चांद आज बहुत सुस्त लग रहा था। किसी की गोद में नहीं जा रहा था। आज ज्यादा ही छिरिया रहा था। मां की छाती से लगकर थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता फिर रोने लगता। शाम होते ही उसका बदन गर्म होने लगा। रात में तबियत बिगड़ने लगी। रह-रह कर चिहुंक उठता। बच्चे को लोग ओझा के पास ले गए। नजर-गुजर उतारने के लिए। वहां ठीक नहीं हुआ तो वैद्य जी के पास। सरला के पैर में मानो पंख लग गए थे | जो जहां कहता वह वहीं दौड़ी-भागी जा रही थी। जैसे ही श्याम बाबू घर आए बच्चे को लेकर सीधे डॉक्टर के पास भागे। गांव के डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिये। बोले शहर के अस्पताल में जल्दी भर्ती करवाइए। रातों-रात सब बच्चे को लेकर शहर के अस्पताल में पहुंचे। पर उसे बचा न पाए। कुछ ही घंटों में बदली का चांद घुप अंधेरे में कहीं गुम हो गया। सब बदहवास। किस के हाथों ने बच्चे की लाश थामी | किसने सरला को संभाला कुछ पता नहीं। एक ही झटके में सबकुछ टूट गया। 

अब और नहीं 

फिरोज अख्तर

फिरोज अख्तर

आज श्याम बाबू काफी खुश थे। घर की हर चीज उन्हें अच्छी लग रही थी। यहां तक कि सरला भी। कल तक उसकी परछाई से भी परहेज करने वाले श्याम बाबू आज बदले.बदले से थे। पत्नी पर खूब प्यार आ रहा था। सरला जानती थी कि पति का प्रेम आज यूं ही नहीं उमड़ आया है। श्याम बाबू को घर का वारिस मिलने वाला है | इसलिए करमजली सरला आज दुलारी हो गई है। वैसे मां बनने की खुशी किसे नहीं होती है, लेकिन बीते छह वर्षों में उसने जितने दुख उठाए | वे इस वक्त खुशी में घुलकर आंखों के कोर से टपक रहे थे। सरला को बस इस बात की तसल्ली थी कि अब उसे कोई बांझ नहीं कहेगी। कम से उसका चेहरा देखकर उसकी सास की पूजा तो नहीं भ्रष्ट होगी।

श्याम बाबू सरला से हंस.हंस कर बतिया ही रहे थे कि उसकी सास जानकी देवी ने आवाज लगाई. अरी बहुरिया, जरा मेरे पास आना तो। सरला के लिए ये शब्द नए थे। इस घर में किसी ने उससे आदमी की तरह कभी बर्ताव नहीं किया। फिर भी वह झटपट उठकर सास के पास गई। सास ने कहा, देखा मेरे भगवान जी की लीला | पत्थर पर आखिर दूब उगा ही दिया न उसने! इतना कहकर उसे अपने साथ पूजा घर में आने को कहा, ताकि पेट में पल रहे बच्चे को भगवान का आशीर्वाद मिले। सरला जब नई.नई ब्याह कर आई थी तो कभी-कभार पूजा घर में आया करती थी। पर समय के साथ सबकुछ बदल गया। घर के लोग भी, लोगों का व्यवहार भी। खुद तो ताने सुनती ही, मायके के लोगों के बारे में भी बुरा-भला सुनती। सरला को बांझ तो उसकी मां को सब निरूपुत्र कहा करते थे। तब उसका कलेजा फट पड़ता था। ससुराल में ऐसा कोई था भी नहीं जिसके कंधे पर सिर रखकर रो सके। अपना गम हल्का कर सके। श्याम बाबू तो पति होकर भी बेगाने हो गए थे।

जैसे-जैसे दिन करीब आ रहे थे सरला की परवाह हर किसी को होने लगी थी। आखिर वह दिन भी आया जब उसने एक चांद से बच्चे को जन्म दिया। घर में खुशी का ठिकाना नहीं था। आस-पड़ोस में मिठाइयां बंट रही थीं। सरला को दूरा-दरवाजा पर बांझिन कहकर ताना देने वाली औरतों ने गिरगिट की तरह रंग बदल लिया था। सब जानकी देवी को बधाई दे रही थीं कि लो खेलाओ अब अपने पोते को। बड़ा कहती थी कि पोते का मुंह देखे बिना ही स्वर्ग सिधार जाऊंगी।

साभार गूगल से

साभार गूगल से

पोते की छठी पर जानकी देवी ने दिल खोलकर खर्च किया। सारे गांव का भोज कराया। अब सारे गिले-शिकवे दूर। बच्चे के नामकरण पर खूब बहस हुई। श्याम बाबू अपने बेटे का नाम प्रकाश और दुलार का नाम हैप्पी रखना चाह रहे थे। दादी अपने पोते का नाम भगवान के नाम पर कन्हैया जी रखना चाह रही थी। बुआ फिल्में ज्यादा देखती थीं | इसलिए भतीजे का नाम अक्षय रखना चाह रही थी। सरला चुपचाप सबकी बातें सुन रही थी। श्याम ने उसकी तरफ मुंह करके पूछा तुमने क्या नाम सोचा है बाबू का सरला ने कहा आपलोग इसे चाहे जिस नाम से बुलाएं पर मैं तो अपने चांद को चांद ही कहा करूंगी। आखिर में मां का रखा नाम ही पास। बाकी सब हवा में उड़ गए।

जैसे-जैसे चांद बड़ा हो रहा था | उसकी शरारतें भी बढ़ रही थीं। सूसू तो वह श्याम बाबू की गोद में ही करता था और दादी जब भी गोद में लेती कि झपट कर उसकी ऐनक पर हाथ साफ कर देता।

चांद आज बहुत सुस्त लग रहा था। किसी की गोद में नहीं जा रहा था। आज ज्यादा ही छिरिया रहा था। मां की छाती से लगकर थोड़ी देर के लिए चुप हो जाता फिर रोने लगता। शाम होते ही उसका बदन गर्म होने लगा। रात में तबियत बिगड़ने लगी। रह-रह कर चिहुंक उठता। बच्चे को लोग ओझा के पास ले गए। नजर-गुजर उतारने के लिए। वहां ठीक नहीं हुआ तो वैद्य जी के पास। सरला के पैर में मानो पंख लग गए थे | जो जहां कहता वह वहीं दौड़ी-भागी जा रही थी। जैसे ही श्याम बाबू घर आए बच्चे को लेकर सीधे डॉक्टर के पास भागे। गांव के डॉक्टर ने हाथ खड़े कर दिये। बोले शहर के अस्पताल में जल्दी भर्ती करवाइए। रातों-रात सब बच्चे को लेकर शहर के अस्पताल में पहुंचे। पर उसे बचा न पाए। कुछ ही घंटों में बदली का चांद घुप अंधेरे में कहीं गुम हो गया। सब बदहवास। किस के हाथों ने बच्चे की लाश थामी | किसने सरला को संभाला कुछ पता नहीं। एक ही झटके में सबकुछ टूट गया।

सही कहा गया है कि वक्त से बड़ा कोई मरहम नहीं होता। घर के लोग अब बच्चे की मौत का गम भूलने लगे थे। पर यह बात मां पर लागू नहीं होती। जिसने अपने शरीर अपनी आत्मा के अंश को खोया हो उसके जख्म की गहराई को वक्त कैसे भर पाएगा। महीनों क्या, बरस बीत गए, पर सरला का जख्म नहीं भरा। घाव एक हो तब तो भरे। अब तो सास.ननद ने एक और लांछन लगा दिया था। घर की बात बाहर फैली तो आस-पड़ोस की औरतें भी उसे डायन कहने लगीं। गली से गुजरती तो उसे देख औरतें अपने बच्चे को आंचल में छुपा लेती। रही बात श्याम की तो वह पहले भी बेगाना था, अब भी बेगाना। सरला की आंखों में आंसू भी नहीं बचे थे जो बहते तो दिल का गम हल्का हो जाता। इतना सबकुछ के बाद भी वह जिंदा थी तो किस लिए पता नहीं।

आज श्याम ने हद ही कर दी। शराब के नशे में धुत न जाने क्या-क्या बकता रहा। पीट-पीटकर सरला को लहुलुहान कर दिया। इतने से भी मन नहीं भरा तो उसकी साड़ी खींचने लगा। एक ही बात बोले जा रहा था | कमीनी तुम मेरे बेटे को खा गई मैं तुझे पूरे गांव में नंगा घुमाऊंगा मैला पिलाऊंगा। पति के मुंह से यह बात सुनकर सरला के सब्र का बांध टूट गया। अचानक उसने श्याम को एक तमाचा जड़ दिया। शायद सरला ने कोई बड़ा इरादा कर लिया था। तभी तो उसके अंदर इतना साहस आ गया वरना मारपीट गाली-ग्लौज से दो-चार होना तो उसकी रोजमर्रा में शामिल था।

रात का अंधेरा गहराने लगा था। सरला लड़खड़ाती हुई घर के दरवाजे से बाहर निकली। फिर तेज कदमों से किसी अनजानी मंजिल की तरफ बढ़ी। चलते-चलते घर से दूर गांव के अंतिम छोड़ पर पहुंच गईए जहां से गंगा नदी के उस पार उसका मायका गांव पड़ता था। सामने गंगा जी की लहरें उफान मार रही थीं। मगर सरला के दिल में इससे भी तेज लहरें उठ रही थीं। उसने मां गंगे को पुकारा। हे मां तू ही बता। क्या मैं डायन लगती हूं | लोग कहते हैं कि मैं अपने बच्चे को खा गई हूं। भला दुनिया में ऐसी कौन मां होगी जो अपने बच्चे को खा जाएगी। लोगों ने मनहूस करमजली कहा, सह गई बांझ कहा फिर भी जहर का घूंट पी गई। बच्चे को खा जाने का लांछन बर्दाश्त न होगा मां अब इस जीवन से मुक्ति दे दो, अपनी शरण में ले लो मां। इतना कहकर सरला गंगा की लहरों में समा गई। कुछ देर तक हलचल रही फिर अचानक लहरें भी शांत हो गईं। शायद गंगा मइया ने सरला की करुण व्यथा सुन उसे मुक्ति दे दी थी।

अब वह फिर जन्म लेगी लेकिन अबकी सरला नहीं बल्कि दुर्गा बनकर। जन्म और मृत्यु का चक्र चलता रहता है। उसकी आत्मा ने अब तक तो किसी कोख में अपना रूप धारण भी कर लिया होगा। बहुत हो गया। अब और नहीं। इसबार खुद कहानी नहीं बनेगी बल्कि अदम्य साहस से कहानियां गढ़ेगी। ऐसी लकीर खींचेगी जिस पर चलकर कई सरला दुर्गा का रूप धारण करेंगी। ऐसा होना हैए ऐसा ही होगा।

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    By: फ़िरोज़ अख्तर

    सीतामढ़ी जिले के सुरसंड में जन्म। प्राथमिक से कॉलेज तक की पढ़ाई वहीं से। छात्र जीवन से रंगकर्म से जुड़ाव। करगिल शहीदों पर लिखे नाटक ‘श्रद्धांजलि’ और उसके निर्देशन से मिथिलांचन क्षेत्र में पहचान। वर्तिका, चेतांशी सहित कई पत्र-पत्रिकाओं में कहानियां और गजल प्रकाशित। जीविका के लिए एक दशक तक पेंटिंग से जुड़ाव। अब हुनर को जिंदा रखने के लिए चित्रकारी। एनओयू से पत्रकारिता में स्नात्कोत्तर करने के बाद 2007 से प्रिंट मीडिया में। अभी हिन्दुस्तान पटना में सीनियर सब एडिटर के पद पर कार्यरत।
    संपर्क : हरिहर सिंह निवास, राजेंद्र नगर पटना
    मोबाइल-9771203592, [email protected]

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    गोपाल: कहानी (फ़िरोज अख्तर)

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