पिछले काफी समय से नये और पुराने व्यंग्यकारों के लेखन पर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें या तो सिरे से नकार दिया जा रहा है या छपास की श्रेणी में डाला दिया जाता है. अकसर हाल फ़िलहाल लिखे जा रहे व्यंग्यों को सपाट बयानी कहकर उन्हें सिरे से नकार दिया जा रहा है. जो मौजूदा समय में एक प्रकार का अन्तर्विरोध है. युवा आलोचक एवं व्यंग्यकार एम.एम.चंद्रा के अतिथि संपादन में गत जुलाई, अगस्त और सितम्बर के तीन अंक ‘व्यंग्य में अंतर्विरोध’, ‘व्यंग्य की अंतर्दृष्टि’ और ‘व्यंग्य परिदृश्य’ विशेषांक प्रकाशित हुए जो एक अलग तरह का प्रयोग है. ‘आरिफा एविस’ का समीक्षात्मक आलेख

‘अट्टहास’ पत्रिका का नया प्रयोग

आरिफा एविस

लखनऊ से प्रकाशित हास्य व्यंग्य की अनूठी पत्रिका अट्टहासका प्रकाशन पिछले अट्ठारह वर्षों से हो रहा है जिसके प्रधान संपादक अनूप श्रीवास्तव है. यूँ तो अलग अलग समय पर पत्रिका विशेषांक निकालती रही है. लेकिन इस बार युवा आलोचक एवं व्यंग्यकार एम.एम.चंद्रा के अतिथि संपादन में गत जुलाई, अगस्त और सितम्बर के तीन अंकव्यंग्य में अंतर्विरोध‘, ‘व्यंग्य की अंतर्दृष्टिऔर व्यंग्य परिदृश्यविशेषांक प्रकाशित हुए जो एक अलग तरह का प्रयोग है.इस तरह के प्रयोग न सिर्फ पत्रिका को बेहतर बनाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं, बल्कि व्यंग्य विमर्श के विकास अपना योगदान भी देते हैं.

आज हम जिस दौर में जी रहे हैं उसमें हर जगह अन्तर्विरोध निहित है चाहे वो किसी भी रूप में क्यों ना हो. हर इंसान को रोज अन्तर्विरोध से जूझना पड़ता है और आगे बढ़ना पड़ता है जो उसके विकास के लिए जरूरी है. इसी तरह अगर लेखन के क्षेत्र में यानि हास्य व्यंग्य के क्षेत्र में देखा जाए तो समय समय पर हास्य व्यंग्य में भी अन्तर्विरोध उभरकर सामने आये हैं, मसलन नई पीढ़ी -पुरानी पीढ़ी का अन्तर्विरोध, नयी तकनीकी और पुरानी तकनीकी का अंतर्विरोध, महिला और पुरुष का अन्तर्विरोध, समसामयिक और क्लासिकल, सत्ता और व्यवस्था का अन्तर्विरोध आदि.. इन्हीं अन्तर्विरोधों को समझने का प्रयास किया गया हैं इन तीनों अंकों में जिसमें वरिष्ठ और नये लेखकों ने भी लिखा.

अंतर्विरोध के सिद्धांत पर आलोचक एम.एम चंद्रा ने कहा , ‘अन्तर्विरोध का सिद्धांत वह सिद्धांत है जो व्यंग्य-आलोचना के मूलभूत तत्वों में से एक है, अर्थात यह सिद्धांत व्यंग्य आलोचना का मूलभूत नियम है.यदि इस नियम को एक बार समझ लिया गया तो जड़सूत्र वादी, समाज विरोधी, भाववादी प्रवृत्तियों को आसानी से समझा जा सकता है.

पिछले काफी समय से नये और पुराने व्यंग्यकारों के लेखन पर सवाल उठ रहे हैं, जिन्हें या तो सिरे से नकार दिया जा रहा है या छपास की श्रेणी में डाला दिया जाता है. अकसर हाल फ़िलहाल लिखे जा रहे व्यंग्यों को सपाट बयानी कहकर उन्हें सिरे से नकार दिया जा रहा है. जो मौजूदा समय में एक प्रकार का अन्तर्विरोध है. इसी विषय पर वरिष्ठ व्यंग्यकार डॉ. ज्ञान चतुर्वेदी ने सपाट बयानी को स्पष्ट करते हुए कहा,’रोचक विवरण , भाषा से खेलना आपकी ताकत भी हो सकती है और कमजोरी भी, और एक आड़ भी… मोहलेने वाली भाषा और चमत्कारी मुहावरे वाला विवरण भी सपाटबयानी पैदा कर सकता…

नयी पीढ़ी और पुरानी पीढ़ी के अन्तर्विरोध पर अनूप शुक्ल जी लिखते हैं –मठाधीशी की दीवारे नये मीडिया ने हिला दीं है…लिखने के अनेक प्लेटफोर्म होने के चलते नयी पीढ़ी के लेखकों की संख्या बहुत तेजी से बढ़ी है.अभिव्यक्ति की सहजता के चलते नित नए लेखक सामने आ रहे है.रोज लिख रहे हैं.दिन में कई बार लिख रहे हैं.बिना किसी गुरु से गंडा बंधाये…समय के साथ नया पुराना हो जाता है और अच्छा ना हुआ तो नजरों से ओझल भी.

व्यंग्य की स्पष्ट करते हुए डॉ.प्रेम जनमेजय ने लिखा , ‘जरूरी नहीं की व्यंग्य में हंसी आए.यदि व्यंग्य चेतना को झकझोर देता है, विद्रूप को सामने खड़ा कर देता है, आत्म साक्षात्कार कराता है, सोचने को बाध्य करता है,व्यवस्था की सड़ांध को इंगित करता है और परिवर्तन की ओर प्रेरित करता है.तो वह सफल व्यंग्य है.

व्यंग्य की अंतर्दृष्टिविशेषांक में-

समकालीन व्यंग्य आलोचना के संदर्भ में एम.एम.चंद्रा ने लिखा,’समकालीन व्यंग्य व्यक्तिगत अनुभववादी और यथार्थवादी व्यंग्य के रूप में आ रहा है…जबकि व्यंग्य यथास्थितिवाद से आगे की महीन और गंभीर विषयवस्तु है.

हास्य और व्यंग्य में अंतर स्पष्ट करते हुए विवेक रंजन श्रीवास्तव ने लिखा कि हास्य और व्यंग्य में सूक्ष्म अंतर है जहाँ लोगों को गुदगुदाकर छोड़ देता है वहीं व्यंग्य हमें सोचने पर विवश करता है.व्यंग्य के कटाक्ष हमें तिलमिलाकर रख देते हैं. व्यंग्य लेखक के करुण हृदय के असंतोष की प्रतिक्रिया के रूप में अंतर होता है.

व्यंग्य आलोचना के उठते सवालों को लेकर फारूक अफरीदी ने लिखा कि आलोचना के विकास में समय लगता है और अभी कोई बहुत देरी नहीं हुई है. हाल के वर्षों में एक युवा पीढ़ी व्यंग्य आलोचना के समय में उभर कर सामने आ रही है जिस पर भरोसा किया जाना चाहिए.यह पीढ़ी आलोचना के प्रति न्याय करेगी,निष्पक्षता की रक्षा करेगी.पूर्वाग्रहों से ग्रसित नहीं होगी और ठकुर सुहाता नहीं करेगी.

डॉ.हरीश नवल ने व्यंग्य की दिशा संदर्भ में लिखा है कि साहित्य का असर धीमे धीमे पड़ता है…साहित्य विरेचक भी करता है और परिवर्तन की भूमिका भी निभाता है…दिक्कत है कि व्यवस्था लगभग वही है.सत्ता बदलने से बहुत कुछ नहीं होता…व्यंग्य चाहे अखबार में चाहे किताब में जहाँ जहाँ उत्कृष्ट रचा हुआ है, रचा जा रहा है परिवर्तन कर रहा है.आज का व्यंग्यकार जो सही दिशा में है वह सुधारक का काम कर रहा है.युवा पीढ़ी में भी ऐसे बहुत से यशस्वी हैं.

समकालीन व्यंग्य के संदर्भ में अशोक गौतम ने लिखा कि आज का व्यंग्य अपने समय के वांक्षित,अवांक्षित दबाव से निर्मित मनुष्य और समाज का वह सृजनात्मक ,वैचारिक आन्दोलन है जो आक्रोश व समझ को एक साथ जन्म देता है.इसलिए समकालीन व्यंग्य अपने समय के अध्ययन के साथ ही साथ समाज के विभिन्न कोणों से किया गया एक सामाजिक अध्ययन है.

व्यंग्य के प्रति चिंतन प्रकट करते हुए अनूप श्रीवास्तव ने लिखा है कि व्यंग्य एक फार्मूले पर स्थित होता जा रहा हूँ.एक फ्रेम में बंधता जा रहा है. एक नाव में आखिर कितनी बार सवार हुआ जा सकता है. व्यंग्य की अपनी लीक बनानी होगी नये प्रयोग करने होंगे.शैली की नयी भंगिमा ढूंढनी होगी.व्यंग्य के पोखर में जिस तेजी से पानी डाला जा रहा है इससे हम व्यंग्यकारों को बचना होगा.

तीसरे अंक में व्यंग्य शिल्प की महत्ता पर जोर देते हुए एम.एम.चंद्रा ने लिखा कि मात्र व्यंग्यकार की शैली और शिल्पगत मजबूती के आधार पर किसी की मूल्यांकन किया जाना संभव नहीं… व्यंग्य शिल्प का महत्त्व तो है लेकिन व्यंग्य शिल्प का इतना भी प्रयोग नहीं होना चाहिए कि विषय वस्तु की उपेक्षा होने लगे.

व्यंग्य के संदर्भ में यशवंत कोठारी लिखते हैं,’व्यंग्य जीवन की आक्रामकता है, सहिष्णुता नहीं.व्यंग्य तो शल्यक्रिया है जो जीवन को बचाने के लिए आवश्यक है.व्यंग्य समीक्षा नहीं, फ़कत वह तो सहभागिता करता है.जीवन के हर मोड़ पर व्यंग्य आपको अपने साथ खड़ा मिलेगा ठीक प्रकृति की तरह जिजीविषा की तरह.

कुल मिलाकर देखा जाए. अट्टहास पत्रिका के इन तीनों अंकों ने  व्यंग्य-आलोचना के माध्यम से  नये लेखकों के लिए एक नई रौशनी के समान तो है ही साथ ही पाठकों को दृष्टि भी साफ़ होगी. पत्रिका में अलग अलग विषयों पर छपी रचनाएँ चाहें वो हास्य व्यंग्य हो या हास्य व्यंग्य कविता आज के सन्दर्भ में खरी उतरती हैं जिससे यह स्पष्ट होता है कि पत्रिका का मूल उद्देश्य पूरा हो रहा है. बस जरूरी है निरंतर इसी तरह के नए नए प्रयास किये जाएँ ताकि बेहतर साहित्य का निर्माण हो सके.

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