‘अश्विनी आश्विन’ की तीन ग़ज़लें 

अश्विनी आश्विन

अश्विनी आश्विन

1- 

जो भरे-बाज़ार, सब के बीच, नंगा हो गया।
वो सियासतदां, शहर का फिर मसीहा हो गया।।

फिर चले चाकू-छुरे कल, फिर जलीं कुछ बस्तियां,
हो गई काशी खफा, नाराज़ कावा हो गया।

बाप बूढ़ा हो गया बेवक़्त, जिसकी फ़िक्र में
पर निकलते ही उड़नछू, दिल का टुकड़ा हो गया।।

फिर लूटी हैं अस्मतें कल, फिर हुई औरत ज़लील
कल तेरा इंसानियत !! मुंह और काला हो गया।।

खटखटाते रह गए ताउम्र सांकल न्याय की
चीखते हम रह गए और वक़्त बहरा हो गया।।

बाकई आज़ाद है यह मुल्क ? हम आज़ाद हैं ?
‘अश्विनी’ क्या सोचते थे ? और ये क्या हो गया ?

2- 

साभार google

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मुफलिसी के मारे हैं, दीन, बेसहारे भी।
वक़्त के सताये हैं, ज़िन्दगी से हारे भी।।

एक आस से सदियां, रास्तों को तकतीं हैं,
देश के सियासतदां, दुख सुनें, हमारे भी।।

बस्तियां अंधेरों में डूब कर सिसकतीं है,
इंतज़ार में हम हैं, ज़िन्दगी पुकारे भी।।

ज़िन्दगी अगर हमको, एक पल इजाज़त दे,
आसमां झुका दें हम, तोड़ लें सितारे भी।।

मुल्क की तरक्की का जो बहम हुआ हो तो
मुफ्लिसों की बस्ती के देखना नज़ारे भी।।

ढूंढती हैं अब आँखें, आस का नया सूरज,
रौशनी की कुछ किरणें, जो यहाँ उतारे भी।।

गन्दगी, सड़न, बदबू, बेबसी, घुटन, आहें,
आदमी यहाँ कैसे, चार दिन गुजारे भी।।

सोचती यही मन में, ज़िन्दगी घिसटती है
दिन कभी भले होंगे ‘अश्विनी ‘ हमारे भी।।

3- 

साभार google से

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न जाने लोग कितने, आज भी सोते सड़क पर ही।
रजाई आसमां उनकी, बिछावन है ज़मीं भर ही।।

झुलसते दिन तपन से या सिहरती-कांपती रातें
सभी कुछ झेलते हैं, मानकर अपना मुकद्दर ही।।

कि उनकी बेवसी पर तंज करती हैं हवाएं भी
समय भी बात करता है सदा उनसे अकड़कर ही।।

यही है हश्र, उनकी ज़िंदगी भर की कमाई का
पुराने चार बर्तन और दो खाली कनस्तर ही।।

अंधेरों के सिवा कुछ भी नहीं है इन हयातों में
उमड़ते, आँख से दिन-रात अश्कों के समंदर ही।।

सियासत भी इन्हें कब वोट से ज़्यादा समझती है
गुजरती ज़िन्दगी गुमनाम, बे-दर और बे-घर ही ।।

उजाले, भूल कर इस रहगुजर का रुख नहीं करते
कि हालत हो रही है रोज बद से और बदतर ही।।

उन्हें मालूम क्या होगा, तरक्की कौन चिड़िया है ?
न जिनको आज तक दो वक़्त की रोटी मयस्सर ही।।

भटकती फिर रही है ज़िन्दगी बेकल, परेशां-सी
भरेगा मांग इसकी ‘अश्विनी’ जैसा कलन्दर ही।।

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