अतीत के गहरे जख्मों से रिसते दर्द पर भविष्य के सुखद मानवीय क्षणों का मरहम रखती, ‘निदा नवाज़की कविताएँ……

अँधेरे की पाज़ेब

निदा नबाज़

अँधेरे की पाज़ेब पहन

आती है काली गहरी रात

दादी माँ की कहानियों से झाँकती
नूकीले दांतों वाली चुड़ैल सी
वह मारती रहती है चाबुक
मेरी नींदों की पीठ पर
काँप जाते हैं मेरे सपने
वह आती है जादूगरनी सी
बाल बिखेरती
अपनी आँखों के पिटारों में
अजगर और सांप लिए
मेरी पुतलियों के बरामदे में
करती है मौत का नृति
अतीत के पन्नों पर
लिखती है कालिख
वर्तमान की नसों में
भर देती है डर
भविष्य की दृष्टि को
कर देती है अंधा
मेरे सारे दिव्य-मन्त्र
हो जाते हैं बाँझ
वह घोंप देती है खंजर
मेरे परिचय के सीने में
रो पड़ती है पहाड़ी श्रृंखला
सहम जाता है चिनार
मेरे भीतर जम जाती है
ढेर सारी बर्फ़ एक साथ.

क्रांति-पुष्प

हमारी पीठ पर
क्रूरता के चाबुक से बोई
ज़ख़्मों की फ़सल को
लहलहाते देख
वे हंस रहे हैं
और हम…
हर घाव की ख़ुशबू में उपजे
विद्रोह को देख कर
आश्वस्त हैं
कि आने वाले समय
ख़ुशी से मना पाएंगे हमारे बच्चे
हमारी पीठ के इतिहास पर खिले
क्रान्ति-पुष्प के त्योहार .

दोपहर का अकेला सूरज

नीले समुद्र की लहरों पर
खे रहा है सूरज
अपनी कश्ती
लेकिन मेरे चेहरे पर
अब नहीं खिलती
उसकी दोपहरी मुस्कुराहटें
मैं हर दिन समेटता हूँ
अपने आंगन से
कबूतरों के अधजले पंख
और ताकता रहता हूँ सदैव
अपनी छत का सूनापन
मेरा पूरा पीला समुन्द्र
झांकने लगता है
मेरी तन्नी हुई नसों से बाहर
एक कड़वे सच की तरह
मेरी आँखों में उमड़ आता है
सन्नाटे का सैलाब
और डूब जाती है
हिचकौले खाती
सपनों की आख़री नाव भी
छीन ली जाती है
मेरे आत्मसम्मान की
नाज़ुक मादाएं तक भी
मेरे भीतर रो पड़ता है
अकेला चिनार
ख़ून के आंसू
और धुल जाते हैं
आख़री उम्मीद के पदचिन्ह
आख़री सपनों के बिम्ब
मैं छुप जाता हूँ
छटपटाती मछली जैसा
अपनी मन-पोखरी की
गहराइयों में
चिनार की सारी टहनियाँ
बन जाती हैं उँगुलियाँ
और फैल जाती हैं हैरतें
जड़ों तक भी
मेरी रीढ़ की हड़ी में
भर जाती है
विष की एक एक बूंद
और मेरी आँखों के
लाल समुन्द्र के बीच
कहीं मर जाता है
दोपहर का अकेला सूरज .

विद्रोह

मैंने काले घनघोर मेघों से
कभी रास्तों का पता नहीं पूछा
मैंने रेबीज़ से ग्रस्त कुत्तों से
कभी यारी नहीं गांठी
मैंने कसी भगवान के आगे
कभी नहीं किया कोई मन्त्र पाठ
और न ही मांगी
किसी अंधविश्वास के देवता से
कोई जीवनदान की दुआ
मैं धर्म के दलालों को
जज़िया देने से सदैव इनकारी हुआ
अपनी उम्र के सूर्योदय से लेकर
आज तक
इतिहास की आदम-ख़ोर रात के दौरान
मैं समेटता रहा
रौशनी की एक एक किरन
विद्रोह की एक एक चिंगारी
अपने विवेक का आहार
मैं दर्ज करना चाहता हूँ
रात के गहरे अँधेरे के ख़िलाफ़
एक मशाल-भर विद्रोह .

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