उन्नीसवीं शताब्दी में शुरू हुए समाज सुधार आंदोलनों से जुड़ी विभूतियों को भी कम संकटों का सामना करना नहीं पड़ा। सती प्रथा के विरोध में आन्दोलनरत राजा राममोहन राय को अपने परिवार का त्याग करना पड़ा। उनके सहयोगियों ने भी लगातार हर प्रकार के विरोध का सामना किया। बालविवाह प्रतिबंध कानून के लिये लगातार प्रयास होते रहे लेकिन हिन्दू समाज का व्यापक वर्ग इसके विरोध में था। बाल विवाह समर्थक धर्म और परंपरा के नाम पर इसका विरोध करते रहे। यही स्थिति विधवा-विवाह कानून की मान्यता के संबंध में थी। इन समाज सुधार कानूनों के विरोध में बड़ी संख्या में हस्ताक्षर इकट्ठा कर ब्रिटेन की महारानी को ज्ञापन भेजे गये। …….

अहिष्णुता के अनेक चेहरे हैं 

डॉ० नमिता सिंह

दिसंबर 2015 की 10 तारीख को अंग्रेज़ी की सुप्रसिद्ध लेखिका सुश्री नयनतारा सहगल के भाषण का आयोजन अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय ने किया था। अवसर था ‘के॰पी॰ सिंह स्मृति व्याख्यान’ जिसका यह छठा संस्करण था। नवंबर 2009 में प्रो॰ कुँवरपाल सिंह के निधन के बाद विश्वविद्यालय ने उनकी स्मृति में हर वर्ष व्याख्यान के आयोजन की घोषणा की थी। प्रो॰ कुँवरपाल सिंह (जो अलीगढ़ विश्वविद्यालय में के॰पी॰ सिंह के नाम से तथा दोस्तों के बीच के॰पी॰ के नाम से ही मशहूर थे) अलीगढ़ में अपनी शिक्षा पूरी करने के बाद हिन्दी विभाग में प्रवक्ता हुए। बाद में वे विभागाध्यक्ष और कला संकाय के डीन भी रहे। एकेडमिक काउंसिल, एक्जीक्यूटिव काउंसिल में वे चुनाव लड़कर जीते और सदस्य के रूप में अनेक महत्त्वपूर्ण निर्णयों को लागू कराने में भागीदार रहे। इसके अलावा अनेक महत्त्वपूर्ण पदों पर भी रहकर उन्होंने शिक्षकों और विद्यार्थियों के हितों के लिये काम किया। वे केवल एक आलोचक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में ही विख्यात नहीं थे बल्कि जीवनभर हर मोर्चे पर जातिवाद और सांप्रदायिकता के विरुद्ध भी संघर्षरत रहे। उनके व्यक्तित्व और अकादमिक एवम् सामाजिक सरोकारों के कारण ही उनके निधन के बाद उनकी स्मृति और सरोकारों को जीवित रखने के लिये तत्कालीन कुलपति ने प्रतिवर्ष व्याख्यान के आयोजन की घोषणा की। वह महत्वपूर्ण है कि विश्वविद्यालय के स्तर पर स्मृति व्याख्यान अब तक संस्थापक सर सैयद अहमद खाँ के नाम पर ही होता रहा था। अब दूसरा आयोजन के॰पी॰ सिंह स्मृति व्याख्यान होता है जो निश्चित रूप से विश्वविद्यालय के व्यापक सोच और धर्मनिरपेक्ष रूपरूप को ही रेखांकित करता है। अब तक इस कड़ी में विभूतिनारायण राय, मेधा पाटकर, (पूर्व) चीफ़ जस्टिस जे॰एस॰ वर्मा (जो अब दिवंगत हो चुके हैं) मे॰ज॰ वजाहत हबीबुल्लाह, सिने निर्देशक मुज़फ्फर अली व्याख्यान दे चुके हैं।
यह छठा व्याख्यान चर्चित लेखिका सुश्री नयनतारा सहगल का था। वे पिछले समय से लगातार सुर्खियों में हैं और वैचारिक असहमति के कारण जो लेखक मारे गये उसके विरोध में आवाज़ बुलंद करती रही हैं। डॉ नरेंद्र दाभोलकर, सामाजिक, राजनैतिक कार्यकर्ता गोविंद पानसारे के बाद पिछले वर्ष जब कन्नड़ लेखक एम॰एम॰ कालबुर्गी की हत्या हुई और साहित्य अकादमी सहित अन्य साहित्यिक संस्थाएँ मौन रहीं तो जैसे उनके सब्र का बांध टूट गया और उन्होंने अपना साहित्य अकादमी सम्मान लौटाने की घोषणा की। उसके बाद तो जैसे इन घटनाओं से चिंतित देश के प्रबुद्धजन को अपनी चिंता, व्यवस्था-मौन के प्रति आक्रोश, व्यापक सामाजिक सरोकारों और बढ़ते सांप्रदायिक वातावरण के लिये विरोध को प्रकट करने की एक दिशा मिल गयी। बड़ी संख्या में लगभग सभी क्षेत्रीय और हिन्दी-अंग्रेज़ी-उर्दू के लेखकों, संस्कृतिकर्मियों, फिल्मकारों और वैज्ञानिकों ने अपने सम्मानों को लौटाने की घोषणा करते हुए पूरे राष्ट्र को और संस्थाओं, अकादमियों को इस दिशा में सोचने और आवश्यक कदम उठाने के लिये मजबूर किया। हालांकि इसके लिये व्यवस्था समर्थित दलों के कोप भाजन का और तरह-तरह के चरित्र हनन का शिकार भी ये लोग हुए।
सुश्री नयनतारा सहगल का व्याख्यान इसी संदर्भ में था। ‘अन मेकिंग इंडिया’ में उनका आधारभूत विचार यही था कि एकांगी और संकीर्ण विचारधारा से राष्ट्र प्रगति नहीं कर सकता और प्रधानमंत्री का ‘मेक इन इंडिया’ जैसा नारा जो राष्ट्र के बहुमुखी विकास के लिये है और विश्व में अपनी विशिष्ट भूमिका को रेखांकित करना चाहता है-वह अर्थहीन हो जाता है। जैसा कि वे अन्य अवसरों पर भी लगातार कहती रही हैं, उन्होंने यहां भी जोर देकर कहा कि बहुसंस्कृतिवादी भारत देश को हिन्दू राष्ट्र के रूप में स्थापित करने का प्रयास इसे विकास के रास्ते से भटका देगा। सबको समान अधिकार और समान न्याय देने वाली लोकतांत्रिक व्यवस्था में ही देश आगे बढ़ सकता है। भारत के स्वाधीनता आंदोलन में शामिल, पं॰ जवाहरलाल नेहरू की बहन श्रीमती विजय लक्ष्मी पंडित (जो स्वतंत्र भारत की ब्रिटेन में पहली हाई कमिश्नर बनीं) की बेटी नयनतारा सहगल ने कहा कि 1975 में जब उनकी बहन तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने आपातकाल लागू किया उन्होंने उस समय भी उसका तीव्र विरोध किया था।
सुश्री नयनतारा सहगल ने कहा कि कुछ दल या संगठन पूरे देश को इस बात के लिये मजबूर नहीं कर सकते कि वे क्या-क्या खायें, क्या पहनें और क्या जीवन-पद्धति अपनायें। इन मुद्दों पर असहिष्णुता होना और हिंसात्मक होना नयी विचार प्रक्रिया, रचनात्मकता और सामाजिक समरसता को नष्ट करेगा।
इस संदर्भ में सबसे महत्वपूर्ण बात जो उन्होंने कही कि इस प्रकार की सामाजिक असहिष्णुता और वर्चस्ववाद का सबसे अधिक शिकार स्त्रियां होती हैं। वैचारिक असहिष्णुता के अलावा व्यापक स्तर पर सामाजिक समूहों और धार्मिक समूहों के भीतर व्याप्त कट्टरवाद भी समानता और समान नागरिक अधिकारों से स्त्रियों को वंचित करता है और उन्हें न्याय नहीं मिल पाता। अनेक समाजों में लड़कियों को आज भी अपनी पसंद से शादी करने का अधिकार नहीं है। अंतरजातीय विचार करने पर या गोत्र संबंधी बात आने पर घर-परिवार और समाज द्वारा भीषण विरोध होता है और अक्सर पति-पत्नी की हत्या कर दी जाती है। अंतर-धार्मिक विवाह के प्रकरणों में भी कई बार पति-पत्नी की हत्या होती है। धार्मिक कट्टरवाद भी लोगों को असहिष्णुता बनाता है और समुदाय के भीतर ही लोग इसका शिकार होते हैं। इस संदर्भ में उन्होंने तसलीमा नसरीन और सलमान रश्दी की पुस्तकों पर प्रतिबंध लगाये जाने की चर्चा भी की। ये भी कुछ लोगों की असहिष्णुतावाद के ही परिणाम थे। ऐसा ही एक मुद्दा ‘काॅमन सिविल कोड’ या ‘समान नागरिक संहिता’ का है। उन्होंने खेद जताया कि आज़ादी के बाद हिन्दू समुदाय के लिये जब पार्लियामेन्ट में ‘हिन्दू कोड बिल’ लाया गया तो उस जैसा बिल समान नागरिक संहिता के रूप में सभी समुदायों पर क्यों नहीं लागू किया गया। राजनैतिक अवसरवादी नीतियों के कारण अन्य समुदाय की औरतों को उनके समुदायों के धार्मिक नेताओं के भरोसे छोड़ दिया गया। बड़ी संख्या में आज भी वे औरतें देश के समान नागरिक अधिकारों से वंचित हैं। जहां तक समाज विशेष से विरोध होने का सवाल है वह तो हमेशा से हर स्तर पर होता आया है। स्त्रियों के जीवन सुधार के सभी मामलों में पितृसत्तात्मक वर्चस्ववाद ने हस्तक्षेप किया है और धार्मिकता के आधार पर समाज सुधारों का विरोध किया है। यदि ऐसी धर्म आधारित परंपराओं का जिसके कारण स्त्रियां अन्याय और शोषण का शिकार थीं, विरोध न किया गया होता तो आज भी स्त्रियां मध्यकालीन समाज की तरह सती की जातीं और चारदीवारी में बंद रहतीं। समान नागरिक संहिता के द्वारा ही प्रत्येक समुदाय की स्त्रियों को एक समान लोकतांत्रिक अधिकार दिये जा सकते हैं और देश की कानून व्यवस्था से उन्हें न्याय मिल सकता है।
अलीगढ़ मुस्लिम विश्वविद्यालय के बहुत बड़े प्रबुद्ध जनसमूह में नयनतारा सहगल के इस वक्तव्य का कुछ लोगों ने मुखर तो बहुत लोगों ने मौन समर्थन किया। उनका व्याख्यान पूरे श्रोता समूह द्वारा सराहा गया।
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व्यक्तिगत रूप से मुझे लगता है कि समाज सुधार के मुद्दों पर विशेष रूप से ध्यान देने की जरूरत है और समाज के बड़े वर्ग के हितों की जब बात हो तो कुछ लोगों के विरोध का कोई महत्व नहीं होता। परंपरागत वर्चस्ववाद का उपभोग करने वाले वर्ग आसानी से अपने अधिकार त्यागने को तैयार नहीं होते। उन्नीसवीं शताब्दी में शुरू हुए समाज सुधार आंदोलनों से जुड़ी विभूतियों को भी कम संकटों का सामना करना नहीं पड़ा। सती प्रथा के विरोध में आन्दोलनरत राजा राममोहन राय को अपने परिवार का त्याग करना पड़ा। उनके सहयोगियों ने भी लगातार हर प्रकार के विरोध का सामना किया। बालविवाह प्रतिबंध कानून के लिये लगातार प्रयास होते रहे लेकिन हिन्दू समाज का व्यापक वर्ग इसके विरोध में था। बाल विवाह समर्थक धर्म और परंपरा के नाम पर इसका विरोध करते रहे। यही स्थिति विधवा-विवाह कानून की मान्यता के संबंध में थी। इन समाज सुधार कानूनों के विरोध में बड़ी संख्या में हस्ताक्षर इकट्ठा कर ब्रिटेन की महारानी को ज्ञापन भेजे गये। दिलचस्प बात यह है कि स्त्रियों की दशा सुधारने वाले इन कानूनों का विरोध रवींद्रनाथ टैगोर जैसे अनेक प्रबुद्धजनों ने भी किया और कहा कि यह भारतीय परंपराओं के विरुद्ध ब्रिटिश राज का अनावश्यक हस्तक्षेप है।
हिन्दू कोड बिल के रूप में अनेक आधारभूत अधिकारों का उपहार भी स्त्री समाज को आसानी से नहीं मिला। संविधान की धारा 44 में देश के सभी नागरिकों को समान सिविल कोड का प्रावधान किया गया लेकिन संविधान सभा में ही इसका विरोध शुरू हुआ। सबसे पहले मुस्लिम सदस्यों ने इसका विरोध किया और अपने धार्मिक पर्सनल लाॅ को बनाये रखने के लिये बहस की। अंत में तय हुआ कि वृहद हिन्दू समाज (जिसमें बौद्ध, सिख जैसे समुदाय भी शामिल थे) के लिये हिन्दू कोड बिल हो। यह एक क्रांतिकारी कदम था जो परंपरागत रूप से दमित स्त्री समाज को पुरुषों के समान बराबरी के अधिकार देता था। इस में कुछ बिन्दु प्रमुख थे जिनके अनुसार विधवा स्त्री को तथा पुत्रियों को भी संपत्ति में बराबर हिस्से का अधिकार था। दूसरे बिन्दु के रूप में पति की गंभीर बीमारी, अत्याचार अथवा उसके चरित्रहीन होने पर पत्नी को तलाक लेने का और तलाकशुदा स्त्री को पति द्वारा भरण-पोषण प्राप्त करने का अधिकार था। तीसरे बिन्दु के रूप में जाति-उपजाति जैसे भेद से परे दूसरे समुदाय में होने वाले विवाह को मान्यता देने के संबंध में था। अंतर्जातीय विवाह किसी भी विधि से हो कानून सम्मत था। इस कानून के द्वारा स्त्रियों को भी तलाक देने का अधिकार मिलता था। इसके अतिरिक्त पुरुषों द्वारा किये जाने वाले बहु विवाह पर रोक लगाने का प्रावधान इस कानून में था और एक पत्नी के रहते दूसरा विवाह कानूनी रूप से अमान्य था। गोद लेने की प्रथा को भी जाति-वर्ग भेद से अलग करने की बात इस कानून में थी।
हिन्दू कोड बिल का विरोध न केवल बाहर बल्कि संविधान सभा में और बाद में बी॰आर॰ अंबेडकर के सभापतित्व में बनायी गयी सलेक्ट कमेटी में भी हुआ। विशेषरूप से राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ, हिन्दू महासभा, द्वारका के शंकराचार्य, स्वामी करपात्री जी महाराज जैसे लोगों और उनके अनुयायियों ने भीषण विरोध किया। कुछ संकीर्णतावादी वकीलों द्वारा ‘ऐंटी हिन्दू कोड बिल कमेटी’ बनायी गयी और देशव्यापी आंदोलन छेड़ा गया। राजेंद्र प्रसाद जैसे व्यक्ति जो बाद में भारत के प्रथम राष्ट्रपति बने वे भी अन्य अनेक लोगों के साथ संविधान सभा के भीतर भरपूर विरोध कर रहे थे। तर्क वही था-परंपरा और हिन्दू धर्म शास्त्र जो स्त्री को पुरुषों के समान बराबरी का अधिकार नहीं देते। स्वामी करपात्री जी ने तो यहां तक कहा कि-एक अछूत (बी॰आर॰ अंबेडकर) को कोई अधिकार नहीं कि वो शास्त्रों से संबंधित मामलों में, जो ब्राह्मणों का अधिकार क्षेत्र है, कोई दखल दे। बड़े-बड़े जुलूस निकाले गये, संविधान सभा का घेराव हुआ, तोड़-फोड़ की घटनाएँ हुईं। 1952 में हुए प्रथम आम चुनावों में संन्यासी के रूप में विख्यात प्रभुदत्त ब्रह्मचारी ने इसी हिन्दू कोड बिल के विरोध के आधार पर पं॰ नेहरू के खिलाफ़ चुनाव भी लड़ा। नेहरू जी बहुत बड़े बहुमत से जीते। चुनाव के बाद अनेक प्रभावशाली महिलाएं लोकसभा में आईं। हिन्दू कोड बिल तथा अन्य अनेक महिलाओं और कम्युनिस्ट पार्टी के सदस्यों ने इन स्त्री हितों की रक्षा करने वाले हिन्दू कोड बिल का समर्थन किया। अंततः 1955 में यह बिल पास हुआ लेकिन अलग-अलग कानूनों के रूप में। ‘हिन्दू मैरिज एक्ट 1955 में तो संपत्ति अधिकार, तलाक का अधिकार, भरण पोषण की प्राप्ति का अधिकार तथा अवयस्क की गार्जियनशिप अधिकार जैसे कानून 1956 में बने। यह तमाम विरोधों के बावजूद जवाहरलाल नेहरू की दृढ़ता तथा तत्कालीन कानून मंत्री, संविधान सभा के अध्यक्ष डाॅ॰ बी॰आर॰ अंबेडकर के अथक प्रयासों और धैर्य का परिणाम था कि वृहद हिन्दू समाज की स्त्रियों को बराबरी का हक मिलने की शुरूआत हुई जिसके कारण आज उनकी सामाजिक सुरक्षा और आत्मविश्वास मिला।
उस समय लगातार इन होने वाले प्रयासों की आलोचना होती रही कि केवल हिन्दू समाज के लिये ही सुधार क्यों। बिल के समर्थकों का यह कहना था कि इस दृढ़ता का परिचय इस कानून को सभी समुदायों पर लागू करके देना चाहिये। समाजवादी जे॰बी॰ कृपलानी ने लोकसभा में बहस करते हुए कहा कि ‘हिन्दू कोड बिल में एकल विवाह का प्रावधान सभी समुदायों पर लागू होना चाहिये। उन्होंने पूरे विश्वास से कहा कि मुस्लिम समुदाय भी इसके लिए तैयार है, केवल वे ही (कानून मंत्री और प्रधान मंत्री) आगे बढ़ कर हिम्मत नहीं कर रहे हैं। लोकसभा के सदस्य और पेशे से वकील हिन्दू महासभा के एन॰सी॰ चटर्जी का भी यही तर्क था कि अगर हम सेक्यूलर राष्ट्र हैं और समझते हैं कि बहु विवाह प्रथा हिन्दू स्त्री समाज के लिये अभिशाप है तो हमारी मुस्लिम बहनें क्यों इस लाभ से वंचित रहें और सभी के लिये समान सिविल कोड हो।
आज भी समान नागरिक संहिता (काॅमन सिविल कोड) बहस का और समय-समय पर उठने वाले सांप्रदायिक उभारों के बीच मुखर होता रहा है। संविधान सभा में जब यह बिल प्रस्तावित हुआ था तो अनेक मुस्लिम सदस्यों का मानना था कि अभी इसके लिये उचित समय नहीं है और यह आगे का विषय है। पिछले पैंसठ-छियासठ वर्षों में वोट की राजनीति मुख्यधारा का स्वरूप बन गयी और इसका साथ जाति आधारित राजनीति ने दिया है। इस अवसरवाद ने सामाजिक प्रश्नों को पीछे धकेल दिया है। आज उन्नीसवीं सदी जैसे प्रखर सामाजिक आंदोलन भी नहीं हैं। धार्मिकता का बढ़ता ज्वर दिन-ब-दिन तीव्र होता जा रहा है और इसका प्रभाव राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय स्तर पर दिखाई देता है। ऐसे में अन्य समुदाय की स्त्रियों के हितों की ओर ध्यान कैसे जायेगा। ऐसे वातावरण में अगर दूसरे समुदाय की स्त्रियां स्वयं जब तक इसके लिये मांग नहीं करेंगी और उठ कर आंदोलन नहीं करेंगी तब तक लोकतांत्रिक राज्य द्वारा प्रदत्त लैंगिक समानता के मूल्य नहीं मिलेंगे। यूँ भी जिस तेजी से टैक्नोलाॅजी का विस्तार हो रहा है और वह रोजमर्रा की जिं़दगी का भी हिस्सा बन रही है, उसी तेज़ी से पुनरुत्थानवादी और अतार्किकता का वातावरण बनाने का भी प्रयास हो रहा है। मुस्लिम समुदाय की स्त्रियों के बीच पर्दे का और बुर्के का चलन आश्चर्यजनक रूप से बढ़ा है और विशेषकर नयी पीढ़ी इस ओर तेज़ी से आकर्षित हो रही है। दूसरी ओर अंधविश्वासों के विरुद्ध, अवैज्ञानिक सोच और कर्मकांडों का विरोध करने वाले डाॅ॰ नरेंद्र दाभोलकर, गोविंद पानसोर और विद्वान प्रोफ़ेसर कालबुर्गी जैसे लोगों की हत्यायें की जा रही हैं।
मध्यकालीन समाज बनाने वाली प्रवृत्तियों के खिलाफ़ व्यवस्था जनित प्रयास जरूरी हैं तो प्रबुद्ध नागर समाज द्वारा बिना किसी प्रकार की अवसरवादिता के प्रगतिशील और जनतांत्रिक मूल्यों के लिये गहन प्रयास करने ही होंगे।
यह विडंबना है कि संकीर्ण परंपरावादी लोग सहज एकजुट हो जाते हैं और निहित स्वार्थों की रक्षा के लिए अधिक सक्रिय होते हैं। स्त्री समानता और जनतांत्रिक मूल्यों के समर्थक प्रबुद्ध समाज को सामाजिक आन्दोलनकारी के रूप में आगे आकर और परंपरागत दबावों का सामना करके ही समस्त स्त्री समाज को न्याय दिलाया जा सकता है।

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