इंसान के दुनिया में आने के साथ ही प्रेम दुनिया में आया और भाषा के बनने के साथ ही प्रेम की रचनात्मक अभिव्यक्ति कविता भी किन्तु साहित्य में कविताई प्रेम अभिव्यक्ति करती रचनाएं इंसानी और सामाजिक सरोकारों से भी विमुख नहीं हुई | वर्तमान बाजारी प्रभाव से बदलते सामाजिक ताने-बाने के बीच कविताई सौन्दर्य के साथ प्रेम की मानवीय व्यख्या रचतीं ‘अनीता चौधरी’ की कविताएँ……..

अनीता चौधरी की तीन कविताएँ…. 

मैं पीछे क्यों रहूँ

अनीता चौधरी

१- 

कहाँ हो तुम ?
तुम हो कहाँ
तुम्हारे क़दमों की आहट
चौंका देती है बार बार
कानों में गूंजती तुम्हारी आवाज़
पैदा करती है बेकली
मिलने की।
बिस्तर पर पड़ी सलवटें
गवाही देती हैं
भरपूर आलिंगन की
कंबल से आती तुम्हारे
पसीने की गंध
उठाती है सिहरन
इस मुरझाये तन में।
दिख रहे हैं तुम्हारे
अनगिनत चुम्बनों के चिन्ह
मेरे शरीर के हर भाग पर
तुम्हारे हाथों की गर्माहट
बंद है मेरी असमान की तरह
अँगुलियों की चादर से
तनी खोह में।

साभार google से

साभार google से

नहीं…
तुम गए नहीं
बसे हो मेरे शरीर के
हर एक रोएँ रोएँ में।
पर सुनो….
जब तुम आओ तो
अपने ऊपर चिपकी
उधारी संस्कृति
भारी बुद्धिमता
दिखावटी अपनापन और
आत्मीयता
सबको दरवाजे के बाहर
झाड़ फेंक आना।
जिससे टोह सकूँ मैं
तुम्हारे मन के हर कोने को
और कर सकूँ भरपूर
आलिंगन अपने प्रियतम का।

२- 

माफ़ कीजिएगा
अगर आप अपनी
पुरुषात्मक गुलाम
मानसिकता के साथ
स्त्री से दोस्ती करना
चाहते हैं तो न करें
यह स्त्रियाँ तुम्हारी
गुलाम मानसिकताओं से
उपजी नपुंसक होती
सेक्स की भरपाई नहीं
जो सिर्फ तुम्हारी
अच्छी बुरी बातें पर
सहमति दर्ज करें ।
विरोध नहीं ?

३-

कभी कभी तुम्हारा
अत्याधिक अपनत्व
प्रेम भरी बतिया
जन्मभर संग
जीने मरने की कसमें
मन के कोने में
तुमसे दूर होने का
भय पैदा करता है।

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