कइयों बार इन सवालों के व्यूह से गुजरा हूं कि आज जब देश आजाद है, विश्व का सबसे बड़ा लोकतंत्र यहां स्थापित है, विश्व की राजनीति में लगातार किसी न किसी रूप में अपनी उपस्थिति दर्ज करा रहा है, कला-सौंदर्य-अंतरिक्ष के क्षेत्र में कामयाबी के झंडे गाड़ रहा है, वहां फिर से भगतसिंह और मुठ़ी भर क्रांतिकारियों को याद करने का क्या मतलब हो सकता है? भगत सिंह पर तो वैसे भी फिल्म बन चुकी है, आजादी की स्वर्ण जयंती पर धड़ा-धड़ सीरियल बन रहे हैं, नाटक लिखे जा चुके हैं, इतिहास की किताबों में ढेरों कहानियां छप चुकी हैं फिर एक नाटक लिखने की जरूरत? कौन नहीं जानता है, सब जानते हैं भगत सिंह की कहानी। सबको पता है, भगतसिंह एक बहादुर इंसान थे, पक्के देशभक्त थे। उन्होंने सांडर्स को मारकर लाला लाजपत राय की हत्या का बदला लिया। पुलिस की आंखों में धूल झोंककर दुर्गा भाभी व उनके पुत्र शची के साथ लाहौर से कलकत्ता गये। सेंट्रल असेम्बली में बम फेंका और गिरफ्तारी देकर हंसते-हंसते फांसी के फंदे पर झूल गये। फिर इस कथा को पुनः दोहराने की क्या आवश्यकता? लोगों को स्मरण दिलाने के लिए एक बार अगर इतिहास दिखला भी दे तो उसकी प्रासंगिकता क्या है? निःसंदेह वे स्मरणीय है, पूजनीय है। उन पर गीत-कवितायें लिखे जा सकते हैं, आजादी के पर्वों पर उनकी कुरबानियों को याद किया जा सकता है पर आज के समाज में जो घट रहा है उथल-पुथल बरकरार हैं उसमें कहां फिट बैठते हैं?  इन्हीं सवालों से जूझने व इसकी तह में जाने की प्रक्रिया की अभिव्यक्ति है यह नाटक ‘अन्तिम युद्ध’ ।

अंतिम युद्ध 

राजेश कुमार

(नाटक )

दृश्य एक 

(मंच पर व्याप्त गहन अँधेरे में बहुत ही हल्की नीली रोशनी के साथ दर्शकों के सम्मुख असेम्बली का दृश्य उभरता है। हॉल में पक्ष-विपक्ष के नेतागण विराजमान हैं। मद्धिम प्रकाश में सफेद रंग की टोपियाँ दिखाई पड़ती हैं। सभी के परिधान सफेद पजामा-कुरता। पक्ष-विपक्ष आपस में बँटे हैं। स्पीकर मंच के पार्श्व केन्द्र में, एक ऊँचे स्थान पर बैठा झुँझलाया-सा दिखता है। असेम्बली में किसी विवादास्पद विषय पर पक्ष-विपक्ष में गरमागरम बहस जारी है। क्या बहस हो रही है, बहस का मुद्दा क्या है, दर्शकों के पल्ले कुछ नहीं पड़ रहा है। सारे शब्द एक-दूसरे से गुत्थमगुत्था हो रहे हैं। दर्शकों तक केवल टुकड़े-टुकड़े शब्द पहुँच पा रहे हैं ,मसलन ‘भ्रष्टाचार, घोटाला, कम्यूनल, सेक्यूलर, चारा, चीनी, हथियार, दवा, स्वाद’ लेकिन असंगत रूप में। एक ऐसे शोर का रूप लिये हुए हैं जैसे घड़े में बहुत सारे कंकड़ डालकर, जोरों से हिला दिया गया हो। दर्शकों के लिए ये शोरगुल थकाने वाली, ऊबाने वाली, झुँझला देने वाली है। साथ में संगीत भी चलता रहता है। संगीत कर्कश, भयावह, विद्रूप है…
असेम्बली हॉल का वह हिस्सा जो दर्शकदीर्घा है, स्पॉट के प्रकाश में धीरे-धीरे आलोकित होने लगता है। अन्य हिस्सा उसी प्रकार झीना-झीना। जब स्पॉट तेज होता है तो वहाँ एक साधारण-सा आदमी नजर आता है। बुजुर्ग है, आँखों पर ऐनक। सर पर लाल रंग की पगड़ी। मूँछ, बढ़ी हुई दाढ़ी। दिखने में सरदार लगता है। लाल रंग का कुरता और अधिक मोहरीवाला पजामा पहने है। कंधे से थैला लटक रहा है, जिसमें ढेर सारे कागज भरे पड़े हैं। सरदार काफी तनाव में है। बेचैनी की मुद्रा में खड़ा है। स्पॉट के प्रकाश में वह कभी दायीं ओर देखता है, कभी बायीं ओर… और फिर उधर, जिधर नेतागण बहस कर रहे हैं। बार-बार वह कुछ बोलना चाह रहा है। पूरी ताकत से अपनी बात उन तक पहुँचाना चाह रहा है, लेकिन शोरगुल, संगीत की तेज ध्वनियों में कोई सुन नहीं रहा है। शब्द जैसे दीवारों से टकरा-टकराकर वापस लौट जा रहे हों…
नेताओं की बहस अब गाली-गलौज में तब्दील होने लगती है। वे एक-दूसरे को ‘चोर-डाकू-लुटेरे- कमीने-बेईमान-भ्रष्टाचारी-दुराचारी’ कहने लगते हैं। गाली-गलौज बढ़कर जूते-चप्पल, सड़े-गले अण्डे-टमाटर फेंकने में बदल जाता है। नेतागण अपने स्थान पर खड़े हो जाते हैं। उनमें से कुछ स्पीकर के टेबल पर चढ़ जाते हैं। बिलकुल अराजक माहौल हो जाता है। बढ़ते-बढ़ते माहौल मारा-पीटी, माइक फेंका-फेंकी, फैटम-फैटी, कपड़ा फाड़ा-फाड़ी का हो जाता है। ‘मारो सालों को, आज ठीक कर देना है, बचाओ-बचाओ’ शब्द गूँजने लगते हैं…
सरदार झुँझलाकर चीखने लगता है। दहाड़ मारते हुए अपनी बात सुनाने का प्रयास करने लगता है। पर व्यर्थ। जब अपनी बात सुना पाने में असमर्थ पाता है तब थैले में हाथ डालता है और असेम्बली हॉल में बम फेंकता है। एक तेज धमाका होता है। इतने जोरों का कि कानों के परदे तक हिल जाते हैं। सरदार बुलंद आवाज के साथ नारे लगता है। ,
सरदार ः  इन्कलाब जिन्दाबाद ! साम्राज्यवाद मुर्दाबाद ! …
(बम के धमाके से हठात् असेम्बली का शोर थम जाता है। एक क्षण के लिए सब फ्रीज्ड। डर के मारे वहाँ से भागने लगते हैं। बम के फटने से जो नीला धुंआ निकला है, पूरे हॉल में भर जाता है। धीरे-धीरे जब साफ होता है तो असेम्बली हॉल बिल्कुल खाली दिखता है। केवल सरदार अपने स्थान पर दृढ़ अटल भाव में खड़ा है। थैले से लाल रंग के परचे निकालकर असेम्बली हॉल में फेंकता है। ) ,
बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की जरूरत  होती है…
(पुलिस धड़धड़ाते हुए प्रवेश करती है। ),
पुलिसगण ः खबरदार, अपनी जगह से हिलना नहीं।
(पुलिस घेर लेती है। ,) 
सरदार ः इन शब्दों को आजादी के पहले सरदार भगतसिंह ने इसी असेम्बली हॉल में कहा था… आजादी के बाद वही शब्द आज मैं दुहरा रहा हूँ…
पुलिसगण ः (चौंककर) सरदार भगतसिंह!
पुलिस 1 ः कौन भगतसिंह ?
पुलिस 2 ः कहाँ रहता है ये भगतसिंह ?
पुलिस 3 ः किस पार्टी का है ये भगतसिंह ?
सरदार ः (आश्चर्य से) तुम भगतसिंह को नहीं जानते!
पुलिस 3 ः ओय, हम किसी भगतसिंह-वगतसिंह को नहीं जानते।
सरदार ः तुमने स्वतन्त्रता-संग्राम का इतिहास पढ़ा नहीं ?
पुलिस 3 ः हमको क्या कुत्ते ने काटा है जो इतिहास पढ़ूँ ? स्वतन्त्रता संग्राम के लोगों को जानते चलूँ ? खुद ही ओढ़ो और बिछाओ अपने इतिहास को। सब चोंचले हैं। (व्यंग्य से) यहाँ तो लुटियाचोर भी फ्रीडम फाइटर का सर्टीफिकेट लिये घूम रहा है। चोर-पॉकेटमार-बटरमार जो भी जेल गया, स्वतन्त्रता सेनानी का पेंशन पा रहा है। खाने-पीने, आने-जाने का कन्सेशन पा रहा है…
पुलिस 2 ः और क्या, होंगे उन्हीं में से तुम्हारे ये भगतसिंह…
पुलिस 1 ः करते होंगे चोरी-डकैती…
पुलिस 2 ः एकाध मर्डर-वर्डर भी किया होगा…
पुलिस 3 ः और ऐसे क्रिमिनल, टेरेरिस्ट आजकल कहाँ नहीं मिलते ? एक ढूँढ़ो, हजार मिलेंगे। हर जिले, हर राज्य में। पंजाब, कश्मीर, असम…
(नेताओं का प्रवेश ),
नेता 1 ः (सरदार से) कहीं तुम उस आतंकवादी भगतसिंह की बात तो
नहीं कर रहे जिसे अंग्रेजों ने फाँसी पर लटका दिया था ?
नेता 2 ः जो आतंकवाद के रास्ते से मुल्क को आजाद कराना चाहता था?
नेता 3 ः हिंसा के सहारे राजसत्ता दखल करना चाहता था ?
नेता 1 ः पर रामजी की कृपा से वो तो अहिंसा के रास्ते से कब का पूरा हो गया। वो गाना है न… दे दी हमें आजादी बिना खड्ग, बिना ढाल…
नेता 2 ः माउण्टबेटन तूने, हम पे कर दिया उपकार। (सबका ठहाका) नहीं तो लटकी रहती आजादी कुछ सालों के लिए और…
नेता 3 ः और जब आजादी मिल गई तो फिर भगतसिंह की क्या जरूरत? अब तो जनतन्त्र आ गया है, फिर उसके समाजवाद की क्या जरूरत ? वो तो कब का अप्रासंगिक हो चुका है। इरेलिवेण्ट। (नीचे पड़े एक परचे को उठाकर) फिर इस परचे की जरूरत? (परचा पढ़ता है)… जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएँ और जनता को शोषण और दमन के विरुद्ध क्रान्ति के लिए तैयार करें… (चौंककर, सरदार की तरफ पलटकर) पार्लियामेण्ट का बॉयकॉट!… जनतन्त्र पर अविश्वास!… क्या है ये ?
नेता 1 ः आखिर तुम चाहते क्या हो ?
सरदार ः शहीदों के सपनों को पूरा करना…
नेता 3 ः तो का बूझते हो, हम यहाँ बैठे झक मार रहे हैं का ? पचास साल से यही तो कर रहे हैं पार्लियामेण्ट में बैठकर। एक लम्बा प्रोसेस है भाई। टाइम तो लगबे करेगा।… हम समाजवादी ढंग से पूरा कर रहे हैं… (नेता 2 से) हमारे ई मित्र, राष्ट्रवादी ढंग से पूरा कर रहे हैं। (नेता 1 से) और उ हमारे सेक्यूलर मित्र, हिंसावादी ढंग से।… सबके रास्ते अलग हैं, पर मोटिव एक है… का ?
तीनों ः सपने।
सरदार ः कौन-से सपने ?
नेता 1 ः घर-घर कम्प्यूटर पहुँचाने के सपने…
सरदार ः उदारीकरण के नाम पर देश को फिर से गुलाम बनाने के सपने?
नेता 2 ः एक-एक के हाथ में सेल्यूलर थमाने के सपने…
सरदार ः पैर तले की जमीन खींचकर लोगों को हवा में लटकाने के सपने?
नेता 3 ः जगह-जगह मन्दिर-मस्जिद बनवाने के सपने…
सरदार ः आदमी को आदमी के खिलाफ लड़ाकर, उसके खून से वोट की फसलें उगाने के सपने ?
नेता 1 ः विदेशी चैनलों द्वारा रंग-बिरंगी दुनिया दिखाने के सपने…
सरदार ः घर के अन्दर बाजार प्रवेश कराने के सपने ?… बाजार के पीछे पागलों की तरह दौड़ लगाने… खण्ड-विखण्ड होते मूल्यों के सपने ?
नेता 3 ः ओए का बकर-बकर कर रहा है तू ? मेरे को तो तेरे ये सपने… सपने कम, खुराफात ज्यादा नजर आता है।
नेता 2 ः तुम्हारे बम के क से एनारकिंज्म की गंध आ रही है…
नेता 1 ः तुम्हारे आदर्श में हिंसा की भयानक प्रतिच्छाया दिख रही है…
नेता 3 ः का बात है, कौन है तू ?
पुलिस 1 ः (तेजी से सरदार के पास आकर। ग्रेनेड तानते हुए) कहीं तू उग्रवादी तो नहीं ?
पुलिस 1 ः अराजकतावादी तो नहीं ?
पुलिस 3 ः तो आतंकवादी जरूर होगा।
सरदार ः (चीख पड़ता है) नहीं ऽ ऽ ऽ…
पुलिस 3 ः लो जी, कर लो गल्ल ! सरदार है, केदाँ आतंकवादी
नहीं हूँ।
सब हँस पड़ते हैं। ,
सरदार ः (पूरी ताकत से) हाँ, मैं आतंकवादी नहीं हूँ। मैं क्रांतिकारी हूँ। और क्रान्ति आतंकवाद नहीं है। हमारी क्रान्ति का अर्थ न तो रक्तपात है और न व्यक्तिगत द्वेष। और न बम या पिस्तौल ही है। हमारे क्रान्ति का अभिप्राय है, अन्याय पर आधारित मौजूद व्यवस्था में आमूल परिवर्तन। ऐसी समाज की स्थापना जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य हो।
पुलिस 3 ः (पुलिस 1 से) गुरु, ये तो नक्सलियों जैसी भाषा बोल रहा है ?
सरदार ः ये भगतसिंह के विचार हैं। और जब ये शब्द बनकर आते हैं तो सत्ता तक हिल जाती है।
नेता ः लेकिन अब क्यों हिलेगी, अब वतन आजाद है।
सरदार ः शोषण से मुक्ति के बिना आजादी का कोई अर्थ नहीं। उनकी आजादी का उद्देश्य ये नहीं था कि लॉर्ड रीडिंग या इरविन की जगह तेजबहादुर या पुरुषोत्तम दास, ठाकुर दास को गद्दी पर बिठा दिया जाए।
नेता 1 ः (नेता 2 से) भइया, ये तो बड़ी खतरनाक बातें कर रहा है।
नेता 2 ः लोगों का मालूम पड़ गया तो दिल्ली से खदेड़ते देर नहीं लगेगी।
नेता 3 ः बौने पड़ जाएँगे हमारे गढ़े हुए नेताओं के कद।
नेता 1 ः मैं तो कहता हूँ, भइया कुछ करो, सोचो-विचारों…
नेता 2 ः वरना ये भगतसिंह हमारे लिए खतरा बन सकता है।
पुलिस 1 ः कहिए तो हुजूर, रासुका-इस्मा लगा दूँ…
पुलिस 2 ः स्साले को गुंडा-एक्ट में अन्दर कर दूँ…
पुलिस 3 ः टाडा में बन्द कर दूँ…
पुलिस 1 ः जेल भेज दूँ…
पुलिस 2 ः आजीवन कारावास…
पुलिस 3 ः फाँसी…
सरदार ः भगतसिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फाँसी की।
यदि जनता की बात करोगे तुम गद्दार कहलाओगे
बम्ब-सम्ब की छोड़ो भाषण दिया कि पकड़े जाओगे।
निकला है कानून नया चुटकी बजाते बंध जाओगे
न्याय अदालत की मत पूछो, सीधे ‘मुक्ति’ पाओगे।
सत्य-अहिंसा का शासन है, राम-राज्य फिर आया है
भेड़- भेडि़ये एक घाट हैं सब ईश्वर की माया है।
पहनेगी हथकड़ी भवानी रानी लक्ष्मी झाँसी की
भगतसिंह इस बार न लेना काया भारतवासी की
देशभक्ति के लिए आज भी सज़ा मिलेगी फाँसी…
शंकर शैलेन्द्र की कविता सुना ही रहा
था कि पुलिस डपट पड़ती है। ,
पुलिसगण ः बन्द करो ये गाना!
सरदार ः क्यों, डर लगता है ?
पुलिस 1 ः यह प्रतिबंधित है।
पुलिस 2 ः सरकार के खिलाफ आम आदमी में घृणा जगाती है।
सरदार ः घृणा नहीं, चेतना कहो।
पुलिस 3 ः चेतना गई तेल लेने, हम ये गाना नहीं गाने देंगे।
सरदार ः हम गाएँगे, लोगों को सुनाएँगे।
पुलिसगण ः हम सुनाने दें तब न !
सरदार ः हम भगतसिंह को जन-जन तक पहुँचाएँगे।
पुलिस 3 ः हमारी मर्जी के खिलाफ पत्ता तक नहीं हिल सकता, ये भगतसिंह किस खेत की मूली है ?
नेता 1 ः तुम कहो तो भगतसिंह को हीरो बना दें…
नेता 2 ः पार्लियामेण्ट में अगर फोटो नहीं लगा हो तो, फोटो लगवा दें…
नेता 3 ः गली-नुक्कड़-चौराहे पर मूर्ति लगवा दें, स्टेच्यू…
नेता 2 ः आदमी का भगवान बना दें, घर-घर पूजा करवा दें…
नेता 1 ः पर तुम कहोगे कि उनकी विचारधारा को जन-जन तक पहुँचा दें…
सब ः वो हरगिज ना होने देंगे।
सरदार ः लेकिन हम भगतसिंह की विचारधारा को जनता के बीच जरूर ले जाएँगे। गाँव-शहर के गली-नुक्कड़-चौराहों की दीवारों पर हम लाल रंग से लिखेंगे… शहीद भगतसिंह दी राह, साडी राह।
सब ः (डपटकर) साडी राह, शिट!
सरदार ः सुनो, देश के लोगों सुनो ऽ ऽ…
सब ः चोप्प !
सरदार ः भगतसिंह की सुनो ऽ ऽ…
आगे बढ़कर दर्शकों को सुनाना चाहता है कि पुलिस दौड़कर पीछे से दबोच लेती है। सरदार जोर लगाते हुए दर्शकों के बिल्कुल समीप जा पहुँचता है और आर्तनाद करता है।
नेतागण बापू के बन्दर की मुद्रा बनाकर एक कोने में स्थिर हो जाते हैं। सरदार के आर्तनाद के साथ अन्धकार। ,

दृश्य दो

 

अँधेरे में ही बहुत सारे लोगों की सम्मिलित आवाज उभरती है जो कि नारे के रूप में है। ,
(नारा) ः साइमन कमीशन गो बैक, गो बैक, गो बैक ऽ ऽ…
(लाहौर स्टेशन पर साइमन कमीशन की टीम पहुँचने वाली है। विरोध में सारा शहर एकजुट है। लाहौर के हर गली-मुहल्ले से कमीशन के विरोध में जनता उमड़ पड़ी है। नारों के साथ लोग मंच के विभिन्न कोनों से निकल-निकलकर एक जगह जुटते हैं और जुलूस का रूप ले लेते हैं। जुलूस में सबसे आगे लाल लाजपतराय हैं जिन्हें नौजवान भारत सभा के युवक अपने घेरे में किए हुए हैं। भगतसिंह उनके ऊपर छतरी ताने हुए हैं। राजगुरू, सुखदेव तथा अन्य साथी उनके अगल-बगल हैं। जुलूस मंच का एक चक्कर लगाकर केन्द्र में रुकता है। लोग झण्डे लहरा-लहराकर नारे लगा रहे हैं।
मंच के बायें तरफ जो स्टेशन का हिस्सा है, उस तरफ से पुलिस सुपरिंटेण्डेण्ट मिस्टर स्कॉट, डी.एस.पी. सांडर्स व कुछ पुलिस निकलकर आते हैं। सामने इतनी बड़ी भीड़ को देखकर स्कॉट एक क्षण के लिए हक्का-बक्का रह जाता है। ,
स्कॉट ः ओऽ गॉड ! सो क्राउड ! लगता है सारा लाहौर ही स्टेशन पर जमा हो गया है।
भीड़ काले झण्डे दिखाती है। ,
भीड़ ः साइमन कमीशन गो बैक, गो बैक ऽ ऽ…
स्कॉट ः अगेन गो बैक! (सांडर्स की तरफ पलटकर) ह्वाट इज दिस ? ह्वाट इज दिस मिस्टर सांडर्स ? यही इन्तजाम है तुम्हारा ? इस तरह वैलकम करेंगे साइमन कमीशन का ?
सांडर्स ः सर-सर ऽ ऽ…
स्कॉट ः (झल्लाकर) ह्वाट सर ?… सर साइमन इंग्लैण्ड जाकर गवर्नमेण्ट को यही रिपोर्ट सबमिट करेगा। कमीशन का बॉयकॉट रिपोर्ट?… गवर्नमेण्ट ने इण्डियन पब्लिक की आँखों में धूल झोंकने के लिए कमीशन भेजा था लेकिन धूल तो हमारी आँखों में ही पड़ गया। जहाँ-जहाँ कमीशन गया… सेम स्लोगन, सेम रिपरकेशन…
भीड़ ः गो बैक, गो बैक ऽ ऽ…
स्कॉट ः गो बैक, माई फुट !
सांडर्स ः जगह-जगह बैरियर लगाए, नाकेबन्दी की, पूरे लाहौर को छावनी में बदल दिया, पर सब फेल। पता नहीं कहाँ से इडियट निकलकर आ गए ?
स्कॉट ः इण्डियन सॉयक्लॉजी का कुछ पता नहीं चलता मिस्टर सांडर्स? हमने सोचा था, ये कम्यूनल राइट्स में फँसे होंगे। कास्ट, रिलीजन के कन्ट्रोवर्सी में इन्वाल्व होंगे, पर स्ट्रेंज। साइमन कमीशन इण्डिया क्या आया, ब्लडी सोए से जग गए। कमीशन बाम्ॅबे पहुँचा…
भीड़ ः साइमन कमीशन गो बैक…
स्कॉट ः गो बैक का नारा। कमीशन दिल्ली पहुँचा…
भीड़ काले झण्डे दिखाती है। ,
स्कॉट ः दिल्ली में काले झण्डे। मद्रास में तो नौबत फायर करने तक आ गई। तीन प्रदर्शनकारी मारे गए। कलकत्ता में भी काफी तगड़ी मुठभेड़ हुई। नाकों चने चबा दिया, दिज ब्लैक बास्टर्ड इण्डियन्स ने।
सांडर्स ः यहाँ भी यही हाल है। लाहौर का बच्चा-बच्चा नारे लगा रहा है।
भीड़ ः साइमन कमीशन गो बैक… गो बैक ऽ ऽ…
स्कॉट ः (झुँझलाकर) स्टॉप…स्टॉप दिस नॉनसेंस। (सांडर्स से) मुँह क्या देखता है, हटाओ इन लोगों को यहाँ से, दूर करो। जब तक लालाजी और नौजवान भारत सभा की टोली यहाँ से नहीं हटेगी, कमीशन के मेम्बरानों को जाने का सेफ रास्ता नहीं मिल सकेगा। रास्ता साफ करो। जरूरत पड़े तो भीड़ पर लाठी चार्ज भी करो, लेकिन करो…
सांडर्स ः ठीक है सर, ऐसा ही होगा… (तेज कदमों से जुलूस के करीब जाता है। घूम-घूमकर ऐलान करता है) सुनो, लाहौरवासियों मेरी बात ध्यान से सुनो। साइमन कमीशन आ चुका है। उसे जाने का रास्ता दो। लौट जाओ अपने-अपने घर। बन्द करो नारे। वरना किसी भी कार्यवाही के जिम्मेदार तुम्हीं होंगे…
भीड़ ः साइमन कमीशन वापस जाओ…
सांडर्स ः देखो, तुम्हारा प्रदर्शन गैर-कानूनी है। सारे शहर में धारा 144 लागू है।
भीड़ ः वापस जाओ-वापस जाओ… साइमन कमीशन वापिस जाओ।
सांडर्स ः भीड़ को हुक्म दिया जाता है कि छँट जाए… लौट जाए, वरना लाठी चलाने का आर्डर दे दिया जाएगा।
भीड़ ः वापस जाओ, वापस जाओ…
सांडर्स ः गिरफ्तार कर लिए जाओगे।
भीड़ ः वापस जाओ ऽ ऽ…
सांडर्स ः जेल होगी।
भीड़ ः वापस ऽ ऽ…
सांडर्स ः सजा मिलेगी।
भीड़ ः वापस ऽ ऽ…
सांडर्स ः लाठी चार्ज ऽ ऽ…
पुलिस लाठी लेकर जुलूस पर पिल पड़ती है। भगदड़ मच जाती है। भीड़ तितर-बितर होने लगती है। कभी पीछे हटती है, कभी आगे बढ़ती है। बिखरती है, बिखरकर फिर टुकड़ों में जुटती है। कोई टोली इधर तो कोई उधर।
लाला लाजपत राय अभी भी अपनी जगह पर डटे हैं। पुलिस लालाजी और उनको घेरे में लिये, नौजवान भारत सभा के युवकों को खदेड़ने का प्रयास करती है, पर उनके पीछे हटने की कोई गुंजाइश नहीं है। प्रदर्शन का मोर्चा ज्यों का त्यों बरकरार है। लोग गगनभेदी नारों के साथ एक बार फिर एकत्रित हो पंक्तिबद्ध होकर बढ़ना शुरू करते हैं। सांडर्स को यह भीड़ एक सैलाब की तरह बढ़ती नजर आती है।
पुलिस डण्डों के सहारे भीड़ को धकेलने लगती है पर भीड़ असहमत है। धक्कम-मुक्की बरकरार है। बल्कि भीड़ कुछ जगहों से डण्डों का घेरा तोड़कर लगती है। भीड़ बेकाबू हो जाती है।
यह देखकर सांडर्स अपना आपा खो बैठता है। एक पुलिसवाले के हाथ से डण्डा लेकर भीड़ की तरफ पगलाए हुए दौड़ पड़ता है। बाज की तरह निहत्थी जनता पर टूट पड़ता है। लोग भागने लगते हैं। ,
लालाजी ः (भीड़ को हाथ से इशारा करते हुए) ठहरो, ठहरो ऽ ऽ…भागो नहीं, बरतानिया जुल्म और हैवानियत का मुकाबला करो। ये पंजाब केसरी का ऐलान है। सुनो… सुनो ऽ ऽ…
जनता उनके आह्वान पर फिर जुटने लगती है। नारे लगाते हुए बढ़ने लगती है… देखकर सांडर्स पगला-सा जाता है। सामने से आ रहे लालाजी पर लाठी चलाता है। नौजवान भारत सभा के युवक रोकने के लिए हाथ बढ़ाते हैं पर लाठी के वार से लालाजी के ऊपर तनी हुई छतरी टूट जाती है। सांडर्स दूसरी लाठी चलाता है जो लालाजी के कन्धे पर बैठती है। लाला लाजपत राय लहू-लुहान हो जाते हैं, लड़खड़ाकर गिरने को होते हैं कि भगतसिंह थाम लेते हैं। ,
भगतसिंह ः सुखदेव, लालाजी को मैं सम्भालता हूँ। तू मोरचा सम्भाल।
राजगुरू ः हाँ, मोरचा टूटने न पाए…
सुखदेव ः मोरचा नहीं टूटेगा राजगुरू, न पीछे हटेगा। बढ़ता रहेगा, आगे और आगे…
भीड़ ः साइमन कमीशन वापस जाओ…
सुखेदव ः यह हिन्दुस्तान सिर्फ हिन्दुस्तानियों के लिए है। हम किसी भी विदेशी को यहाँ नहीं रहने देंगे।
भीड़ ः वापस जाओ, वापस जाओ…
भीड़ को आक्रामक होते देखकर लाला लाजपत राय आवाज देते हैं। ,
लालाजी ः ठहरो ! रुको !
भगतसिंह ः क्या हुआ लालाजी ?
लालाजी ः सरदार रोको लोगों को, आगे बढ़ने से रोको…
सुखेदव ः मगर क्यों ?
लालाजी ः पुलिस की जालिमाना हरकत की मुखालफत में मुजाहिरे को मुअत्तल कर दिया जाए।
भगतसिंह ः (भौंचक्क होकर) ये क्या कह रहे हैं लालाजी ?
लालाजी ः सरदार, ये मेरा हुक्म है। (जुलूस के लोग इधर-उधर घायल पड़े हैं। किसी का सर फटा है, किसी का हाथ टूटा हुआ है। कोई उठने में असमर्थ हैं तो कोई पड़ा-पड़ा कराह रहा है।
लाल लाजपतराय के माथे से खून बह रहा है। चल पाने में परेशानी हो रही है। नौजवान भारत सभा के युवकों का सहारा लेकर बढ़ते हुए एक ऊँचे स्थान पर खड़े होते हैं। आँखें लाल हैं। गुस्से से शरीर काँप रहा है। सामने सभा में बैठे हुए लोगों को देखकर बुलन्द आवाज में बोलना प्रारम्भ करते हैं। स्वर में तल्खी है) सर जॉन साइमन… और कमीशन के सातों अंग्रेज मेम्बरानों ! देखो, देखो इस जनसमुदाय को। तुम सोचते होगे, लाठी-गोली से जनता की जुबान बन्द कर दोगे। तुम सोचते होगे, कानून की मोटी-मोटी किताबों से अवाम की रफ्तार रोक लोगे। रोक लिया ? बाँध लिया जन-ज्वार को ? देखो, चारों तरफ… जन और जन। और जन ने आज सुना दिया फैसला। भारत में शासन सुधार की रिपोर्ट तुम क्या जमा करोगे ? रिपोर्ट जनता ने लिख दी, अपने खून के कतरों से। लिख दिया, साइमन कमीशन धोखा है, साइमन कमीशन फरेब है। कमीशन के भूलभुलैया में जनता अब नहीं फँसने को। जनता जाग चुकी है। और जो सरकार जगी हुई निहत्थी जनता पर इस तरह जालिमाना हमले करती है, उसे तहजीबयाफ्ता सरकार नहीं कहा जा सकता और ऐसी सरकार हरगिज कायम नहीं रह सकती। (भीड़ में नारे। पीछे खड़े कुछ पुलिसवालों को देखकर)… यहाँ कई अंग्रेज अफसरान दिख रहे हैं… मैं, पंजाब केसरी उन्हें सुनाकर कह रहा हूँ… आई डिक्लेयर दैट द ब्लोज स्ट्रक ऐट मी, विल बी द लास्ट नेल इन दा कॉफिन आॅफ द ब्रिटिश रूल इन इंडिया ऽ ऽ…
भीड़ में कुछ लोग तालियाँ बजाते हैं। धीरे-धीरे और लोग भी बजाने लगते हैं। यह सिलसिला क्रमशः तेज होते जाता है और पूरा वातावरण तालियों की आवाज से गुँजायमान हो जाता है। ,

दृश्य तीन

 

दो-तीन छोटे-छोटे अलग प्रकाशवृत्तोंं में भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव और चन्द्रशेखर आजाद दिखते हैं। निर्जन स्थान है। किसी खंडहर की सीढि़यों पर, ऊपर-नीचे असन्तुलित क्रम में निशाना लेने की मुद्रा में स्थित है। सभी के हाथ में एयर पिस्टल है। निशानेबाजी का अभ्यास कर रहे हैं। भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव निशाना साधे हुए हैं। आजाद तीनों के पीछे खड़े होकर निर्देश देने की मुद्रा में। तीनों के पिस्टलों का रुख दर्शकों की तरफ से घूमते हुए मंच के एक कोने की तरफ जाकर थम जाता है। तीनों काफी तनाव में हैं। चेहरा पसीने से चुहचुहाया
हुआ। ,
राजगुरू ः लालाजी मर गए।
भगतसिंह ः मरे नहीं हैं, मारे गए हैं। खून हुआ है लालाजी का।
सुखदेव ः सारा लाहौर चिता के साथ धू-धू कर जल रहा है…
आजाद ः धधक यहाँ तक आ रही है…
भगतसिंह ः और जला रही है अन्दर बैठी प्रतिशोध की ज्वाला को। तपिश में इतनी गरमी है कि लगता है सारे जंगल को जलाकर राख कर देगी।
सुखेदव ः हमारे भी खूँ का असर देख लेना, मिटा देंगे जालिम का घर देख लेना।
राजगुरू ः लेकिन क्यों ? हमारा तो उनसे आइडियालॉजिकल डिफरेंस था।
भगतसिंह ः था राजगुरू, था।
आजाद ः मतभेद जरूर था, पर थे तो वे हमारे बापू ही। जवान बेटों की मौजूदगी में बूढ़े बाप पर दुश्मन प्रहार करे, उसकी चोट से बाप मर जाए, तब भी बेटों का खून न उबले और बाप की मौत का बदला लेने का निश्चय न करे तो उन बेटों के लिए लानत के सिवा और कोई क्या कह सकता है।
भगतसिंह ः लालाजी की मौत एक व्यक्ति की मौत नहीं है। एक राष्ट्र का अपमान है।
आजाद ः और इस अपमान का बदला हम जरूर लेंगे।
भगतसिंह ः सुखदेव! माँ की सौगन्ध, मैं इस खून का बदला लूँगा।
सुखदेव ः हाँ, हम इस खून का बदला खून से लेंगे।
भगतसिंह ः इस सरकार को बस एक ही भाषा समझ में आती है, खून का बदला खून।
राजगुरू ः बासन्ती देवी ने नौजवानों को ललकारा है कि लालाजी की चिता की राख ठण्डा होने से पहले ही यह देश इस राष्ट्रीय अपमान का जवाब चाहता है।
आजाद ः जवाब मिलेगा और जरूर मिलेगा…
राजगुरू ः चितरंजन दास ने कहा है, क्या देश में मानवता व जवानी अभी बाकी है ? क्या नौजवानों की रगों का खून सफेद पड़ गया है, भारत माँ के सपूतों के कलेजे काले पड़ गए हैं। नहीं… पण्डित जी, अब मुझे बर्दाश्त नहीं होता। यह धरती जिस पर लालाजी के जख्मों के निशान अभी भी बाकी है, हमसे कुछ कह रही है। सुनिए पण्डित जी, क्या कह रही है ? कह रही है, भारत माँ के लालों ने अपने हाथों में चूडि़यां पहन ली हैं… कह रही है, लानत है ऐसी जवानी पर जो अपने देश के सिपाहियों की मौत का नंगा नाच देखकर भी चुप है।
आजाद ः राजगुरू, जवानी का नजारा तो हम दिखाएँगे। और वो नजारा ऐसा होगा कि सारी दुनिया देखेगी।
सुखदेव ः देखेगी कि जो जख्म लालाजी के दिलों में हुए थे, उससे भी गहरा जख्म हम व्यवस्था के दिलों में देंगे।
भगतसिंह ः साइमन कमीशन में तो हम चुक गए। साधनों की कमी से एक्शन को अंजाम न दे सके। पर ये मौका हाथ से नहीं जाना चाहिए। यही मौका है चोट करने का। राष्ट्रीय अपमान का बदला लेने का। जनता के क्रोध को शान्त कर, जनाधार को अपनी तरफ मोड़ लेने का…
राजगुरू ः तो देर किस बात की ? पण्डित जी योजना बनाइए।
आजाद ः धीरज धरो राजगुरू।
राजगुरू ः लेकिन पण्डित जी, मारूँगा मैं ही…
आजाद ः पहले निशाना तो लो।
तीनों निशाने की मुद्रा में आ जाते हैं। ,
तीनों ः ले लिया!
आजाद ः न इधर देखो, न उधर… हमेशा लक्ष्य पर दृष्टि रखो।
तीनों ः है !
आजाद ः दिखा ?
भगतसिंह ः दिख रहा है…
सुखेदव ः लक्ष्य दिख रहा है…
राजगुरू ः सब कुछ साफ-साफ दिख रहा है…
आजाद ः ऐम ऽ ऽ…
तीनों ः यस !
आजाद ः शूट ऽ ऽ…
तीनों एक साथ फायर करते हैं। गोलियों की आवाज से सारा वातावरण गूँज उठता है। अँधेरे में कुछ क्षण तक फायर की आवाज चलती रहती है। ,

दृश्य चार

 

जब प्रकाश आता है, पुलिस-दफ्तर के बाहर एक सिपाही बन्दूक थामे पहरा देता हुआ दिखाई देता है। शाम का समय है। लाल रंग की एक मोटरसाइकिल दफ्तर के बाहर एक कोने में खड़ी है।
जयगोपाल साइकिल चलाते हुए आता है। पुलिस-दफ्तर के सामने जानबूझकर सामने से आ रहे एक आदमी को टक्कर मार देता है। साइकिल से गिर जाता है। उठकर साइकिल को स्टैण्ड पर खड़ा कर देता है। झुककर साइकिल दुरुस्त करने का बहाना करने लगता है।
राजगुरू को साइकिल चलाना नहीं आता है, इसलिए पैदल ही आते हैं। चन्द्रशेखर आजाद और भगतसिंह साईकिलों पर सवार होकर आते हैं। एक कोने में साइकिल रोककर खड़ी कर देते हैं। भगतसिंह राजगुरू के पास आते हैं। भगतसिंह ने बाकायदा एक सिख युवक की तरह साफे बाँध रखा है।
आजाद दूसरे स्थान पर जाकर घटनास्थल को ध्यानपूर्वक देखते हैं। जेब में रखी माउजर को हाथ से टटोलते हैं। आश्वस्त होते हैं। आँखों ही आँखों में एक-दूसरे को देखते हैं और इशारा करते हैं कि तैयार हो जाएँ। कुछ क्षण के लिए सन्नाटा। चुप्पी। ,
राजगुरू ः (आजाद के पास आकर) पण्डित जी, कहिए तो, स्साले को अन्दर ही जाकर ठीक किए आता हूँ।
आजाद ः (आँखें तरेरते हुए) ज्यादा बड़-बड़ न किया कर। जा अपनी जगह पर और इन्तजार कर।
राजगुरू अपने स्थान पर चले जाते हैं और प्रतीक्षा करने लगते हैं। मंच पर थोड़ा अँधेरा होने लगता है।
दफ्तर के बाहर खड़ा सिपाही हरकत में आता है। अन्दर से आ रहे पुलिस अफसर को देखकर जोर से सेल्यूट मारता है। ,
राजगुरू ः लगता है, स्कॉट आ रहा है…
भगतसिंह ः जयगोपाल इशारा करेगा…
दफ्तर के अन्दर से सांडर्स निकलता है। आँखों पर काला चश्मा लगाए है। सर पर टोपा पहने है। फाटक के पास आकर रूकता है। जेब से सिगरेट निकालकर मुँह में दबाता है। सुलगाता है। एक कश खींचकर मोटरसाइकिल की तरफ बढ़ता है। ,
राजगुरू ः हाँ, स्कॉट ही है… (जयगोपाल रूमाल हिलाकर इशारा करता है। भगतसिंह, राजगुरू एलर्ट हो जाते हैं) हाँ, यही है कातिल।
भगतसिंह ः चल, हो गया इशारा।
सांडर्स चाबी डालकर किक मारता है। मोटरसाइकिल स्टार्ट हो जाती है। एक्सलेटर लेता हे। जोर-जोर से आवाज होने लगती है। ज्यों गियर लगाकर बढ़ने को होता है कि राजगुरू अपनी जगह से निकलकर तेज गति से उसकी तरफ दौड़ते हैं। सड़क पर जा रहे एक आदमी से टकराते हैं पर उसे धक्का देकर बगल हटा देते हैं और दौड़ाते हुए ठीक उसके सामने आ जाते हैं। पिस्तौल सांडर्स पर तान देते हैं। निशाना लेते हैं। पिस्तौल देखकर यक-ब-यक सांडर्स किंकर्तव्यविमूढ़ हो जाता है। ,
राजगुरू ः (चीखकर) कातिल।
फायर करते हैं। गोली सांडर्स के सर पर लगती है। सांडर्स मोटरसाइकिल समेत वहीं गिर पड़ता है। लेकिन फुर्ती से पलटकर जेब से पिस्टल निकाल लेता है। तब तक भगतसिंह भी अपन स्थान से निकलकर दौड़ते हुए वहाँ आ जाते हैं, पिस्तौल उस पर तान देते हैं। ,
भगतसिंह ः हत्यारे। (फायर करते हैं) लालाजी के हत्यारे! (दूसरी गोली) पंजाबकेसरी के हत्यारे! (तीसरी गोली) शेरे पंजाब के हत्यारे! (चौथी गोली) राष्ट्रीय सम्मान के हत्यारे! (पांचवीं गोली)
सांडर्स का सिर ही नहीं, कन्धे तक छिद जाते हैं। वह वहीं ढेर हो जाता है। दफ्तर के बाहर ड्यूटी पर तैनात सिपाही यह सब देखकर अकबका-सा जाता है। नर्वस होकर चिल्लाने लगता है। ,
सिपाही ः ओए बिल्लो, ओए ढिल्लो।… ओए बलविन्दर, जोगिन्दर, ओए सुखविन्दर… दौड़-दौड़। जल्दी बाहर आ।… अरे हत्यारों ने गोली मार दिया सांडर्स बाबू नूँ। अरे बचाओ-बचाओ ऽ ऽ…
इंस्पेक्टर फर्न और दो सिपाही अन्दर से दौड़े हुए आते हैं। ,
इंस्पेक्टर ः पकड़ो सालों को, भागकर जाने न पाए।
भगतसिंह और राजगुरू को पकड़ने के लिए लपकते हैं। ,
भगतसिंह ः राजगुरू भाग। आजाद सम्भाल लेंगे।
इंस्पेक्टर और दोनों सिपाही उनके पीछे दौड़ते हैं।)
इंस्पेक्टर ः ठहर स्साले ठहर…
भगतसिंह पैरों की आहट से अचानक रुकते हैं और मुड़कर तेजी से उस पर फायर करते हैं। निशाना इंस्पेक्टर फर्न पर। लेकिन वह बचने की कोशिश में फौरन लुढ़क जाता है। पिस्तौल छूटकर दूर गिर जाता है। उसके गिरते ही दोनाें सिपाही वहीं ठहर जाते हैं। ,
भगतसिंह ः (फर्न पर निशाना लेते हुए) ठहरने के लिए कह रहा था, अभी ठहराता हूँ…
भगतसिंह मारने के लिए पिस्तौल का ट्रेगर दबाने को होते हैं कि आजाद भागकर वहाँ पहुँचते हैं। ,
आजाद ः ये क्या कर रहा है ? (आजाद झट पिस्तौल वाला हाथ ऊपर कर देते हैं। फायर की आवाज। भगत सिंह और राजगुरू को अचानक जैसे होश आता है। कड़क स्वर में आजाद हुक्म देते हुए) चलो।
दोनों मुड़कर चल पड़ते हैं। तभी हेड कांस्टेबल चाननसिंह गालियाँ बकता हुआ उनके पीछे भागता है। वह गुस्से में इतना अन्धा हो रहा है कि भागते-भागते भी गालियाँ बक रहा है। ,
चाननसिंह ः ओए खोते दे पुत्तर, भागता कहाँ है ? कुत्ते दा पिल्ला ठहर, ठहर। एक-एक को देख लूँगा, माँ के याराें !…
आजाद पलटते हैं। रास्ता रोककर खड़े हो जाते हैं। राइफल की तरह माउजर निकालकर तान देते हैं। ,
आजाद ः ऐ, पीछे हटो, भागो। नहीं तो उसका अंजाम बुरा होगा।
चाननसिंह ः ओय गीदड़ की औलाद, तेरा भेजा तो ठिकाने पर है ? तू हेड कांस्टेबल चाननसिंह को धमकी देता है…
आजाद ः धमकी नहीं, गोली भी मार देता हूँ।
चाननसिंह ः तो मार। मैं मौत से नहीं डरता।
आजाद ः जोश में होश मत खो। हमारी तुमसे कोई दुश्मनी नहीं है, न हम तुमसे भिड़ना चाहते हैं। हमारी लड़ाई सरकार से है।
चाननसिंह ः सरकार का मैंने नमक खाया है।
आजाद ः नमक याद है नमकहराम और वह धरती जिसने तुम्हें पाला-पोसा, बड़ा किया, भूल गया ? भूल गया कि जिसके पक्ष में तू खड़ा है वह खूनी-लुटेरा-हत्यारा है।
चाननसिंह ः मुझे बस यही याद है कि मैं सरकारी नौकर हूँ।
आजाद ः नौकर नहीं, तू गुलाम हो गया है। मर गया है तेरा जमीर। अपने ही आदमियों पर गोली चलाता है। हमवतन पर ?
चाननसिंह ः तो तू क्या सोचता है, इन लौंडे-लफाडि़यों के बूते सत्ता पलट दोगे ? दस-बीस-पचास अफसरों का खून करके अंग्रेजों को भगा दोगे ? अब भी मौका है, अपने-आप को हवाले कर दो, नहीं तो मारे जाओगे स्सालों… कुत्ते की मौत मारे जाओगे…
आजाद ः कुत्ते की मौत मरता है गद्दार। वतन पर मरने वाला होता है, शहीद। (चीखकर) हट मेरे सामने से।
चाननसिंह ः गोली चलाना छोकरों के बस का नहीं है…
आजाद ः मैं कहता हूँ रुक जा…
चाननसिंह ः नहीं तो क्या करेगा ? गोली मारेगा ? मार… मार…
आजाद ः क्यों बेकार जान देने पर तुला है ?
चाननसिंह ः है हिम्मत तो चला…
आजाद ः खबरदार।
चाननसिंह ः नहीं!…
आजाद ः रुक ऽ ऽ…
कहने के साथ ही आजाद की अंगुलियाँ हिलती हैं। माउजर से गोली छूटती है। चाननसिंह एक ही गोली में बाँहें फैलाए मुँह के बल गिर पड़ता है। धूल में लोट जाता है। चाननसिंह को ढेर होते देखकर बाकी सभी सिपाही वहाँ से भाग खड़े होते हैं। अब मैदान बिल्कुल साफ था। आजाद दौड़कर साइकिल उठाते हैं। राजगुरू को अपनी साइकिल पर बिठा लेते हैं और वहाँ से नौ-दो-ग्यारह। केवल मंच के मध्य वाले हिस्से में चाननसिंह पड़ा रह जाता है। टॉप स्पॉट। रक्ताभ। फड़फड़ा रहा है। धीरे-धीरे तड़प थमने लगती है। साथ में प्रकाश भी कम होता जाता है। अँधेरे के साथ-साथ चाननसिंह शान्त, निर्जीव, शिथिल पड़ने लगता है। ,

दृश्य पाँच

 

एक बड़े प्रकाशवृत्त में हिन्दुस्तान समाजवादी प्रजातान्त्रिक सेना के युवक इकट्ठे दिखते हैं। आजाद सबसे आगे हैं। दर्शकों को सम्बोधित करते हैं। ,
आजाद ः एक आदमी की हत्या का हमें खेद है। परन्तु यह आदमी उस निर्दयी, नीच और अन्यायपूर्ण व्यवस्था का अंग था जिसे समाप्त कर देना आवश्यक था। इस आदमी की हत्या हिन्दुस्तान में ब्रिटिश शासन के कारिन्दे के रूप में की गयी है। यह सरकार संसार की सबसे अत्याचारी सरकार है।
मनुष्य का रक्त बहाने के लिए हमें खेद है। परन्तु क्रान्ति की वेदी पर कभी-कभी रक्त बहाना अनिवार्य हो जाता है। हमारा उद्देश्य एक ऐसी क्रान्ति से है जो मनुष्य द्वारा मनुष्य के शोषण का अन्त कर देगी…
विदेशी सरकार चाहे हमारा कितना भी दमन कर ले, परन्तु हम राष्ट्रीय सम्मान की रक्षा करने और विदेशी अत्याचारों को सबक सिखाने के लिए सदा तत्पर रहेंगे। हम सब विरोध और दमन के बावजूद क्रान्ति की पुकार को बुलन्द रखेंगे और फाँसी के तख्तों पर से भी पुकारकर कहेंगे… इन्कलाब ऽ ऽ…
सब ः (जोर से) जिन्दाबाद!
सुखदेव आते हैं। ,
सुखदेव ः सारा लाहौर अपने पोस्टरों से गरमाया हुआ है…
राजगुरू ः (मंच पर प्रवेश करते हुए) जिधर जाओ, लोग इसी पर बातें कर रहे हैं…
जयगोपाल ः जनता बहुत खुश है।
विजय ः लेकिन सरकार को तो साँप सूँघ गया है।
सुखदेव ः लकवा मार दिया है सी.आई.डी. वालों को। इतनी बड़ी घटना घट गई और किसी को सुराग तक न मिली। खुली सड़क पर, पुलिस-दफ्तर के ठीक सामने एक अंग्रेज अफसर को दिन-दहाड़े मार डाला गया और कोई गिरफ्तार न हो… इससे बड़ा अपमान और क्या हो सकता है सरकार का ?
आजाद ः यही तो हम चाहते थे, कैसे सरकार तिलमिलाए और जनता, जिसके कलेजे में लालाजी के अपमान और मरण का जो काँटा चुभा हुआ था, काँटे ने जो जख्म दिया था, उसमें खुशी और उमंग भरे।
जयगोपाल ः चारों तरफ बस एक ही नाम है, भगतसिंह… भगतसिंह…
विजय ः भगतसिंह को गिरफ्तार करने के लिए घर-घर तलाशियाँ चल रही हैं।
राजगुरू ः जबरन लोगों को गिरफ्तार किया जा रहा है।
आजाद ः जो हो, सरदार को लाहौर से निकालना बहुत जरूरी है।
सुखदेव ः लेकिन कैसे ? सरदार को तो पुलिस में बहुतेरे पहचानने वाले हैं। उनके पास फोटो भी है जिसे पुलिस वालों ने दशहरा बम काण्ड पर चुपके से लिया था। फिर सांडर्स को मारते समय सिपाहियों ने भी देख लिया था कि मारने वालों में एक सिख भी है।
विजय ः मैं तो कहता हूँ, सरदार को किसी तरह यहाँ से निकालकर देश के बाहर भेज दिया जाए।
सुखदेव ः हाँ, ये ठीक रहेगा। यहाँ नहीं तो वहाँ से भी काम कर सकते हैं।
आजाद ः सरदार से पूछो।
राजगुरू ः कहाँ है सरदार ?
विजय ः अन्दर बैठा किताबें पढ़ रहा होगा।
बी.के.दत्त ः पढ़ नहीं निगल रहा होगा। जब देखो, कोई न कोई किताब… कलम… कागज।
आजाद ः आवाज दो।
सब ः (मंच के पीछे वाले हिस्से में जाकर आवाज देते हैं) सरदार!… सरदार!… सरदार ऽ ऽ…
उधर एक स्पॉट पड़ता है, जहाँ भगतसिंह खड़े
हैं। ,
भगतसिंह ः मैं तूफानों से खेलूँगा, मैं गरदाबों को झेलूँगा।
लबे-दरिया मुझे डर-डर के मर जाना नहीं आता।।
भगतसिंह को देखकर सारे साथी चौंक पड़ते हैं, क्योंकि एक सिख युवक के स्थान पर वे एक साहब बहादुर के रूप में थे। सर पर तिरछा फैल्ट हैट, ऊँचे कालर का ओवरकोट पहने हुए। ,
सब ः सरदार ये क्या !
आजाद ः सरदार ये तुमने क्या किया ?
राजगुरू ः अपने केश कटवा लिए सरदार ?
विजय ः कड़ा उतार दिया ?
सुखदेव ः कहाँ गया तुम्हारा कंघा ?
भगतसिंह ः मैं तो सिखी की अंग-अंग कटवाने की परम्परा का कायल हूँ। अभी तो मैंने एक ही अंग कटवाया है… वह भी पेट के लिए नहीं, देश के, लिए। देखना यारो, जल्द ही इसके लिए गर्दन भी कटवाऊँगा।
आजाद ः ओए, गर्दन कटे फिरंगियों की । (और साथियों की तरफ मुड़कर) अभी तो ये सोचना है, कैसे साथियों को लाहौर से बाहर निकाला जाए…
बी.के.दत्त ः (मजाकिये अन्दाज में) आप बाहर निकालने की बात कर रहे हैं… (राजगुरू से) ये हजरत तो सोते ही पकड़े जाएँगे। हद हो गई, जनाब चलते-चलते ही सो जाते हैं। उनकी आँख पुलिस लॉकअप में खुलेगी और तब ये पहरेवालों से पूछेंगे, ‘मैं सचमुच में पकड़ा गया हूँ या स्वप्न देख रहा हूँ।’
सब हँसते हैं। ,
विजय ः और जनाब आप ? ये चाँदनी रात में पार्क में चाँद देखते हुए पकड़े जाएँगे और पुलिसवालों से कहेंगे, ‘कोई बात नहीं, मगर चाँद है कितना सुन्दर।’
साथियों की हंसी ,
राजगुरू ः विजय और सरदार तो किसी सिनेमा हॉल में पकड़े जाएँगे और पुलिस वालों से कहेंगे, ‘जी हाँ, पकड़ लिया तो क्या गजब हो गया। अब खेल तो पूरा देख लेने दो।’
हँसी ,
सुखदेव ः और पण्डितजी बुन्देलखण्ड की किसी पहाड़ी में शिकार खेलते हुए किसी मित्र बने सरकारपरस्त के विश्वासघात से घायल होकर बेहोशी की अवस्था में पकड़े जाएँगे।
आजाद झिड़की की हँसी हँसते हैं। ,
भगतसिंह ः (विनोद करते हुए) पण्डितजी, आपके लिए दो रस्सों की जरूरत पड़ेगी। एक आपके गले के लिए और दूसरा इस भारी-भरकम पेट के लिए।
सब खुलकर ठहाका लगाते हैं। ,
आजाद ः (हँसकर) देख, फाँसी पर जाने का शौक मुझे नहीं है। वह तुझे ही मुबारक हो। रस्सा-कस्सा तुम्हारे गले के लिए हैं। अरे, अपने पास तो जब तक ये बम-तुल-बुखारा है, किसने माँ का दूध पिया है जो आजाद को जिन्दा गिरफ्तार कर ले जाए…
शेर ,
दुश्मन की गोलियों का सामना करेंगे।
आजाद हैं, हमेशा आजाद ही रहेंगे।
(मूड बदलकर) देखो, बहुत मजाक हो गया। अब मेरी योजना ध्यानपूर्वक सुनो। (भगतसिंह से) ऐसा करो, तुम हिन्दुस्तानी साहब बनकर रेल के फर्स्ट क्लास से कलकत्ता निकल जाओ। तुम अकेले नहीं जाओगे। तुम्हारे साथ दुर्गा भाभी और उनका लड़का शची भी साथ जाएँगे।
सुखदेव ः हाँ, इससे किसी को शक भी नहीं होगा…
आजाद ः और राजगुरू तुम… इनके नौकर के रूप में साथ रहोगे। इनकी हिफाजत का जिम्मा तुम्हारा। हाँ, साथ में पिस्तौल रखना मत भूलना।
राजगुरू ः पण्डितजी आप ?
आजाद ः (सहज होकर) मेरा क्या, पण्डित आदमी हूँ। रामनामी चादर ओढ़कर, माथे पर चन्दन लगाकर, मथुरा का पण्डा बनकर, रेल के किसी डिब्बे में बैठ जाऊँगा। रमता जोगी, बहता पानी।
जय रघुनन्दन जय सियाराम। देवकीनन्दन राधेश्याम। जय सियाराम ऽ ऽ…
ख्साधु के भजन-कीर्तन की नकल देखकर सब ठठाकर हँस पड़ते हैं। ,

दृश्य छः

 

कमरे में पार्टी की मीटिंग चल रही है। रात का समय है। अर्द्ध वृत्ताकार घेरे में पार्टी के लोग बैठे हैंं अगल-बगल कुछ खड़े हैं तो कुछ दीवाल से टिके। आजाद एक ऊँचे स्थान पर बैठे हैं, भगतसिंह उनकी बगल में। सबका चेहरा आजाद की तरफ है ओर आजाद का दर्शंकों की तरफ। आपस में बातचीत चल रही है। बीच में लालटेन रखी है, जल रही है। साथ ही, अगल-बगल कुछ पार्टी लिटरेचर, अखबार व पोस्टर बिखरे हैंं। मौसम में कुछ ठण्डक बरकरार है सो कुछ साथी चादर व कम्बल भी ओढ़े हुए हैं। ,
आजाद ः ये स्पष्ट है कि आन्दोलन केवल मीडिल क्लास, कुछ दुकानदारों, जमींदारों, आफिस के बाबुओं व विदेशोंं से पढ़कर आए बुद्धिजीवियों के बूते नहीं चल सकता। किसानों-मजदूरों को मुख्यधारा में लाना ही होगा।
विजय ः बिल्कुल। जब तक ये जुड़ेंगे नहीं, आन्दोलन जुझारू नहीं हो सकता।
आजाद ः क्योंकि किसी भी क्रान्ति का हिरावल दस्ता यही होते हैं। ये भागनेवाले नहीं हैं, दुनिया बदलनेवाले हैं। यही असली क्रान्तिकारी सैनिक हैं।
राजगुरू ः इस बात को सरकार अच्छी तरह समझ रही है। और डर रही है कि अगर इन्हें रोका न गया तो देखते-देखते ये मालिक बन जाएँगे। उन्हें ये राज छोड़ना पड़ेगा।
बी.के. दत्त ः क्योंकि जिस तरह देश में कारखाने बढ़ रहे हैं… पूँजीपति और अंग्रेजों के लाभ-हानि साझे होते जा रहे हैं… मुनाफे के लिए मजदूरों का शोषण कर रहे हैं… विरोध में जिस तरह जगह-जगह ट्रेड यूनियन बन रहे हैं… धरना-हड़ताल की खबरें मिल रही हैं, इसका एहसास तो उन्हें निश्चित हो रहा है…
भगतसिंह ः इसलिए तो ये माँग कर रहे हैं कि सरकार कोई ऐसा बिल असेम्बली में पेश करे जिससे कि कोई मजदूर हड़ताल ही न कर सके। यदि एक यूनियन दूसरी यूनियन के समर्थन में हड़ताल करे तो हड़ताल गैर-कानूनी मानी जाए।
जयदेव ः और बिना कारण बताए किसी को भी जेल में ठूँस दिया जाए।
बी.के. दत्त ः ये बिल नहीं, मजदूर आन्दोलन पर सुनियोजित हमला है।
भगतसिंह ः (साथियों को एक पम्फलेट दिखाते हुए) देखो ट्रेड डिस्प्यूट्स बिल और पब्लिक सेफ्टी बिल की कॉपी। ये बिल हैं या जुल्म बरपाने के लिए औजार।
जयदेव ः आखिर क्यों कर रहे हैं ये मजदूरों से जानवरों जैसा व्यवहार ?
भगतसिंह ः जानवर! ये उन्हें जानवर भी नहीं बूझ रहे हैं। जानवर भी विरोध करता है। ये हक भी वो इन्हें देना नहीं चाहते। गुलाम समझते हैं हमें। लूटना, मारना, मिटा देना चाहते हैंं। देखो, क्या कह रहा है बिल? मजदूरों को हड़ताल का अधिकार नहीं होगा। हड़ताल करने वाले को 500 रूपये जुर्माना या एक माह की कैद की सजा दी जाएगी। और अगर कोई राजनीतिक विचारधारा को लेकर हड़ताल करेगा, तो उसे तीन माह की कैद होगी तथा 500 रूपये जुर्माना।
आजाद ः आखिर क्यों ? क्या इन गरीबों को हड़ताल करने का भी अधिकार नहीं ?
विजय ः क्यों नहीं, आखिर मजदूर भी इसी समाज का एक हिस्सा है। उसे भी जरूरत है एक ऐसे आन्दोलन की जिससे पूँजीपति गुट को, जो अभी मजदूरों को गुलामी से छूटने नहीं देना चाहता, नानी याद आ जाए। पर यह नानी भी तभी याद आ सकती है जब आनेवाले चुनाव में इनकी ऐसी हार हो कि याद कर-कर आँखें मला करें।
आजाद ः जो हो, इसका विरोध होना चाहिए। क्योंकि आजादी हर इन्सान की पैदाइशी हक है।
राजगुरू ः लेकिन सरकार तो इन बिलों को पास करने पर उतारू है।
बी.के. दत्त ः काँग्रेसी और दूसरे प्रोग्रेसिव मेम्बरान, इन बिलों को हरगिज पास न होने देंगे।
विजय ः सो व्हाट ? वायसराय अपने वीटो पावर से पास कर देंगे।
जयदेव ः संसद उनकी, सत्ता उनकी… चाहे कुछ भी कर सकते हैं।
राजगुरू ः फिर क्या करें ?
भगतसिंह ः (अचानक खड़े होकर) यही समय है, अब नहीं तो कभी नहीं।
सब ः क्या ?
भगतसिंह ः सरकार अवाम की आवाज अनसुनी कर रही है। वह बहरी हो गई है। उसके कान खोलने की व्यवस्था करनी होगी।
सब ः कैसी व्यवस्था ?
भगत सिंह ः सांडर्स की हत्या से जो हमने जनता का मनोवैज्ञानिक लाभ उठाया था, वही बिलों का विरोध करके फिर उठाए ?
आजाद ः कैसे ?
भगतसिंह ः असेम्बली में बम फेंका जाए।
सब ः (चौंककर) बम !
भगतसिंह ः हाँ, फ्रांसीसी क्रान्तिकारी वेलाँ के शब्दों में बहरों को सुनाने के लिए बम के धमाके की जरूरत होती है…
आजाद ः तो ?
भगतसिंह ः जिस दिन ये बिल असेम्बली में पेश हों… बहुमत से खारिज हो… और वायसराय अपने वीटो पावर से इन्हें कानून बनाने की घोषणा करने को हो… उसी वक्त असेम्बली में बम फेंका जाए।
विजय ः वाह ! कमाल का विचार है।
भगतसिंह ः साथ में अपने उद्देश्य को स्पष्ट करने वाले परचे भी…
जयगोपाल ः वहाँ काँग्रेस के मेम्बरान भी तो होंगे…
भगतसिंह ः देखो, किसी को मारना हमारा लक्ष्य नहीं है। हमारा उद्देश्य है असेम्बली के माध्यम से जन-जन तक अपने विचार से जाना। असेम्बली हमारे लिए महज एक माध्यम होगा, अपनी विचारधारा को असेम्बली से आम लोगों तक पहुँचाने का।… इसलिए बम किसी खाली सीट पर फेंकेगे। और फेंकने के बाद वहाँ से भागेंगे नहीं। अपने को पुलिस के हवाले कर देंगे।
भगवानदास ः (चौंककर) क्या बात कर रहे हो !
जयदेव ः मैं कई बार असेम्बली गया हूँ, वहाँ से भागने के अनेक रास्ते हैं।
आजाद ः असेम्बली के बाहर एक मोटर रहेगी। बम फेंकनेवाले को उड़ा ले जाएगी।
भगतसिंह ः पण्डितजी, मेरे अन्दर कोई और नक्शा है।
आजाद ः कौन-सा ?
भगतसिंह ः गुप्त आन्दोलन को जन-आन्दोलन में बदलने का…
आजाद ः कैसे ?
भगतसिंह ः अदालत को राजनैतिक प्रचार के मंच के रूप में इस्तेमाल करके। पण्डितजी, जिस तरह यह सरकार और हमारे ही देश की राजनीतिक पार्टियाँ और सो कॉल्ड लीडर्स, हाई क्लास लीडर्स… हम पर वैचारिक हमले कर रहे हैं, हमें फासिस्ट, हत्यारे, हिंसक और आतंकवादी घोषित कर रहे हैं, जरूरत है उनका मुँहतोड़ जवाब देने की। अवाम को बताने की कि सच क्या है ? हमारा उद्देश्य, हमारा रास्ता क्या है ? हमारे सिद्धान्त क्या हैं ?
आजाद ः भई, सिद्धान्त-विद्धान्त तुम लोग ज्यादा समझते हो। हमें तो बस अमल करना आता है।
विजय ः कौन फेंकेगा असेम्बली में बम ?
भगतसिंह ः मैं फेकूँगा असेम्बली में बम।
आजाद ः बेकार की बात मत करो। सांडर्स की हत्या के सिलसिले में पंजाब की पुलिस वैसे ही तुम्हारी तलाश में है। और जानते हो, पकड़े जाने का अर्थ ?… फाँसी।… नहीं, संगठन के लिए तुम्हारा रहना जरूरी है।
भगतसिंह ः संगठन के लिए ही मेरा जाना जरूरी है।
आजाद ः सरदार, योजना तुम्हारी थी, मैंने ठीक समझा और मान लिया। लेकिन ये जरूरी नहीं है, उसको अंजाम देने के लिए भी तुम्ही जाओ। पार्टी में और भी जो साथी हैं… वैचारिक रूप से विजय और बटुकेश्वर दत्त भी काफी समृद्ध हैंं। इस काम के लिए यही बेहतर होंगे।
भगतसिंह ः लेकिन पण्डितजी…
आजाद ः नहीं सरदार, जिद मत करो। यह दल का निर्णय है।
भगवान दास ः पण्डितजी, मुझे भी मौका दीजिए।
आजाद ः नहीं भगवान दास। मैं नहीं जानता कि ग्वालियर और झाँसी केन्द्र अभी किसी प्रकार के संकट में पड़े।… जयदेव, असेम्बली के पासों के इन्तजाम का जिम्मा तुम्हारा।
जयदेव ः हो जाएगा पण्डितजी। असेम्बली में कई मेम्बरानों से कॉन्टेक्ट है। कई बार खुद जा चुका हूँ। फिर जाकर पूरा अध्ययन कर लूँगा।
आजाद ः ठीक है, परसों फिर बैठेंगे। तब तक सुखदेव भी आ जाएगा। तभी विस्तार से बातें होंगी।
ख् आजाद खड़े हो जाते हैं। अन्य भी जाने के लिए अपने-अपने स्थानों पर खड़े हो जाते हैं। भगतसिंह को छोड़कर अन्य सभी आपस में बातचीत करते हुए बाहर चले जाते हैं।
भगतसिंह वहीं बैठे हैं। किसी विचार में खोए हुए से। हाथ में बिल की कॉपी है। धीरे-धीरे हाथ कसता जाता है, कॉपी दबती जाती है। अँधेरा होने लगता है…
पूर्ण अँधेरा होने से पूर्व ही प्रकाश का आना प्रारम्भ… भगतसिंह बैठे हुए हैं। सुखदेव उनके पीछे खड़े हैं। माहौल तनावपूर्ण लग रहा है। ,
सुखदेव ः सरदार, आखिर ये निर्णय हो कैसे गया ?
भगतसिंह ः ये निर्णय पण्डितजी का था, सुखेदव।
सुखदेव ः लेकिन इतिहास तुम्हें इस निर्णय के लिए कभी मुआफ नहीं करेगा। (भगतसिंह चुप रहते हैं) कहेगा तुम कायर हो। तुम मौत से डर गए हो।
भगतसिंह ः मैं मौत से नहीं डरता।
सुखदेव ः तो असेम्बली में बम फेंकने के लिए जब तुम्हंें जाना था, फिर निर्णय कैसे बदल गया ?
भगतसिंह ः पार्टी ने निर्णय लिया था कि संगठन के भविष्य के लिए मुझे पीछे रहने की जरूरत है।
सुखदेव ः (रूखे और कड़े स्वर में) बेकार की बात है ये। तुम्हारे व्यक्तिगत मित्र की हैसियत से देख रहा हूँ कि तुम अपने पाँव में कुल्हाड़ी मार रहे हो। यह देखकर मैं चुप नहीं रह सकता। जानते हो, तुम किस रास्ते पर चल रहे हो ?
भगतसिंह ः जानता हूँ…
सुखदेव ः तुम कुछ नहीं जानते। तुम नहीं जानते हो कि तुम्हारा अहंकार बढ़ गया है। तुम समझने लगे हो कि तुम्हारे ही सिर पर पार्टी का सारा दारोमदार है।
भगतसिंह ः ये तुम्हारा भ्रम है। ऐसी कोई बात नहीं है।
सुखदेव ः ऐसी कोई बात नहीं है तो क्यों हो गया ऐसा ? जब तुम जानते हो कि तुम्हारे सिवा दूसरा कोई पार्टी के सिद्धान्त, आदर्श, उद्देश्य को अच्छी तरह से नहीं रख सकता है, फिर तुमने केन्द्रीय समिति को यह फैसला क्यों लेने दिया कि तुम्हारे स्थान पर कोई और बम फेंकने जाए।
भगतसिंह ः मैं तो बार-बार कहता रहा, पण्डितजी मानते तब न ?
सुखदेव ः (व्यंग्य करते हुए) वैसे तो और कामों के लिए फौरन पण्डितजी को मना लेते हो, इसके लिए नहीं मना सके ?
भगतसिंह ः यहाँ तक कहा कि पार्टी के लिए मेरा जाना जरूरी है, पर पण्डितजी ने कहा, पार्टी के लिए ही तुम्हारा रूकना जरूरी है।
सुखदेव ः तर्क की ओट में खुद को न बचाओ सरदार।
भगतसिंह ः बचा नहीं रहा हूंँ, बल्कि पण्डितजी की आज्ञा और अनुशासन ने मुझे बाँध रखा है।
सुखदेव ः अनुशासन की ओट में तुमने खुद को वापस खींचा है सरदार।… तुम दादा सान्याल और जयचन्द विद्यालंकार बनते जा रहे हो । जानते हो तुम्हारा क्या अन्त होगा ?
भगतसिंह ः (पास आते हुए, झुँझलाकर) क्या होगा ?
सुखदेव ः एक, रोज तुम भाई परमानन्द बन जाओगे।
भगतसिंह ः (गुस्से से मुँह दूसरी तरफ मोड़कर) झूठ ।
सुखदेव ः प्रथम लाहौर षड्यन्त्र के मुकद्में में हाईकोर्ट के जज ने फैसला देते हुए मालूम है, क्या कहा था ?… कहा था,‘ भाई परमानन्द इस क्रान्तिकारी षड्यन्त्र का मस्तिष्क और सूत्रधार है। लेकिन व्यक्तिगत रूप से यह आदमी कायर है। संकट के काम में दूसरों को आगे झोंककर अपने प्राण बचाने की चेष्टा करता है।’
भगतसिंह ः (तिलमिलाकर एक तरफ चल देते हुए) सुखदेव, तुम्हें पता है क्या कह रहे हो ?
सुखदेव ः सच बयान कर रहा हूँ। (ऊँची आवाज में) सरदार, तुम सदा तो यों बच नहीं सकते। एक दिन तुम्हें भी अदालत के सामने आना ही पड़ेगा। उस दिन तुम्हारे लिए भी वैसा ही फैसला लिखा जाएगा, जैसा भाई परमानन्द के लिए लिखा गया था।
भगतसिंह ः (पलटकर सुखदेव को घूरते हैं, जैसे पिंजरे में बन्द शेर चोट करने वाले की ओर देखता है) सुखदेव, तुम मेरा अपमान कर रहे हो… तुम क्या जानो, पार्टी के इन्कार कर देने से मुझे कितनी पीड़ा पहुँची है, किस द्वन्द्व से गुजरा हूँ…
सुखदेव ः तुम कहना चाहते हो कि संगठन के हित के लिए तुम शहीद बनने के सम्मान को बलिदान कर रहे हो ? अरे जाओ ! ईमानदारी से अपने गिरेबान में झाँककर देखो, क्या यह सच है? नहीं !… दरअसल, तुम इस समय मौत का सामना नहीं करना चाहते सरदार, क्योंकि तुम्हें जिन्दगी इस समय बड़ी सुहावनी लग रही है। तुम सम्बन्धों की संवेदनाओं में डूब जाना चाहते हो और इसे दल के प्रति उत्तरदायित्व का बहाना बना रहे हो।… तुम दूसरों से चाहे जो कहो, लेकिन मैं तुमसे और तुम मुझसे नहीं छिप सकते। सरदार, तुम फिसल रहे हो…
भगतसिंह ः (तिलमिलाते हुए) बस सुखदेव… बस। अब असेम्बली में बम फेंकने मैं ही जाऊँगा। केन्द्रीय समिति को मेरी बात माननी पड़ेगी। और तुमने मेरा जो अपमान किया है, उसका जवाब मैं नहीं दूँगा।
सुखदेव ः (रूखे स्वर से) मैंने तो बस अपने मित्र के प्रति अपना कर्तव्य पूरा किया है।
भगतसिंह ः और आगे से तुम मुझसे बात न करना। जाओ, मेरी नजरों से दूर हो जाओ… (इतना कहकर भगतसिंह तेज कदमों से एक तरफ बढ़ते हैं और काठ के ब्लॉक पर दर्शकों की तरफ पीठ करके बैठ जाते हैं। सुखदेव वहीं खड़े हैं, मंच के केन्द्र में। एक प्रकाशवृत्त के अन्दर। पलटकर भगतसिंह को देखते हैं, आँखें नम होने लगती हैं। आँसू आने ही वाले होते हैं कि लम्बे-लम्बे डग भरते हुए दूसरी तरफ से बाहर हो जाते है। भगतसिंह मुड़कर उस दिशा में बढ़ते हैं। सुखदेव को आवाज देते हैं-) सुखदेव।… (दो-तीन कदम और बढ़कर) सुखदेव।… (सुखदेव जा चुके होते हैं। भगतसिंह उसतरफ देखकर)… तू कह रहा है, मैं सम्बन्धों की संवेदनाओं में फँसकर क्रान्ति के पथ से भटक गया हूँ। देश के लिए कुछ करना अब मेरे बस का नहीं… (पीड़ा का भाव) अरे, और लोग मुझे गलत समझें तो एक बात है लेकिन सुखदेव… तू तो हमारा साथी है, सब कुछ जानकर भी अनजान क्यों बन रहा है ? इतना करीब होने के बावजूद यह क्यों नहीं पहचान रहा है ? (निराशा, हताशा, टूटन)… उफ, इस प्रकार के लांछनयुक्त जीवन जीने से तो मर जाना बेहतर है… (आँसू अब थम जाते हैं। चेहरा कठोर होने लगता है। दृढ़ संकल्प भरे स्वर में) अब पब्लिक सेफ्टी बिल और ट्रेड डिसप्यूट बिल के सवाल को लेकर मैं ही असेम्बली में जाऊँगा। मैं ही डालँूगा असेम्बली में बम। और बम डालकर भागूँगा नहीं, साहस के साथ गिरफ्तारी दूंगा। इस तरह मेरे बलिदान से एक तो राष्ट्र के प्रति मेरी निष्ठा में कमी को आरोप निराधार सिद्ध होगा… दूसरे क्रान्तिकारियों का स्टैण्ड जनता तक पहुंँचेगा और तीसरे… सुखदेव के सवालों का जवाब भी मिलेगा।… (पलटकर) सुना सुखदेव ! सुखदेव तुमने सुना ऽ ऽ…
धीरे-धीरे अँधेरा ,

दृश्य सात

मंच पर स्पॉट लाइट के घेरे में भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त बैठे हुए दिखते हैं। हल्का प्रकाश है, धीरे-धीरे बढ़ना शुरू होता है। नेपथ्य से असेम्बली में हो रहे शोरगुल की आवाज। सुनकर भगतसिंह व दत्त तनाव में आ जाते हैं। धीरे-धीरे अपने स्थान पर खड़े हो जाते हैं। अखबार में लिपटा हुआ बम फुर्ती से निकालकर भगतसिंह हाथ में लेते हैं और मंच पर फेंकते हैं। सदन में धुआँ उठने लगता है।
भगतसिंह पिस्तौल निकालकर छत की ओर हाथ उठाकर दो गोलियाँ छोड़ते हैं।
बमों के फटने से पूरा हाऊस नीले धुएं से भर जाता है। धुआँ ही धुआँ। धुआँ काफी समय तक फैला रहता है। जब साफ होता है तब मंच पर भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त अपनी जगह पर दृढ़तापूर्वक खड़े दिखते हैं। जोर-जोर से नारे लगाते हैं। ,
दोनों ः इन्कलाब जिन्दाबाद !…
साम्राज्यवाद का नाश हो !…
दुनिया के मजदूरो एक हो !…
बटुकेश्वर दत्त लाल रंग के परचे असेम्बली में फेंकते हैं। परचे हवा में लहरा उठते हैं। पूरा मंच परचों से भर जाता है। परचे लहराते हुए धीरे-धीरे नीचे उतरने लगते हैं। परचों में में लिखे शब्दों को भगतसिंह दर्शकों तक दमदार आवाज में पहुँचाते हैं। स्पॉट केवल भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त के चेहरे पर। शेष अँधेरे में। ,
भगतसिंह ः ‘‘बहरों को सुनाने के लिए बहुत ऊँची आवाज की जरूरत होती है।’’ प्रसिद्ध फ्राँसीसी अराजकतावादी शहीद वेलाँ के ये अमर शब्द हमारे काम के औचित्य के साक्षी हैं।
शासन-सुधारों के नाम पर ब्रिटिश हुकूमत ने पिछले दस वर्षों से हमारे देश का जो अपमान किया है, उसे हम दोहराना नहीं चाहते, ना ही इस सभा यानी कथित संसद द्वारा भारतीय कौम के माथे पर जो अपमान थोपे गए हैं, उनका जिक्र करेंगे। हम तो सिर्फ ये बताना चाहते हैं कि जब ये साइमन कमीशन से कुछ और सुधारों की झूठी आशा कर रहे हैं, हड्डियों के बँटवारे की प्रतीक्षा में लड़-झगड़ रहे हैं, ऐसे में सरकार हमारे ऊपर ‘पब्लिक सेफ्टी बिल’ और ‘ट्रेड डिसप्यूट बिल’ जैसे दमनकारी कानून थोप रही है जो स्पष्ट कर देती है कि सरकार किस रवैये पर चल रही है, हवा का रूख किस तरफ है…
जनता के प्रतिनिधियों से हमारा आग्रह है कि वे इस पार्लियामेण्ट के पाखण्ड को छोड़कर अपने-अपने निर्वाचन क्षेत्रों को लौट जाएँ और जनता को विदेशी दमन और शोषण के विरूद्ध क्रान्ति के लिए तैयार करें…
सार्जेण्ट टेरी और इंसपेक्टर जॉनसन का अपने दल के साथ धड़धड़ाते हुए प्रवेश। ,
सार्जेण्ट टेरी ः (पिस्तौल भगतसिंह पर तानते हुए) हैंड्स अप !
इंसपेक्टर ः डॉण्ट मूव !
भगतसिंह ः (मुस्कुराते हुए) आओ सार्जेण्ट, हम तुम्हारा ही इन्तजार कर रहे थे।
बी.के. दत्त ः बड़ी देर लगा दी हुजूर आने में।
सार्जेण्ट टेरी ः ये बम तुम्हीं लोगों ने फेंका है ?
भगतसिंह ः आपको कोई शक है ?
बी.के. दत्त ः चिन्ता मत करो। हम सारे संसार को बता देंगे कि यह हमने किया है।
भगतसिंह ः (बच्चों की तरह अंगुलियों के सहारे पिस्तौल से खेल रहे हैं। सार्जेण्ट को डरा हुआ देखकर खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं) डर लगता है… लो, सम्भालो। (पिस्तौल सार्जेण्ट की तरफ उछाल देते हैं) मारना होता तो कभी भी मार सकते थे। लेकिन हमारी लड़ाई अंग्रेज व्यक्तियों के विरूद्ध नहीं है, अंग्रेजी साम्राज्यशाही व्यवस्था से है।
बी.के. दत्त ः हाँ, सर शुस्टर अगर डैस्क के नीचे न छिपते तो उन पर जरूर गोली चलाते क्योंकि असेम्बली में वे ब्रिटिश शासन व्यवस्था के मुख्य प्रतिनिधि के रूप में थे।
सार्जेण्ट ः (इंसपेक्टर से) सुनो, ये सारे परचे बटोर लों इसकी गंध बाहर न जाने पाए।
इंसपेक्टर ः नहीं जा पाएगा सर।
ख् पुलिस परचे उठाने में जुट जाती है। ,
सार्जेण्ट ः एक भी परचा अखबार वालों के हाथ न लगने पाए।
इंसपेक्टर ः बाहर एक-एक की तलाशी चल रही है सर।
सार्जेण्ट ः बम काण्ड की खबर बाहर न जाने पाए। फोन-तार सब रोक लो।
इंसपेक्टर ः यस सर!
सार्जेण्ट ः इन्हें कोतवाली ले चलो।
भगतसिंह, बटुकेश्वर दत्त जोर-जोर से नारे लगाते हुए चलते हैंं। पुलिस उन्हें कवर करते हुए अग्र मंच के एक कोने में लाती है। जहाँ एक बेंच रखा हुआ है। दोनों को उस पर बिठाते हैं। टॉप लाइट दोनों के ठीक ऊपर। प्रकाशवृत्त के घरे के बाहर पुलिस के लोग खड़े हैं। इंसपेक्टर जॉनसन इंटरोगेशन प्रारम्भ करता है। ,
इंसपेक्टर ः लगता है तुम लोग फिल्में बहुत देखते हो ? (दोनों चुप हैं) ’पासिंग शो’ देखी है ?
भगतसिंह ः नहीं।
इंसपेक्टर ः उसमें बिल्कुल इसी तरह के विस्फोट की घटना है। चलो, देखी न होगी, सुनी तो जरूर होगी।
बी.के. दत्त ः जी नहीं।
इंसपेक्टर ः तो कहाँ से आया बम पटकने का विचार ? कौन सप्लाय करता है तुम्हें बम और हथियार ?
भगतसिंह ः हथियार ! (हँस पड़ते हैं) इंसपेक्टर साब जब मैं छोटा था तो एक दिन पिताजी मेहताजी के साथ खेतों में टहल रहे थे। मेहताजी ने मुझे खेत में देखकर पूछा, ‘क्या कर रहे हो भगतसिंह ?’… मैंने कहा, ‘बन्दूकें बो रहा हू’… ‘क्यों पुत्तर ?’… मैंने कहा, ‘मुल्क को आजाद कराने के लिए बन्दूकें चाहिए। आज बन्दूकें बो रहा हूँ… कल इससे बन्दूक की फसलें काटूँगा।’… देखो, आज फसलें तैयार हैं, हर तरफ बन्दूकें लहरा रही हैं…
इंसपेक्टर ः डोंट बी रोमांटिक भगतसिंह। रोमांटिक रिवोल्यूशन क्या है ? बस धुआँ। एक उफान, एक बलबला। तुम्हें कोई बहका रहा है। मोहरा बनाकर अपना उल्लू सीधा कर रहा है। कौन है वो ? हू इज योर कमांडर ? क्या नाम है उसका ? कहाँ रहता है ? क्या करता है ? कितने लोग हैं पार्टी में ? (सिगरेट निकालकर मुँह में डालता है। उन्हें आॅफर करते हुए) सिगरेट… (वे इन्कार करते हैं) नो !… बमों से खेलते हो और सिगरेट से परहेज ! आश्चर्य !… आश्चर्य होता है तुम जैसे ब्रिलियंट स्टूडेंटों को पॉलटिक्स के चक्कर में देखकर।… भई, विद्यार्थियों का मुख्य काम है, पढ़ाई। उसे पूरा ध्यान अपनी पढ़ाई पर लगाना चाहिए। कैसे अपना कैरियर बनाए, प्लान करना चाहिए। देश-समाज के बारे में सोचना शिक्षा में शामिल नहीं है। भला पॉलटिक्स से तुम्हारा क्या मतलब ? बता दो, हम तुम्हें छोड़ देंगे… बताओ…
भगतसिंह ः (गम्भीर स्वर में) जब मैं बारह साल का था…
इंसपेक्टर ः (उत्सुकता से) तो क्या था, बताओ ?
भगतसिंह ः एक दिन मैं घर से स्कूल के लिए निकला तो सीधा अमृतसर जा पहुँचा…
इंसपेक्टर ः अमृतसर! फिर क्या हुआ ? किससे मिले ? गो आॅन… टेल मी…
भगतसिंह ः जलियाँवाला बाग पहुँचा… जहाँ लोग शहीद हुए थे, जहाँ की मिट्टी उनके खून से अभी भी लाल थी… चारों तरफ बिखरी पड़ी थी। (पॉज) मैंने खून से लथपथ मिट्टी उठायी, माथे से लगायी। तभी मेरे कलेजे को चीरती हुई, पूरे वजूद को हिलाती हुई अन्दर से एक आवाज आयी.. बलिदान… हाँ, बस एक शब्द… बलिदान।… मैं थोड़ी-सी मिट्टी एक शीशी में भरकर अपने साथ लाया.. मिट्टी… जो आज भी चीख-चीखकर कह रही थी… बलिदान!… बलिदान्!… बलिदान!…
इंसपेक्टर ः (सर पर हाथ फेरता हुआ) डोण्ट बी इमोशनल भगतसिंह। हैव ए पेशेंस। तुम्हारी उम्र में मेरा खून भी तुम्हारी तरह ही गरम रहता है। बात-बात पर उबल पड़ता था। लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, आदमी प्रैक्टिकल होता जाता है। सो कुल डाउन माई ब्वॉय। क्या रखा है बम-सम में ? बलिदानी-कुरबानी तो बस एक ढकोसला है। अपना सोचो, पहले अपने आपको सुधारो। देश तो खुद ही सुधर जाएगा। (जेब से एक कागज और कलम बढ़ाते हुए), साइन करो। मेरी सलाह मानो, तुम दोनों सरकारी गवाह बन जाओ। कुछ नहीं होगा। सारा मामला सम्भाल लूंगा। (बी.के. दत्त लेकर दूर फेंक देते हैं। इंसपेक्टर तिलमिला उठता है, लेकिन फिर मुस्करा पड़ता है। कागज उठाकर बढ़ाते हुए) इसी तरह… बिल्कुल इसी तरह का तेवर था मेरा। आई लाइक इट। अच्छा लगता है देखकर। जवानी की याद आ गई। लेकिन जवानी के लिए जीवन जरूरी है यंग ब्वॉय।… लो, साइन करो। (भगतसिंह लेकर एक नजर देखते हैं, फिर दूसरे ही क्षण फाड़कर दूर फेंक देते हैं। इंसपेक्टर जैसे पगला जाता है, चीखने लगता है) ओह नो ! मरेगा तू। अब कोई नहीं रोक सकेगा तुझे मरने से। (बाल खींचकर ऊपर उठाते हुए) ये तू नहीं बोल रहा है। जो तू कर रहा है, वह तू नहीं कर रहा है। करवा रही है ये मिट्टी।… स्साले, इसी मिट्टी में तुझे मिला दूँगा। (चीखकर) खजानसिंह!
सिपाही ः यस सर!
इंसपेक्टर ः इनके बयान नोट करो।
भगतसिंह ः हमें पुलिस के सामने कोई बयान नहीं देना है। जो कहना है, हम अदालत में कहेंगे।
इंसपेक्टर ः (तिलमिलाते हुए) यू ब्लडी बास्टर्ड!
हाथ में पकड़े रूल को बगल के किसी फर्नीचर पर जोरों से मारता है। इसी के साथ इंसपेक्टर जॉनसन अँधेरे में विलीन होने लगता है…
कुछ क्षण के लिए अँधेरा…
मंच मध्य के केन्द्र में एक स्पॉट जलता है। हल्का प्रकाश। स्पॉट के घेरे में एक कटघरा दिखाई पड़ता है। प्रकाश धीरे-धीरे तेज और तेज। भगतसिंह और बटुकेश्वर दत्त कटघरे में आकर खड़े हो जाते हैं। दोनों प्रकाशवृत्त के अन्दर, शेष वहां कोई नहीं।
दृश्य मानो सेशन जज मिडिलटन की अदालत का हो। दोनों दर्शकों को भावपूर्ण नजरों से देखते हैं। चेहरे पर आत्मविश्वास है। भगतसिंह बयान देना प्रारम्भ करते हैं- ,
भगतसिंह ः माई लार्ड!
हमारे ऊपर जो संगीन आरोप लगाए गए हैं, उसके मद्देनजर यह जरूरी है कि हम अपना रवैया स्पष्ट करें। मी लार्ड, यह काम हमने किसी व्यक्तिगत स्वार्थ या विद्वेष की भावना से नहीं किया है। हमारा उद्देश्य उस शासन-व्यवस्था के विरूद्ध प्रतिवाद करना था जिसके हर एक काम से उसकी अयोग्यता ही नहीं, बल्कि अपकार करने की असीम क्षमता भी प्रकट होती है… मी लार्ड, हमारा एकमात्र उद्देश्य ‘बहरों को सुनाना’ और उन शोषितों की माँगों पर ध्यान न देने वाली सरकार को समय रहते चेतावनी देना था।… हम साम्राज्यवादी शोषकों को यह बतला देना चाहते हैं कि मुट्ठी भर आदमियाें को मारकर किसी आदर्श को समाप्त नहीं किया जा सकता है और न ही दो नगण्य आदमियों को कुचलकर राष्ट्र को दबाया जा सकता है।… फाँसी के फन्दे और साइबेरिया की खानें रूसी क्रान्ति की आग को बुझा नहीं पाईं तो ये अध्यादेश और सेफ्टी बिल्स भारत आजादी की लौ को क्या बुझा सकेंगे ? नौजवानों को जेलों में ठूँसकर क्या क्रान्ति का अभियान रोक सकेंगे ?… नहीं मी लार्ड, हरगिज नहीं!…
पॉज ,
क्रान्ति ? आप पूछ रहे हैं, क्रान्ति से हमारा क्या मतलब है ? (विराम) मी लार्ड, क्रान्ति के लिए खूनी लड़ाइयाँ अनिवार्य नहीं हैं। और न ही इसमें व्यक्तिगत प्रतिहिंसा के लिए कोई स्थान है। वह बम और पिस्तौल का सम्प्रदाय नहीं है। क्रान्ति से हमारा अभिप्राय है, अन्याय पर आधारित मौजूदा समाज व्यवस्था में आमूल परिवर्तन।
समाज का प्रमुख अंग होने के बावजूद भी आज मजदूरों को उनके बुनियादी अधिकार से वंचित रखा जा रहा है और उनकी गाढ़ी कमाई का सारा धन शोषक पूँजीपति हड़प जाते हैं। दूसरों के अन्नदाता किसान आज अपने और अपने परिवार के लिए दाने-दाने को मोहताज हैं। दुनिया भर के बाजारों को कपड़ा मुहैया करने वाला बुनकर अपने तथा अपने बच्चों के तन ढंकने भर को भी कपड़ा नहीं पा रहा है। सुन्दर महलों का निर्माण करने वाले राजगीर, लोहार तथा बढ़ई स्वयं गन्दे बाड़ों में रहकर ही अपनी जीवन-लीला समाप्त कर जाते हैं। और दूसरी तरफ, समाज के जोंक, शोषक पूँजीपति ज़रा-ज़रा सी बातों के लिए लाखों का वारा-न्यारा कर देते हैं।
यह भयानक असमानता और जबरदस्ती लादा गया भेदभाव दुनिया को एक बहुत बड़ी उथल-पुथल की ओर लिए जा रहा है। लेकिन यह स्थिति अधिक दिनों तक कायम नहीं रह सकती।… सभ्यता का यह ढाँचा यदि समय रहते सम्भाला न गया तो भरभराकर गिर जाएगा। इसलिए जरूरत है बुनियादी परितर्वन की।… मनुष्य के हाथों मनुष्य की और कौम के हाथों कौम की लूट अगर खत्म नहीं किया गया तो मानवता को उसके क्लेशों से छुटकारा मिलना असम्भव है।… मी लार्ड, क्रान्ति से हमारा तात्पर्य अन्ततोगत्वा एक ऐसी समाज-व्यवस्था की स्थापना से है जो इस प्रकार के संकटों से बरी होगी और जिसमें सर्वहारा वर्ग का आधिपत्य सर्वमान्य होगा। और जिसके फलस्वरूप स्थापित होने वाला विश्वसंघ मानवता को पूँजीवाद के बन्धनों से और साम्राज्यवादी युद्ध की तबाही से छुटकारा दिलाने में समर्थ हो सकेगा।… और मी लार्ड, यदि इस चेतावनी पर ध्यान न दिया गया और वर्तमान शासन-व्यवस्था उठती हुई जनशक्ति के मार्ग में रोड़े अटकाने से बाज न आई तो क्रान्ति के इस आदर्श की पूर्ति के लिए एक भयानक युद्ध का छिड़ना अनिवार्य है।
विराम ,
और मी लार्ड… यदि उद्देश्य को पूरी तरह भुला दिया जाए तो किसी भी व्यक्ति के साथ न्याय नहीं हो सकता क्योंकि उद्देश्यों को नजरों में न रखने पर संसार के बड़े-बड़े सेनापति साधारण हत्यारे नजर आएँगे, सरकारी कर वसूल करने वाले अधिकारी चोर, जालसाज दिखायी देंगे और न्यायधीशों पर कत्ल का अभियोग लगेगा।… उद्देश्य की उपेक्षा की जाए तो हर धर्म-प्रचारक झूठ का प्रचारक दिखाई देगा और हरेक पैगम्बर पर अभियोग लगेगा कि उसने करोड़ों भोले और अनजान लोगों को गुमराह किया। यदि उद्देश्यों को भुला दिया जाए तो हजरत ईसा मसीह आतंक फैलाने वाले, शान्ति भंग करने वाले और विद्रोह का प्रचार करने वाले दिखाई देंगे और कानून के शब्दों में ‘खतरनाक आदमी’ माने जाएँगे। लेकिन हम उनकी पूजा करते हैं, उनका हमारे दिलों में बेहद आदर हे, उनकी मूर्ति हमारे दिलों में अध्यात्मिकता का स्पन्दन पैदा करती है। यह क्यों?… इसलिए कि उनके प्रयत्नों का प्रेरक एक ऊँचे दरजे का उद्देश्य था।… कानूनी दृष्टि से उद्देश्य का प्रश्न खास महत्त्व रखता है।… माई लार्ड, जनरल डायर का उदाहरण लीजिए। उसने गोली चलायी और सैकड़ों बेकसूर और निहत्थे व्यक्तियों को मार डाला। लेकिन फौजी अदालत ने उसे गोली का निशाना बनाने का हुक्म देने के बजाय लाखों रूपये इनाम में दिए। यह सिद्धान्त किस कदर गलत है।
आटे में संखियाँ मिलाना जुर्म नहीं बशर्ते इसका उद्देश्य चूहों को मारना हो। लेकिन यदि इससे किसी आदमी को मार दिया जाए तो यह कत्ल का अपराध बन जाता है।… हमें हत्या के प्रयत्न करने के अपराध के लिए सज़ा दी गयी है, लेकिन हमारे बमों से 4-5 आदमियोंं को मामूली चोटें आईं और एक बेंच को मामूली-सा नुकसान पहुँचा। हमें सजा का कोई डर नहीं है। लेकिन हम यह नहीं चाहते हैं कि हमें गलत समझा जाए…
इन्कलाब-जिन्दाबाद से हमारा वह उद्देश्य नहीं था जो आमतौर पर गलत अर्थ में समझा जाता है। पिस्तौल और बम इन्कलाब नहीं लाते, बल्कि इन्कलाब की तलवार विचारों की सान पर तेज होती है…
मंच के बाहर से ‘सरदार भगतसिंह जिन्दाबाद’ के नारे ,
भगत/दत्त ः इंकलाब जिन्दाबाद!
दर्शक ः जिन्दाबाद-जिन्दाबाद!…
जज ः आर्डर! आर्डर!
भगत/दत्त ः साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
दर्शक ः मुर्दाबाद- मुर्दाबाद!
जज ः आर्डर! आर्डर! आर्डर!…
भगत/दत्त ः दुनिया के मजदूरों एक हो!
दर्शक ः एक हो! एक हो!
जज ः आर्डर, आर्डर, आर्डर, आर्डर…
ख्नारों के साथ अँधेरा। धीरे-धीरे सारा कुछ अँधेरे में विलीन…,

दृश्य आठ

लाहौर सेन्ट्रल जेल के अंदर का एक कमरा। मंचाग्र के बाएँ एक प्रकाशवृत्त में चार-पाँच सिपाही दर्शकों की तरफ पीठ किए एक कतार में घुटनाें के बल बैठे हुए दिखते हैं। कतार के बीच वाला सिपाही सुखदेव की छाती पर बैठा है। सुखदेव का चेहरा अभी दर्शकों को नहीं दिख रहा है, केवल दोनों पैर बाहर निकले हुए हैं।
मंचाग्र के दाएँ हिस्से में जेलर कुर्सी पर बैठा हुआ है। उसके हाथ में कैदियों को खिलानेवाली थाली है। उसे ऊपर उठाकर-,
जेलर ः भूख-हड़ताल !… हमारी जेल में भूख-हड़ताल करोगे ?… खाना नहीं खाओगे ?… क्या कह रहे थे, ‘हमारे साथ जो व्यवहार हो रहा है वह राजनैतिक कैदियों-सा नहीं है, चोर-बदमाशों की तरह है।’… इसलिए इस अन्याय को दूर करने के लिए खाना नहीं खाओगे, लेकिन हमें खिलाने से कैसे रोक पाओगे ?… बताओ रोक सकोगे ?… तुम भूख-हड़ताल करो या असहयोग आन्दोलन… तुम हमारा कुछ नहीं बिगाड़ सके। एक दिन भूखे रहो या सौ दिन… हमारा निर्णय अटल है। (कुर्सी से उठकर अपने दाएँ-बाएँ के विंग्स की तरफ देखकर) देखो… अपनी-अपनी बैरकों से, भूख-हड़तालियो झाँककर देखो… तुम गवाह रहोगे कि कैसे मैंने इन भूख-हड़तालियों की हड़ताल तोड़ दी है… गरूर जो सर चढ़ के बोल रहा था, चूर-चूर कर दिया है…
इतना कहना था कि सारे सिपाही एक साथ पलटते हैं। सभी का चेहरा दर्शकों की तरफ। एक सिपाही रबर की लंबी नली सुखदेव की नाक के रास्ते में डालने लगता है। ,
कहते हैं दूध नहीं पीएँगे, देखते हैं कैसे नहीं पीते हैं ?… पिलाओ दूध… और…
जेलर ठहाके लगने लगता है। सिपाही पाइप में लगे पीपे के सहारे लगातार दूध डालता जाता है। सब बलपूर्वक दूध पिलाने का प्रयास करते हैंं। सुखदेव लगातार विरोध कर रहे हैं। हाथ-पैर चला रहे हैं। धीरे-धीरे बेसुध होने लगते हैं। जेलर हँसते-हँसते अचानक शांत हो जाता है, फिर सिपाहियों को रोकते हुए ,
बस! ध्यान रहे, भूख-हड़ताल से ये मरे नहीं… बल्कि फीडिंग से भूख की ज्वाला बढ़ाओ… इतनी बढ़ाओ कि ये डिग जाए… टूट जाए… टुकड़े-टुकड़े हो जाए।… चलो…
तेज कदमों से जेलर बाहर की तरफ जाने लगता है। पीछे-पीछे सिपाही भी चल पड़ते हैं। सुखदेव बेसुध से पड़े हैं। किसी तरह जोर लगाते हुए उठते हैं। अपनी अंगुलियों को मुँह में डालकर उल्टी कराने का प्रयास करने लगते हैं कि अचानक उल्टी आ जाती है। तेजी से पलटकर दर्शकों की तरफ पीठ कर उल्टी करने में जुट जाते हैं। जबरन जो दूध पिलाया गया था, बाहर करने का अभिनय करते हैंं। भगतसिंह और दूसरे साथी दौड़े हुए आते हैं। सुखदेव को सम्भालते हैं। ,
भगतसिंह ः सुखदेव! सुखदेव!
सुखदेव ः सता ले जितना सताने की हद हो… ढ़ा ले जितनी हों जुल्मो-सितम की इन्तहाँ।… फिर भी करूँगा मैं भूख-हड़ताल… फिर भी करूँगा मैं भूख-हड़ताल… फिर भी करूँगा मैं भूख-हड़ताल…
भगतसिंह ः हाँ सुखदेव, ये अस्त्र भूख-हड़ताल का, टूटेगा नहीं… प्रहार करेगा सत्ता की छाती पर। अनशन चलता रहेगा, चलता रहेगा… जब तक हमारी माँगे पूरी नहीं होती…
विजय ः जब तक हमें राजनैतिक कैदी का सम्मान नहीं दिया जाता…
जयदेव ः मशक्कत के नाम पर सम्मानहीन कामों को करने से रोका नहीं जाता…
शिव वर्मा ः बिना किसी रोक-टोक के पुस्तकें और लिखने का सामान लेने की सुविधा नहीं मिल जाती…
प्रेमदत्त ः कम-से-कम एक दैनिक पत्र हरेक कैदी को दिया नहीं जाता…
गया प्रसाद ः राजनैतिक कैदियों को एक विशेष वार्ड नहीं मिल जाता…
बी.के. दत्त ः स्नान की सुविधा…
किशोरीलाल ः अच्छे कपड़े नहीं मिल जाते…
भगतसिंह ः और जब तक ये माँगे पूरी नहीं होतीं…
सब ः तब तक कोई समझौता नहीं। कोई वार्ता नहीं। कोई फैसला नहीं।
सुखदेव ः ये हमारा ऐलान है और हम हैं…
सब ः लाहौर षड्यंत्र केस के, भूख हड़ताली।
अँधेरा ,

दृश्य नौ

अँधेरे में बातचीत। खुसुर-फुसुर की आवाज के साथ प्रकाश आने लगता है। पूरा प्रकाश आता है तो दर्शकों के सम्मुख अदालत का दृश्य दिखलाई पड़ता है। अदालत के लोग अपना-अपना स्थान ग्रहण किए हुए हैं।
जैसे अखाड़े में मस्त पहलवान आते हैं, उसी तरह भगतसिंह, राजगुरू, सुखदेव और उनके साथी बटुकेश्वर दत्त, जयदेव कपूर, विजय कुमार सिन्हा, शिव वर्मा, प्रेमदत्त अदालत में आते हैंं। झूम-झूमकर गाते हुए कटघरे की तरफ बढ़ने लगते हैं। ,
(गाना)
सरफरोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है।
देखना है जोर कितना बाजुए कातिल में है।।
वक्त आने दे बता देंगे मुझे ऐ आसमाँ,
हम अभी से क्या बताएँ, क्या हमारे दिल में है।
ऐ शहीदे मुल्को मिल्लत, मैं तेरे ऊपर निसार
अब तेरी हिम्मत की चर्चा गैर की महफिल में है।
जज का आगमन। ज्योंहि वह कुर्सी पर बैठता है, भगतसिंह और उनके साथी ‘इन्कलाब जिन्दाबाद’, ‘साम्राज्यवाद मुर्दाबाद’, ‘दुनिया के मजदूरों, एक हो’ के नारे लगाने शुरू कर देते हैं। जज सर झुकाए मौन बैठा है। वकील शांत है। अर्दली, सिपाही भी सिर झुकाए खड़े रहते हैं। नारे सुनते-सुनते जज झुँझला उठता है। ,
जज ः ये क्या मजाक है ? अदालत है या शालीमार बाग ?
सब ः वतन की आबरू का पास देखें कौन करता है,
सुना है आज मक्तल में हमारा इम्तहाँ होगा।
इलाही वह भी दिन होगा जब अपना राज देखेंगे
जब अपनी ही जमीं होगी और अपना आस्माँ होगा।
जज ः (बौखलाकर) आई से स्टॉप दिस नॉनसेंस।
सिपाही ः ऐ बंद करो, बंद करो ये शेरो शायरी।
जज ः (फाइल के पन्ने पलटकर) मुकदमा… सम्राट बनाम भगतसिंह आदि शुरू हो…
अर्दली ः (एक कोने पर जाकर) सरकारी गवाह जयगोपाल हाजिर हो ऽ ऽ… हाजिर हो ऽ ऽ… हाजिर हो ऽ ऽ…
जयगोपाल विटनेस बॉक्स में आकर खड़ा हो जाता है। ,
प्रेमदत्त ः (जयगोपाल को इंगित कर) आ गया सरकारी कुत्ता!…
अर्दली ः (जयगोपाल के पास जाकर) गीता पर हाथ रखकर कहो कि…
प्रेमदत्त ः (ताना मारते हुए) हाँ-हाँ कह दे, कह दे… वही कहूँगा जो विलायती पिल्लों ने पढ़ा के भेजा है।
अदालत में हल्ला मच जाता है। ,
जज ः खामोश, खामोश रहिए। (पॉज) अदालत की कारवाई शुरू की जाए।
सरकारी वकील जिरह के लिए उठता है। ,
स. वकील ः थैंक्स मी लार्ड! (जयगोपाल के पास आकर) आपका नाम ?
जयगोपाल ः जयगोपाल!
स. वकील ः (भगतसिंह व साथियाें को इंगित कर) इन्हें जानते हैं ?
जयगोपाल ः अच्छी तरह से।
स. वकील ः अच्छी तरह से क्या जानते हैं ?
जयगोपाल ः कि ये आतंकवादी हैं, टेरेरिस्ट हैं। मुल्क में मारकाट, हिंसा के द्वारा आतंक का माहौल उत्पन्न करना चाहते हैं। इनका मूल सिद्धांत आतंकवाद है। देश के किसी नियम, कानून, अचार-विचार या संविधान में आस्था नहीं है। है तो केवल खून-हत्या, डाका, कत्ल, बगावत में…
स. वकील ः बगावत!
जयगोपाल ः ये हथियारों के द्वारा देश का तख्ता पलटना चाहते हैं।
स. वकील ः (चौंकने का अभिनय) तख्ता पलट देना चाहते हैं!
जयगोपाल ः अंडरग्राउण्ड पार्टी बनाकर समांतर सरकार चलाना चाहते हैं।
स. वकील ः यू मीन, पैरलेल गॉवर्नमेंट ! मी लार्ड, ये पोइंट नोट किया जाए।
जयगोपाल ः व्यक्तिगत हिंसा के सहारे न्याय और कानून की धज्जियाँ उड़ाना चाहते हैं।
स. वकील ः इसका कोई सबूत है आपके पास ?
जयगोपाल ः सांडर्स की हत्या।
स. वकील ः किसने की थी सांडर्स की हत्या ?
जयगोपाल ः भगतसिंह, राजगुरू और चन्द्रशेखर आजाद ने।
स. वकील ः किस आधार पर कह रहे हैं ?
जयगोपाल ः (जज से) मी लार्ड, जब हत्या हुई, मैं वहीं था।
स. वकील ः आप वहाँ क्या कर रहे थे ?
जयगोपाल ः मैं भी इस एक्शन में शामिल था।
स. वकील ः आप कैसे आ गए इस बम पार्टी में ?
जयगोपाल ः (जज की तरफ मुड़कर) मी लार्ड, मैं क्या… कोई भी इनकी देशभक्ति की बातें, खून खौलानेवाली… अंगार पैदा करनेवाली, क्रांति की तकरीरें सुन ले तो… इनकी बम पार्टी में आ सकता है। फिर मुझे क्या पता था, इनके आदर्श, सिद्धांत, विचारधारा महज हाथी के दाँत हैं। वास्तव में ये खूनी-हत्यारे-लुटेरे हैंं। लुच्चे-लफंगे-हुल्लड़बाजों की पार्टी है। (भगतसिंह व साथियों की तरफ मुड़कर) ऐसे भला देश आजाद होगा, उल्टे और अव्यवस्था फैल जाएगी। फासिस्टों की ताकत बढ़ेगी।
जज ः (भगतसिंह से) आपके क्या विचार हैं इस बारे में ?
भगतसिंह ः किसके बारे में ? क्रांति ?
जज ः जयगोपाल…।
भगतसिंह ः (जयगोपाल को देखकर) मी लार्ड, जयगोपाल हमारे संगठन का सबसे भरोसे वाला नौजवान समझा जाता था। सच्चा हीरा था।… सोचता हूँ, पुलिस ने आठ दिनों में किस कदर टार्चर किया होगा कि हीरा टूट कर टुकड़े-टुकड़े हो गया। न्यायालय सिवाय ढ़कोसले के और कुछ नहीं है।
स. वकील ः आब्जेक्शन मी लार्ड! ये तो अदालत की सरासर तौहीन है।
भगतसिंह ः यह अदालत एक ढ़कोसला है।
जज ः आर्डर, आर्डर।
भगतसिंह ः हम पर लगाए सारे अभियोग गलत है मी लार्ड। हम मुकदमें की कार्यवाही में किसी भी प्रकार भाग नहीं लेना चाहते क्योंकि हम इस सरकार को न तो न्याय पर आधारित समझते हैं, न ही कानूनी तौर पर स्थापित।
राजगुरू ः क्रांतिकारी अगर बम और पिस्तौल का सहारा लेता है तो यह उसकी आवश्यकता में से पैदा होता है और आखिरी दाँव के तौर पर होता है। जज साब, हमारा विश्वास है कि अमन और कानून मनुष्य के लिए है न कि मनुष्य अमन और कानून के लिए।
सुखेदव ः मी लार्ड, हम शास्वत और वास्तविक शांति चाहते हैं जिसका आधार न्याय और समानता है। हम झूठी और दिखावटी शांति के समर्थक नहीं जो बुजदिली से पैदा होती है और भालों और बन्दूकों के सहारे जीवित रहती है।
विजय ः हम वर्तमान ढाँचे के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक क्षेत्रों में क्रांतिकारी परिवर्तन लाने के पक्ष में है। जब तक सारा सामाजिक ढाँचा बदला नहीं जाता, उसके स्थान पर समाजवादी समाज स्थापित नहीं होता, हम महसूस करते हैं कि सारी दुनिया संकट में है।
भगतसिंह ः इसलिए मी लार्ड, हमारा दृढ़ विश्वास है कि चाहे जिस भी ढंग से हो देश में क्रांति लाई जा सके और इस सरकार का पूरी तरह खात्मा किया जा सके, इसके लिए हर प्रयास और अपनाए गए सभी ढंग नैतिक स्तर पर जायज है…
स. वकील ः (ऊँची आवाज में) सुन रहे हैं मी लार्ड…
जयगोपाल ः (चीखकर) ये तो खुलेआम युद्ध की घोषणा है।
स. वकील ः व्यवस्था के खिलाफ खुला विद्रोह है।
जयगोपाल ः न्यायालय पर सीधा प्रहार है।
स. वकील ः मी लार्ड, ये लोग जब देखिए तब हमेशा एक ही नारे लगाते हैं, इंकलाब…
सब ः जिंदाबाद।…
स. वकील ः देखा मी लार्ड। इसलिए अदालत का वक्त जाया न करते हुए आपसे गुजारिश करता हूँ कि इन सिरफिरे, राजद्रोहियों को सख्त-से-सख्त सज़ा दें ताकि आनेवाली नस्ल भविष्य में हिंसा व दहशत के रास्ते पर चलने की जुर्रत न कर सके। दैट्स आॅल मी लार्ड।
जयगोपाल ः हुजूर नादान लड़के हैं। थोड़ा मुरव्वत कीजिएगा। कहिएगा तो कान पकड़कर माफी भी माँग लेंगे। मुर्गा भी बन जाएँगे। अभी-अभी स्कूल से निकले हैं, अभ्यास छूटा थोड़े है। (इतना कहकर उन्हें दिखा-दिखाकर मूँछे ऐंठने लगता है।)
सब ः (जयगोपाल की हिमाकत को देखकर चिल्ला पड़ते हैं) शेम, शेम!
प्रेमदत्त सबसे छोटी उम्र के हैं। झट आवेश में आ जाते हैं!
जूता निकालकर जयगोपाल के मँुह पर दे मारते हैं। ,
प्रेमदत्त ः अंग्रेजों के टट्टू।…
जूता जयगोपाल के थोबड़े पर पड़ता है। अदालत में हंगामा मच जाता है। ,
जज ः आर्डर, आर्डर। (सिपाहियों से) इन्हें हथकड़ी पहना दो।
पुलिस कटघरे की तरफ हथकड़ी पहनाने के लिए बढ़ती है। ,
द कोर्ट इज एडजर्न…
मुल्तवी की घोषणा सुनकर दर्शक दीर्घा के लोग तथा वकील गण उठकर अदालत से बाहर जाने लगते हैं। भगतसिंह व साथी कटघरे में ही हैं। सिपाही हथकड़ी लेकर उनकी तरफ बढ़ता है, पर उनमें कोई उसे पहनने को तैयार नहीं होता है। पुलिस उन पर डंडे चलाती है। विरोध में भगतसिंह और उनके साथी नारे लगाते हैं। सिपाही पहनाने के लिए जोर-जबरदस्ती करने पर उतारू हो जाते हैं तब भगतसिंह और उनके साथ धक्का दे देते हैं। वे लड़खड़ाकर मंच के दूसरे कोने की तरफ फेंका जाते हैं जहाँ जज खड़ा है। ,
अर्दली ः (उठते हुूए) हुजूर, इंकलाबी हथकड़ी नहीं पहन रहे हैं।
जज ः (पाइप निकालकर मुँह में दबाता है) हुअं ऽ ऽ…
सिपाही ः (सहम कर बढ़ते हुए) अपनी जिद पर अड़े हैं।
जज ः (पाइप में तम्बाकू भरता है) अच्छा ऽ ऽ…
अर्दली ः लड़ने-झगड़ने पर आमादा है।
जज ः (पाइप सुलगाता है) ये बात है…
सिपाही ः क्या करें हुजूर ?
जज ः (धुआँ छोड़कर) हिजड़ों, तुम करोगे भी क्या ?… घास-फूस खानेवालो, तुम क्या खाकर पहनाओगे हथकडि़याँ ? (पलटता है। एक कोने की तरफ मुड़ता है, उधर से आठ पठान डंडे-लाठी के साथ आते हैं) हथकडि़याँ तो पहनाएँगे हमारे ये जांबाज पठान। (इशारा पाकर पठान सिपाही भगतसिंह व उनके साथियों की तरफ बढ़ते हैं) हिन्दू के खिलाफ मुसलमान। और मुसलमान के खिलाफ हिन्दू। (हँस पड़ता है) पेशावर में जब मुसलमान विरोध करे तो खिलाफ खड़े करो हिन्दू और पंजाब में जब हिन्दू हो तो भिड़ाओ मुसलमान। (खिलाखिलाकर हँस पड़ता है) पॉलिटिक्स का बस एक है गुर। डिवाइड एंड रूल। बाँटो और राज करो। इस हिन्दुस्तान को एक मत रहने दो। टुकडे़-टुकड़े कर दो इसकी शान को। इन्हें जाति में बाँटो, धर्म में बाँटो, भाषा में बाँटो। बाँटो… बाँटो… और राज करो… (पठान सिपाही शिकारी कुत्ते की माफिक भगतसिंह व साथियों पर टूट पड़ते हैं। भयंकर और क्रूरतम पिटाई करते हैं। भगतसिंह को खींचकर अलग लाते हैं और विशेष रूप से उन पर पिल पड़ते हैं। चार-पाँच पठान अकेले भगतसिंह से लिपटे पड़े हैं। लाठी, जूतों से उन्हें मारने लगते हैं) मारो और मारो इन बास्टर्ड्स को!
भगतसिंह ः खबरदार गाली मत देना, हम कोई चोर-लुच्चे नहीं हैं।
राजगुरू ः इंकलाबी हैं।
सुखदेव ः अब और गाली दी तो…
जज ः (तमक कर) क्या कर लोगे ? यू ब्लडी… ब्लैक इंडियन…
सुखदेव तड़प उठते हैं, तेजी से जज की तरफ दौड़ पड़ते हैं। परंतु सिपाही लपक कर पकड़ लेते हैं। जमीन पर गिराकर निर्मम ढंग से पीटने लगते हैं। भगतसिंह व उनके साथी लगातार ‘इंकलाब-जिंदाबाद’ के नारे लगाते रहते है। मारते-मारते पठान सिपाही थक जाते हैंं जो जज के पास आते हैं। ,
पठान 1 ः हुजूर, पता नहीं, किस धातु के बने हैं, टूटने का नाम नहीं ले रहे हैं।
पठान 2 ः आप कहें तो मारते-मारते जान ले लें… लेकिन इनकी मर्जी के खिलाफ कुछ करना बड़ा मुश्किल है…
जज ः सब मुश्किल आसान हो जाएगा, जेल ले चलो…
सिपाही घायल अभियुक्तों को ले जाने के लिए बढ़ते हैं। अभियुक्त सस्वर गाते हैं। ,
(गाना)
अपनी किस्मत में अजल से ही सितम रखा था,
रंज रखा था, मुहिम रखी थी, ग़म रखा था,
किसको परवा थी और किसमें ये दम रखा था,
हमने जब वादि-ए-गुरबत में कदम रखा था,
दूर तक यादे वतन आई थी समझाने को।
अंधेरा ,

दृश्य दस

जेल के एक कमरे में भगतसिंह, जयगुरू, सुखदेव और उनके साथी सहज भाव से इधर-उधर बैठे गपिया रहे हैं। कोई तनाव नहीं है। हँस रहे हैं, एक-दूसरे को छेड़ रहे हैं, लतीफे-चुटकुले सुनाए जा रहे हैं। खुलकर ठहाके लगा रहे हैं। ,
विजय ः गया प्रसाद नहीं दिख रहा है, कहीं गया है क्या ?
राजगुरू ः मियाँ की दौड़ मस्जिद तक। जनाब बड़े घर गए हैं। सुबह से पाँचवी मरतबा है।
भगतसिंह ः जो हो, कल का डिनर था लाजवाब। याद रहेगा…
सुखदेव ः याद तो आगरा के उस डिनर की खूब आती है, क्यों सरदार ?
भगतसिंह ः अरे हाँ, वो भला भूल सकते हैं ?
शिव वर्मा ः कोई खास तरह का था आगरे का वो डिनर ?
सुखदेव ः बिल्कुल खास समझो।
विजय ः हमें भी बताओ।
सुखदेव ः क्याें सरदार, बता दें ?
भगतसिंह ः अरे छड्ड यार…
प्रेमदत्त ः छड्ड क्यों, सुना दे यार…
सब ः हाँ-हाँ, सुना दे…
सुखदेव ः काकोरी केस के साथियों को जब हम जेल से छुड़ाने की योजना में आगरा में थे, तब पैसे की बेहद तंगी थी। बर्तन की जगह मिट्टी के ठीकरे से काम चलाते थे। तो भला खाना कैसा बनता ? फिर खाने का स्वाद तो भइया, पकाने से आता है न। वहाँ तो ऐसे-ऐसे पाक शास्त्री थे, जिन्हें यह भी पता नहीं था कि दाल में नमक के साथ हल्दी भी पड़ती है…
सब हँसते हैं। ,
प्रेमदत्त ः फिर क्या हुआ ?
सुखदेव ः हुआ क्या… भगतसिंह खाना खाने बैठे तो खाना उनके गले के नीचे नहीं उतर रहा था। खाने को खराब बताते तो उन्हें बुरा लगता जो साथ शौक से खा रहे थे। खाना छोड़कर भी नहीं उठ सकते थे। खाना बंद कर दिया तो सब कारण पूछते। सो सोच-समझकर सरदार ने कहा…
भगतसिंह ः (खाने का अभिनय करते हुए) आप लोग जानते हैं, लखनऊ के नवाब किस तरह खाना खाते थे ? (खुद ही बोल पड़ते हैंं) लीजिए, मैं आपको दिखाता हूँ।
भगतसिंह तीन अंगुलियाँ खड़ी करके अंगूठे और पास की अंगुली से मोटी रोटी का एक छोटा-सा टुकड़ा इस नजाकत से तोड़ने का अभिनय करते हैं, जैसे रोटी से अंगुली छूना गुनाह हो, फिर उस टुकड़े को इस नफासत से मुँह में रखते हैं जैसे हीरे की अंगूठी को मखमली डिबिया में रख रहे हों, धीरे-धीरे मुँह चलाते रहते हैं। ,
सुखदेव ः नवाबी का यह नाटक तब तक चला जब तक दूसरे लोगों ने पूरा खाना खाया। बाद में अदा के साथ कुल्हड़ उठाया और पानी के घूँट से उसे पेट में पहुँचाया। फिर डकार लेते हुए उठे और लखनवी अन्दाज में बोले…
भगतसिंह ः वल्लाह, क्या लजीज खाना है।
सब ठठाकर हँसते हैं। गया प्रसाद अन्दर आते
हुए- ,
गया प्रसाद ः अरे बस भी करो यारो। गुसलखाने तक हँसी की आवाज आ रही है। बैठना तक मुश्किल हो गया। अगर हँसी अदालत तक पहुँच गयी तो मजिस्ट्रेट कहेगा, जेल में बड़ी मस्ती चल रही है। स्सालों को जल्दी सज़ा सुनाओ और छुट्टी काटो।
विजय ः अरे छुट्टी तो मैं मजिस्ट्रेट की कर दूँ, अगर एक बार मुझे कुर्सी पर बिठा दे। सारा केस एक दिन में ही निपटा दूँगा।
शिव वर्मा ः तो कर फैसला। रोक कौन रहा है ?
जयदेव ः हाँ, ये ठीक है। एक-दूसरे का फैसला खुद ही कर डालें। पता नहीं सरकार कब सुनाए।
प्रेमदत्त ः (फौरन खड़ा होकर) पहले विजय भैया का फैसला सुनाता हूँ। जब देखो विजय भैया पढ़ते रहते हैं और देख रहा हूँ अभी ढेरों किताबें पढ़ने को बाकी हैं। सो उनके साथ न्याय होना चाहिए। फैसला… सज़ा-ए-काला पानी। पढ़ते रहिए उम्र भर…
विजय ः और तुझे ? (सोचकर) तू छोटा है, चल माफ किया। तू भी क्या याद करेगा ?
शिव वर्मा ः ऐसी गलती मत करना विजय भैया। देखने में छोटा है पर घाव गम्भीर करता है…
सुखदेव ः जयगोपाल को अभी भी वह जूता याद होगा…
शिव वर्मा ः चलो, तीन साल की सज़ा तो सुना ही दो।
जयदेव ः और शिव दा, तुमने भी कम खुराफात नहीं किए हैं। लड्डुओं के माफिक बम बनाए हैं।
गया प्रसाद ः अरे सबको सज़ा सुनाए जा रहे हो, किसी को छोड़ो भी…
विजय ः चलो जितेन्द्र सान्याल को छोड़ दिया। वो भी क्या इस मजिस्ट्रेट को याद करेगा।
भगतसिंह ः (मुस्कुराते हुए) और राजगुरू, सुखदेव और मेरा फैसला ? क्या आप लोग हमें बरी कर रहे हैं। (कोई जवाब नहीं देता है। भगतसिंह धीमे स्वर में) असलियत को स्वीकारते हुए डर लगता है ? (चुप्पी छायी रहती है। भगतसिंह ठहाका लगाते हैं। उठकर एक ऊँचे स्थान पर खड़ा होकर ऐलानिया अन्दाज में) हमें फाँसी के फन्दे से तब तक लटकाया जाय जब तक कि हम मर न जाएँ। (स्वाभाविक मुद्रा में) यह हकीकत है जिसे मैं जानता हूँ और तुम भी जानते हो। फिर क्यों हकीकत से आँखें चुराते हो ? (स्वर धीमा है पर यही शक्ति है। स्वाभाविक अन्दाज में) ये तो देशभक्ति का सबसे बड़ा पुरस्कार है। और हमें गर्व है क हम यह पुरस्कार पाने जा रहे हैं वे सोचते हैं कि हमारे शरीर को नष्ट कर के इस देश में सुरक्षित रह जाएँगे। यह उनकी भूल है। वे हमें मार सकते हैं, लेकिन हमारी भावनाओं को नहीं कुचल सकेंगे। ब्रिटिश हुकूमत के सिर पर मेरे विचार उस समय तक एक अभिशाप की तरह मँडराते रहेंगे जब तक वे यहाँ से भागने के लिए मजबूर न हो जाएँ। (बोलते-बोलते पूरे आवेश में आ जाते हैं। अन्य उनके चेहरे को टुकुर-टुकुर देखते रहते हैं) लेकिन यह तस्वीर का सिर्फ एक पहलू है। दूसरा पहलू भी उतना ही उज्जवल है। ब्रिटिश हुकूमत के लिए मरा हुआ भगतसिंह जीवित भगतसिंह से ज्यादा खतरनाक होगा। हमें फाँसी हो जाने के बाद हमारे क्रान्तिकारी विचारों की सुगन्ध हमारे इस मनोहर देश के वातावरण में व्याप्त हो जाएगी। वह नौजवानों को मदहोश कर देगी। और वे आजादी और क्रान्ति के लिए पागल हो उठेंगे। और यही पागलपन ब्रिटिश साम्राज्यवादियाें को विनाश के कगार पर पहुँचा देगा। यह मेरा दृढ़ विश्वास है। मैं बेताबी के साथ उस दिन का इन्तजार कर रहा हूँ जब मुझे देश के लिए, मेरी सेवाओं और जनता के लिए मेरे प्रेम का सर्वोच्च पुरस्कार मिलेगा…
जेलर सिपाहियों के साथ अन्दर आता है। ,
जेलर ः (अभियुक्तों से) ट्रिब्यूनल का फैसला आ गया है।
प्रेमदत्त ः हम इसी का इन्तजार कर रहे हैं…
जयदेव ः कमाल हो गया, जेल में ही अदालत आ गई। बैठ जाओ भाइयों । ट्रिब्यूनल का कुछ तो सम्मान करो। कायदे से बैठ जाओ।
जो जहाँ थे, वहीं बैठ जाते हैं। जेलर लिफाफा खोलकर कागज निकालता है। ,
जेलर ः चूँकि लाहौर षड्यन्त्र के अभियुक्तों ने ट्रिब्यूनल का बहिष्कार किया था, अदालत में उपस्थित न होने का निर्णय लिया था… लिहाजा सरकार ने निर्णय लिया है कि जेल में जाकर फैसला सुनाया जाए। ट्रिब्यूनल का फैसला इस प्रकार है… (कागज पढ़ने का अभिनय) विजय कुमार सिन्हा, कमलनाथ तिवारी, जयदेव कपूर, शिव वर्मा, गया प्रसाद, किशोरीलाल और महावीर सिंह को आजन्म काला पानी।… कुन्दनलाल को सात साल और प्रेमदत्त को तीन साल की कड़ी कैद।… मास्टर आशाराम, जयगोपाल, सुरेन्द्र पाण्डेय, अजय घोष, देशराज और जितेन्द्रनाथ सान्याल रिहा। (पॉज) और सुखेदव…राजगुरू… और भगतसिंह को दफा 121 और दफा 302 ताजीराते-हिन्द और दफा चार (बी) सहपठित दफा 6(एफ) विस्फोटक पदार्थ अधिनियम और दफा 120 (बी) ताजीराते-हिन्द में सज़ा-ए-मौत… (पॉज) टू बी हैंग्ड बाई द नेक टिल ही इज डैड…
अंतिम शब्द सुनाकर जेलर चुप हो जाता है। अगले क्षण वहाँ टिक नहीं पाता है। मुड़कर सिपाहियों के साथ तेजी से बाहर चला जाता है।
कमरे में गहन खामोशी छायी है कि भगतसिंह अपने स्थान पर खड़े होकर आलाप भरते हैं। ,
(गाना)
दम निकले इस देश की खातिर, बस इतना अरमान है।
एक बार इस राह में मरना, सौ जन्मों के समान है।
देख के वीरों की कुरबानी, अपना दिल भी डोला।
मेरा रंग दे बसंती चोला..
जेल के अन्य साथी भी अब धीरे-धीरे इस गाने में स्वर देने लगते हैं। ,
मेरा रंग दे बसन्ती चोला…
जिस चोले को पहन शिवाजी, खेले अपनी जान पे
जिसे पहन झाँसी की रानी, मिट गयी अपनी आन पे
आज उसी को पहन के निकला, हम मस्तों का टोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला..
बहुत ही गहरा दाग है यारो, जिसका गुलामी नाम है।
उसका जीना भी क्या जीना, जिसका देश गुलाम है।
सीने में जो दिल था यारो, आज बना वो शोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला…
भगतसिंह विजय के पास आते हैं। ,
भगतसिंह ः भाई, ऐसा न हो कि फाँसी रूक जाए। और क्रान्ति के कार्य को आगे बढ़ाने के लिए मुझे बलिदान होने का सौभाग्य प्राप्त न हो सके। मेरे भाई, हम मरकर ही क्रान्ति की सेवा कर सकते हैं। (फिर अन्य साथियों की तरफ मुड़कर) लेकिन ये फाँसी तब हो जब देश की जनता का जोश पूरे उफान पर हो और उनका ध्यान पूरी तरह फाँसी पर केन्द्रित हो।
जयदेव ः सरदार, तुम मरने जा रहे हो, तुम्हें इसका अफसोस तो नहीं है।
भगतसिंह पहले तो जोर से हँसते हैं फिर गंभीर होकर बोलते हैं। ,
भगतसिंह ः क्रान्ति के मार्ग पर कदम रखते समय मैंने सोचा था कि यदि मैं अपना जीवन देकर देश के कोने-कोने तक ‘इंकलाब-जिंदाबाद’ का नारा पहुँचा सका तो समझूँगा जीवन का मूल्य मिल गया। आज फाँसी की इस काल कोठरी में लोहे के मोटे-मोटे सीखचों के पीछे बैठकर भी मैं करोड़ों देशवासियों के कंठों से उठती हुई उस नारे की हुँकार सुन रहा हूँ और मेरा विश्वास है कि मेरा यह नारा साम्राज्यवादियों पर अन्त तक प्रहार करता रहेगा। (कुछ क्षण ठहरकर अपनी स्वाभाविक मुस्कुराहट के साथ धीरे से कहते हैं) और इतनी छोटी सी जिन्दगी का इससे अधिक मूल्य हो भी क्या सकता है भाई… (शिव वर्मा को भावुक होते देखकर) भावुक बनने का समय अभी नहीं आया है प्रभात। मैं तो कुछ ही दिनों में सारे झंझटों से छुटकारा पा जाऊँगा लेकिन तुम लोगाें को लम्बा सफर तय करना है। मुझे विश्वास है कि उत्तरदायित्व के भारी बोझ के बावजूद इस लम्बे अभियान में तुम थकोगे नहीं, पस्त नहीं होगे, न हार मानकर रास्ते में बैठ जाओगे।
कहकर प्रभात जिनका असली नाम शिव वर्मा है, के हाथ को थाम लेते हैं। शिव शर्मा खुद को रोक नहीं पाते हैं। छाती से चिपक जाते हैं।
जेलर सिपाहियों के साथ प्रवेश करता है। पास आकर धीमें स्वर में कहता है। ,
जेलर ः चलिए…
भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव चल पड़ते हैं। उनके साथी पीछे से आवाज देते हैं। ,
सब ः सरदार।… राजगुरू।… सुखदेव।…
तीनों पलटते हैं। सारे साथी उनकी तरफ दौड़ पड़ते हैं। बाँहें फैलाकर उन्हें गले लगा लेते हैं। लिपटकर एक-दूसरे से मिलने लगते हैं। माहौल मार्मिक हो जाता है। ,

दृश्य ग्यारह

जेल की काल कोठरी में भगतसिंह दीवार से पीठ टिकाए, खिड़की के बाहर की तरफ देख रहे हैं। खिड़की से नीली रोशनी छन-छनकर अन्दर आ रही है। भगतसिंह किसी ख्याल में खोए हुए हैं।
जेल का चीफ वार्डर, रिटायर्ड फौजी हवलदार सरदार चतरसिंह अन्दर आता है। ,
चतरसिंह ः सरदार! (भगतसिंह अभी भी विचारों में डूबे हुए हैं। कन्धे पर हाथ रखकर पुनः) सरदार!
भगतसिंह ः (तन्द्रा टूटते ही) सरदार चतरसिंह जी! कहिए…
चतरसिंह ः कहाँ हो ? सपने देख रहे हो क्या ?
भगतसिंह ः (भावुक होकर) हाँ, और जिस संसार के सपने देख रहा हूँ उसमें देशों के बीच की दीवारें हट जाएँगी… सारा संसार एक हो जाएगा। न मजहब की कोई दीवारें होंगी, न आदमी-आदमी में फर्क। न भाषा की लड़ाई, न जाति की काई टकराहट। होगा तो बस प्यार… एकता… भाईचारा… (कहते-कहते भगतसिंह की मुट्ठी बँध जाती है। खुशी से झूम उठते है) और ऐसा समय आएगा, जरूर आएगा।…
चतरसिंह ः सरदार, आपके घरवाले आए हैं।
दादा, माता-पिता-चाची एवं छोटे भाई कुलतार, कुलवीर व बहन अमर कौर का प्रवेश। भगतसिंह उनकी तरफ बढ़ते हैं। ,
भगतसिंह ः दादाजी!… कैसे हैं ?
दादा सरदार अर्जुन सिंह काफी अधीर हैं। भगतसिंह के सिर पर हाथ फेरने लगते हैं जैसे भगतसिंह एक छोटे-से बालक हो। ,
अर्जुनसिंह ः तू कैसा है पुत्तर ?
भगतसिंह ः बिल्कुल चंगा हूँ दादाजी। देखते नहीं क्या तन्दुरूस्ती बन गई है। कहा करते थे न, सेहत बादशाहों वाली… जब से जेल में आया हूँ, वजन और बढ़ गया है। लाठियाँ भले कुछ कम मिलें पर रोटियों के साथ कोई समझौता नहीं। जमकर सरकारी रोटियाँ तोड़ रहा हूँ। शरीर देखकर सरकार भी हड़बड़ा रही होगी, कहीं फाँसी का फन्दा कमजोर न पड़ जाए इस सरदार के लिए…
अर्जुनसिंह बहुत कुछ बोलना चाह रहे हैं पर उच्छ्वास इतना प्रबल है कि बोल कण्ठ को पार कर जीभ तक आ तो जरूर रहे हैं पर अधरों की कपकपी उन्हें शब्दों के रूप नहीं लेने दे रही है। और एक फीकी फुसफुसाहट बनकर रह जाती है। ,
अर्जुनसिंह ः भागो ऽ ऽ…
अर्जुनसिंह के उद्वेग इतने प्रबल हो जाते हैं कि पास खड़े रहना असह्य हो जाता है। दूर जा खड़े होते हैं। उनके भाव आँसू बन-बनकर बराबर बहते रहते हैं। भगतसिंह एकटक देखते रहते हैं, खुद को सम्भालते हैं। पिताजी के पास आते हैं। ,
भगतसिंह ः पिताजी, आपको याद होगा जब मैं छोटा था… बापूजी ने मेरे यज्ञोपवीत के वक्त ऐलान किया था, मुझे खिदमते-वतन के लिए वक़्फ कर दिया गया है। लिहाजा मैं उस वक्त की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। (बगल में खड़ी माँ रो पड़ती हैं। उनके पास जाकर) बेबेजी! (माँ कुछ नहीं बोल पाती है।) बेबेजी, दादाजी काफी कमजोर हो गये हैं। बूढ़े भी कुछ ज्यादा दिखने लगे हैं। अब ज्यादा दिन नहीं जिएँगे। आप बंगा जाकर इनके पास ही रहना। उन्हें अब अकेले मत छोड़ना (माँ का रोना जारी है) आप लोग मेरी मौत का गम न करना। मैं तो कभी भी नहीं मरूँगा। एक भगतसिंह मरेगा तो लाखों भगतसिंह पैदा होंगे। (माँ रोते ही जा रही है) फाँसी के दिन आप न आना बेबेजी।
माँ ः क्यों भागो, क्यों ?
भगतसिंह ः आप आएँगी तो जरूर रोएँगी। रोते-रोते बेहोश हो जाएँगी। तब लोग आपको सम्भालने में लगेंगे या मेरी लाश लेंगे।
माँ ः ना भागो, ना! (फफककर रो पड़ती हैं।)
भगतसिंह ः ये क्या बेबेजी ? (माँ पलटकर भगतसिंह के गले लग जाती है) हाँ बेबेजी, मेरी लाश लेने आप मत आना। कुलबीर को भेज देना। कहीं आप रो पड़ीं तो सब कहेंगे, देखो भगतसिंह की माँ रो रही हैं…
ख्कहकर भगतसिंह इतने जोर से हँसते हैं कि वार्डर चतरसिंह फटी-फटी आँखों से देखता रह जाता है। ,
माँ ः पुत्तर, तू अगर भगतसिंह है तो मैं भी भगतसिंह की माँ हूँ। जिसने अपने कलेजे को निकालकर मुल्क पर कुर्बान कर दिया, उसे तू इतना कमजोर समझता है कि वह बेहोश हो जाएगी। अरे, ये तो खुशी के आँसू हैं। पुत्तर, मुझे तो तुझ पर नाज है। तू अपने इरादे से डिगना नहीं। मरना तो एक दिन सबको है पुत्तर पर महान् काम के लए मरना कुछ ही लोगों को नसीब होता है। मैं खुश हूँ कि मेरा लाल देश के काम आया। मैं तो चाहती हूँ मेरा पुत्तर फाँसी के तख्त पर चढ़कर ‘इन्कलाब-जिन्दाबाद’ के नारे इतने जोर से लगाए कि पूरा मुल्क इन नारों से गूँज उठे। (पास आकर) और ये सुनकर तो मैं जरूर पागल हो जाऊँगी रे। रोऊँगी नहीं, झूम-झूमकर गाऊँगी। पंजाब में भाई की शादी पर बहनें घोड़ी गाती हैं। पर देखना तेरी शादी पर लाहौर की गलियों में…पंजाब के गाँवों में… देख के कोने-कोने मेें… हर तरफ लोग गाएँगे…
ख् दूर कहीं से गाने की आवाज ,
तू न रोना कि तू है भगतसिंह की माँ
मर के भी लाल तेरा मरेगा नहीं
घोड़ी चढ़के तो लाते हैं दुल्हन सभी
हँस के फाँसी पर चढ़ेगा तेरा लाल…
माँ मुड़कर बाहर जाने लगती है। कुलबीर माँ को सम्भालता है। सब जाने लगते हैं। सभी की आँखों में आँसू हैं। कुलतार दौड़कर भगतसिंह के पैरों में चिपक जाता है। बड़ी मुश्किल से वहाँ से जाने को तैयार होता है।
वार्डर चतरसिंह उन्हें जाते हुए देखता है। झुककर जमीन की धूल उठाता है, माथे से लगा लेता है।
भगतसिंह उस तरफ बढ़ते हैं जिधर से घरवाले गए हैं। कुछ कदम चलकर- ,

भगतसिंह ः भाई कुलतार, तुम्हारी आँखों में आँसू देखकर दुःख हुआ। तुम्हारे आँसू मुझसे सहन नहीं होते।… बरखुरदार, दिल छोटा मत करो। हौसला रखना और ज्यादा क्या कहूँ…
उसे यह फिक्र है हरदम नया तर्जे-जफा क्या है
हमें यह शौक है देखें सितम की इन्तहा क्या है।
दहर स क्यों खफा रहे, चर्ख का क्यों गिला करें,
सारा जहाँ अदूू सही, आओ मुकाबला करें।
कोई दम का मेहमाँ हूँ ऐ अहले महफिल
चरागे-सहर हूँ बुझा चाहता हूँ
हवा में रहेगी मेरे ख्याल की बिजली
ये मुश्ते-खाक है फानी, रहे रहे न रहे।
वार्डर चतरसिंह पास आता है। ,
चतरसिंह ः सरदार, फानी होने वाले हो, कभी प्रार्थना करते नहीं देखा ?
भगतसिंह ः (मुस्कराकर) जेल मैनुअल में तो ऐसा नहीं लिखा है ।
चतरसिंह ः यहाँ जो भी कैदी आता है, अन्तिम दिनों में ईश्वर को याद जरूर करने लगता है।
भगतसिंह ः लेकिन मैं तो नास्तिक हूँ।
चतरसिंह ः अन्त तक अटल रह सकोगे ?
भगतसिंह ः मुझे अन्त का सामना करने के लए किसी नशे की सहायता की जरूरत नहीं है। मैं यथार्थवादी हूँ। (पॉज) आप ईश्वर की बात करते हैं। मैं पूछता हूँ, सर्वशक्तिमान होकर भी आपका भगवान, अन्याय, अत्याचार, भूख, गरीबी, शोषण असमानता, दासता, महामारी, हिंसा और युद्ध का अन्त क्यों नहीं कर देता ?…
अभी तक ये प्रायः सभी धर्मों ने मनुष्यों को एक-दूसरे से अलग किया है। दुनिया में अभी तक जितना रक्तपात धर्म के नाम पर धर्म के ठेकेदारों ने किया है उतना शायद ही किसी ने किया हो। सच बात तो यह है कि इस धरती का स्वर्ग धर्म की आड़ में ही उजाड़ा गया है। और जो धर्म इन्सान को इन्सान से जुदा करें, मुहब्बत की जगह उन्हें एक-दूसरे से घृणा करना सिखलाएँ, अन्धविश्वासों को प्रोत्साहन देकर लोगों के बौद्धिक विकास में बाधक हों, दिमागों को कुन्द करें, वह कभी मेरा धर्म नहीं बन सकता। मेरे निकट हर कदम जो इन्सान को सुखी बना सके, समता-समृद्धि और भाईचारे के मार्ग पर उसे एक कदम आगे ले जा सके, वही धर्म है। दो शब्दों में कहूँ तो यह धरती और इस धरती पर भारत की पवित्र भूमि मेरा स्वर्ग है, उस पर विचरण करनेवाला हर व्यक्ति, हर इन्सान मेरा देवता है, भगवान है। और भगवान को भगवान से लड़ाकर मेरे स्वर्ग को नर्क बनानेवाली शक्तियों को समाप्त कर इन्सान को वर्गहीन समाज की ओर बढ़ाने वाला हर प्रयास, हर कदम मेरा धर्म है…
ज़रा ठहरकर ,
मैं आपको बता दूँ कि अंग्रेजों की हुकूमत यहाँ इसलिए नहीं है कि ईश्वर चाहता है, बल्कि इसलिए कि उनके पास ताकत हैं और हममें उनका विरोध करने की हिम्मत नहीं।वो हमको अपने प्रभुत्व में ईश्वर की सहायता से नहीं रखे हैं बल्कि बन्दूकों, राइफलों, बम और गोलियों, पुलिस और सेना के सहारे। यह हमारी उदासीनता है कि वो समाज के विरूद्ध सबसे निन्दनीय अपराध, एक राष्ट्र का दूसरे राष्ट्र द्वारा अन्यायपूर्ण शोषण सफलतापूर्वक कर रहे हैं। कहाँ है ईश्वर ? वह क्या कर रहा है? क्या वह नीरो है?… (जेब से एक लिफाफा निकालकर चतरसिंह को देते हैं) पंजाब के गवर्नर के नाम पत्र लिखा है, इसको भिजवा दीजिए।
चतरसिंह ः मर्सी पिटीशन है ?
भगतसिंह ः (मुस्कराकर) एक अपील है।
चतरसिंह ः क्या कहा है सरकार को ?
भगतसिंह ः (ज़रा ठहरकर) बहुत जल्द ही अन्तिम युद्ध की दुन्दुभी बजेगी और अन्तिम फैसला हो जाएगा। साम्राज्यवाद और पूँजीवाद अपनी अन्तिम साँसें गिन रहे हैं। हमने उसके विरूद्ध युद्ध में भाग लिया है और इसके लिए हमें गर्व है। हमने इस युद्ध को आरम्भ नहीं किया है और न ही हमारे जीवन के साथ यह समाप्त ही होगा…
हमारे विरूद्ध सबसे बड़ा आरोप यह लगाया गया है कि हमने सम्राट जार्ज पंचम के विरूद्ध युद्ध किया है।… आज अंग्रेज जाति और भारतीय जनता के बीच एक युद्ध चल रहा है और हमने निश्चित रूप से इस युद्ध में भाग लिया, अतः हम युद्धबन्दी हैं।… हम आपसे केवल यह प्रार्थना करना चाहते हैं कि आपकी सरकार के ही एक न्यायालय के निर्णय के अनुसार हमारे विरूद्ध युद्ध जारी रखने का अभियोग है। अतः इस आधार पर हम आपसे माँग करते हैं कि हमारे प्रति युद्ध बन्दियों जैसा व्यवहार किया जाए और हमें फाँसी देने के बजाय गोली से उड़ा दिया जाए…
कोठरी की सफाई करने वाला जमादार हाथ में लम्बे बॉसवाला झाडू लिए आता है। भगतसिंह उसे देखते प्रफुल्लित हो उठते हैं। ,
आओ बेबे आओ। कमरे की अच्छी तरह से सफाई कर देना। देखो, कागज के टुकड़े इधर-उधर बिखरे होंगे, उन्हें बटोर लेना। हाँ बेबे, फाँसी वाले दिन जरूर आना। खूब अच्छी तरह से साफ कर देना ताकि जेलर साब जब आएँ तो लगे यहाँ जश्ने-फाँसी का आलम है… इस कोठरी की दरो-दीवार से बस एक ही गूँज… अनुगूँज हो…
शेर)
सर देके राहे इश्क में ऐसा मजा मिला,
हसरत यह रह गई कि कोई और सर न था।
चतरसिंह ः सरदार, आप इसे हमेशा बेबे क्यों कहते हैं ? बेबे तो माँ को कहते हैं।
भगतसिंह ः जीवन में दो को मेरी गन्दगी उठाने का काम मिला है। एक मेरी बचपन की माँ और एक जवानी की जमादार माँ। इसलिए दोनों बेबेजी ही है मेरे लिए।
चतरसिंह ः आपकी कोई खास इच्छा हो तो बताइये। मैं उसे पूरा करने की कोशिश करूँगा।
भगतसिंह ः हाँ एक इच्छा है और उसे पूरा कर भी सकते हैं।
चतरसिंह ः बताइए।
भगतसिंह ः मैं बेबे के हाथ की रोटी खाना चाहता हूँ।
चतरसिंह ः ठीक है, कल ही आपकी माँ को बुलाकर…
भगतसिंह ः (खिलखिलाकर हँस पड़ते हैं) अरे माँ को बुलाने कहाँ जाओगे। बेबे तो यहीं है… हमारे सामने।
सुनकर जमादार बिल्कुल घबरा-सा जाता है। ,
जमादार ः ये क्या कह रहे हैं सरदारजी ? आप और मेरे हाथ की रोटी ? मेरे हाथ ऐसे नहीं है कि उनसे बनी रोटी आप खाएँ। सरदारजी, मैं नीची जाति का हूँ। अछूत हूँ। जिसके छूने से धरम भ्रष्ट हो जाता है, मन्दिरों में घुसने से देवता नाराज हो जाते हैं, कुएँ से पानी निकालने से पानी अपवित्र हो जाता है।
भगतसिंह उसके कन्धों को थपथपाते हैं। ,
भगतसिंह ः माँ, जिन हाथों से बच्चों का मल साफ करती है, उन्हीं से खाना बनाती है। बेबे, तुम चिन्ता मत करो। निकालो अपनी पोटली। रोटी दो, बहुत जोर की भूख लगी है। (जमादार कन्धे से टँगी पोटली उतारकर रोटी निकालने लगता है) कुत्ता हमारी गोद में बैठ सकता है। हमारी रसोई में घूमता-फिरता है। लेकिन एक इन्सान का हमसे स्पर्श हो जाए तो वह धर्म भ्रष्ट हो जाता है। क्या इतना कमजोर है धर्म ?
भगतसिंह जमादार के हाथ से रोटी लेकर खाने लगते हैं। धीरे-धीरे यह दृश्य धुँधला-सा होने लगता है…
मंच के अग्र हिस्से में जेलर तेज़ कदमों से दाखिल होता है। काफी तनाव में दिख रहा है। हाथ में एक लिफाफा है। सामने से आ रहे सिपाहियों को आदेश देता है। ,
जेलर ः सुनो, अभी और इसी वक्त सारे कैदियों को अपनी-अपनी बैरकों में बन्द कर दो।
सिपाही ः बन्द तो शाम को करते हैं। अभी तो पूरी तरह दुपहरी भी नहीं ढली है।
जेलर ः (डाँटते हुए) जितना कहा जाए, उतना ही करो।
सिपाही ः यस सर ! (जेलर मुड़कर बाहर चला जाता है। सामने से आ रहे चतरसिंह को देखकर सिपाही उसके पास जाता है) सरदारजी, आज ही शाम को तीनों को फाँसी दी जाएगी। समय कम है, अपनी तैयारी पूरी कर लो।
चतरसिंह ः (चौंककर) आज शाम को। लेकिन आज तो तेईस तारीख है। फाँसी तो चौबीस को मुकर्रर है।
सिपाही ः (धीरे से व्यंगात्मक स्वर में) जिसके राज में सूरज नहीं डूबता, वहाँ कुछ तो डूबना चाहिए।
सरदार चतरसिंह तेज कदमों से भगतसिंह को सेल की तरफ बढ़ते हैं। भगतसिंह लेटे हुए एक लाल रंग की किताब पढ़ने में मग्न हैं। उनके अगल-बगल ढेर सारी किताबें बिखरी पड़ी हैं। ,
चतरसिंह ः बेटा, अब तुम्हारी जिन्दगी के कुछ ही घण्टे बाकी हैं। यों एक धार्मिक सिख के नाते अथवा कर्त्तव्य समझकर तुम्हारे पास आया हूँं
भगतसिंह ः कौन-सा कर्त्तव्य ?
चतरसिंह ः इस जीवन के बाद एक दूसरा जीवन शुरू होता है। (भगतसिंह चुप हैं। पास आकर) बेटा, आखिरी वक्त आ चुका है। मैं तुम्हारे बाप के बराबर हूँ। मेरी एक बात मान लो।
भगतसिंह ः (हँसकर) कहिए, क्या हुक्म है ?
चतरसिंह ः सिर्फ एक दरख्वास्त है कि आखिरी वक्त में तुम ‘वाहे गुरू’ का नाम लो और गुरूवाणी का पाठ कर लो। यह लो गुटका। तुम्हारे लिए लाया हूँ।
भगतसिंह जोर से हँस पड़ते हैं। ,
भगतसिंह ः आपकी इच्छा पूरी करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं हो सकती थी अगर कुछ समय पहले आप कहते। अब जबकि आखिरी वक्त आ गया है, मैं ईश्वर को याद करूँ तो वे कहेंगे कि यह बुजदिल है। तमाम उम्र तो उसने मुझे याद किया नहीं, अब मौत सामने नजर आने लगी है तो मुझे याद करने लगा है। इसलिए बेहतर यही होगा कि मैंने जिस तरह पहले अपनी जिन्दगी गुजारी है, उसी तरह मुझे इस दुनिया से जाने दीजिए। मुझ पर यह इल्जाम तो कई लोग लगाएँगे कि मैं नास्तिक था और मैंने ईश्वर में विश्वास नहीं किया, लेकिन यह तो कोई नहीं कहेगा कि भगतसिंह कायर और बेईमान भी था। और आखिरी वक्त मौत को सामने देखकर उसके कदम लड़खड़ाने लगे।
चतरसिंह ः तेरे कदम नहीं लड़खड़ाएँगे भगत। वाहे गुरू, तेरे कदमों में ताकत देगा। तू मुल्क के लिए लड़ा है बहादुर पुत्तर… मुल्क के लिए…

स्वर में गाता है। ,
सुरा सो पहचानिए, जो लड़ै दीन के हेत।
पुर्जा-पुर्जा कट मरै, कभूँ न छाँडै खेत।।
गाते हुए बाहर की तरफ प्रस्थान। भगतसिंह किताब पढ़ने मे लग जाते हैं। लेनिन के जीवन चरित्र के अभी कुछ ही पन्ने पढ़ पाए थे कि काल कोठरी का दरवाजा खुलता है। जेल के अधिकारी अपनी चमकदार यूनीफार्म पहने अन्दर प्रवेश करते हैं। ,
जेलर ः सरदार जी, फाँसी लगाने का हुक्म आ गया है, आप तैयार हो जाएँ।
भगतसिंह के दाहिने हाथ में पुस्तक है। पुस्तक पर से बिना आँख उठाए बायाँ हाथ उन लोगों की ओर उठाकर- ,
भगतसिंह ः ठहरो! एक क्रान्तिकारी दूसरे क्रान्तिकारी से मिल रहा है। (आवाज में कड़क थी। जेल अधिकारियों के लिए ऐसे स्वर अनजाने थे। वे सकते में आ जाते हैं। भगतसिंह का पुस्तक पढ़ना जारी है। कुछ देर बाद वे पुस्तक छत की ओर उछाल देते हैं और एकदम उठ खड़े होकर बोलते हैं) चलो।
जेलर ः क्या पढ़ रहे थे ?
भगतसिंह ः लेनिन का जीवन-चरित्र।
जेलर ः आज आप कैसा महसूस कर रहे हैं ?
भगतसिंह ः मैं बिल्कुल प्रसन्न हूँ।
जेलर ः कोई सन्देश ?
भगतसिंह ः (बिना सोचे तुरन्त) साम्राज्यवाद मुर्दाबाद! इन्कलाब जिन्दाबाद!
भगतसिंह कोठरी से बाहर आ जाते हैं। सामने से सुखदेव और राजगुरू भी अपनी-अपनी सेलों से निकलकर आते हुए दिखते हैं। तीनों एक-दूसरे को देखते हैं और गले लग जाते हैं। फिरा मुड़कर चल पड़ते हैं। जरा भी पाँव नहीं लड़खड़ाते हैं, छाती तानकर चलते हैं। चाल में गर्व, आत्मविश्वास, उमंग व जोश। भगतसिंह बीच में हैं। सुखदेव उनके बाएँ और राजगुरू दाएँ। भगतसिंह अपनी दायीं भुजा राजगुरू की बायीं भुजा में डाल देते हैं और बायीं भुजा सुखदेव की दायीं भुजा में।
क्षणभर के लिए तीनों रूकते हैं। भगतसिंह गाना आरम्भ करते हैं। पलक झपकते तीनों के स्वर एक हो जाते हैं। इस सम्मिलित स्वर में कण्ठ का माधुर्य है, हृदयों का सरस्य है और है उल्लास की ऊँचाई। तीनों झूमकर गा रहे हैं।
(गाना)
दिल से निकलेगी न मरकर भी वतन की उलफत
मेरी मिट्टी से भी खुश्बू-ए-वतन आएगी।
तीनों गाते हुए बढ़े रहे हैं। उनके पीछे जेलर व सिपाही उन्हें कवर करते हुए चल रहे है। तीनों बढ़ते हुए फाँसी स्थल पर पहुँचते हंैं। वहाँ नियमानुसार डिप्टी कमिश्नर, डॉक्टर, जल्लाद तथा कुछ सिपाही अपना-अपना पोजीशन लिए तैनात हैं।
भगतसिंह उन सब की तरफ मुखातिब होते हैं। उनकी आँखों में खुशी की शान्ति है, होठों पर मित्रता की मुस्कुराहट और आवाज में राष्ट्रपुरूष जैसी गम्भीरता। ,
भगतसिंह ः वेल मिस्टर मजिस्ट्रेट, यू आर लकी मैन।
मजिस्ट्रेट ः (चौंककर) ह्वाय ?
भगतसिंह ः आज आपको अपनी आँखों से यह देखने का मौका मिल रहा है कि हिन्दुस्तानी क्रान्तिकारी कैसे हँसते-हँसते अपने आदर्शाें के लिए मौत को गले लगाते हैं।
डिप्टी कमिश्नर पानी-पानी हो जाता है। भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव मंच की सीढि़यों पर चढ़ते हैं। पैरों में न कपकपी है, न लड़खड़ाहट। तीन फन्दे लटक रहे हैं। तीनों उसी क्रम में उनके नीचे खड़े हो जाते हैं। बीच में भगतसिंह। बाएँ सुखदेव, दाएँ राजगुरू। अपना-अपना फन्दा पकड़कर बुलन्द स्वर में बोलते हैं। ,
राजगुरू ः हम अपनी पूरी ताकत से यह कहना चाहते हैं कि क्रान्तिकारी जीवन के शुरू के चन्द दिनों के सिवाय न तो हम आतंकवादी हैं और न थे…
भगतसिंह ः गरीब मेहनतकशों व किसानों… तुम्हारे असली दुश्मन पूँजीपति हैं। तुम किसी भी जाति, धर्म या राष्ट्र के हो, भलाई इसी में है कि इस भेदभाव को मिटाकर एकजुट हो जाओ और सरकार की ताकत अपने हाथ में लेने का यत्न करो। इन यत्नों से तुम्हारा नुकसान कुछ नहीं होगा। इससे किसी दिन तुम्हारी जंजीरें कट जाएँगी और तुम्हें आर्थिक स्वतंत्रता मिलेगी…
सुखदेव ः उठो और वर्तमान व्यवस्था के विरूद्ध बगावत खड़ी कर दो। सामाजिक आन्दोलन से क्रान्ति पैदा कर दो तथा राजनैतिक और आर्थिक क्रान्ति के लिए कमर कस लो। तुम ही तो देश का मुख्य आधार हो। वास्तविक शक्ति हो। सोए हुए शेरो, जागो… उठो और बगावत खड़ी कर दो…
फन्दे को चूमकर गले में डालते हैं। एक साथ हुंकार भरते हैं। ,
तीनों ः इन्कलाब जिन्दाबाद, साम्राज्यवाद मुर्दाबाद!
जेल की अन्य बैरकों के सीखचों के पीछे खड़े कैदी भी जोर-जोर से नारे लगाने लगते हैं। लाहौर जेल नारों से गूँज उठती है। ,
नेपथ्य ः इन्कलाब जिन्दाबाद, इन्कलाब जिन्दाबाद ऽ ऽ…
जल्लाद आकर उनके दोनों हाथों को पीछे करके बाँध देता है। आगे आकर काले गारक से तीनों का चेहरा ढ़क देता है। फिर अपने स्थान पर आकर खड़ा हो जाता है।
नारे चलते रहते हैं। जेलर हथेली पर बँधी छड़ी की सूई की तरफ देख रहा है तथा दाएँ हाथ में रूमाल पकड़ा हुआ है। नारा जब महत्तम पर पहुँचता है तो जेलर रूमाल को अकस्मात् डाउन करता है। इशारे के साथ जल्लाद हैंडिल नीचे करता है। तीनों की गर्दनें एक झटके के साथ एक तरफ लटक जाती है।
नारे बन्द हो जाते हैं। चुप्पी छा जाती है। एक क्षण के लिए सब कुछ शान्त। डिप्टी कमिश्नर और जेलर अपनी टोपियाँ उतार लेते हैं। दूर कहीं से आलाप।
(गाना)
दम निकले इस देश के खातिर, बस इतना अरमान है।
एक बार इस राह में मरना, सौ जन्मों के समान है।
देख के वीरों की कुरबानी, अपना दिल भी डोला।
मेरा रंग दे बसन्ती चोला, माँ…
गाने के उतार के साथ मंच पर अँधेरा होने लगता है
जिसमें मंच पर स्थित सीन व पात्र धीरे-धीरे अँधेरे में
खोने लगते हैं। केवल एक स्पॉट फाँसी के तख्ते पर झूल रहे भगतसिंह, राजगुरू और सुखदेव पर। स्पॉट का रंग गहरा नीला।
दूर से ‘इन्कलाब-जिन्दाबाद’ का नारा सस्वर उभरने लगता है। धीरे-धीरे तेज। स्वर में जोश, उमंग। इन्हीं स्वरों के बीच मंच पर लोग आने लगते है। तरह-तरह के लोग हैं। विभिन्न धर्म, सम्प्रदाय के। पहनावे, दिखावे में सब आम आदमी। सब के आगे वही बूढ़ा सरदार है जो नाटक के पहले दृश्य में था। लोग मंच पर हर तरफ फैल जाते हैं। कुछेक के हाथों में लाल रंग के झण्डे हैं जो लगातार लहरा रहे हैं। बूढ़ा सरदार दर्शकों को सम्बोधित करता है। ,
सरदार ः शहीदे आजम भगतसिंह ने कहा था… हमारी फाँसी लगने के पन्द्रह साल बाद अंग्रेज यहाँ से चले जाएँगे क्योंकि उनकी जड़ें हिल चुकी है। किन्तु उनके चले जाने के बाद जो राज होगा वह लूट, स्वार्थ व गुंडागर्दी का राज होगा। पन्द्रह साल तक लोग हमें भूल जाएँगे। फिर हमारी याद ताजा होनी शुरू होगी। लोग हमारे विचारों को परखेंगे और वास्तविक समाज के सृजन के लिए मेहनतकश व ईमानदार लोग एकत्र होंगे…
कविता ,
बहुत जल्दी ही
अन्तिम युद्ध की दुन्दुभी बजेगी
और फैसला हो जाएगा।
इस युद्ध को न हमने प्रारम्भ किया है
और न ही हमारे जीवन के साथ समाप्त ही होगा।
यह तब तक चलता रहेगा
जब तक कि
कोरस ः मनुष्य द्वारा मनुष्य का
और एक राष्ट्र द्वारा दूसरे राष्ट्र का
शोषण समाप्त नहीं हो जाता
सरदार ः जब तक होता रहेगा
हत्या-लूट-बलात्कार
राजनीति, धर्म और जाति के नाम पर अत्याचार
कोरस ः तब तक चलता रहेगा ये युद्ध
सरदार ः दमन, शोषण और अन्याय के विरूद्ध
कोरस ः अन्तिम युद्ध!…
परदा धीरे-धीरे बन्द होने लगता है। ,

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    By: राजेश कुमार

    (जन्म 11 जनवरी 1958, पटना) रंगमंच की तीसरी धारा का रंगकर्मी । नाटक के माध्यम से चेतना प्रसार का प्रबल समर्थक । सन् 1976 से अब तक अनवरत् रंगकर्म करने वाले होलटाइमर। शिक्षा ः प्रारंभिक शिक्षा आरा से । भागलपुर इंजीनियरिंग कॉलेज से बी0 एस0 सी0 (इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग)।
    नौकरी ः उ0 प्र0 पावर कारपोरेशन में अधीक्षण अभियंता ।
    थियेटर ः भोजपुर की चर्चित नाट्य संस्था ‘युवा नीति ‘, भागलपुर की ‘दिशा‘ , अलीगढ़ की ‘दृष्टि ‘, शाहजहांपुर की ‘ अभिव्यक्ति‘ और लखनऊ की ‘धार‘ के संस्थापक सदस्यों में से । शुरुआत मंच नाटक से लेकिन शीघ्र एक जरुरत के तहत नुक्कड़ नाटक की तरफ टर्न ।
    डेढ़ दशक तक लगातार कार्य करने के बाद पुनः प्रोसिनयम की तरफ । फिलहाल एकल नाट्य विद्या पर गंभीरता से कार्यरत्।
    लेखन ः देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में एक दर्जन कहानियां एवं दो दर्जन से अधिक नुक्कड़ नाटकों का प्रकाशन । दो नुक्कड़ नाटक पुस्तिकाओं (‘नाटक से नुक्कड़ नाटक तक‘ और मोरचा लगाता नाटक‘) का संयुक्त संपादन ।
    पूर्णकालिक नाटक ः झोपड़पट्टी, आखिरी सलाम, अंतिम युद्व, गांधी ने कहा था, घर वापसी, मार पराजय, हवनकुंड सत भाषै रैदास, गांधी और अम्बेडकर, द लास्ट सैल्यूट ,सुखिया मर गया भूख से और असमाप्त संवाद ।
    प्रकाषित नुक्कड़ नाट्य संग्रह ः हमें बोलने दो, जनतंत्र के मुर्गे‘ ,‘ कोरस का संवाद ‘ नुक्कड़ नाटक संग्रह का संपादन। एकल संग्रह प्रकाशित ः पांच एकल (शताब्दी की परछाइयां) ।
    सम्पर्क ः बी- 206, रोहिणी अपार्टमेन्ट, सेक्टर-4, गोमती नगर विस्तार,
    लखनऊ 226010 मो. ः 09453737307
    ई मेल ः rajeshkr1101@gmail.com

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