सामाजिक बदलाव के समय में साहित्य से गाँव और ग्रामीण जीवन की कहानियाँ जैसे गायब होती जा रहीं हैं, उसकी जगह बाजारी अतिक्रमण से प्रभावित नगरीय जनजीवन और उसके बीच पनपते नये मध्यवर्ग की आर्थिक विषमताओं एवं व्यक्तिगत दैहिक कुंठाओं से भरी कहानियों की लम्बी फेहरिस्त सामने है | मज़े की बात है कि इनमें से ज्यादातर कहानियों में से पूरे सामाजिक ताने-बाने को प्रभावित करने वाला राजनैतिक और वैचारिक परिदृश्य भी कहीं ओझल है | ऐसे में ‘सुभाष चंद्र कुशवाह’ की कहानी पाठक को न केवल भारतीय ग्रामीण जीवन के करीब ले कर जाती है बल्कि राजनैतिक स्वार्थों और इच्छा शक्तियों के प्रभाव में छिन्न-भिन्न होती भारतीय सांस्कृतिक विरासत को भी रेखांकित करती  …| – संपादक 

अमीन मियां सनक गये हैं 

सुभाष चन्द्र कुशवाह

सुभाष चन्द्र कुशवाह
बी 4/140 विशालखंड
गोमतीनगर,लखनऊ 226010

जब लाफ्टर चैनल का जमाना न था, तब हंसने-हंसाने के साधन थे अमीन मियां । कद सामान्य, चेहरा गोल और सिर के घंुघराले बाल उनकी अलग पहचान बनाते । खरी बोली-बानी, सादा जीवन और परमार्थ, अमीन मियां की पहचान थी । तब लोग, मियां का मतलब खांटी मनई समझते थे। अमीन मियां के नाम के साथ मियां जुड़ा था, सो मियां थे, वरना हिन्दू, मुसलमान में फर्क करना, हवा को आक्सीजन रहित करना था । न दाढ़ी, न टोपी और न नमाज का झंझट ।
घाघी नदी के कछार पर बसा परसौनी गांव का दखिन टोला, अमीन मियां बिन ठकुआ जाता और वह गांव बिन, चइत महिने की मूंज, सरकंडे जैसे खर-पतवारों की तरह मुरझा जाते । परसौनी गांव के तीन टोले थे । उत्तर टोला, परसौनी गांव की सत्ता का केन्द्र था । वह ठाकुरों और भूमिहारों का टोला था । उत्तर टोला में खंडहरनुमा शिव मंदिर था । मंदिर का पुजारी, दरबार का पुजारी कहलाता । दरबार यानी पूर्व जमींदार, वीरेन्द्र प्रताप सिंह की हवेली । उत्तर टोले में अंग्रेजों के जमाने का प्राथमिक विद्यालय भी था, जो टोले के दखिन, घाघी नदी के किनारे से कुछ दूर, भीट पर बना हुआ था । विद्यालय से सटा कटबांसी, सेमर, गूलर, महुआ, जामुन, बहुवार, सीहोर, शीशम और आम के पेड़ों का घना मगर छोटा जंगल था । जंगल पर दरबार का कब्जा था । जब चकबंदी हुई, बंदोबस्त के कागज-पत्तर निकाले गये तो पता चला कि जंगल का थोड़ा हिस्सा ही वीरेन्द्र प्रताप सिंह के पूर्वजों के नाम था । बाकी स्कूल की जमीन के रूप में दर्ज था । जंगल, दखिन टोले की दिनचर्या में था । जंगल के सूखे पत्ते जलौनी के काम आते । वहां माल-मवेशी चरते और शौच के लिए जगह उपलब्ध हो जाती । तभी तो बाबू वीरेन्द्र प्रताप सिंह सुनाते, ‘हमार जंगल न हो तो दखिन टोले का हगना-मूतना बंद हो जाय ।’ दखिन टोला बाबू वीरेन्द्र प्रताप सिंह की धमकी सुनता और एहसान तले दबा रहता ।
पश्चिम टोला, तिवारी टोला भी कहा जाता । कभी तिवारी लोग उत्तर टोले के पश्चिम बसे थे । बाद में फैलते-फैलते पश्चिम टोले में बदल गये । तिवारी टोला के दखिन में एक बड़ा तालाब था । तालाब के बाद, दो-तीन बिस्वा केवड़े का बाग था । केवड़े के बाग के बाद, घाघी नदी से आधा किलोमीटर दूर, प्राथमिक विद्यालय से सटा दलितों, मुसलमानों और पिछड़ी जातियों की बस्ती थी, जिसे दखिन टोला कहा जाता था । तीनों टोले मिलकर एक त्रिभुज बनाते । दखिन टोला, बाकी दो के निशाने पर यानी तिकोने पर स्थित था ।
अमीन मियां को लोग चिढ़ाते और वह चिढ़ कर हरिहराते । मजाल क्या कि लरजते । उनका होना, दखिन टोले का होना था । घाघी का उफनाना, बाग-बगीचों का फलना-फूलना था । उनका न होना, गांव की कच्ची सड़क का सूनापन था और चुप रहना, फगुनी पछुआ बयार से उड़े धूल-सा गंवई मानुष के दिल-दिमाग में गर्द की तह की तरह जम जाना था ।
दखिन टोले की आधी से कुछ कम आबादी मुसलमानों की थी । मुसलमानों के वंशज जुलाहे थे । हिन्दू जातियों में अहीर, कोईरी, लोहार, बढ़ई, तेली, धोबी, कोहार और चमार जाति के लोग थे । दखिन टोले के गरीब किसान और मजदूरों के पास बहुत कम जमीनें थीं । कोहार और चमार जाति के लोग भूमिहीन थे । उत्तर टोले और पश्चिम टोले में मजदूरी कर पेट पालना उनकी मजबूरी थी ।
गरीबी के बावजूद दखिन टोले में छुआछूत का भेद था । शादी-ब्याह में मुसलमानों की अलग पंगत बैठती । दखिन टोले के हिन्दू-मुसलमान पंगत के फासले को हंसी-मजाक से ढंक देते थे।
‘का हो इन्द्रजीत ! साथ बैठने पर हिन्दू लोग करिया जायेंगे ?’ एक बार अमीन मियां अपनी पंगत में बैठे, सुना बैठे थे।
‘पंडित के अलावा हिन्दू लोग गोर कहां हैं ? अरे पंगत का इ पुरान विधान है । न केहू गोर, न करिया ।’ अमीन के दोस्त, इन्द्रजीत ने जवाब दिया ।
‘तो इ विधान बदलेगा नहीं ?’
‘काहें ना बदलेगा ? नवका लड़िका बदल रहे हैं ।’
‘ आप नहीं बदलेंगे?’
‘कौनो किरिया है ?’
‘त तोहरे बगल में आ जायं ?’ अमीन मियां ने फिर कुरेदा था ।
‘आ जाइये ! आप को कौन रोक रहा है ? दखिन टोला में कौन भेद ? यह बाबू और तिवारी लोग का टोला थोड़े है ?’ इन्द्रजीत हथियार डाल दिए थे ।
‘ बूझ रहे हैं तोहार बात ? बेटओ मीठ और भतरो मीठ।’ अमीन मियां का मजाक पंगत के फासले को दूर करता ।
‘ऐ इयार ! तू हमरा बगल में ना बइठे हो ? हमरे साथ भूजा नहीं फांके हो ? अरे ! शादी-विवाह में तनिक लोक-लाज का ख्याल रखना पड़ता है । दूसर गांव के मनई बवाल करते हैं ।’ इन्द्रजीत ने सफाई दी पर कुछ सोच कर झेंप गये थे । दोस्त के शब्दों की हकीकत नकारी न जा सकी । अमीन मियां ने पूड़ी के टुकड़े से परवल की सब्जी बटोरते हुए इन्द्रजीत का चेहरा देखा, जो जमीन की ओर गड़ा हुआ था । वह चुपचाप खाने लगे थे। पंगत में बैठे दूसरे मुसलमानों को उस बतकही से क्या मतलब ? ‘जइसन देखी गांव के रीति, ओइसन उठाई आपन भीति’ ।
छूआछूत की बीमारी से दलित और मुसलमान, दोनों प्रभावित थे । कुएं से मुसलमानों के पानी भरते वक्त, गैर दलित हिन्दुओं की बाल्टी और रस्सी, कुएं की जगत से दूर कर दी जाती थी । ढेंकुल चला रहे मुसलमान, गैर दलित हिन्दू महिलाओं के आने पर पंवठा से अलग हो जाते । गैर दलित हिन्दुओं के बरतन में मुसलमान नहीं खा-पी सकते और न मुसलमानों के बरतन में हिन्दू । दलितों के यहां खाने-पीने का सवाल ही नहीं ।
पश्चिम टोले के तपेसर तिवारी, दखिन टोले के गैर दलित हिन्दुओं के पुरोहित थे । दलितों का कोई पुरोहित न था । जब तपेसर तिवारी दखिन टोले में पधारते तो अमीन मियां पंवलगी कर चिढ़ाते । एक बार गांव के कुएं पर नहाते हुए अमीन मियां ने तिवारी को देख, उठ कर पांवलगी की । तपेसर तिवारी ने अपनी चिरपरिचित शैली में आशिर्वाद देते हुए कहा, ‘का हो अमीन, मौज है न ?
‘का मौज कहें तिवारी जी ? पानी बरसा नहीं, धान की फसल मार गई ।’
‘मस्त रहो अमीन ! सूखा-बाढ़ तो लगा ही रहता है गरीब के जीवन में । जो मुंह दिया है, वही अन्न देगा ।’ तिवारी हाथ उठा कर बोले ।
‘आप का धंधा ठीक है महराज । सूखा-बाढ़ से कौनो फर्क नहीं ।’
‘धत् ससुर !’ तिवारी मुस्कुराते आगे बढ़े ।
‘आप तो गोबर के गणेशजी बना के दस-बीस झटक लेंगे, पर हम गरीब ? अमीन मियां ने तपेसर तिवारी को चिढ़ाया ।
‘ ऐ मियां ! चुपा जा ! तोहरा लोग में जब मुसलमानी होती है तब मौलवी को दान-पुण्य मिलता है कि नहीं ? मिलता है न ? तो हमें मिल रहा है तो तोहें काहें फट रही ? तपेसर तिवारी चिढ़े थे और हंसी का हल्कापन, हवा में उड़ाते आगे बढ़ गये थे ।
अमीन मियां दखिन टोले वालों के प्यारे थे । कुएं पर मजमा लगता और अमीन मियां न दिखाई देते तो दिलफेंक युवा पूछते, ‘का हो, अमीन चाचा दिखाई ना दिए, ससुराल गये हैं का ?’
‘और का ? सुने ना हो, ससुरारि पियारी भई जब से, रिपु रूप कुटुम्ब भयो तब से,’ अमीन मियां के पड़ोसी हदीश चाचा, रामचरित मानस की पंक्तियां दुहराते हुए मुस्कुराते ।
‘आपो चाचा हद करते हैं ? न साली, न साला, तब काहें बनेंगे अमीन ससुराल वाला ? चाची तो यहीं हैं ?’ नथुनी यादव की षरारत सनसनाने लगती । अमीन मियां सुनते तो घर से मुसकुराते निकलते और कहतेे, ‘अहिर मिताई तब करे जब सब मीत मरि जाए। …..का हो नथुनी ! बड़ा मजा ले रहे हो। ’

अमीन मियां सनक गये हैं

‘अरे ! यह देखो ! अमीन भाई तो घर में हैं !’ नथुनी ठहाका लगाते । लोग उसमें शामिल हो जाते । आषाढ़ की पहली बारिस के बाद का सरेह जैसा दखिन टोला, अमीन मियां का अन्यादि पुराण सुन गदरा जाता ।
‘अमीन भाई ! ऐ अमीन भा….’ कोई दरवाजे पर खड़ा, हांक लगाता । फिर कुछ देर इंतजार कर कुंडी खटखटाते कहता,
‘अरे सुन रहे हैं ? कांटा दीजिएगा ? फंसाना है ।’
‘किसको फंसाना है काका ?’ गांव के लड़के टिभोली मारते । बड़े भी मैदान में कूद पड़ते, ‘अरे किसको क्या ? बाल्टी फंसानी है ? तू लोग का बूझ रहे हो ? भउजाई को ? राम, …..राम, अब इस उम्र में ? अरे ऊ तो फंसी ही हैं । किसी और को ..।’ हांक लगाने वाला लड़कों के चुहल को उकसाता । मजाक की तासीर बढ़ जाती ।
अमीन मियां-बो यानी हमउम्रों की भौजाई, कम रसवन्ती न थीं । माना कि थोड़ी सांवली थीं पर नाक-नक्श में कटीली थीं । चैड़े किनारे वाली साड़ी, माथे पर बिन्दी, पांव में पायल, बिछुआ और कान में झुमके लटका कर, कांख में खैंची दाबे खेतों की ओर निकलतीं तो अमीन मियां के दोस्त, भौजाई को देख आह भरते । भौजाई को सुनाकर मजाक करते। भौजाई भी मजाक में शामिल हो कहतीं- ‘बड़ा मुस्कुरा रहे हैं आप लोग ? अपनी बहिन से मिल कर आ रहे हैं का ?’
‘नीक लागे टिकुलिया, परसपुर के … ।’ कोई मजाकिया गाने लगता । परसपुर अमीन मियां-बो का मायका था । मजाक का रंग डड़ार की कदमचाल के साथ फुदकता, सरेह में पसर जाता। खुर्पी, हंसिया और कुदाल की चाल तेज हो जाती ।
अच्छे दिनों के बाद की पीढ़ी संदेह कर सकती है कि मुसलमान औरतें मांग में सिन्दूर, माथे पर बिन्दी या पैरों में बिछुआ पहनतीं होंगी ? वक्त-वक्त की बात है । हिन्दू औरतें भी मुहर्रम में रोजा रखती, शाम को तीनचउरी प्रसाद बांटती । अभी भी कहीं-कहीं यह परंपरा कायम है ।
अमीन मियां के पास एक कांटा था । कांटा यानी, कुएं में गिरे बर्तन निकालने का देहाती औजार । कांटा लोहे की छड़ों का बना था, मजबूत और फंसाऊ । वह किसी होषियार लोहार की निहाई पर तराषा गया था । लोहार की कलाईयों और हाथों के संतुलित दबाव से उसके हुक, कंटिया के मानिन्द मुड़े और नुकीले थे । कहा जाता है, अमीन मियां उस कांटे को कोलकाता से खरीदकर लाए थे । तब वह आठ आने का मिला था । कोलकाता यानी कि कलकत्ता, जहां अमीन मियां, विवाह बाद, अपने अब्बा हाकिम मियां से नाराज होकर, मजूरी करने चले गये थे । दो साल बाद जब बीवी का आठवां महीना चल रहा था, परदेष से गांव के लिए चले तो अब्बा के लिए खैनी, दोस्तों, बूढ़े-बुजुर्गों के लिए बीड़ी, बीवी के लिए साड़ी और गांव वालों के लिए कांटा खरीद लाए थे। कांटा उन्हें काम का लगा था । तब टोले में हैंडपम्प नहीं गड़े थे । पीने के पानी के लिए कुएं थे । कुओं से पानी निकालते समय रस्सी टूट जाती तो बाल्टी, गगरा या दूसरे बरतन कुएं के पेट में समा जाते ।
जब अमीन मियां परदेश से कांटा लेकर लौटे तो अमीन मियां-बो कांटा देख, मुंह में अंचरा का खूंट दबाये, मन्द-मन्द मुस्कुराई थीं । कनखियों से मरद को निहारते हुए कांटे के उपयोगशास्त्र को बांच रही थीं । ‘का मुस्की मार रही हैं ?’ पूछे थे अमीन भाई । अमीन मियां-बो खिलखिला पड़ी थीं । ‘बतायेंगी कि खाली हंसती रहेंगी ?’ अमीन मियां बेचैन हो, जानना चाहे।
‘अरे ! इ देख कर लगा कि आप कवनो बीखो लाये हैं, हमरा लिए । फिर सोची कि किलो, दू किलो का बीखो कौन पहिनेगा ।’ अमीन मियां-बो मुस्कुराती हुई कांटे की ओर इशारा कर ताना मारी थीं ।
हाकिम मियां कांटा देख बहुत खुश हुये थे । चारपाई पर लेटे-लेटे बोले थे, ‘ई नीक चीज लाये हो अमीन। अपने यहां के लोहार एइसा कांटा नहीं बना पायेंगे ।’
गांव में जब अमीन मियां का कांटा नहीं था, न जाने कितनी बाल्टियां या गगरे, कुएं के तल में समाये, इतिहास उत्खनन की चीज बन चुके थे । कोई बिरले षातिर बुड़ाकू ही कुएं में डुबकी लगाकर, बरतनों को निकाल पाता ।
कुओं में गिरे बरतनों को फंसाने का तरीका आसान था । कांटे को मजबूत और लम्बी रस्सी में
बांधकर, कुएं में डाल दिया जाता । फिर रस्सी को इधर-उधर खींचते, सरकाते हुए गोल-गोल घुमाया जाता । बरतन फंस जाता तो रस्सी खींच जाती । कांटा डालने वाला समझ जाता कि काम बन गया है और धीरे-धीर बरतन खींच लिया जाता।

अमीन मियां का कांटा पूरे गांव के काम आता । यह देख भौजाई का मन महकता । मन महकता तो साड़ी और नाखूनों का रंग गाढ़ा हो जाता । आये दिन लोग दरवाजे पर हांक लगाते । अमीन मियां न होते तो अमीन मियां-बो को पुकारते । पुकार की बोली-भाषा, पुकारने वाले की उम्र और रिश्ते पर निर्भर होती । कोई ‘भौजी’, कोई ‘अमीन-बो’ और कोई ‘चाची’ पुकारता । उत्तर और पश्चिम टोले वालों की एक भाषा थी, ‘ ऐ अमीन! अमीन-बो !’
अमीन मियंा या अमीन मियां-बो कांटा पकड़ाते हुए हिदायत देते, ‘रस्सी कस कर बांधियेगा ! कंाटा खुल गया तो, कौन निकालेगा ?‘
‘हां ! वैसे ही बांधा जायेगा, जइसे आप दोनों की गांठ बंधी थी ।’, दोस्त मजाक करते ।
‘पता ना हमार गांठ बंधी थी कि निकाह हुआ था, पर आज आप की गांठ हमार कांटा से बंधेगी ।’ अमीन मियां मुस्कुराते हुए मासूमियत से जवाब देते।
इस बीच अमीन मियां के दूसरे पुत्र, सलीम भी दुनिया में आ चुके थे । हाकिम मियां अपने दोनों पोतों को कभी राम, कृष्ण की तो कभी मुहम्मद साहब के चचेरे भाई के दामाद, अली के दोनों बेटों-हासन और हुसैन के बलिदान की कहानी सुनाते । हर शाम, उनकी चरपाई के पास बच्चों का जमावड़ा होता । शादाब और सलीम के अलावा गांव के दूसरे बच्चे भी आ बैठते । हाकिम मियां कहानी सुनाते-सुनाते गाने लगते । जब दम फूलने लगता या खांसी उपट जाती तब कहानी सुनाना बंद कर चारपाई पर पसर जाते।
अमीन मियां के दलान के आगे नीम का पेड़ था । सुबह-शाम कौवों और मैनों का मजमा, गांव को गुलजार रखता । पेड़ पुराना था पर दतुवन तोड़ने के कारण, विस्तार नहीं कर पाया था । पेड़ से सटे गांव की मुख्य सड़क निकलती थी । सड़क की दूसरी ओर दखिन टोले का कंुआ था। कुएं के उत्तर और पूरब, आसपास के लोग गाय-बैल, भैंस, बकरियां बांधते । पश्चिम ओर बैठकी के लिए पक्का चबूतरा था । चबूतरे का निर्माण चंदे से हुआ था । जब दखिन टोले में कुंआ नहीं था, गांव की मेहरारू सरेह के इनार से पानी लातीं । वह इनार पश्चिम टोले के मंगल तिवारी का था । उसमें से दलितों और मुसलमानों को पानी लाने की मनाही थी। वे लोग एक किलोमीटर दूर, जंगल स्थित भटकुंइया इनार से पानी लाते ।
हाकिम मियां की अगुवाई में दखिन टोले का कुंआ, श्रमदान से बना । सत्तन और सरजू ने ईंट पाथी । गांव के दूसरे मजदूरों ने काम किया । भट्ठे के लिए कोयला खरीदना पड़ा था मगर लकड़ी की व्यवस्था इन्द्रजीत के दादा ने आम का पेड़ दान देकर पूरा किया ।
कुंआ टोले की बैठकी का अड्डा बन गया । उत्तर टोले वालों को ‘छोट जातियों की राजनीति का अड्डा’ लगता । देखते-देखते मदारियों के तमाशे का अड्डा भी बन गया वह । बाइसकोपवाला आता तो वहीं बुढ़िया धोबिन और ताजमहल की तस्वीर दिखाता । उत्तर और पश्चिम टोले वाले मजदूरों की तलाश में आते तो कुंवे के चबूतरे पर बैठ, हांक लगाते । प्रधानी चुनाव के समय वीरेन्द्र प्रताप सिंह दखिन टोले में पधारते तो कंुवें के चबूतरे पर बैठ, पूरे टोले का जायजा लेते ।
मदारी आते तो अमीन मियां के दोस्त दिलग्गी करते । कहतेे, ‘ऐ अमीन भाई ! भौजाई से कहिए, मायके से भाई आये हैं, पानी लेकर आएं । पियासे हैं ।’
‘ठीक से चिह्निए । हमें तो लग रहा है कि आप के मामा आये हैं ।’ अमीन मियां अपने होंठों और दांतों की चमक ऐसे दिखाते, जैसे सीप के अधखुले मंुह से मोती चमक रही हों । माहौल में ताजगी तमतमाती तो अमीन मियां लुंगी और बनियान में कुएं की जगत पर बैठे, गंवई हंसी-मजाक की तासीर बढ़ाते ।
कंुए पर सुत्ता पड़ने तक चहल-पहल रहती । दिन-रात ढेंकुल चलती । बरतन, कपड़े और हाथ-पैर धोने का काम, वहीं होता।
अमीन मियंा और अमीन-बो के प्यार के किस्से, हर जवान मरद-मेहरारू की जुबान पर थे । वे टोले के लैला-मंजनू थे । यह देख गांव के बच्चों ने बारी-बगीचे में खेलने वाला नाटक बना लिया था, ‘मियां अमीन लगाते हैं पान, कहते हैं बीवी से
इधर आओ जान ! कहो डिग डिग है ।’ अमीन मियां सुनते तो मुस्कुराते हुए कहते, ‘कौन हरामी इ नाटक बनाया है रे !’
गांव में मरद-मेहरारू में रूठने-मनाने का रंग-ढंग भी तमाशा होता है । अमीन मियां-बो रूठतीं तो मायके की राह पकड़तीं । खेतों के बीच दौड़ते अमीन मियां सीवान तक मनाने जाते । भौजाई आगे-आगे और अमीन मियां पीछे-पीछे । पूरा टोला तमाशा देखता । महिलाएं एक-दूजे को देख हंसती और लड़कों के चुहलपन पर डांटतीं-‘ तू लोग का तमाशा बनाये हो ? मरद-मेहरारू में रीस-खीस ना देखे हो का ?’ उधर अमीन मियां, गन्ना खेत की आड़ में बीवी से कहते -‘अरे एक पास रहा जाता है तो रीस-खीस हो ही जाती है । चलिए ! मान जाइए । कहिए तो गोड़ पकड़ लूं ।’ अमीन मियां-बो यह सुन नखड़ा निखार लेतीं । कहतीं, ‘लाठी के मार भुला जाला पर बात के ना’, और अमीन मियां मनाने के वास्ते अंकवार में बीवी को पकड़ लेते।
एक दिन की बात है, शाम का वक्त था । चरवाहे, घसिहारिन, मजदूर और किसान सरेह से टोले की ओर लौट रहे थे । तभी अमीन मियां-बो किसी बात पर रूठ, मायके निकल पड़ीं । आगे-आगे अमीन मियां-बो, पीछे-पीछे अमीन मियां । सरेह की सीमा आई तो अमीन मियां चिरौरी करने लगे । गन्ने की आड़ में पांव पकड़ने को झुके ही थे कि स्कूल से लौटते लड़कों की टोली ने देख लिया । बस क्या था, वहीं से हा…. हा,… ही…. ही का दौर शुरु हो गया । गांव में अमीन मियां के पहुंचने के पहले ही लड़कों ने आंखों देखी खबर का दिलचस्प विस्तार कर दिया था ।
‘का हो भौजी ! काहें भाई से खिसिया कर भागने लगती हैं ।’ इन्द्रजीत पूछे थे।
‘अरे भाई की आत्मा भौजाई में बसती है। भौजाई मायके जायेंगी तो भाई तुलसी दास की तरह ससुराल पहुंच जायेंगे ।’ नथुनी यादव सुनाये थे । ‘पांव तो भौजाई ने पूजवा ही लिया, अब रसिआव और बेरहिन बना कर खिलायेंगी । समझ लीजिए कि मायके से लौटकर आईं हैं । …का भाई ! इसी बात पर भौजी को पान खिलाइए तो ! कर दीजिए हांेठ लाल ।’ इन्द्रजीत की बात सुन अमीन मियां मुस्कुराते, लजाते दूर खिसक गये थे । अमीन मियां-बो गुस्सा थूक, मुस्कुरातीं हुई बोली थीं ‘जाने दीजिए आप लोग ? केतना चिढ़ाइयेगा ?’ फिर मरद से मुखातिब हो, जोष भरी थीं -‘आप के मुंह में दही जमी है का ? काहें ना सुना देते हैं दू-चार बात ?’ अमीन मियां मेहरारू की सलाह और खीझ सुन, मुस्कुरा दिए थे । कई बार उकसाने पर बोले थे-‘जाने दीजिए ! ए लोग के एही में मजा आ रहा है त मजा लेने दीजिए ? कुक्कूर भौंकते रहते हैं, हाथी रास्ता पकड़ कर चला जाता है ।’
अमीन मियंा मस्त रहते । वह जानते थे कि टोले की ठसक और उदासी, उन्हीं के सहारे टूटती है । टोले में मीलाद हो या सत्यनारायण व्रत कथा, सभी को बुलावा जाता । तब मोबाइल, लैपटाप या टीवी बिना भी लोग एक-दूजे से हर पल जुड़े थे। मनमुटाव के बावजूद, आफत-बिपत में संग रहते । कीर्तन और जारी गायन में हिन्दू-मुसलमान शामिल होते । मुहर्रम में मिलकर ताजिया बनाते । नथुनी, इन्द्रजीत, सत्तन और सरजू सबसे बढ़िया जारी गाते और कर्बला में लाठी भांजते ।
जब टोले में मीलाद होती और मौलवी साहब ‘मरहबा, मरहबा, रसूलल्ला….’ पढ़ते, तब पीछे बैठे बच्चे अमीन मियां की चप्पल, जो दरी के किनारे निकाल दी गई होती, उठा कर किसी छान-छप्पर पर रख आते । मीलाद खत्म होते ही अमीन मियां चप्पल तलाश करते और बच्चों को गरियाते । शरारती बच्चे दूर खिसक कर ही.. ही …खी…खी…..करते ।
जब अमीन मियां बच्चों को गरियाते तो हाकिम मियां घुड़कते, ‘का बच्चों को गरिआते हो अमीन ? लड़िका-फड़िका बदमाशी ना करेंगे तो कौन करेगा ? तुम छोटपन में कम शैतान थे ?’
होली के दिन सुबह-सुबह इन्द्रजीत घसीट कर अमीन मियां को कीचड़ में लपेट देते । दोपहर बाद नथुनी की हुड़दंगी टोली उन्हें अबीर से ऐसे रंग डालती कि पहचान में न आते । सामने बैठे हदीश मियां और रंगने का इशारा करते । झूठ-मूठ में हुड़दंगियों को कहते, ‘बचा के भाई, बचा के । अमीन को ज्यादा दिक मत करिये, सुकुवार मनई हैं ।’ हाकिम मियां नीम पेड़ के नीचे चारपाई पर लेटे-लेटे, तमाशा देखते । बोलते कुछ नहीं । हुड़दंगी, बूढ़े हाकिम मियां को तंग नहीं करते । अमीन मियां सब कुछ का मजा लेते पर उन्हें फूहड़ फगुआ पसंद न था । कभी-कभार किसी उदंड लड़के के मुंह से फूहड़ फगुआ सुनते तो घर के अंदर चले जाते । ‘मउगा गए का अमीन मियां’ हदीश चाचा पर होली का रंग चढ़ जाता । ‘अरे खींच लाओ भाई ! न माने तो भउजाई को भी लाओ ।’ नथुनी ललकारते । अमीन मियां बाहर निकल, होली हुड़दंग टीम का हिस्सा बन जाने में भलाई समझते ।

वक्त गुजरता रहा । अमीन मियां के दोनों बेटे रोजगार की तलाश में कुवैत जा पहुंचे थे ।

वक्त के साथ बकार तो बदलती ही, संबंधों की बयार भी बदलती गई । परधानी चुनाव में हमेशा उत्तर टोले का बोलबाला रहता । बाबू वीरेन्द्र प्रताप सिंह के दरवाजे पर परधानी घिकुरी मारे बैठे रहती । जब आरक्षण लागू हुआ तो उनके नौकर-चाकर आगे आये । कोशिश यही रही कि परधानी बाबू के चंगुल से बाहर न जाने पाये । पर ऐसा नहीं हुआ । पिछली बार परंपरा टूट गई । पिछड़े वर्ग के लिए सीट आरक्षित हुई तो अमीन मियां ने बाजी मार ली । अभिमन्यु और प्रभुनाथ तिवारी ने अपने-अपने आदमी खड़ा किए । लड़ाई त्रिकोणीय हो गई । दखिन टोले के बूते अमीन मियां भारी पड़ गये । पहली बार वीरेन्द्र प्रताप सिंह की निगाहों में ठीक से चढ़े थे अमीन मियां । वह घूम-घूम सुनाते, ‘जोलहा-जोलहटी के गांड़ में दम है कि परधानी करेंगे ? मानेगा कोई उनकी बात ? मलिकई करने के लिए मलिकार होता है ।’

उत्तर टोले में एक और घटना घटी । बाबू वीरेन्द्र प्रताप सिंह के दरवाजे पर ‘हिन्दू युवा दल’ का कार्यालय खुला । अध्यक्ष बने पश्चिम टोले के प्रभुनाथ तिवारी के सुपुत्र मुन्ना तिवारी । उसके बाद परसौनी गांव सहित, जर-जवार की हवा-बतास बदल गई । जगह-जगह भगवा झंडे लहराने लगे । भगवा झंडे लगे तो हरे झंडे भी दिखाई देने लगे । परसौनी गांव से दो किलोमीटर दूर, पीपराकनक गांव था । वह मुसलमानों का गांव था । उस गांव में रहने वाले ज्यादातर शेख, पठान और सैय्यदों के लड़के अरब देशों में काम करते थे । अरब देशों से मिलने वाली मजदूरी से पिपराकनक संपन्न गांव था । वहां की मस्जिद, पूरे इलाके में भव्य और विशाल थी । मुन्ना तिवारी, पिपराकनक को मिनी पाकिस्तान कहा करते ।
हिन्दू युवा दल ने पहला काम यह किया कि शिव मंदिर पर लाउडस्पीकर लगा दिया। लाउडस्पीकर का मुंह पीपराकनक की ओर था । सुबह होते ही हनुमान चालीसा, भजन और प्रवचन के कैसेट बजने लगते । शिव मंदिर की गूंज हवा में पसरते ही आसपास के मस्जिदों पर भी कैसेट बजने लगे । पीपराकनक मस्जिद का लाउडस्पीकर सबसे तेज बजता । सुबह की चिड़ियों की चहचहाहट को आसपास के लाउडस्पीकरों ने दबा दिया था ।
एक दिन उत्तर टोले की सामान्य घटना ने इलाके का मिजाज बदल दिया । हुआ यह कि वीरेन्द्र प्रताप सिंह के पड़ोसी, अभिमन्यु बाबू की बाल्टी कुएं में गिर गई । वह बाल्टी जानवरों को पानी पिलाने के काम आती थी । बाल्टी गिरी तो उसको निकालने के लिए अमीन मियां का कांटा मंगवाया गया । बाद में चर्चा उठी की मुसलमान के कांटे से बाल्टी निकाली गई है । मुसलमान के कांटे से निकली बाल्टी अपवित्र घोषित कर दी गई । यह बात तेजी से फैली । मुन्ना तिवारी ने बाल्टी शुद्धीकरण का कार्यक्रम बना डाला । हिन्दू युवा दल कार्यालय के सामने बाल्टी को मूंज घास में आग लगा कर झोंकारा गया । वीरेन्द्र प्रताप सिंह के नौकर का कहना था, ‘अजबे संयोग है, सुबह ही बाबू साहब ने गोठउल से एक बोझा मंूज निकाल कर बरामदे के पास रखवाया था ।’ अभिमन्यु बाबू की नौकरानी ने बताया, ‘बाबू साहब के यहां तो नल से पानी भरा जाता है । पता नहीं काहें बाबू साहब कुएं से पानी भरने चले गये ।’
इस संयोग और दुर्योग के बहाने प्रभुनाथ तिवारी ने पूरे गांव के हिन्दुओं के बरतन शुद्धीकरण के लिए यज्ञ का आवाहन कर दिया । उनके अनुसार, ‘सबसे ज्यादा तो दखिन टोले के हिन्दुओें के बरतन नसाएं हैं । वे धर्मभ्रष्ट हो चुके हैं । दूसरे गांव के जाति बिरादरी वाले रिश्ता भी नहीं करेंगे ।’ यह सुन दखिन टोले के हिन्दुओं के माथे की लकीरें गहरी हो गईं ।
मुन्ना तिवारी ने दखिन टोले के हिन्दू युवाकों को रास्ता सुझाया। कहा, ‘परेशान होने की जरूरत नहीं । सभी के बरतन होलिका दहन में झोंकार कर शुद्ध कर दिये जायेंगे।’
दखिन टोले में न मंदिर था न मस्जिद । पिपराकनक वाले कई बार कोशिश कर चुके थे मगर अमीन मियां ने रुचि न दिखाई थी ।
‘मंदिर न होनेे के कारण ही दखिन टोले पर आफत-बिपत आती रहती है । ऊपर से मुसलमान परधान, कब्रगाह की जमीन तो नपवा कर बढ़वा लिया पर मंदिर के बारे में नहीं सोचा ।’ मुन्ना तिवारी ने दखिन टोले के हिन्दुओं को समझाना शुरू किया ।
‘अहीरों का शासन है । अबो परधान न बनोगे तो कब ? जिनगी भर मियां लोग की आंड़ी सुहराओगे ?’ वीरेन्द्र प्रताप सिंह ने नथुनी यादव के कान में बात डाल दी । ‘लाखों की कमाई है । तुम चाहो तो अगला परधान तुमको बनवा दूं । चाहें सीट जनरल रहे, चाहे रिजर्व ।’ वीरेन्द्र प्रताप सिंह ने समझाते हुए नथुनी के पीठ पर हाथ रख दिया था ।
दखिन टोले के कुएं के पास जहां चबूतरा था, जहां मदारी मजमा लगाते थे और जहां अमीन मियां पर छींटाकसी की तासीर टोले को जीवंतता प्रदान करती, वहीं मंदिर की नींव रख दी गई । अस्थाई तौर पर चबूतरे पर शिव लिंग के रूप मे एक पत्थर रख कर केसरिया झंडा फहरा दिया गया । मुन्ना तिवारी ने मत्रोंच्चार द्वारा लिंग स्थापना का कार्य पूर्ण कराया । शिव मंदिर निर्माण कमेटी के अध्यक्ष इन्द्रजीत बनाये गये । चंदा वसूलने की जिम्मेदारी स्वयं मुन्ना तिवारी के पास थी ।
शिवलिंग स्थापना के सप्ताह भर बाद ही होलिका दहन की तिथि थी । इस बार दखिन टोले की होलिका दहन का स्वरूप बदल गया । मुसलमान लड़कों की चुहल दिखाई नहीं दी । उन्हें बुलाया ही नहीं गया । लकड़ी चुराने या पंचगोईठी मांगने का काम हिन्दू लड़कों के जिम्मे था । होलिका में आग लगाने के बाद दखिन टोले के बरतनों का शुद्धिकरण किया जाना था । युवा पीढ़ी इस काम में उत्साह से लगी हुई थी । सबके माथे पर ‘होलिका दहन समिति’ की केसरिया पट्टी बंधी हुई थी । नथुनी यादव दौड़-दौड़ कर खर जुटा रहे थे । इन्द्रजीत, घर-घर से बरतन बटोरने में व्यस्त थे । सत्तन, सरजू ने विचार रखा, ‘चमारों के बरतन नहीं झोंकारे जाने चाहिए । ऊ तो अछूत हैं ।’ सभी को सत्तन और सरजू की बात पसंद आई ।
बरतन शुद्धीकरण के समय मुन्न तिवारी तेज-तेज श्लोक पढ़ रहे थे । बार-बार मुट्ठी में रखे सरसों के दानों को बरतनों पर फेंक रहे थे । अभिमन्यु बाबू हाथ में जलती लुकारी थामें, बरतनों को तपा रहे थे ।

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फोटो google से साभार

चांद पूरे शबाब पर था पर गांव में अंधेरा ही अंधेरा दिख रहा था । अमीन मियां नीम गाछ के नीचे भकुवाये बैठे, आसमान ताक रहे थे । तारों का कहीं अता-पता नहीं था । कुत्तों के भौंकने की आवाज नहीं आ रही थी वरना तो हर साल, होलिका दहन के लिए लकड़ी और खर-पतवार जुटाने वाली टोली को देख, कुत्ते भौंकते हुए दौड़ लगाते रहते।
अमीन मियां को उम्मीद थी कि नथुनी और इन्द्रजीत बुलाने आयेंगे । उन्हें पकड़ कर ले जायेंगे । उनके बिना कभी होलिका जली है क्या ? फिर वह सोचने लगे, ‘कोई बुलाये या न बुलाये, उन्हें तो जाना ही चाहिए । गांव के परधान हैं । इस नाते भी गांव की हर खुशी में उन्हें रहना चाहिए ।’ यही सोच सड़क पर निकल पड़े । पूर्णमासी की चांदनी रात में भी गांव भूतहा नजर आ रहा था। एकाएक उनके बढ़ते पांव ठहर गये । सोचने लगे, जब उनके कांटे से हिन्दुओं के बरतन अपवित्र हो गये तो उनके जाने से ? नहीं, उन्हें कहीं नहीं जाना चाहिए । चुपचाप अपने घर रहना चाहिए । अमीन मियां के शरीर में सिहरन सी हुई । उन्हें बदलते और बुढ़ाते समय का भान हुआ । वह तत्काल लौट आये और चारपाई पर पसर गये ।
अमीन मियां-बो शाम से बाहर नहीं निकलीं थीं । रात का खाना भी नहीं बनायीं थीं । ससुर और मरद के लिए डलिया में चिउड़ा निकाल कर रख दिया था और जमीन पर बिछी चटाई पर पड़ी कराह रही थीं । शरीर तप रहा था । आंखें भारी और होंठ सूख कर सख्त हो चुके थे ।
बीवी के कराहने की आवाज सुन, अमीन मियां अंदर आये । बुखार से तपते शरीर पर हाथ रखते ही दिल धड़कने लगा । ढिबरी की रोशनी में पत्नी का मलिन चेहरा देख मन मुरझा गया । ‘का हो ! का हो गया ? सब आफत आज ही आनी थी ।’ माथे पर हाथ फेरते अमीन मियां बीवी की ओर एकटक निहार रहे थे । अमीन मियां-बो पहले कुछ बोलीं नहीं । फिर एकाएक चिल्लाने लगीं, ‘छोड़ दीं ..छोड़ दीं । माहुर दीं…माहुर दीं ….।’
अमीन मियां घबड़ा गए थे । मेहरारू को क्या हो गया ? किसको बुलाएं ? किसे दिखाएं ? मुसलमानों के घरों में सन्नाटा था । हिन्दू, होलिका दहन में गये थे । उन्हें लगा, वह टोले में अकेले हैं । उन्हें संभालने वाला कोई नहीं । भाग कर अब्बा के पास गये । हाकिम मियां सुने तो चारपाई पर उठ बैठे और पीर बाबा को गोहराने लगे ।
चिउड़ा धरा का धरा रह गया । किसी ने अन्न-जल ग्रहण नहीं किया । अमीन मियां-बो रह-रहकर अक-बक बोल रही थीं । कभी उठ बैठतीं । झोंटा खोल, सिर हिला कर गातीं, ‘दइया रे दइया । दइया रे दइया ….।’ अमीन मियां अंकवार में पकड़ कर समझाते, संभालते , कभी साड़ी को माथे पर ओढ़ाते ।
रात सन्नाटे को ओढ़े बेहोश सो रही थी । कुएं के मेढ़कों ने दम साध लिया था । कहीं से कोई आवाज नहीं । सिर्फ अमीन मियां-बो की आवाज सुनाई दे रही थी ।
अमीन मियां-बो के रोने की आवाज सुन हदीश चाचा गोजी ठेकते आ गयेे थे । ‘का हो अमीन ! तोहार मलिकाइन की तबियत खराब है का ?’ पूछते-पूछते खांसने लगे थे हदीश चाचा ।
‘ हां चाचा ! देखिये न, एकदमे का हाल हो गया इनका ? शाम को ठीक थीं । ……..जी बहुत घबरा रहा है चाचा ?’
‘घबरा मत अमीन ! सब ठीक हो जायेगा । चुड़ैल पकड़ी है । जंगल की चुड़ैल । आजकल जंगल में चुड़ैल और भूत बढ़ गये हैं । होलिका से तनिक आग उठा लाता हूं । होलिका की आग देख, चुड़ैल भाग जायेगी । तू परेशान मत हो ?’ हदीश चाचा की आवाज कांपने लगी थी । वह होलिका की ओर जानेे को उठ खड़े हुए थे।
‘ना चाचा ना ! होलिका की ओर मत जाइयेगा ।’
‘काहें ?’
‘आप भी तो मुसलमान हैं ? होलिका अपवित्र हो गई तो ?’ अमीन मियां ने चाचा का हाथ पकड़ लिया था । हदीश चाचा, अमीन का मुंह ताकने लगे थे । अमीन के अंदर की आंच महसूस कर सहम गये थे ।
‘तब रुको ! रामरती ओझा को बुला लाता हूं । सब चुड़ैल-उड़ैल भगा देंगे रामरती ।’ गोजी को मुट्ठी में दाबे उठ गये थे हदीश चाचा।
‘आयेंगे रामरती काका ?’ अमीन के होंठो पर कृ़ित्रम हंसी सी दिखाई दी ।
‘काहें ना आयेंगे ?’ चाचा की आवाज सख्त हो गई थी ।
‘अरे हम मुसलमान हैं न ! गांव की हवा-बयार देख रहे हैं न! कहीं मत जाइये चाचा । सुबह का इन्तजार कीजिए । सुबह होगी तो पीपराकनक के मजार पर ले जाऊंगा । अब वहीं का आसरा है चाचा !’ अमीन मियां ने जिद की ।
‘अरे बउरा गये हो का ? मौलवियों के चक्कर में पड़ोगे ? मेहरारू से ज्यादा तू अक-बक बोल रहे हो ? कौन नहीं आयेगा ? इ कवनो बाबू लोग का टोला है ? आपन टोला है । तू गांव के परधान हो ?’ हदीश चाचा खड़े-खड़े खांसते हुए कांपने लगे थे । एक खैाफ उनके अंदर भी रेंगने लगा था । वह बैठ गये थे ।
‘ कैसा परधान चाचा ? ……. कहीं मत जाइये ।’ अमीन मियां ने फिर चाचा का हाथ पकड़ लिया था ।
हदीश चाचा नहीं गये थे । कुछ देर अमीन के पास बैठे रहे । आंख झपकने लगी तो उठ गये । ‘सुबह आऊंगा ।’ कहते हुए घर की ओर चले गये थे । हदीश चाचा के जाने के बाद अमीन मियां कुछ सोच कर उठे । लालटेन जला कर ढिबरी बुझा दी । अंदर का कुछ भय, बाहर निकल आया । लालटेन की रोशनी का उजाला हुआ तो बीवी का चेहरा साफ-साफ दिखने लगा । ललिआया और पसीने से तरबतर चेहरा । वह फिर एक हाथ से सिर सहलाने लगे थे ।
कब बिहान हुई, पता नहीं । मेहरारू की आंख लग गई थी । नीम गाछ पर कौवों और मैनों के झुंड देख मन कुछ हल्का हुआ । वह उठे और शौच के लिए पीपराकनक की ओर निकल गये थे ।
होली के दो माह बाद मुहर्रम करीब आया तो दखिन टोले की दीवारों पर नारा लिखा दिखा-‘जो हासन-हुसैन को गायेगा, वह हिन्दू नहीं रह पायेगा।’ नारा किसने लिखा, दखिन टोले को पता न था । बरतन शुद्धिकरण के बाद दखिन टोले के हिन्दू-मुसलमानों में जो दरार बनी थी, खेती-किसानी में रमते ही बिला गई थी । पर दीवारों पर लिखे नारों से दखिन टोले की धड़कन एक बार फिर बढ़ गई थी । उस दिन टोले वाले सहमे हुए खेत-बारी की ओर निकले थे । छोटे बच्चे दीवारों पर लिखी इबारतों को पढ़ते, एक दूजे से पूछते, ‘इसका का मतलब है ?’
इसके बाद इलाके में कई बवंडर उठे । एक बवंडर पिपराकनक से उठा। पिपराकनक के मौलवी ने जुमे की नमाज के बाद ऐलान किया है, ‘कोई भी मुसलमान कीर्तन टोली में नहीं जायेगा । कथा-प्रवचन और जागरण से दूर रहेगा । गाना-बजाना इस्लाम में हराम है ।’
दखिन टोले की इनार की बैठकी उकठ गई थी । वहां जल चढ़ाने कुछ महिलाएं जरूर आतीं मगर पहले की तरह उन्मुक्त बटोर और हंसी का सिलसिला बिला गया ।
अमीन मियां तेजी से बुढ़ा गये थे । वह अक्सर ठकुआये, ठूंठ नीम गाछ के नीचे बैठे रहते । वहां न हवा-बतास बहती, न नीम की टहनियां धूप से रक्षा करतीं । ठूंठ नीम पर कभी कभार एकाध चिड़िया जरूर आती मगर एक खटके के खटकते ही उड़ जाती ।
अमीन मियां-बो बीमारी के बाद बिस्तर से उठ नहीं पाईं । शरीर पीला होता गया । भूख मरती गई । बड़ी मुश्किल से एक-दो कौर खातीं । बहू की हालत देख हाकिम मियां हदस गये थे और एक दिन उनका इंतकाल हो गया । उनके जनाजे में पूरा गांव आया था । इन्द्रजीत और नथुनी भी आये थे मगर अमीन मियां से बातचीत नहीं हुई थी । हाकिम मियां के जाने के कुछ ही दिनों बाद, गांव भर की भौजाई भी चल बसीं । बेटे कुबैत में थे और अमीन मियां इस दुख को झेलने के लिए अकेले पड़ गये थे । ढाढ़स बंधाने पूरा टोला आया था । इन्द्रजीत, नथुनी, सत्तन, सरजू और हदीश चाचा भी थे पर अमीन मियां नीम गाछ के नीचे ठकुआये दम साधे मौन थे ।
अमीन मियां ने बीवी के कब्र में कांटे को दफना दिया था । उनका कहना था, ‘मरते समय मेहरारू ने कहा था कि जो बीखो आप मेरे लिए कलकत्ता से लाये थे, उसे मैं अपने साथ ले जाना चाहती हूं ।’
अम्मी की मौत सुन परदेश से शादाब और सलीम गांव आये । महीने भर रहे और अब्बा के समझाने पर वापस लौट गये थे। अमीन मियां अकेले रह गये थे, बीवी बिन, भुतहे मकान में । वह घर पर कम रहते । इधर-उधर पगलाये घूमते रहते । कभी घाघी किनारे तो कभी पाठशाला की भीट पर निर्गुन की पंक्तियांें का विलाप करते-‘पिया मतलबवा के इयार, पीरितिया ले के भगले रे सखिया ।’ एक दिन तो केवड़े के बाग में, जिसमें सांप,गोजरों का बास था, घंटो बैठ, इसी गीत को गाते रहे थे ।
उत्तर टोले वाले कहते, ‘अमीन मियां सनक गये हैं । परधानी का काम उप परधान को मिलना चाहिए ?’

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    By: सुभाष चन्द्र कुशवाहा

    जन्म- उत्तर प्रदेश के कुशीनगर में 1961 में,
    कविता-संग्रह ‘आशा’, ‘कैद में है जिंदगी’ और ‘गाँव हुए बेगाने अब’ और तीन कहानी-संग्रह ‘हाकिम सराय का आखिरी आदमी’, ‘बूचड़खाना’ और ‘होशियारी खटक रही है’ प्रकाशित हुए हैं। इसके अलावा उन्होंने ‘कथा में गाँव’ (कहानी-संग्रह), ‘जातिदंश की कहानियाँ’, ‘लोकरंग’ (1 और 2) आदि पुस्तकें संपादित की हैं।
    ‘लाला हरपाल के जूते’ कहानी संग्रह हाल ही में बैस्ट सेलर में शामिल हुआ है |
    1998 से ‘लोकरंग’ पत्रिका का संपादन कर रहे हैं।
    संपर्क – बी 4/140 विशालखंड
    गोमतीनगर,लखनऊ 226010
    mail- [email protected]

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