‘अली मंजिल’ अवधेश प्रीत की हमरंग पर प्रकाशित होने वाली दूसरी और बहु चर्चित कहानी है|  कहानी अली मंजिल बिना किसी शोर के बिना किसी प्रत्यक्ष मानवीय त्रासद घटना के एक दम मौन रूप में भी न केवल मानवीय संवेदनाओं को झकझोरती है बल्कि इंसानी वजूद की परतों को उस हद तक खोलने में सफल होती है जहाँ सदियों पहले गायब हुई इंसानी पूंछ एक विकृत और संकीर्ण बीमारी के रूप में अभी भी इंसान के अन्दर दिखाई देती है | हालांकि इस कहानी पर विश्वनाथ त्रिपाठी का एक वृहद् आलेख हम यहाँ पूर्व में प्रकाशित कर चुके हैं | 

आज अवधेश प्रीत का जन्मदिन भी है और यहाँ प्रका

मरना कोई हार नहीं होती: संस्मरण (हरिशंकर परसाई) -: परसाई द्वारा मुक्तिबोध पर लिखा गया संस्मरण :-

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शित उनकी यह कहानी हमरंग परिवार की ओर से उन्हें जन्मदिन की बधाई के रूप में है |  – संपादक 

  अली मंजिल 

 

‘अली मंजिल’ के आखिरी वारिस जनाब मंजूर अली की उम्र सत्तर पार

पहुंच चुकी थी। सिर-दाढ़ी के बाल सन जैसे सफेद हो चुके थे। आंखों पर पावर के चश्मे के बावजूद रोशनी धुंधली पड़ चुकी थी। दूर की चीजों को पहचानना निहायत मुश्किल काम था उनके लिए। अलबत्ता नजदीक की चीजें वह फौरन पहचान लेते थे। हाथ भी कांपने लगे थे। चलते तो छड़ी तक थरथराती थी। ज्यादातर बाहरी बरामदे में बैठे-बैठे लोगों को आते-जाते देखते रहते। लोग राम-सलाम करते तो वह आवाज पहचानकर राम-सलाम करने वाले का नाम लेकर हाल-चाल पूछते। ढेरों दुआएं देते और तस्बीह के दाने फेरते हुए अल्लाह की रहमत लेने की नसीहत देते। लोग उनके अकेलेपन पर मन-ही-मन अफसोस करते हुए खैरियत पूछते, ‘‘कैसे हैं बड़े मियां?’’
जनाब मंजूर अली आंखें मिचमिचाते सामने वाले को भरपूर निगाह से देखने की कोशिश करते, फिर दोनों हाथ हवा में उठाकर कहते, ‘‘हमारी क्या पूछते हो मियां… हम तो पके हुए आम हैं… किसी भी दिन खुदा का बुलावा आ सकता है…।’’
बात पूरी होते न होते जनाब मंजूर अली की सांसें फूलने लगतीं। सीने में जमा कफ घर्र-घर्र बज उठता… रमजान मियां दौड़कर आते और उनकी पीठ मलने लगते। धीरे-धीरे सांसें सामान्य होतीं और वह गीली हो आर्इं आंखों को पोंछते हुए रमजान मियां को टोकते, ‘‘मियां, अभी तक चाय नहीं मिली।’’

अवधेश प्रीत

अवधेश प्रीत

रमजान मियां सिर झुकाए चुपचाप अंदर चले जाते और लौटते तो चाय से भरा गिलास उनके हाथ में होता। जनाब मंजूर अली रमजान मियां की खामोशी का मतलब समझ जाते। चाय की एकाध घूंट सुड़कने के बाद रमजान मियां को झिड़की देते, ‘‘मियां, अब बहन-बहनोई ने इतने प्यार से बुलाया है तो न कैसे कर दूं…? उसका भरा-पूरा कुनबा है। सभी चाहते हैं मुझे। फिर रजिया मुझसे छोटी है… मुझे बाप की तरह मानती है।’’
रजिया का जिक्र आते ही अक्सर जनाब मंजूर अली छोटी बहन की याद में गोते लगाने लग जाते हैं। उनकी आंखों के सामने गुडि़या-सी प्यारी रजिया की शक्ल उभर आती है।. अब्बा की मौत के बाद उन्होंने रजिया को बाप-सा प्यार दिया। उसकी शादी के लिए एक से एक लड़के देखे, कोई पसंद नहीं आया… अम्मा झुंझालते हुए कहतीं, ‘मंजूर, लड़का नहीं, शाहजादा ढूंढ़ रहा है, शाहजादा…।’ सचमुच, रजिया के लिए शाहजादा ही ढूंढा था उन्होंने। गोरे-चिट्टे, लंबे-तगड़े खुरशीद मियां कराची के नवाब अमजद अली के लख्ते-जिगर थे… रिश्ता तय पाया गया था। और जनाब मंजूर अली ने इस धूम-धाम से बहन की शादी की थी, कि लोग वर्षों तक याद करते रहे थे।
आज भी यादों के रेले में डूबते-उतराते मंजूर अली को अचानक कुछ याद आया, ‘‘रमजान मियां, आज कितनी तारीख है?’’
‘‘तेरह!’’ रमजान मियां ने जैसे एक-दिन दिन जोड़ रखा हो।
‘‘मतलब यह कि अगले जुम्मे तक खुरशीद मियां तशरीफ ले आवेंगे।’’ जनाब मंजूर अली अनुमान लगाकर हुलस पड़े।
‘‘हां…!’’ मरी हुई-सी आवाज में रमजान मियां ने हामी भरी।
और जिस दिन खुरशीद मियां और रजिया पाकिस्तान से यहां आए रमजान मियां ने उनकी खातिर-तवज्जो में जी-जान लगा दी। जनाब मंजूर अली भी बहन-बहनोई के आने से बेहद खुश थे। लेकिन यह खुशी तब टीस में बदल गई, जब खुरशीद मियां ने उन्हें समझाते हुए कहा, ‘‘भाई जान, आपकी उम्र काफी हो गई है… तबीयत भी ठीक नहीं रहती… ऐसे में आपका यहां अकेले रहना ठीक नहीं है… वहां उतनी दूर से यहां हिन्दुस्तान बार-बार आना मुमकिन नहीं है… बेहतर यही होगा कि यह मकान-जायदाद बेचकर आप मुस्तकिल तौर पर वहीं हमारे पास रहें… रजिया की मंशा भी यही है…।’’
भीतर तक हिल गए थे जनाब मंजूर अली। वक्तन-जरूरतन वह पाकिस्तान जाते रहे हैं। लेकिन मकान-जायदाद बेचकर मुस्तकिल तौर पर जाने का तो कभी सोचा ही नहीं। अब, जबकि खुरशीद मियां ने यह बात जोर देकर और पूरी संजीदगी से कही,तो वह एकबारगी देर तक सन्नाटे में डूबे रहे। बाद में एक-दो हमउम्र दोस्तों ने भी उन्हें सलाह दी कि अपने पीछे जायदाद छोड़कर कहीं जाने का जमाना नहीं है… जाना हो तो बेचकर ही जाइए… हाथ में पैसे रहेंगे तो बहन-बहनोई पर बोझ भी नहीं रहिएगा। आखिरकार ,बात जंची । भीगे मन से उन्होंने अपने दोस्तो-पहचान वालों सेे ही कोई खरीददार तलाशने की ताकीद की।
खदीददार तलाशने में ज्यादा दिक्कत नहीं हुई। जनाब मंजूर अली के मरहूम दोस्त राम प्रसाद के बेटे दयाल बाबू खबर पाते ही आ धमके। दयाल बाबू जनाब मंजूर अली की बाप की तरह ही इज्जत करते थे। एक नेक बंदे को मकान बेचने की जनाब मंजूर अली की भी मंशा पूरी हुई। बगैर-हुज्जत के सौदा पक्का हो गया। उन्होंने सारे कागजात पर दस्तखत करते हुए दयाल बाबू से गुजारिश की, ‘‘मियां, दो-चार दिन और रहूंगा इस मकान में…।’’
दयाल बाबू ने भाव-विह्वल हो उनकी बात काट दी, ‘‘चचा, ऐसा क्यों बोलते हैंं…? जब तक इच्छा हो रहिए… मुझे कोई जल्दी नहीं है।’’
रुखसती के दिन, जिस वक्त जनाब मंजूर अली ने दयाल बाबू को ‘अली मंजिल’ की चाभी सौंपी, उनका कांपता हुआ हाथ बुरी तरह थरथरा रहा था। आंखें पनीली हो आई थीं। दयाल बाबू ने अपनी दोनों हथेलियों में जनाब मंजूर अली के झुर्रीदार हाथ को लेकर भींचा, और उनका हाथ अपनी पीठ पर खींचकर आशीर्वाद लिया। फिर उन्हें सड़क तक विदा करने आए। खुरशीद मियां और रजिया के साथ उन्हें जाते हुए बड़ी दूर तक देखते रहे। मकान की चाभी उनकी हथेली में भिंची रह गई थी। गोया जनाब मंजूर अली का कांपता वजूद हथेली में शेष रह गया हो।’’
अगले दिन सुबह-सुबह ही दयाल बाबू पत्नी बच्चों को मकान दिखाने के लिए ले आए। मुख्य सड़क से बार्इं ओर घूमी गली में घुसते ही दयाल बाबू उत्तेजना से भर गए। वर्षों की साध पूरी हुई थी। इतने बड़े शहर की घनी बस्ती में अपना मकान होने की खुशी छलकी पड़ रही थी, ‘‘सब भाग्य की बात है?’’ दयाल बाबू ने पत्नी को समझाया, ‘‘मकान गली में जरूर है, लेकिन सस्ता कितना पड़ा है?’’
पत्नी ने आशंका जताई, ‘‘सुना है, बहुत कंजस्टेड इलाका है।’’
ठठाकर हंस पड़े दयाल बाबू। उनकी हंसी में एक पूरा मकान भी शामिल था। उन्होंने पत्नी को मीठी-सी झिड़की दी, ‘‘भई, पुराना मुहल्ला है, कंजस्टेड तो होगा ही।’’
बड़े बेटे शिवेश ने नाक सिकोड़ी, ‘‘लेकिन पापा, बड़ी गंदगी रहती है इस इलाके में।’’
छोटे बेटे ब्रजेश ने तो जैसे खाका ही खींच दिया, ‘‘मुर्गा-मुर्गी… बकरा-बकरी… बजबजाती नालियां… किनारों पर बिखरा पाखाना… टाट के पर्दे…।’’
‘‘लेकिन तुम्हारी उस कॉलोनी से बेहतर… वहां किसी को किसी से कोई मतलब नहीं। मुहल्लों में लोगों में मुहब्बत होती है।’’ झेंपने के बावजूद अनुभवजन्य दलील दी दयाल बाबू ने।
गली में घुसते ही जो नजारा दिखा, उसे देखते ही दोनों बेटों की आंखें मिलीं और वे मुस्कुरा पड़े। बेटी रानी ने भाइयों की मुस्कुराहट को लक्ष्य कर लिया था। वह भी दयाल बाबू टोकने से नहीं चूकी, ‘‘पापा, भइया लोग ठीक ही कहते हैं… इधर तो सच में बड़ी गंदगी है।’’ रानी के स्वर में चाहे-अनचाहे कॉलोनी के छूटने की पीड़ा भी थी।
दयाल बाबू ने जैसे कुछ सुना ही न हो, वह तो मुदित मन… सधी चाल… गली के आखिरी सिरे पर खड़े अली मंजिल पर ही आंखें टिकाए हुए थे।
मकान के करीब पहुंचते ही रमजान मियां नजर आ गये। वह बाहरी बरामदे पर उकड़ू बैठे हुए मिले। दयाल बाबू पर नजर पड़ते ही उन्होंने अदब से ‘आदाब अर्ज’ किया। उनकी आवाज इस कदर थकी हुई थी मानो मीलों लंबा सफर तय करके वहीं बैठे सुस्ता रहे हों। बड़ी मुश्किल से पूछ पाए, ‘‘बच्चों को मकान दिखाने लाए हैं, हुजूर?’’
‘‘हां बड़े मियां!’’ दयाल बाबू ने अपने पीछे आ रहे पत्नी, बच्चों की ओर इशारा किया, ‘‘सब कुछ इतना आनन-फानन हो गया कि इन लोगों को मकान दिखाने तक का मौका नहीं मिला।’’
अधेड़ उम्र रमजान मियां इस वक्त कुछ ज्यादा ही बूढ़े लग रहे थे। खिचड़ी दाढ़ी और उनके शरीर में कोई तालमेल नहीं दिख रहा था। लेकिन दयाल बाबू के परिवार पर नजर पड़ते ही जैसे उनकी आंखों में चमक-सी आ गई। थकान मानोे काफूर हो गई, ‘‘आइए, हुजूर, आइए! अब यह मकान तो आप ही का है। अर्से से वीरान पड़ा यह मकान अब गुलजार हो जाएगा।’’
दयाल बाबू ने जेब से चाभी निकाल ली थी। उन्होंने गौर किया कि बच्चे मकान के बड़े से बरामदे पर खड़े होकर मकान को देखने के बजाय सामने गली के दूसरे मकानों को तजबीज रहे हैं। रमजान मियां ने उन्हें टोका, ‘‘लाइए हुजूर, चाभी दीजिए। मैं ताला खोल देता हूं।’’
एक अजीब पुलक से भर गए रमजान मियां। लगभग जबरन उन्होंने दयाल बाबू के हाथ से चाभी ले ली और मुख्य दरवाजे का ताला खोलते हुए दोनों पल्लों को इस तरह अंदर की ओर ढकेला जैसे उनके बगैर वह दरवाजा खुलता ही नहीं।
मकान के अंदर दाखिल होते ही दयाल बाबू के बच्चों की आंखें हैरत से फैल गर्इं-इत्ता बड़ा मकान! रमजान मियां गर्व से फूल गए, गोया मकान नहीं, उनकी तारीफ की गई हो। वह जजबाती लहजे में लगभग फूट-से पड़े, ‘‘हुजूर, मंजूर अली साहब के अब्बा हुजूर ने यह मकान बड़े शौक से बनवाया था। मर्दानखाना, जनानखाना, बावर्चीखाना, आंगन, सहन, गुसलखाना सब इतने करीने से बनवाया था कि आज भी अच्छे-अच्छे मकान इसके मुकाबले में नहीं ठहरते।’’
रमजान मियां की बात बिल्कुल सही थी। बड़े-बड़े कमरे… बड़ा सा सहन, खुला-खुला आंगन…। एकबारगी सबका मन खिल उठा। बच्चों ने तो उसी वक्त आंगन में धमा-चौकड़ी शुरू कर दी। दयाल बाबू ने पत्नी की ओर देखा-वहां, चेहरे पर संतोष का भाव पाकर, वह विजयी मुस्कान के साथ बोले, ‘‘अपना घर अपना ही होता है।’’
पत्नी की बजाय रमजान मियां ने तस्दीक की, ‘‘बजा फरमाया, हुजूर! अब जितनी जल्दी हो यहां आकर रहना शुरू कर दीजिए। यहां कोई तकलीफ नहीं होगी… फिर मैं तो हूं ही यहां।’’
यह अप्रत्याशित अधिकारबोध था। दयाल बाबू चौकें। फिर यह सोचकर कि यहां वे पुराने वाकिफकार हैं, इसीलिए ऐसा कहा होगा, वह चुप ही रहे। उन्होंने रमजान मियां को कुछ और बोलने का मौका दिए बगैर एक-एक कमरे का चक्कर लगाना शुरू कर दिया। हर कमरा चाक-चौबंद…साफ-सुथरी दीवारें…चमकता फर्श…मजबूत दरवाजे-खिड़कियां…मन प्रसन्न हो गया। दयाल बाबू की प्रसंनता को भांप लिया रमजान मियां ने। गदगद भाव से बाले ‘‘हुजूर, बड़े मियां को इस मकान से बेहद मुहब्बत थी। हर साल साफ-सफाई कराते थे। मैं खुद हर रोज झाड़-पोंछ करता था।’’
दयाल बाबू ने रमजान मियां को इस कदर स्नेहिल भाव से निहारा कि रमजान मियां दोहरे हो गए। पत्नी की तरफ देखा, वह मंत्रामुग्ध्-सी दिखीं-शायद मन ही मन घर को सजाने-संवारने की कल्पना में डूबने-उतराने लगीं थीं। उन्होंने पत्नी के मन की थाह लेने की गरज सेे पूछा, ‘‘कहिए, कैसा लगा?’’
‘‘अच्छा है!’’ पत्नी ने बेसाख्ता जवाब दिया जैसे कल्पनालोक से जबरन खींच लाई गई हों।
‘‘तो संडे तक शिफ्रट कर लेते हैं।’’ पत्नी की सहमति पाकर दयाल बाबू तरंग में बोल गए, ‘‘ज्यादा देर करने से कोई फायदा तो है नहीं?’’
बच्चे अपने-आप में मशगूल थे। दयाल बाबू को लगा- बच्चों को भी मकान पसंद आया है। वह अपनी अक्लमंदी पर मन-ही-मन स्वयं को दाद देने लगे।
मकान में शिफ्रट करते पूरा दिन निकल गया। शाम होते-होते सभी लोग बुरी तरह थक गए।
सुबह जब सामान सहित दयाल बाबू पहुंचे तो रमजान मियां बाहरी बरामदे में ही बैठे हुए मिल गए थे गोया उन लोगों के आने की ही प्रतीक्षा कर रहे हों। ट्रक गली के मोड़ पर खड़ा था। वहां से समान ठेलों पर ही आ सकता था। समजान मियां ने यह सुनते ही पता नहीं कहां लपकते हुए गये और लौटे तो उनके साथ दो-तीन ठेले भी थे। इस बीच आसपास के कई लोग इकट्ठे हो गए थे। धेती-कुर्ता पहने, माथे पर रोली का बड़ा-सा टीका लगाए घनश्याम मिश्राजी ने तो खुद आगे बढ़कर पहल की, ‘‘तो आप ही ने खरीदा है ‘अली मंजिल को?’
यह जानकर कि पड़ोसी हिन्दू हैं,दयाल बाबू ने राहत की सांस ली और घनश्याम मिश्राजी के प्रति आदर जताते हुए कहा, ‘‘जी!’’
‘‘मेरा नाम घनश्याम मिश्रा है… आपका पड़ोसी हूं। ’’ घनश्याम मिश्रा ने अपना परिचय दिया।
‘‘मेरा नाम दयाल कृष्ण है। मैं यहां सेक्रेटेरियट में सेक्शन अफसर हूं।’’ दयाल बाबू ने भी अपने बारे में जानकारी दी।
फिर तो लगे हाथ घनश्याम मिश्रा ने आसपास खड़े कई लोगों का दयाल बाबू से परिचय करा डाला, ‘ये अंसारी साहब हैं…ये श्रीवास्तवजी…ये सिंह साहब और वो खान साहब!’’
दयाल बाबू ने हाथ जोड़कर,दुहाते हुए सबका अभिवादन किया । मुस्कुराहटों के आदान-प्रदान के साथ ही देखते-देखते चमत्कार हो गया। वहां मौजूद कई लड़के-बच्चे सामान उतारने-ढोने-पहुंचाने में जुट गए थे। दयाल बाबू ‘‘नहीं-नहीं’’ करते रह गए, लेकिन किसी ने एक न सुनी। उल्टे खान साहब बोल पड़ेे, ‘‘दयाल बाबू, सभी घर के बच्चे हैं…। हाथ बंटा देंगे तो काम जल्दी निबट जाएगा।’’
वाकई काम तो जल्दी ही निबट गया था। लेकिन कमरों में सामान जमाते-जमाते शाम हो गई। थकान के साथ ही चाय पीने की तलब जोर मारने लगी थी। लेकिन समस्या दूध् की थी। यह सयोचकर कि कहीं आस-पास दूध् मिल जयेगा दयाल बाबू बरतन लेकर निकले ही थे कि ऐन सामने रमजान मियां आ खढ़े हुए। दयाल बाबू को दूध् का बरतन लिये निकलते देख उन्होंने इसरार किया, ‘‘लाइए हुजूर, दूध् मैं ले आता हूं। यहीं पास में ही एक ग्वाला रहता है।’’
‘‘चलिए, फिर मैं भी चलता हूं। कल से उससे दूध् देने की बात तय कर लूंगा।’’ दयाल बाबू शु(-ताजा दूध् मिल जाने की कल्पना से उमग पड़े।
ग्वाला ज्यादा दूर नहीं था। रमजान मियां को देखकर उसने सलाम किया। रमजान मियां सलाम का जवाब देते हुए बोले, ‘‘साधे भाई, यह दयाल बाबू हैं। नए-नए आए हैं मुहल्ले में। इन्हे कल से दूध् चाहिए।’’
‘‘कहां…? वहीं अली मंजिल में?’’ अपने ही प्रश्न का उत्तर देते साधे ने दयाल बाबू को गहरी उत्सुकता से देखा।
‘‘हां…हां…वहीं! रमजान मियां की बजाय हड़बड़ा कर बोल पड़े दयाल बाबू। पता नहीं क्या तो उनके मन में चुभ गया!
यह चुभन दयाल बाबू के मन में दूध् लेकर लौटते हुए भी बनी रही। तेज-तेज डग भरते वह जैसे ही अपने मकान के सामने पहुंचे कि अनायास ही उनकी आंखें छज्जे पर जा टिकीं-वहां उर्दू के बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ लिखा हुआ था। मानो दीवार को खोद-खोद कर उन अक्षरों को उभारा गया हो। वह उर्दू पढ़ नहीं सकते थे, लेकिन उन्होंने अंदाजा लगाया कि जरूर वहां ‘अली मंजिल’ लिखा होगा। रमजान मियां अब तक करीब आ गए थे। यह सोचकर कि रमजान मियां उनकी मनःस्थिति भांप न लें, दयाल बाबू तेजी से बरामदा पार कर अंदर घुस गए।
उस शाम अपने मकान में पत्नी-बच्चों के साथ इकट्ठे बैठकर चाय पीते हुए दयाल बाबू ने महसूस किया कि चाय का स्वाद कुछ ज्यादा ही अच्छा लग रहा है-शायद दूध् का असर हो। दूध् का ख्याल आते ही साधे का चेहरा आंखों में उभर आया-कहां? वहीें…‘अली मंजिल’ में? एकदम से गड़बड़ा गए दयाल बाबू। दिमाग में उर्दू के बड़े-बड़े अक्षर उभर आए। उन्हें लगा, ये अक्षर उनके माथे पर नक्श हो गए हैं। उन्होंने कसकर सिर को झटका दिया मानो उन अक्षरों को झटक रहे हैं। अनायास ही दाहिना हाथ ललाट पर चला गया। वहां कुछ रेंगता हुआ महसूस हुआ। उन्होंने हथेली से माथे को रगड़ा। फिर अपनी ही बेवकूपफी पर मुस्कुरा पड़े।
पत्नी-बच्चों का ध्यान दयाल बाबू की इस हरकत पर नहीं गया था। लिहाजा वह अपने-आपको सहज दिखाने की सजगता में चाय ‘सुड़क-सुड़क’ कर पीने लगेे। सुड़कने की आवाज कमरे में भर गई। पत्नी ने उन्हें घूर कर देखा और फिर मुस्कुराते हुए बोली, ‘‘एक दिन कथा करा लिया जाये।’’
‘‘ठीक कहती हो। इसी बहाने एक ‘गेट टू गेदर’ हो जाएगा। कॉलोनी के लोगों को भी बुला लेंगे।’’ नई जगह, नए मकान से अपनी पहचान जोड़ने का यह अच्छा तरीका मानकर दयाल बाबू ने सहमति दे दी।
कथा सुबह में ही रखी गई थी। नए पड़ोसियों को भी बुलाया गया था। घर में अच्छी-खासी चहल-पहल हो गई थी। रमजान मियां भी इधर-उधर के काम में हाथ बंटा रहा थे। खासकर, पड़ोसियों का स्वागत करने और उन्हें उचित जगह बैठाने की जिम्मेदारी उन्होंने ही संभाल ली थी।
दयाल बाबू अपनी पुरानी कॉलोनी से आनेवालों का इंतजार करते कभी बरामदे के बाहर दहलीज पर खड़े हो गली के छोर तक निहारते, तो कभी अंदर जाकर व्यवस्था के चाक-चौबंद होने का जायजा लेतेे।
आखिरकार गली में खरामा-खरामा चले आ रहेे सिन्हा साहब पर नजर पड़ते ही उनका चेहरा खिल गया। दोनों हाथ जोड़कर दूर से ही सिन्हा दम्पत्ति का स्वागत करने के लिए दयाल बाबू उनकी ओर लपके, फिर करीब पहुंचकर जिज्ञासा की, ‘‘पहुंचने में कोई परेशानी तो नहीं हुई, सिन्हा साहब?’’
‘‘कोई खास नहीं।’’ सिन्हा साहब ने उनके जुड़े हाथ थाम लिए, ‘‘बस नुक्कड़ पर जरा पूछना पड़ा। लोगों ने बताया कि एक नए साहब, ‘अली मंजिल’ में आए हैं। मैंने सोचा, वहीं पहुंचकर देखते हैं।’ सिन्हा साहब ने दयाल बाबू से सीधे पूछा,‘यह ‘अली मंजिल’ ही है न?’’
‘‘हां… हां।’’ अचकचा गए दयाल बाबू। बड़ी कठिनाई से थूक निगलते हुए प्रसंग बदलने की कोशिश की, ‘‘और पांडेयजी, जायसवाल साहब वगैरह नहीं आए?’’
‘‘सभी आ रहे हैं, भाई।’’ सिन्हा साहब ने दयाल बाबू को आश्वस्त किया, ‘‘हम थोड़ा पहले ही निकल आए। श्रीमती जी बोलीं, देरी होने पर भाभीजी नाराज होंगी।’’
‘‘हों-हों’’ कर हंस पड़े दयाल बाबू। लेकिन उन्हें अपनी ही हंसी अजनबी-सी लगी। उनके मन के किसी कोने में ‘अली मंजिल’ फांस की तरह अटक गया था। इस ख्याल से छुटकारा पाने के लिए वह सिन्हा साहब को घर दिखाने के उद्देश्य से अंदर दाखिल हो गए। एक-एक चीज का बारीकी से मुआयना करते सिन्हा साहब के चेहरे पर कई-कई भाव आ-जा रहे थे। अचानक बेडरूम में पहुंचकर सिन्हा साहब ठिठक-से गए। उन्हें ठिठका देख दयाल बाबू ने पूछा, ‘‘क्यों, क्या हुआ, सिन्हा साहब?’’
‘‘बड़ी खूबसूरत नक्काशी है!’’ सिन्हा साहब दीवार में बनी लकड़ी की आलमारी की ओर इशारा करके चहके।
दयाल बाबू ने पहली बार गौर किया कि आलमारी के दोनों बाजू गोलाकार में उठकर गुम्बद की शक्ल बना रहे हैं। आलमारी के बंद पल्लों और बाजुओं को एक साथ देखने पर किसी मस्जिद का चित्र उभरता था। दयाल बाबू को आश्चर्य हुआ कि उनका ध्यान इस नक्काशी पर पहले क्यों नहीं गया? वह अपने-आप में झेंप-से गए। सिन्हा साहब की निगाहें बारीक हैं। वह कॉलोनी में भी अनुभवी आदमी माने जाते हैं। पूरे घर का चक्कर लगाने के बाद सिन्हा साहब ने दयाल बाबू को दाद दी, ‘‘अच्छा है दयाल बाबू, आपने बाजी मार ली।’’
सिन्हा साहब के स्वर में अफसोस का पुट भी था गोया यह बाजी वह क्यों नहीं मार पाये ? दयाल बाबू ने विनम्रता से जवाब दिया, ‘‘सब आप लोगों का आशीर्वाद है, सिन्हा साहब!’’
कथा-पूजन की गहमा-गहमी के बावजूद दयाल बाबू का मन उचाट हो गया था। आंखों के सामने कभी आलमारी पर बना मस्जिदनुमा चित्र उभर आता, तो कभी मकान के बाहर लिखा ‘अली मंजिल’। इस मकान से पराएपन की बू आने लगी थी। यक-ब-यक पूरा मकान उन्हें अजनबी लगने लगा मानो जनाब मंजूर अली की शख्सियत हर जगह चस्पां है और वही अभी भी जबरन इस मकान के मालिक बने बैठे हों।
मेहमानों के विदा हो जाने के बाद घर एक सन्नाटे में डूब गया था। दोनों बेटे अपने नए दोस्तों के साथ घूमने निकल पड़े थे। बेटी रानी पड़ोस के मिश्राजी के यहां गई हुई थी। पत्नी निढाल होकर बिस्तर पर जा पड़ी थी। ऐसे में दयाल बाबू केे मन की बेचैनी और बढ़ गई। वह चुपचाप ड्राइंगरूम में बैठे-बैठे अपने आपसे उलझते रहे। इस मनःस्थिति में यकायक उन्होंने तय कर लिया कि सबसे पहले इस मकान का नाम बदलना होगा- अब यह ‘अली मंजिल’ नहीं, ‘दयाल भवन’ है। और आलमारी के पल्ले भी बदलने होंगे-मस्जिद का चित्र तो कतई नहीं चलेगा। सहसा उन्हें ख्याल आया कि अंदरुनी बरामदे में बना चबूतरा भी तुड़वाना होगा। रमजान मियां ने बताया था,‘‘वह चबूतरा नहीं, जानिमाज है, हुजूर। उसी पर बड़ी बी नमाज अदा करती थीं।’’
मन कैसा-कैसा तो हो आया। लगा, दयाल बाबू का इस मकान में अपना कुछ नहीं है। इसी व्यग्रता में उन्होंने पहलू बदला कि उनकी आंखें कमरे में बने मेहराब पर जा टिकीं। एक झटका-सा लगा। शुरू-शुरू में जो मेहराब देखने में बेहद खूबसूरत लग रहा था, इस वक्त उसकी खूबसूरती पता नहीं कहां गुम हो गई थी। वह मेहराब भी बुरी तरह खटकने लगा। उन्हें महसूस हुआ कि यह मेहराब ड्राइंग रूम की खूबसूरती बिगाड़ रहा है। वहां बैठे रहना उन्हें मुश्किल लगने लगा। वह तेजी से उठे और बाहरी बरामदे में चले आए।
बरामदे की दीवार से पीठ टिकाकर ऊँघ रहे रमजान मियां पर नजर पड़ते ही दयाल बाबू ठिठक गए- आगे नाथ न पीछे पगहा! जब से वह आए हैं, रमजान मियां खुदाई खिदमतगार की तरह हर वक्त मौजूद मिले हैं। इस मकान से साए की तरह चिपके हुए। पत्नी ने कहा भी था- ‘‘क्या हर्ज है… काम के आदमी हैं…।’’
अनजाने ही रमजान मियां घर का हिस्सा हो गए थे।
दयाल बाबू को सामने देख रमजान मियां हड़बड़ाकर उठ खड़े हुए। दयाल बाबू रमजान मियां से आंखें मिलते ही पल भर को सकपकाए गोया मन का चोर पकड़ा गया हो। पर्देदारी की कोशिश में तपाक से कह बैठे, ‘‘रमजान मियां, कोई राजमिस्त्राी हो तो कल बुला लाइएगा।’’
‘‘क्या हुजूर, कुछ जुड़वाना-तुड़वाना है क्या?’’ आंखें ही नहीं , रमजान मियां की आवाज में भी हैरानी थी।
रमजान मियां का लहजा दयाल बाबू को अच्छा नहीं लगा। उन्होंने थोड़ी सख्ती से कहा, ‘‘अपने मुताबिक मकान में रद्दो-बदल जरूरी है, रमजान मियां। कोई अच्छा कारीगर हो तो कल ले आइए!’’
आदेश देकर एक पल के लिए भी वहां नहीं रुके दयाल बाबू। उन्हें रमजान मियां की टोका-टाकी नागवार गुजरी थी। उन्हें लगा, यह आदमी खामख्वाह दखल दे रहा है- जबर्दस्ती काबिज होता जा रहा है। यह जनाब मंजूर अली का मुंह लगा था… इसका मतलब यह तो नहीं कि वह भी इसे बर्दाश्त करें… नहीं, इसे हटाना होगा… जल्दी ही इसे नहीं हटाया गया, तो गले की हड्डी बन जाएगा।
अगली सुबह राजमिस्त्राी को हाजिर देख दयाल बाबू की बांछें खिल गर्इं। पूछा, ‘‘रमजान मियां लाए हैं आपको?’’
‘‘हां हुजूर! बोले, कि मकान में आपको कुछ जरूरी काम करवाना है।’’ राजमिस्त्राी बरामदे में ही फर्श पर बैठ गया।
‘‘लेकिन रमजान मियां हैं कहां?’’ दयाल बाबू ने रमजान मियां को राजमिस्त्राी के साथ न देखकर पूछा।
‘‘पता नहीं, हुजूर!’’ राजमिस्त्राी ने निर्विकार भाव से उत्तर दिया, ‘‘वह तो हमें ‘अली मंजिल’ पहुंचने को कहकर उल्टे पांव लौट आए थे।’’
दयाल बाबू के दिमाग में धमाका-सा हुआ ‘अली मंजिल’। अब तक पत्नी भी वहां आ पहुंची थीं। दयाल बाबू ने पत्नी को उत्सुकता से अपनी ओर देखता पाकर मन की बात बताई, ‘‘इस मकान का नाम बदलवाना है-‘दयाल भवन’ कैसा रहेगा?’’
‘‘अच्छा है!’’ पत्नी मन ही मन पति का नाम दुहराते हुए मुस्कुराई।
दयाल बाबू पत्नी के मनोभाव भांप पर आह्लाद से भर गए। एक मीठी नजर पत्नी पर डाली, फिर पुलकित स्वर में राजमिस्त्राी को समझाने लगे, ‘‘सबसे पहले तो वहां छज्जे पर लिखा ‘अली मंजिल’ तोड़कर ‘दयाल भवन’ लिखना है… फिर यहां, इस कमरे में बना मेहराब तोड़कर हटा देना है… और बरामदे में एक चबूतरा है उसे तोड़ना है और मेरे बेडरूम में एक अलमारी है…।’’
पता नहीं क्यों, अपनी बात अधूरी छोड़ दी दयाल बाबू ने। भीतर-ही-भीतर जारी तोड़-फोड़ से शब्द गड्ड-मड्ड हो गए थे शायद। वह पत्नी से चाय बनाने को बोल, राजमिस्त्राी को साथ लेकर ‘‘कहां-कहां और क्या-क्या’’ काम करना है समझाने लगे। राजमित्राी ‘‘हां में हां’’ मिलाता,बीच-बीच में अपना सुझाव भी देता जा रहा था। इस सलाह-मशविरे में बच्चे भी आ शामिल हुए थे। शिवेश ने राय जाहिर की थी, ‘‘पापा, दीवारों में बने ताखे बंद करा दीजिए।’’
ब्रजेश के पास भी अपनी सलाह थी, ‘‘पापा, यह मकान पुराने डिजाइन का है। मेरी समझ से इसे ‘रिनोवेट’ करना ठीक रहेगा।’’
‘‘होगा… धीरे-धीरे सब होगा!’’ दयाल बाबू बच्चों से सहमत होते हुए राजमिस्त्राी से मुखातिब हुए, ‘‘समझ गए न आप?’’
‘‘हां हुजूर!’’ दांत निपोर दिया राजमिस्त्राी ने, ‘‘फिर आज ही से हाथ लगा देते हैं?’’
दयाल बाबू स्वयं भी जल्दी में थे। तुरंत बोल पड़े ‘‘हां… हां, जितनी जल्दी हो, काम शुरू कर दीजिए।’’
राजमिस्त्राी चाय पीकर चला गया। दयाल बाबू भी ऑफिस जाने की तैयारी में जुट गए। बच्चों पर राजमिस्त्राी से काम कराने की जिम्मेदारी सौंपकर उन्होंने उन्हें स्कूल जाने से रोक दिया था। बच्चे जिम्मेदारी लेते हुए अनायास ही संजीदा हो गए थे।
शाम होते-होते ‘अली मंजिल’ का नामोनिशान मिट गया। ऐन उसी जगह पर ताजे सिमेंट से ‘दयाल भवन’ उभर आया। दयाल बाबू ने ऑफिस से लौटते हुए गली में ठहरकर, भर निगाह, ‘दयाल भवन’ को निहारा और फिर भीतर तक पसर गई प्रसन्नता को लिए अंदर इस तरह दाखिल हुए जैसे पहली बार अपने घर में प्रवेश कर रहे हों।
पत्नी किचन में थीं। बेटी रानी पानी का गिलास लेकर आई और आते ही उसने सूचना दी, ‘‘पापा, भइया लोग अभी सिमेंट का आॅर्डर देने गए हैं। मिस्त्राी ने कहा है, कल जल्दी ही काम शुरू हो जाएगा।’’
दयाल बाबू ने गहरी सांस ली जैसे सीने पर पड़ा कोई बोझ उतर गया हो। दिन-भर की थकान पता नहीं कहां गायब हो गई । उन्होंने वहीं से चहकते हुए पत्नी को आवाज दी, ‘‘अरे भाई, किचन में क्या कर रही हो?’’
दयाल बाबू की पसन्नता से पत्नी भी पुलक से भर उठी थीं। पास आकर चुहल से बोलीं, ‘‘किचन नहीं हुजूर, बावर्चीखाना।’’
कसकर झटका लगा दयाल बाबू को। एकदम से बेचैन हो उठे। अनायास ही आंखे बाहरी बदामदे की ओर घूम गईं, ‘‘यह रमजान मियां नहीं दिख रहे हैं?’’
पत्नी के बजाय रानी ने तपाक से उत्तर दिया ‘‘पापा, वह तो आज आए ही नहीं… सुबह से ही गायब हैं…।’’
पता नहीं क्यों, असहज हो उठे दयाल बाबू! मन भारी हो आया। चाय पीते हुए रमजान मियां की अनुपस्थिति कहीं और ज्यादा खलने लगी। पत्नी उनके मन की बात समझ गई थीं शायद! उन्हें ऊहापोह से उबारने की गरज से बोलीं, ‘‘अच्छा हुआ, बुढ़ऊ हमारे कहे बगैर टल गए…अरे,…कोई उनका जिंदगीभर का ठेका थोड़े लिए हुए हैं हम!’’
‘‘ठीक कहती हो तुम!’’ बुझे मन से दयाल बाबू ने जैसे अपने आपको समझाया।
मकान में मन मुताबिक रद्दो-बदल कराते-कराते पूरा एक सप्ताह लग गया। अब ड्राइंगरूम से मेहराब गायब हो चुकी थी…अंदर बरामदे में बना चबूतरा फर्श के लेबल पर आ गया था… ताखे भरे जा चुके थे…आलमारी के पल्ले तोड़कर वहां खूबसूरत शीशों के शटर लग गए थे…। इस बीच और भी बहुत कुछ हुआ था…मेहराब के एक कोने में पड़ी रेहल ;पवित्र पुस्तक पढ़ने के लिए बना लकड़ी का स्टैंड’ मिली थी, जिसे दयाल बाबू ने स्टोर में रखवा दिया था। गुसलखाने के एक झरोखे में रखी तैमूम मिट्टी पड़ी दिखी थी, उसे उठाकर फेंक दिया गया था…छत पर जाने के लिए आंगन में बनी सीढ़ियों के नीचे वाले दड़बेनुमा कमरे में टूटी हुई तस्बीह के दाने…चीकट हो गई काले रंग की मखमली टोपी…तामचीन के प्लेट-कटोरे और अल्युमिनियम का बदना वगैरह बेतरतीब बिखरे पड़े थे। थोड़ी देर के लिए तो दयाल बाबू कुछ समझ ही नहीं पाए थे, कि वह इन चीजों का क्या करें? पत्नी ने नाक-भौंह सिकोड़ते हुए कहा था, ‘‘होगा सब उसी रमजान मियां का। इसी खजाने के लिए बुढ़ऊ रात-दिन पहरेदारी कर रहे थे। उठाकर फिंकवा दीजिए।’’
व्यंग्यबुझी पत्नी की हंसी दयाल बाबू को बेध् गई थी । उन्होंने प्रतिवाद करते हुए कहा था, ‘‘जो भी हो…यह रमजान मियां की अमानत है। आखिर हम पर विश्वास करके ही तो यह सब यहां छोड़ रखा है उन्होंने। ऐसा करते हैं…इन्हें स्टोर में रखवा देते हैं…रमजान मियां को लौटा देंगे।’’
‘‘अब क्या लौटेंगे, बुढ़ऊ!’’ थोड़ा तमककर पत्नी ने पति का विरोध् किया था, ‘‘हफ्रते भर से तो पता नहीं है उनका।’’
दयाल बाबू ने पत्नी की बात अनसुनी कर दी थी। सारा सामान उठाकर स्वयं स्टोर में रख आए थे। साफ-सफाई कर दड़बेनुमा उस कमरे को पूजाघर बना दिया गया था। लक्ष्मी-गणेश की मूर्तियां रख दी गई थीं… शंकर-पार्वती के कैलेंडर टांग दिए गए थे। आरती का दिया…पीतल की घंटी…हनुमान चालीसा सब करीने से सजा दिया गया था। अपने हाथ से धूप जलाकर उस कमरे को सुवासित किया था दयाल बाबू ने।
अब वही मकान दयाल बाबू को अपना-अपना-सा लगने लगा था। इस अपनापे के सुख-संतोष में उनके मन का संताप तिरोहित हो गया था। वह आते-जाते कभी ठहरकर, तो कभी चोर नजर से मकान के माथे पर अंकित ‘दयाल भवन’ को देख लेते हैं। नए रंग-रोगन से चमक उठे मकान पर ‘दयाल भवन’ की लिखावट बहुत खूबसूरत लगती। वह मन-ही-मन ‘दयाल भवन’ दुहराते और सोचते कि धीरे-धीरे लोग इस मकान को ‘दयाल भवन’ के नाम से जानने लगेंगे।
ऑफिस से लौटते हुए दयाल बाबू को उस दिन मिश्राजी अपने घर के बाहर बरामदे में बैठे मिल गए। दुआ-सलाम के बाद दयाल बाबू ने उत्सुकता जाहिर की, ‘‘काफी दिनों बाद दिखे मिश्राजी, कहीं बाहर गए थे क्या?’’
मिश्राजी मुस्कुराए, फिर रहस्य खोलने के-से अंदाज में बोले, ‘‘अरे दयाल बाबू, अपना जॉब ही ऐसा है। टूर’ पर गया था…हफ्रता बाद आज ही लौटा हूं…’’
‘‘ओहो, तभी कहूं कि मुहल्ले में सन्नाटा क्यों है?’’ दयाल बाबू ने चुहल की।
आदतन तेज-तर्रार मिश्राजी ने गर्मजोशी से निमंत्राण दे डाला, ‘‘आइए दयाल बाबू, ‘एक-एक कप चाय हो जाए।’’
दयाल बाबू को भी कोई जल्दी नहीं थी। वह भी मुस्कुराए और मिश्राजी के निमंत्रण में अपना प्रस्ताव जोड़ दिया, ‘‘एक शर्त है… आज चाय मेरे यहां पी जाएगी।’’
घनश्याम मिश्राजी खुलकर हंस पड़े, ‘‘दयाल बाबू सस्ते में छूटना चाहते हैं… खैर चलिए… आप ही के यहां चाय पीते हैं।’’
दयाल बाबू आतिथ्यबोध् से झुक-से गए। पहली बार किसी पड़ोसी को अपने घर चाय पर बुलाना उन्हें अच्छा लग रहा था । मन में कहीं अपने घर में आए बदलाव को दिखाने की ललक भी बलवती थी। मिश्राजी प्रवेश द्वार पर पहुंचकर ठिठके। मकान को इस तरह गौर से देखने लगे जैसे उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास ही न हो रहा हो-उघड़े प्लास्टरों और चितकबरी दीवारों का अता-पता नहीं था। नए रंग-रोगन से लकदक। ‘अद्भुत’! उनके मुंह से बेसाख्ता निकल पड़ा, ‘‘अरे! दयाल बाबू… आपने तो ‘अली मंजिल’ का काया-कल्प ही कर दिया।’’
मिश्राजी के मुंह से ‘अली मंजिल’ सुनकर दयाल बाबू के भीतर कुछ दरक-सा गया। जबरन मुस्कुराते हुए प्रतिवाद किया, ‘‘मिश्राजी, अब यह ‘अली मंजिल’ नहीं, ‘दयाल भवन’ है, ‘दयाल भवन’।’’
‘‘हां…हां… वो तो है।’’ मिश्राजी दयाल बाबू के मनोभाव की परवाह किए बगैर जारी रहे, ‘‘आपने सचमुच इसके पुराने दिन लौटा दिया… किसी जमाने में इस मकान की ऐसी ही रौनक थी…।’’
दयाल बाबू के भीतर एक गहरी उदासी पसर गई- इस मकान का अतीत उनके लाख चाहने के बावजूद, उनका पीछा नहीं छोड़ रहा था। वह अजीब कसमसाहट से भर गए-अपने आप पर कोफ्रत हो गई। जी में आया मिश्राजी से कहें- भगवान के लिए गड़े मुर्दे मत उखाडिये। लेकिन खुद को जज्ब कर गए।
मिश्राजी के साथ चाय पीने का मजा किरकिरा हो गया था। हालांकि मिश्राजी नमकीन, बिस्कुट खाते हुए, बड़ी आत्मीयता से बातें करते हुए, चाय का आनंद लेते रहे, लेकिन दयाल बाबू कतई सामान्य नहीं हो पाए-अपनी ही हंसी उन्हें फीकी महसूस होती रही।
नया मुहल्ला ,नया मकान, नए लोग अब धीरे-धीरे दयाल बाबू के परिवार के लिए पुराने हो चले थे। पत्नी, बच्चों का भी मन लग गया था। दयाल बाबू तो ज्यादातर ऑफिस में और ऑफिस के काम में ही व्यस्त रहते, इसलिए अड़ोसियों-पड़ोसियों से मुलाकात गाहे-बगाहे ही हो पाती। जिस दिन फुर्सत के मूड में होते, खुद ही किसी पड़ोसी के घर चले जाते या फिर कोई-न-कोई उनके ही घर आ धमकता। ऐसे में बैठक जमती तो घंटों गप्प-शप्प चलती। हंसी-ठहाके गूंजते।
इधर काफी दिनों बाद, दयाल बाबू को सेकेंड सैटरडे को फुर्सत मिली थी। दोपहर में खाना-वाना खाने के बाद वह ड्राइंगरूम में आकर बैठे ही थे कि श्रीवास्तवजी और खान साहब चले आए। दोनों को देखकर दयाल बाबू भी चहक उठे। पुरजोर स्वागत करते हुए दोनों से हाल-समाचार पूछा और फिर पत्नी को चाय बनाने के लिए कहने अंदर चले गए।
लौटे तो दयाल बाबू के हाथों में पानी से भरे दो गिलास भी थे। उन्हें पानी लाते देख, खान साहब तकल्लुफ में बोल पड़े, ‘‘अरे खामख्वाह तकलीफ कर रहे हैं आप?’’
‘‘नहीं भाई, इसमें तकलीफ की क्या बात है?’’ आत्मीयता से मुस्कुराते दयाल बाबू ने दोनों गिलास टेबल पर रखे ही थे कि कॉल बेल बजा और फिर एक जानी-पहचानी-सी आवाज आ टकराई, ‘‘दयाल बाबू… दयाल बाबू हैं क्या?’’
‘‘यह तो रमजान मियां हैं।’’ श्रीवास्तवजी ने बाहर से आ रही आवाज पहचान ली थी।
‘‘लगता तो है।’’ खान साहब ने भी हामी भरी।
दयाल बाबू भी रमजान मियां की आवाज पहचान गए थे। उनके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहा। इतने दिनों बाद, रमजान मियां आज अचानक कहां से प्रकट हो गए? दयाल बाबू अनजाने आवेग के वशीभूत तेजी से बाहर आए। रमजान मियां को देखकर वह एकबारगी उत्तेजना से भर गए।
रमजान मियां ने उन्हें देखते ही झट ‘आदाब अर्ज’ किया और अपने साथ आए डाकिए की ओर इशारा करके बोल पड़े, ‘‘हुजूर, आपकी चिट्ठी आई है… डाक बाबू आपका नाम पूछ-पूछकर भटक रहे थे… मैंने इन्हें बताया कि आप ‘अली मंजिल’ में रहते हैं। तब कहीं जाकर यह समझे।’’ रमजान मियां अपनी ही रौ में बोले चले जा रहे थे, ‘‘हुजूर, डाक बाबू ने बताया कि पाकिस्तान से चिट्ठी आई है, तो मुझे लगा, जरूर मंजूर अली साहब का खत होगा.. इसीलिए साथ-साथ चला आया, हुजूर।’’ दयाल बाबू पता नहीं कहां खो-से गए थे? क्षणभर को उन्हें अपने इर्द-गिर्द तक का अहसास नहीं रहा। लगा खुद से अंदर ही अंदर जूझ रहे हों। इस बीच डाकिये ने नमस्ते कहा तो जैसे वह अपने-आप में लौटे। खोए-खोए ही लिफाफे पर अंग्रेजी में लिखा पता पढ़ा-नाम, मुहल्ला, शहर सब सही था… लेकिन लिफाफे पर कहीं भी ‘अली मंजिल’ नहीं लिखा था। अचानक क्या तो चटक गया दयाल बाबू के भीतर।
लिफाफा फाड़कर खोला… पत्र उर्दू में लिखा था। दयालबाबू ने बेवसी से रमजान मियां को देखा… रमजान मियां की आंखों में जबर्दस्त उत्सुकता तैरती नजर आई… दयाल बाबू के मन में आया-कैसा बंदा है यह! किसी को प्यार करने की भी इंतहा होती है। प्रत्यक्षतः उन्होंने रमजान मियां को उलाहना दिया, ‘‘बड़े मियां, अचानक कहां गुम हो गए थे आप?’’
दयाल बाबू के प्रश्न का उत्तर अंदर ड्राइंगरूम से आया। ड्राइंगरूम में बैठे खान साहब वहीं से बोल रहे थे, ‘‘अरे दयाल बाबू, रमजान मियां की क्या पूछते हैं… पूरा मुहल्ला ही इनका घर है… जहां रुक गए… समझिए वहीं डेरा हो गया।’’
‘‘ही…ही…ही।’’ रमजान मियां की तरल हंसी तैर गई।
दयाल बाबू रमजान मियां को अंदर ड्राइंगरूम में बुलाते हुए बोले…‘‘खत उर्दू में लिखा है… आइए, खान साहब से पढ़वाते हैं… अच्छे मौके पर यह भी हाजिर हैं।’’
खान साहब ने दयाल बाबू को हैरानी से देखा, गोया उनके नाम उर्दू में खत आना कोई अजूबा हो। दयाल बाबू ने खत खान साहब की ओर बढ़ाया तो उन्होंने खत लपक कर ले लिया और और सरसरी तौर पर पूरे कागज पर नजर दौड़ा डाली। फिर उनकी आंखें खत के ऊपरी हिस्से पर जाकर अंटक गईं ।
‘‘जनाब मोहतरम दयाल बाबू! आदाब अर्ज।’’ खान साहब ने खत पढ़ना शुरू कर दिया था, ‘‘खुदा के फजल से मैं यहां ठीक-ठाक हूं और आप सबकी खैरियत की दुआ करता हूं।’’
दयाल बाबू का मन भीग आया। उन्होंने देखा, रमजान मियां खत पर एकटक आंखें गड़ाए हुए हैं। खान साहब खत पढ़ रहे थे, ‘‘यहां पराए वतन, पराए लोगों के बीच वहां की बहुत याद आती है। अपना घर, मुहल्ला, शहर और लोग हर वक्त आंखों में रक्स करते रहते हैं। आखिरी वक्त में खानाखराबी मेरी किस्मत में बदी थी, वरना अपना मुल्क, अपनी देहरी क्यों छूटती! शायद खुदा को यही मंजूर था।’’
सहसा, एक सिसकी-सी फूटी। खान साहब भी रुक गए। दयाल बाबू ने देखा, रमजान मियां की आंखों से आंसू बह रहे हैं। किसी से कुछ कहते नहीं बना। एक सन्नाटा-सा खिंच आया। रमजान मियां ने अंगोछे से आंखें सुखाते हुए खुद को संभाला। खान साहब भी संजीदा हो गए थे। श्रीवास्तवजी तो लगातार चुप्पी साधे हुए थे। दयाल बाबू ने अगल-बगल झांका, पत्नी को दरवाजे की ओट में खड़ा देख बोले पड़े, ‘‘मंजूर अली साहब का पत्र है।’’
खान साहब ने खत के मजमून पर आंखें टिका दी थीं। दयाल बाबू ने उन्हें खत पढ़ने का इशारा किया। खान साहब उसी संजीदगी के साथ फिर खत पढ़ने लगे, ‘‘उम्मीद है, अब तक आप लोगों ने अपने दौलतखाने को आबाद कर दिया होगा। खूब गुलजार हो गया होगा। मुझे भी उसकी बहुत याद आती है। जानते हैं जनाब, वह मेरा पुश्तैनी मकान था। मेरी अम्मा को भी उससे बेहद मुहब्बत थी। उन्होंने उसकी सलामती के लिए बाहरी दरवाजे के अन्दरूनी चौखट के कोने में आयतल कुर्सी टांग रखी थी, ताकि उसपर कोई बला नाजिल न हो। आज अर्से बाद, पता नहीं क्यों, मुझे अपनी अम्माजान की याद आ गई? शायद बुढ़ापे का तकाजा हो। आपको खत लिखकर बहुत सुकून मिल रहा है। आप मेरी किसी बात का बुरा मत मानिएगा। बस! मैं तो यही दुआ करूंगा कि आप लोग आबाद रहें! खुदा तमाम बलाओं से महफूज़ रखें। आपका खैरख्वाह-मंजूर अली।’’
खत खत्म हो गया था। खामोशी तिर आई थी। लेकिन दयाल बाबू के भीतर-ही-भीतर संवाद जारी था। उन्होंने महसूस किया कि कमरे का वातावरण निहायत गंभीर हो गया है। कोई कुछ नहीं बोल रहा था जैसे सबके भीतर मंजूर अली साहब की स्मृति घुमड़ रही हो।
बेटी रानी चाय के प्याले रख गई थी। दयाल बाबू ने चुप्पी तोड़े बगैर एक प्याली रमजान मियां की ओर बढ़ाई। रमजान मियां की आंखें डबडबाई हुई थीं। वह चाय की प्याली लेकर चुपचाप उठे और बाहर बरामदे में जाकर दीवार के सहारे बैठ गए।
चाय खत्म करके श्रीवास्तवजी और खान साहब भी रुखसत हो गए।
ड्राइंगरूम में दयाल बाबू अकेले रह गए थे मंजूर अली साहब का खत टेबल पर पड़ा हुआ था- खत का एक-एक लफ्रज दयाल बाबू के दिमाग में उभरता जा रहा था-मंजूर अली साहब का चेहरा आंखों के सामने नाचने लगा था जैसे वह कह रहे हों- ‘‘मेरी अम्मा ने बाहरी दरवाजे के अन्दरूनी चौखट के कोने में आयतल कुर्सी टांग रखी थी, ताकि बलाएं नाजिल न हो।’’
सहसा, दयाल बाबू सोफे से उठे और दबे पांव बाहरी दरवाजे तक आए। दरवाजे के खुले दोनों पल्लों को आहिस्ते से बंद करने के अंदाज में एक-दूसरे के करीब किया कि चौखट में गड़ी कील के सहारे जुजदान में टंगी कोई चीज देखकर ठिठक गए। उन्हें ताज्जुब हुआ कि उनका ध्यान कभी इस ओर क्यों नहीं गया? उन्हें लगा, जरूर यह आयतल कुर्सी है, जिसे मंजूर अली साहब की अम्मा ने यहां टांगा होगा।
जुजदान ;कपड़े की था जो खुली धूल-गर्द से चीकट हो गया था। दरवाजे के दाहिने पल्ले पर जुजदान के बराबर रगड़ के चिन्ह उभर आए थे। दयाल बाबू को कोफ्रत हुई कि साफ-सफाई के दौरान किसी का ध्यान इस ओर क्यों नहीं गया? उन्होंने जुजदान को नोचने के लिए हाथ बढ़ाया ही था कि लगा, बाहर बरामदे में बैठे रमजान मियां घूर रहे हैं। उन्होंने हड़बडाकर झट से पल्ले खोल डाले। सामने बरामदा खाली था। रमजान मियां वहां नहीं थे। चाय की खाली प्याली पड़ी हुई थी। एक गहरा सन्नाटा भांय-भांय कर रहा था। दयाल बाबू दरवाजे के बीचोबीच जड़ होकर रह गए थे।

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