निशब्द, दंश, छटपटाहट फिर सवाल ….. कोई जबाव नहीं ….. कलम , अभिव्यक्ति …..?

anwar-suhailअनवर सुहैल

फ़र्क़

फुटपाथ पर दोनों की गुमटियां हैं।
एक मोची की, दूसरी धोबी की।
मोची शूद्र और धोबी मुसलमान।
दोनों फुर्सत में अपनी दीन-हीन दशा पर चिंता किया करते।
मोची अपने साथ छुआ-छूत और दुतकार से दुखी रहता।
मुसलान धोबी ने उसे समझाया–’भाई, छुआछूत, ऊंच-नीच का बर्ताव तो हमारे
समाज में भी होता है…उसे तो हम बरदाश्त कर लेते हैं लेकिन शुक्र है कि
तुम्हें कोई पाकिस्तानी, आतंकवादी या देशद्रोही तो नहीं कहता!”

एक नसीहत और…

अहमद इंजीनियरिंग पढ़ने महाराष्ट्र जा रहा था।
अब्बा उसे एक नई जगह में गुजर-बसर के लिए ऊंच-नीच समझा रहेे थे।
अहमद उन नसीहतों को अपनी गांठ में बांध रहा था। आखिर अब्बा ने दुनिया
देखी है…ठीक तो समझा रहे हैं।
अंत में एक नसीहत और दी—’और हां…सफ़र में या किसी अनजान जगह में
लोगों के बीच ये ज़ाहिर न होने देना कि तुम मुसलमान हो। मुमकिन हो तो कोई
ऐरा-गैरा यदि नाम पूछे तो उसे अहमद की जगह अरविन्द, रमेश, महेश जैसे नाम
बताओ…इन्शा-अल्लाह मुसीबतों से बच जाओगेे।”

छह दिसम्बर के बाद

ज्वाला सर आज कुछ बुझे-बुझे हैं।
वे अनमना सा पढ़ा रहे हैं मुगलकालीन भारत का इतिहास…मुगलों-मुसलमान
शासकों को क्रूर, असहिष्णु, मूर्ति-भंजक, म्लेच्छ औैर कठमुल्ला आदि
विशेषणों के सहारे अक्सर कोसा करते हैं ज्वाला सर।
जावेद के लिए इतिहास का पीरियड इसीलिए बेहद तनावपूर्ण हुआ करता।
इतनी बड़ी कक्षा में कुल जमा दो मुसलमान छात्र…
ऐसा लगता कि सारी कक्षा उसे मुगलकालीन भारत का अपराधी बना किसी कटघरे में
खड़ा कर देती हो।
लेकिन आज जाने क्या बात है कि ज्वाला सर की वाणी में वो आक्रामकता नहीं,
वो ओज नहीं…
शायद, आज छह दिसम्बर के बाद हुई अफरा-तफरी के बाद, लगने वाली पहली क्लास
है इतिहास की…

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