आकार में छोटी ही सही लेकिन बड़ी बातों की तरफ इशारा करतीं, चलती-फिरती जिंदगियों की टकराहटों से पनपतीं लघुकथाएं …..

बुके 

अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर ‘

चौराहे की लाल बत्ती पर रुकते ही , फूलों पर पड़ी मेरी नज़र को वो भांप गया और   तेज क़दमों से चलते हुए मेरे पास तक आ गया –

“ ये लो सर जी बिलकुल ताज़े फूल  हैं, कितने चाहिए ? कितने में दोगे ये वाला ? बोल पड़ा – पांच सौ , में दोनों बुके दे दूंगा ,ले लीजिये ना साब , ज्यादा नही बोला हैं | “ दो सौ में देना हो , तो दे दो दोनों ,  ग्रीन लाईट होने वाली है  ..”!

 मेरे इन शब्दों को सुन उसका मुँह  लटक गया |फिर खुद को सहेजते हुए बोला – अच्छा ले लीजिये गुलाब और रजनीगंधा दोनों ,  आखिरी दाम , साढ़े चार  सौ , दोनों दे दूंगा !

तभी मेरी नज़र उसकी पसीने से तरबतर  सख्त हथेली  पर बंधे,  मैले कपडे की तरफ फिसल गयी  ….उसने फिर  निगाह भांप ली , कुछ नही सर जी, कल रात ढाबे पर बर्तन धोते समय  कट गया था थोड़ा | ओह ! तो कुछ दवा ली …..? वो जोर से हँसा – कहाँ सर जी ! सुबह से लोग सिर्फ मोलभाव ही करके चले जाते हैं ,दोपहर होने को आई | सुबह जब ताजे थे तो इनके दाम ज्यादा थे ,यह कहकर  किसी ने नही लिया | अब मुरझाने लगे तो लोग भाव पूछकर आगे बढ़ जाते हैं …..मैं तो समझ ही नही पाता  साब  ! “ फूल को धूप और गरमी  सुखा रही है या आप जैसे बड़े लोग …….| ”

अच्छा जी आती हूँ अभी ….. 

कितना सब्र करूँ हद हो गयी , जबसे रिटायर हुए हैं बौरा गए हैं | न खुद चैन से बैठते हैं न बैठने देते हैं | अरे ! क्यों इतना प्रेमगीत गाये जा रही हो ? मैं तो बस बाज़ार चलने के लिए बोल रहा था | साथ चलती तो अच्छा लगता ,बीमार शरीर को शुद्ध हवा मिल जाती ,मन बहल जाता थोड़ा | वैसे भी पूरी उम्र नौकरी की भागमभाग ने तुम्हारे  साथ बैठने का मौका कहाँ दिया ? पूरी उम्र मेरी तीमारदारी में लगी रही , हर बात पर –‘ बस अभी आती हूँ ………..अभी आई …’ अपने बारे में कभी सोचा तक नही ……उम्र भी सरक कर कहाँ आ गयी ,पर तुम आज भी वहीँ की वहीँ रुकी हो | पति दीनानाथ  की बात सुनकर कमला शरमा गयी | जाने भी दीजिये आप भी |….अरे अच्छा सुनो ! अगर बाज़ार नही चलना तो ना चलो ,  मेरा एक काम ही कर डालो बैठे –बैठे …..इतना सुनते ही कमला बोल उठी बोलिए न क्या काम है ?दीनानाथ बीमार पत्नी के कंधो पर हाथ रखते हुए बोले –“ तुम यहीं दालान में बैठो , आता हूँ |” थोड़ी देर बाद दो कांपते हुए हाथ ट्रे को मजबूती से पकड़े , अपनी ज़िन्दगी की तरफ़ चले आ रहे थे | कमला बोल पड़ी – अरे ! ये क्या आपने बनाया ? सच में सठिया गए आप ….बोलिए न क्या यही काम था … ? दीनानाथ जी ने मुस्कुराते हुए हाँ ! अब तुम बैठो और मेरे हाथ के बनाये गरम –गरम पकौड़े और चाय का स्वाद लो और हाँ ! वो तुम्हारा वाला डायलॉग अबसे मैं बोला करूँगा – “अच्छा जी आता  हूँ ,बस ….अभी आया |

पूरी दालान मुस्कुराने लगी थी , कमला के सकुचाये पन को देखकर |

कारीगर 

साभार google से

घुरहू ने बड़े जतन से महराजिन अम्मा के घर की एक –एक ईंट जोड़ी थी |

दिल्ली से पूरे दस साल बाद काम सीखकर लौटा हूँ महराजिन अम्मा ! मिस्त्री के काम में पारंगत  हो गया हूँ |बाप – दादा मजूरी करते – करते सिधार गए , कला ना आई | परदेश जाने से बचते रहे | कहते – कहते घुरहू ने महराजिन अम्मा का घर बनाने का ठेका ले लिया |रसोईघर घर बनाने में तो उसे महारत हासिल थी |दिल्ली में जो कुछ भी उस्ताद से सीखा था , आज महराजिन के घर उन सब को उतार देने पर आमादा था | गृहप्रवेश और समय ने रसोईघर को इज़ाजत दे दी – खुशबू और प्यार परोसने की  | अरे वाह ! आज क्या पकाऊँ नयी रसोई में अम्मा जी ? बहू की आवाज़ सुन अम्मा भी रसोई तक आ गयीं |आंखे मटकाते हुए बोलीं – “बिलकुल सिनेमा माफिक रसोई बनायी है घुरहुआ ने |बाप का हाथ मिल गया विरासत में इसको !”

लोगों से अपने बनायी कला का गुणगान सुन , घुरहू फूला ना समा रहा था | बार –बार अपनी पत्नी रमिया  के आगे अपनी हथेलियाँ चूमता , बोलता जाता –“ दादा से मिली ये कला …भगवान भी ..अपरम्पार है लीला उसकी , बहुत बड़ा कारीगर है वो ! “ पत्नी ने तपाक से पूछ लिया – “ चलो दिखा के लाओ फिर अपनी कला ….बिना देखे कैसे जानूं  अपने मरद की कारीगरी | वो तो टोले वालों की जलती मुस्कान से थोड़ा समझ जाती हूँ ..पर एक बार अपनी आँखों  देख तो लूं दिल को ठंढक पहुंचेगी |”  घुरहू महराजिन के द्वार पर खड़ा था , भीड़ के बीच सकुचाया -सा | लोग जब तारीफ करते तो हाथ जोड़ मुस्कुरा देता |तभी छोटी बहू नज़र आयीं | घुरहू ,रमिया को लेकर महराजिन के  घर में दाखिल हुआ | एक –एक बारीकी दिखा कर ,  गौरवान्वित महसूस कर रहा था ..बोला-“ ई का अभिन रसोई देखना ……कहते हुए बोल पड़ा –

“ मालकिन ऊ हमार मेहरिया हमारा काम देखा चाहत है रसोई का ….”

सुनते ही छोटी बहू के कान गरम हो गए |तेजी से कुछ सोचते हुए रसोई की तरफ भागीं …घुरहू चिल्लाया कुछ जल गया का मालकिन ….? तेज क़दमों से लौटी छोटी बहू बोल पड़ी – “ इ  लो मोबाइल पर फोटो देख लो अपने मरद के  कारीगरी की “

घुरहू  की पत्नी रमिया नम आँखे नीचे किये हुए बोल पड़ी  –  “ मैं तो इनसे कबसे बोल रही थी मालकिन – भित्तर छुआ जायेगा तो महराजिन  अम्मा परान ले लेंगी |” घुरहू बुदबुदाया  –   कहता था ना ……भगवान भी , ..अपरम्पार है लीला उसकी….बहुsssssते  बड़ा कारीगर है वो !

स्टेटस 

गूगल से साभार

कार में बैठते हुए मिसेज शर्मा ने अदा के साथ अपने भावी समधी की तरफ आँखें फेरी | नो डाउट मिस्टर शुक्ल ! आपके बेटी की ब्यूटी माडलों जैसी है , गाती भी अच्छा है ,पेंटिंग ,सिलाई आई मीन ! सारे गुण हैं , एक अच्छी हाउस वाइफ के |आखिर मेरे बेटे की पसंद है ? पर अफ़सोस बहुत फर्क है हमारे और आपके बीच | शादी में इतना मैनेज कर पायेंगे आप ?……मेरा मतलब ……बुरा मत मानियेगा आप ! दरअसल …..बड़े बेटे की बारात  फाइव स्टार होटल में ….अच्छी व्यवस्था की थी , बड़ी बहू के घरवालों ने | और आप तो जानते हैं मेरे रिश्तेदारों को ? आपसे क्या छुपा ….अच्छा चलती हूँ , सोचियेगा ,ये तो बच्चे हैं , वक्त के साथ –साथ सब समझ जायेंगे ,जिम्मेदारी तो हमारी और आपकी बनती है कि इन्हें समझाएं , क्या इनके भविष्य के लिए सही है……और ये स्टेटस का फर्क ….आई  थिंक …..कहते हुए मिसेज शर्मा कार में बैठ गयीं |

भीतर आकर शुक्ल जी की नज़र अपने फटे जूते ,बिस्तर पर बिछी , सिली हुई चादर के अलावा शुक्लाइन की बुझी हुई आँखों पर भी पड़ी |अचानक शुक्ल जी ने तकिये को उठाकर चद्दर के सिले भाग पर रख दिया ,जूते को टांड पर  टिका  ,पत्नी की आँखों पर अपने शख्त हाँथों  को ,  गीले मन से रख दिया |

तभी पत्नी की भर्रायी आवाज़ ने उन्हें चौंका दिया –“ रहने भी दो शुक्ल जी ! क्या-क्या ढकोगे ? ढंकने से हम  मिसेज शर्मा बन जायेंगे क्या ?

हम

रिंगटोन  बजते ही अनुराधा   का हाथ तेज़ी से फ़ोन की तरफ़ बढ़ा |उसकी सहेली निशा का था |ओह  नो ! निशा  तुम , हम तो समझे कि मंत्री जी का फ़ोन है | तुमने अखबार में तो पढ़ा होगा न | हमें चुनाव …..अरे दुआ कर , जीत जाऊँ | निशा ने रुआंसे स्वर में कहा –“ ज़रूर जीतोगी …..अनुराधा |” मैं बहुत परेशान हूँ | नरेश की वहशियाना हरकतें | माँ जी की किचकिच और ….बात को बीच में काटते हुए –“ अरे यार ! एक बात तो तुझे बताना भूल ही गयी | हम लोग शॉपिंग सेंटर खोलने जा रहे हैं , मेन मार्केट में | मौका पाकर निशा बोली –“ मैं तुमसे मिलना चाहती थी ,एक तुम्ही हो जो …….” और हाँ ! क्या कहा तुमने …..एक सेकण्ड न्यूज़ देखो ! स्लम एरिया में मेरा कार्यक्रम था , आज वही टेलीकास्ट हो  रहा है …..

अच्छा ऐसा है कि तुम थोड़ी देर बाद फ़ोन करो …..वो   मंत्री जी का फ़ोन आ रहा है न …अरे हाँ ! मैं तो पूछना ही भूल गयी , तुम कैसी हो ?

फोन कट चुका था | उंह …जल गयी होगी ….अनुराधा ने रिसीवर पटक दिया | बेमतलब ………….न जाने क्या मिल जाता है लोगों को  खुद फोन करके काटने में ?

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    By: अमरपाल सिंह आयुष्कर

    जन्म : 1 मार्च
    ग्राम- खेमीपुर, अशोकपुर , नवाबगंज जिला गोंडा , उत्तर – प्रदेश
    दैनिक जागरण, हिन्दुस्तान ,कादम्बनी,वागर्थ ,बया ,इरावती प्रतिलिपि डॉट कॉम , सिताबदियारा ,पुरवाई ,हमरंग आदि में रचनाएँ प्रकाशित
    2001 में बालकन जी बारी संस्था द्वारा राष्ट्रीय युवा कवि पुरस्कार
    2003 में बालकन जी बारी संस्था द्वारा बाल -प्रतिभा सम्मान
    आकाशवाणी इलाहाबाद से कविता , कहानी प्रसारित
    ‘ परिनिर्णय ’ कविता शलभ संस्था इलाहाबाद द्वारा चयनित
    मोबाईल न. 8826957462 mail- [email protected]

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    कटी नाक, जुड़ी नाक: कहानी (अमरपाल सिंह ‘आयुष्कर’)

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