भारतीय समाज के संघर्ष शील अतीत को सामने रखकर हमारे आज से सवाल करती ‘अशोक तिवारी’ की कविता …….

अंधी गली का मुहाना

अशोक कुमार तिवारी

ये कौन सी गली में आ गए हम
कौन सी वादियों में घिर गए
कि कुछ सुझाई नहीं देता?
साँस ही नहीं ली जाती
ये कौन सा रास्ता है
जो अंधी सुरंग को जाता है?

ये कौन हैं
जो साए बनकर घूमते हैं इर्द-गिर्द
जो क़दम क़दम पर डराते हैं
धमकाते हैं
ज़िन्दगी का वास्ता देते हैं?
ये कौन हैं जो
ज़िन्दगी को ही दांव पर लगाते हैं
और ठहाका लगाते हुए
एक दिन तमंचे की गोली से
सामने वाले की आवाज़ को
हमेशा के लिए बंद कर देते हैं?

कौन सी अंधी गली का मुहाना है ये
जहाँ एक बच्चा
अपने बाप से मिलने को तरसता है
एक मां रोती है
काम पर गए अपने बेटे के लिए?
ये कौन सी गली है
जिसका कोई अंत नहीं है
ये कौन सा दयार है जहां
जहाँ एक मज़हब
दूसरे की खाल उतारने को है बेचैन?

क्या ये वही गली है
जिसका पता लेकर निकले थे हम
सालों पहले
सर पर टांगे हुए तमाम जोख़िम
थामे हुए ख़ून में लिसड़े बदन
और घायल सरों को
चलते रहे बेख़ौफ़
क्या इसी तंगदिली और अधेरे के लिए?

ये कौन सी अंधी गली में आ गए हम
जहाँ भाईचारा सिसकियाँ भरता है
सूनी आँखों में उम्मीद की एक किरन लिए
जहाँ रौशनी जूझती है
अपने अस्तित्व के लिए
मिचमिचाई आँखों से देखती है जो
इससे निकलने का रास्ता
और दम साधे रहती है
सबेरे के इंतज़ार में ……

 

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