इधर हमारे आसपास किसी न किसी मुद्दे पर अभिव्यक्ति की आज़ादी पर लगातार हमले देखे गए हैं। हमारे जीवन में  ऐसे हालात बार-बार सामने आते रहे हैं कि हम जनगीतों की सामाजिक जरूरत समझें …..। प्रतिरोध का यही रचनात्मक नजरिया प्रस्तुत करतीं  अशोक कुमार पांडेयकी रचनाएं …… | संपादक 

1-  पूछो…  

अशोक कुमार पांडेय

अशोक कुमार पांडेय

सवाल पूछो
न चुप रहो
अब सवाल पूछो
ये पूछो भूख आज भी है बस्तियों में क्यूं बसी?
ये पूछो कर रहे किसान किस लिए यूं खुदकशी
ये पूछो क्या हुए वो वादे रोज़गार के सभी?
ये क्या हुआ कि जिंदगी बाज़ार में यूं बिक रही.
बहुत हुआ
बहुत सहा
न अब सहो ये बेबसी
पूछो…
ये पूछो सारे मुल्क में आग सी है क्यूं लगी?
ये पूछो जाति-धर्म की दीवार क्यूं नहीं गिरी?
ये पूछो खून पी रहा क्यूं आदमी का आदमी?
ये क्या हुआ सिमट गयी क्यूं महलों ही में चांदनी?
कहाँ है वो
कौन है
कि जिसने लूट ली खुशी
पूछो
जो आग सीने में लगी वो कब तलक दबाओगे
न गर मिला जवाब फिर भी सच तो जान जाओगे
जागोगे खुद जो नींद से तो औरों को जगाओगे
चलो हमारे साथ तनहा कुछ भी कर न पाओगे
कठिन तो
राह है बहुत
पर रौशनी भी है यहीं
पूछो

२- सुना है हाकिम सारे दीवाने अब ज़िंदां के हवाले होंगे

सारे जिनकी आँख ख़ुली है
सारे जिनके लब ख़ुलते हैं
सारे जिनको सच से प्यार

सारे जिनको मुल्क़ से प्यार
और वे सारे जिनके हाथों में सपनों के हथियार
सब ज़िंदां के हवाले होंगे!
ज़ुर्म को अब जो ज़ुर्म कहेंगे
देख के सब जो चुप न रहेगें
जो इस अंधी दौड़ से बाहर
बिन पैसों के काम करेंगे
और दिखायेंगे जो उनके चेहरे के पीछे का चेहरा
सब ज़िंदां के हवाले होंगे
जिनके सीनों में आग बची है
जिन होठों में फरियाद बची है
इन काले घने अंधेरों में भी
इक उजियारे की आस बची है
और सभी जिनके ख़्वाबों में इंक़लाब की बात बची है
सब ज़िंदां के हवाले होंगे
आओ हाकिम आगे आओ
पुलिस, फौज, हथियार लिये
पूंजी की ताक़त ख़ूंखार
और धर्म की धार लिये
हम दीवाने तैयार यहां है हर ज़ुर्म तुम्हारा सहने को

google से साभार

google से साभार

इस ज़िंदां में कितनी जगह है!
कितने जिंदां हम दीवानों के
ख़ौफ़ से डरकर बिखर गये
कितने मुसोलिनी, कितने हिटलर
देखो तो सारे किधर गये
और तुम्हें भी जाना वहीं हैं वक़्त भले ही लग जाये
फिर तुम ही ज़िंदां में होगे!
* ज़िंदां- कारावास

३- ये अफ़साना सुनाना चाहते हैं हम उन्हें भी जो ..

हमारे आंसुओं की नींव पर एवाँ बनाते हैं

हमें देवी बताते हैं, हमारे गीत गाते हैं
कुछ इस तर्ह हमारी क़ैद की दीवार उठाते हैं
कोई घूँघट पे लिखता है, कोई पर्दा सुझाता है
करो तुम शर्म सह लो कष्ट सब चुपचाप मत बोलो
तुम्हारा स्वर्ग है यह ही, तुम्हारी है यही दुनिया
घरों की चार दीवारों में सारे ज़ुल्म तुम सह लो
जो अपने जितने हैं उतना ही हमको वे सताते हैं
कुछ इस तर्ह हमारी क़ैद की दीवार उठाते हैं
पढो मिहनत से और साथ में सब काम घर का हो
ये पढ़ना भी हो यों कि कभी दुल्हन तुम बेहतर हो
अगर दफ्तर भी जाओ लौटकर घर काम सारा हो
जो पैसे तुम कमाओ हक पति का ही बस उस पर हो
पुराने ही नहीं नियम नए यों वे बनाते हैं
कुछ इस तर्ह हमारी क़ैद की दीवार उठाते हैं
घरों में आग चूल्हे की तो बाहर वहशियों की भूख
किया गर प्रेम तो धोखा या फिर मार अपनों की
सगा भाई पिता अपने लिए हथियार आते हैं
ये कैसी आन जिसकी सान पर हम मारे जाते हैं?
कभी सोने कभी लोहे की वो जंजीर लाते हैं
कुछ इस तर्ह हमारी क़ैद की दीवार उठाते हैं
हमारी देह पर ही युद्ध दंगे और सब बलवे
हमारी देह को ही बेचकर महफ़िल सजे सारी
हमीं बैठाए जाएँ हँसते हुए सारे बाज़ारों में
ये हंसना भी तो रोने की तरह है एक लाचारी
कभी रोना कभी हँसना कभी चुप्पी सिखाते हैं
कुछ इस तर्ह हमारी क़ैद की दीवार उठाते हैं
लबों में जो हुई हरक़त धरम की नींव डोले है
सभी को क्यों खले है आज जो औरत भी बोले है
हमारी अपनी आज़ादी हमी से आयेगी सुन लो
कई सदियों की चुप्पी तोड़कर जो आज बोले हैं
तो फिर वो याद संस्कृति की धरम की दिलाते हैं
कुछ इस तर्ह हमारी क़ैद की दीवार उठाते हैं
कई सदियों की ये जुल्मत न अब बर्दाश्त होती है
हदों को तोड़कर निकली हैं राह अपनी बनाने हम
बहुत माँगा, बहुत रोया बहुत फरियाद कर ली है
लड़ेंगे अब तो अपनी ज़िन्दगी अपनी बनाने हम
रहो तुम देखते कैसे नसीब अपना बनाते हैं
तुम्हारी क़ैद की दीवार हम कैसे गिराते हैं

Leave a Reply

Your email address will not be published.