प्रेम एक खूबसूरत इंसानीय व मानवीय जीवन्तता का एहसास है  जो किसी भी जाति, धर्म, सम्प्रदाय से बढ़कर होता है जिस पर किसी भी तरह की बंदिशे नहीं लगाई जा सकती क्योंकि  बिना प्रेम के मानव जीवन संभव नहीं होता | प्रेम से ही जीवन को नई ऊर्जा, संघर्ष करने की क्षमता और जीवन के रंगों की पहचान होती है | ऐसा ही उदाहरण पेश करती है हनीफ मदार की कहानी ‘अनुप्राणित’ |….. अनीता चौधरी  

अनुप्राणित

अनुप्राणित : कहानी (हनीफ मदार)

हनीफ मदार
कहानियां, समीक्षाएं, कविता, व्यंग्य- हंस, परिकथा, वर्तमान साहित्य, उद्भावना, समर लोक, वागर्थ, अभिव्यक्ति, वांग्मय के अलावा देश भर की लगभग सभी पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित
कहानी संग्रह – “बंद कमरे की रोशनी”
सम्पादन- प्रस्फुरण पत्रिका
संपादक – हमरंग
फिल्म – जन सिनेमा की फिल्म ‘कैद’ के लिए पटकथा, संवाद लेखन
अवार्ड – सविता भार्गव स्मृति सम्मान २०१३, विशम्भर नाथ चतुर्वेदी स्मृति सम्मान २०१४
जन्म – 1 मार्च १९७२ को उत्तर प्रदेश के ‘एटा’ जिले के एक छोटे गावं ‘डोर्रा’ में
पूर्व सचिव – संकेत रंग टोली
सह सचिव – जनवादी लेखक संघ, मथुरा
कार्यकारिणी सदस्य – जनवादी लेखक संघ राज्य कमेटी (उत्तर प्रदेश)
56/56 शहजादपुर सोनई टप्पा, यमुनापार मथुरा २८१००१
phone- 08439244335
email- [email protected]

शाम पूरी तरह उतर चुकी थी | गहराते एकांत में जहाँ तहां छिटके हुए चमकते हुए जुगनू टूटते तारों से दिखते थे | हरी घास जो स्याह अँधेरे में बिलकुल काली दिख रही थी | घास में चमकते जुगनुओं को देख लगने लगा मनो आसमान जमीन पर उतरा हो | कालीन सी बिछी घास पर अँधेरे कोने में उसकी छुअन से तन ही नहीं, मन भी झंकृत होता रहा | अब जब चौतीस वाँ सावन भी जा रहा है उसकी स्पर्शीय उष्मा मन के किसी कोने में स्थिर है, जो अभी तक पुलकित कर रही है | गुदगुदा रही है, मेरे भीतर कोई गर्म अहसास भर रही है | सपनों की वह आस्था, जो वर्षों से मेरी स्पंदन गति को तीव्र करती रही है | किन्तु एक बिखरे वजूद के साथ भोर के संगीत सी, शबनम की तरह जो घास के तने हुए सीने पर मोती सी चमकती है, किन्तु सूरज की पहली किरण के सामने शर्माती सी अपने वजूद के साथ पिघलती हुई कहीं विलीन हो जाती है | अंधेरे की वह तीक्ष्ण रश्मि, सपनों से कहीं दूर, अपने ठोस अस्तित्व के साथ मेरी धड़कन को अपनी साँसे देती रही और मुझे उस तत्व से परिचित कराती रही जिसमें संपूर्ण स्त्री समाहित है | स्वर्गीय जीवन जीने के निश्छल सपनों और कथित सामाजिक मर्यादाओं की झंझावत से जद्दो- जहद में जुटी आस्था के बदन की सिरहन मेरे भीतर कहीं सिमट रही थी | मेरे हाथ का दवाब, उसके भीतर समाये किसी अनचाहे डर को इंगित करता रहा था | मेरा स्पर्श, बौना और शायद खोखला लगा था उसे, जबकि उसके खिले हुए चेहरे पर, झील की तरह खुदी हुई आँखे, आनन्द से बोझिल हो रही थी | युवा मन की तरुण तरंगे नशे में थिरक रही थी तब आनंद में डूबा उसका चेहरा, मुझे सुख के चरम पर ले जा रहा था | उसकी गर्म साँसे, मेरे मन के भीतर समाकर कहीं आंधी का रूप ले रही थी और मेरे अन्तःकरण की रेत को उड़ाकर उस कृति को नंगी कर रही थी, जो मेरे मन के मरुस्थल में कहीं दबी थी, जिसे मैं वर्षों से तराशता रहा हूँ, उसे आकार देता रहा हूँ, गुम-सुम, कहीं खोकर, सोते जागते, चलते फिरते, खाते पीते, उठते- बैठते, हंसते-गाते, हर समय मेरे साथ, मेरे भीतर, मेरे मानस पर सजती रही है, मेरे शब्दों से, मेरे अहसासों से | उसके सजीव आलिंगन की मेरी छटपटाहट, उसके खिलखिलाने पर झड़ते अक्षरों को समेट कर शब्दों की माला गूंथ उसे पहनाती रही है | कल्पनाओं की वह आस्था, संवरती रही बसंत की तरह, पेड़ों की पोरों से निकली नई – नई पत्तियों के रंग की साड़ी में, बदल कर खिलते हुए फूलों कलियों से सजी चोली में, बांहों पर जैसे हरे रंग की बेल उतर आई हो | आस्था आधी खुली बांहों को, बार- बार ढंकने की कोशिश कर रही हो जिससे उसकी मोहक महक अन्दर ही रहे बाहर न फ़ैल सके | आज इस मोहक ने उस अँधेरे कोने को, पूरा महका दिया जहाँ सजीव हो रही मेरी कृति खुद इस महक से परिचित हो, जैसे हिरनी को कस्तूरी मिली हो और उसे खोजने की थकान में, बढ़ती सांसों के साथ उस महक में खो गई हो |
यह शहर के बाहर, पुराने कब्रगाह के चबूतरे के नीचे, मैदान में कोमल घास की बिछावन थी | ऊपर छत के रूप में नीला आकाश, जो अँधेरे से घबराकर काला दिख रहा था | उस आसमान के नीचे, आस्था मेरे स्पर्श से चाँद की तरह जीवित हो गयी थी | मेरे अस्तित्व से बाहर, मेरी कल्पनाओं से आगे की आस्था, एक चंचल कहानी की तरह, हंसती खिलखिलाती व्यंग्य की तरह, किसी शायर की गजल सी, किसी महाकाव्य की गंभीर उदारता या प्रकृति का सौन्दर्य समेटे हुए सुन्दर कविता की तरह, जैसे सम्पूर्ण साहित्य उसमें समाया हो | वह मेरे ऊपर झुक सी गई थी लगभग बोझिल सी | उसने झुर झुरी के साथ एक गहरी सांस भरी सीधा होने का ढेर सा ऑक्सीजन बटोरा हो मानो उसके अंग से बेतारतीवी से जुडा हर शब्द, करीने से सीधा हुआ हो और वह बोल पडी, “सुरेन्द्र आप और क्या खोजना चाहते हो ?” जबकि वह खुद भी वही खोज रही थी, जो मैं चाहता था | मैं उसके हर अंग को स्पर्श नहीं करना चाहता था, पर शायद हर अंग को पूरा टोह लेना चाहता था | उस अँधेरे में एक अजीब सा सन्नाटा पसर गया था, कहीं कुछ एक होने का सन्नाटा | मेरी छुअन से उसके भीतर कहीं कुछ जीवित हो रहा था और शायद, मेरा प्रतिकार भी कर रहा था जिसमें मेरे शब्दों की जुंबिश शिथिल हो रही थी| मेरी बाँहें उसे लपटने को हवा में फ़ैल गई, लेकिन वह दूर खडी थी – किसी वीणा की तरह, जिसके तार किसी कलाकार की अँगुलियों ने छेड़ दिए हों और उन तारों में अभी तक स्पंदन हो रहा हो | “कितनी खुश थी मैं, भीतर के लेखक मन के गुदगुदाते एहसासों में भावनाओं के बिछोने पर, सपनों और यादों के कोमल स्पर्श के बीच निश्छलता की दुनिया में, क्यों ज़िंदा किया इस कब्रिस्तान में ? जहाँ चारों ओर कब्रे ही कब्रे हों, जैसे कब्रों का जंगल हो, डरावना,वीरान | मुझे लग रहा है जैसे मैं इस वीरान जंगल में खोती जा रही हूँ | ” उसके यह शब्द मेरे भीतर कहीं फूट रहे थे जो रात में घुले हवा के सन्नाटे को तोड़ रहे थे |

मैं सोचने लगा, यह कब्रे नहीं बल्कि इंसानी रूहें हैं जो सो रही हैं | और हमें देख कर भी अनदेखा कर रही है, जैसे कह रही हों – अब कुछ सोचो मत ! नहीं तो , तुम्हारी सुन्दर कल्पनाओं का यह किला ढह जाएगा, इसलिए मन जो चाहता है उसे करने दो ! वही होने दो, जो होना है, जो होता है और जो हमेशा होगा | जाने कैसे, दूर खड़े रहकर भी उसने मेरे मन के शब्दों को सुन लिया था | वह दूर रहकर भी मेरे ह्रदय के कितना करीब थी | मैंने उसे सीने से चिपका लिया और उसके चेहरे पर उतर आई उसके जिस्म की सम्पूर्ण सिरहन को चूम लिया | वह मेरे सीने में अपने चेहरे को छुपाये कह रही थी – ” तुम झूठ बोलते हो इन कब्रों में इंसानी रूहें नही हैं बल्कि वे तमाम छोटी बड़ी कहानियाँ सिसक रही हैं, जो मेरी तरह स्त्री के रूप में आदमियों के बीच उतरी थी, सोलहवें बसंत के बदलाव में, नाजुक कलियों की तरह महकती खुशबू के साथ, खुले आसमान में पंख फैलाए जीवन जीने की लालसा लिए | इन कब्रों पर फड फडाते ये पंख, उन कहानियों के हैं, हो इस जमीन में बे पर के जमीदोज़ हैं | लेकिन, बाहर तुम भी पुरुष ही हो ! वही कठोरता दंभ और पुरुषत्व का लबादा ओढ़े | तुम इन कहानियों की सिसकियाँ नहीं सुन पा रहे हो | तुम्हारी तो जिद रहती है नई- नई कहानियों को जीवित करने की | देखो ! उनके भीतर के दरकते आयने की वे टेढ़ी- मेढी किस्में, जो सहमकर जुडी रही है, लेकिन दरारें शेष रहती हैं जिन्हें तुम नहीं भर सकते | इस आयने की दुनिया कितने टुकड़ों में दिखाई देती हैं और यह सब कथित पुरुषत्व का नतीजा है | और ….. न जाने कब, मेरे सीने में उसकी भावनाओं के बदल फूट पड़े | मैं, उसके ह्रदय के सम्पूर्ण खारेपन को सोख लेना चाहता था मैं उस खारेपन की अपने भीतर की जमीन की अंतस गहराइयों में, जो उसकी आँखों में उतर आया था एक सवाल बनकर | ” देखो सुरेन्द्र ! इन नुचे हुए पंखों को देखो, इनके ऊपर से अंधे त्रिशूल एवं बेरहम फतवों के निशाँ अभी मिटे नहीं हैं जो इन बचे हुए पंखों को अब भी खुली हवा में उड़ने से रोक रहे हैं, और तुम, यूँ साँसे रोके देख रहे हो एक सपने की तरह, कब तक ? आखिर, कब बाहर आओगे इस सपने से, यथार्थ के धरातल पर, कब तोड़ोगे इस आदमखोर सन्नाटे को ?” इस बार मेरी बाहें उसे अपने वजूद में समेटना चाह रही थीं | उसके जिस्म की सौंधी गंध, मुझे उसके जिस्म की पोर पोर में समा जाने को विवश कर रही थी | न जाने तेज बह रही हवा से किसने कह दिया, जो रुककर दूर खड़े होकर हमें देखने लगी |

मैं आस्था के शब्दों को छेड़ना चाह रहा था, मगर वह छिटक कर दूर हो गयी | ” तुम जिन्दगी से भाग रही हो | क्यों दूर कर रही हो खुद को मन के स्वच्छंद युवा होते सपनों से | नहीं चाहती तुम हवाओं का रुख बदलना | ” मैंने उसकी आत्मा में उतारते हुए अपनी बेवशी से पल्ला झाड़ते कहा था | उसकी खुली आँखों में हवा का पूरा बेग समा गया था | उस हवा के पीछे से उसके कोमल सपने मायूसी से झाँक रहे थे | उसने अपनी पलक झपकी तो हवा बाहर आकर कब्रों पर फैले पंखों को हड्काने लगी, आस्था देर में बोल पाई -” इन हवाओं का कोई भरोसा नहीं है सुरेन्द्र, कब कौनसी हवा हमारे बीच एक और बम का धमाका कर देगी और हमारी जुडी हुई कल्पनाओं के पंख उखड जायेगें | सुरेन्द्र, मेरे भीतर कुछ मर रहा है, मैं इस कब्रिस्तान से दूर जाना चाहती हूँ, खुले आसमान में, परियों के देश से आती हवाओं में, जो मुझमें कहीं बसा है | वहां रह कर भी मैं तुममें रहूँ, तुम्हें महसूसती और तुम्हारे लिए ही सोचती और जीती रहूँ | ” हवा हमारे चारों ओर एक घेरा बना रही थी और उसके यह शब्द बाहर जाने को रास्ता खोजने के लिए हवा के बनाए उस घेरे को टटोल रहे थे | ” इन बने बनाए परम्परावादी रास्तों से चलकर क्या तुम इन हवाओं के चक्रवात से दूर जा सकती हो ? इन रास्तों पर चलने वाले वापस ही आते रहे है | हाँ इन अँधेरे पहाड़ों को तराशकर रास्ते बनाने वाले पैर कभी वापस नहीं होते | ” मैं धीरे धीरे उसकी तरफ बढ़ रहा था | इन्हीं हवाओं के बीच से एक शीतल सा झोंका मधुर एहसासों के साथ मुझमें समाता चला गया, सामने खडी आस्था कहीं विलीन हो गई |

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