शब्दों से स्पंदित होती संवेदना के जीवंत और सवाल पूर्ण छत्र उकेरती हुईं प्रमोद बेड़ियाकी दो कवितायें ….. संपादक 

अधेड़ औरतें

प्रमोद बेड़िया

अधेड़ होती लड़की के दुख
कोई नहीं जानता ,देखिए न मैं भी
दुख को एकवचन में ही दे रहा था
फिर सोचा कि नहीं बहुवचन ही ठीक रहेगा
ठीक इसलिए भी रहेगा कि जवानी पार
होते हुए ,यहाँ तक
पहुँचते – पहुँचते तो ढेर
लग गए होंगे दुखों के ,दुख भी
परेशान हो गए आते- आते |

उसे तो पता नहीं था परियों के सपने
देखना ठीक नहीं है क्योंकि परी तो वह
रह नहीं पाती जवान होते- होते ,हाँ
नायिका – सी बनने लगती है
मन ही मन आजकल तो कई लटके
सीखने होते हैं जवान होने के ,वरना
पहले तो साड़ी का आँचल और रसोई बनाना
सीखना काफी था ,सीखना काफी था
हर आते- जाते के सामने नहीं आना
अब तो माँओं को जवान लड़कियाँ जूड़ा
बनाना सिखाती है ,कई तो मेकअप
करना भी ,लेकिन
अधेड़ तो वे भी होती ही हैं ।

कई लड़कियाँ जब अधेड़ होती जाती है
बस से नौकरी करने जाते- आते ,
लोग भी
समझ जाते हैं कि ये अधेड़ होती जा रही हैं
और औरत बनती जाती है
,याने
अधेड़ औरत हो गई है ,
थोड़ा बहुत छू कर
गुज़रने से कुछ नहीं कहेंगी ,क्योंकि
इन्हें डर होगा कि इनकी बात
कोई मानेगा या नहीं
सो बेचारी अधेड़ होने के अत्याचार
सुख समझती रहतीं हैं ।

इन्हें कोफ़्त होती रहती है
अपने जवान बने रहने पर
उम्र से कम ये दिखना तो नहीं चाहती
लेकिन दिखना ही होता है ,इसलिए भी
कि क्या होगा अब जवान हो कर ,क्या होगा
कोई हसरतों से तो देखता ही नहीं है
कोई मुसकुराता भी है तो लगता है
पड़ी नेमत दे दी हो ,बिना काम की
लेकिन थोड़ा बहुत ही सही
सलीक़े से
पाउडर भी लगाना होता है ,क्रीम भी
कुछ ऐसे कि दिख न जाए
समझ न लें इन्हें कोई
जवान लड़कियाँ ।

लड़की और औरत के बीच में तो
कुछ होता नहीं है ,होता तो ये अपने को उसमें
शामिल कर कितनी खुश होती ,कितनी खुश होती
कि चलो अपना भी कोई नाम है ,लेकिन फिर भी
मर्द नामक प्रजाति तो अधेड़ होते नहीं है
वे या तो जवान होतें है या बूढ़े ,सो फिर तो
इन्हें और भी मुश्किल होती किस मर्द के
खाते में पड़ती ये ,जानती नहीं हैं
आख़िरकार अधेड़ औरतें जो
लड़कियाँ ही होती हैं ,जांए तो कहाँ जाएँ
उम्र का हसीन हिस्सा कहाँ गिरवी रख आईं ये
अब कहाँ प्यार खोंजे है कहाँ
वह हसीन ख़्वाब
वह हसीन लम्हें ,जिन्हें ये मन ही मन
गुज़ारती रही
चुपचाप ,वग़ैर आहट के
चुपचाप !

कविता में प्रेम !

सोचा एक प्रेम कविता लिखूँ
सोचते ही तुम याद आई
सच ही प्रेम किया था हमने
कहो तो मुझे तो याद नहीं है
मैंने कभी भी कहा था कि
मैं तुमसे प्यार करता हूँ ,इत्यादि
न ही तुमने कभी गर्मजोशी से
मेरी हथेलियाँ पकड़ी थी ।

न तो हम किसी रेस्तराँ में
एक टेबल पर बैठ कर कॉफ़ी के
कप के साथ बैठे हुए
एक दूसरे को अपलक देख रहे थे
लगता है ऐसे भी बहुत पुराने हो गए हैं
ये विंब ,ये दृश्य ।

जहाँ तक मुझे याद है एक
ही बस में जाते थे हमलोग सालों
बस रुकते ही तुम दौड़ कर चढ़ती थी
और तुरंत सीट पर बैठ कर खिसक जाती थी
मेरे लिए जगह बनाती ,ख़ाली बस में कोई
कुछ बोलता नहीं था और हमलोग लगभग
सटे हुए सालों यात्रा करते रहे थे ।

फिर एकदिन हठात् तुम्हारी जगह ख़ाली
रहने लगी ,फिर भी मैं वही बैठता
बैठते- बैठते आख़िरकार थक गया
कि मोबाइल बजा और ख़्याल आया
कि तुम नहीं हो
कविता है !

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    By: प्रमोद बेड़िया

    जन्म १९४५ । साप्ताहिक हिंदुस्तान,परिवेश,प्रतिबिंब,गवाह,साक्षात्कार,विपक्ष,सबरंग,संबोधन,वर्तमान साहित्य,उम्मीद,वसुधा और पहल आदि में प्रकाशित । १९७८ में समवेत पत्रिका का प्रकाशन ,जिसमें अभी के मूर्द्धन्य साहित्त्यकारों को प्रकाशित करने का सौभाग्य हुआ । फिर साहित्य जगत से मजबूरन हटना पड़ा ,तीस सालों बाद अब पूर्णकालिक ,एकाध संकलन निकलने वाले हैं !

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