आखिर क्या लिखूं…..? 

हनीफ मदार

हनीफ मदार

कितना तकलीफ़देह होता है उस स्वीकारोक्ति से खुद का साक्षात्कार, जहाँ आपको एहसास हो कि जिस चीज़ की प्राप्ति या तलाश में आप अपना पूरा जीवन और सम्पूर्ण व्यक्तित्व दाँव पर लगाए रहे, इस वक़्त में उसी चीज़ की अपनी सार्थकता ख़त्म हो रही है…| जीवन के महत्वपूर्ण पच्चीस साल इधर लगा देने के बाद आज रूककर सोचने को विवश हूँ कि मैं जो लिख रहा हूँ इसकी सार्थकता क्या है….? सिर्फ मैं ही नहीं सब लेखक इस यातना से गुज़रे हैं या गुज़र रहे होंगे और अपने लिखे की सामाजिक सार्थकता के साथ मुठभेड़ करते हुए मेरी ही तरह खुद से सवाल भी कर रहे होंगे कि मैं किसके लिए और क्यों लिख रहा हूँ….?

आर्थिक उदारीकरण के साथ झूठे आश्वासनों, घोषणाओं के सहारे हर ‘आज’ खुद को बीते कल में धकेलते हुए भी आखिर यह समझने लगा है कि ‘प्राचीन संस्कृति, मार्गदर्शन, आशीर्वाद, शांति, योग जैसी चीज़ें जिनमें उनका कोई अख्तियार नहीं हैं, हमें थमा कर खुद ठोस आधुनिकता की खोज में जुटे हैं | हर ‘आज’ यह देखता आ रहा है कि एक चुकटी राख, तंत्र-मन्त्र एवं राष्ट्रीयता के एक शब्द की कीमत सम्पूर्ण उपभोगी आधुनिकता को खरीदने तक कैसे पहुंचाई जा सकती है | राजनैतिक रूप से इस सामाजिक प्रक्रिया को लेखक भी देखता रहा है | अब लेखक किसी अनाम ग्रह से टपका हुआ प्राणी तो है नहीं वह भी तो इसी समाज का अंग है, इंसान है तो इंसानी फितरत भी है | इसलिए मैं इसे पूरे यकीन के साथ नहीं कह सकता कि सभी के लिए ‘क्या, क्यों और किसके लिए…?’ लिखने के सवालों से जूझने की यातन का ग्राफ या स्तर क्या होगा…? हालांकि यहाँ ऐतिहासिक रूप से  व्यवस्थाई सामाजिक प्रक्रिया के दृष्टिकोण से देखने पर एक बात तो साफ़ नज़र आती है कि हर व्यवस्था आपका समर्थन चाहती रही है जो यह नहीं कर पाता वह गैरजिम्मेदार, असामाजिक और राष्ट्रद्रोही तक होने को अभिशप्त रहा है, तब दोष या प्रतिवद्धता का सवाल बौना हो जाता है |

नहीं तो क्या कारण है कि अपने दौर की सच बयानी के साथ लिखे जाने वाले उपन्यास को अधूरा एवं तीन महत्वपूर्ण कहानियों को पूर्णता पर छोड़कर मैं ठहर गया हूँ और सोच रहा हूँ कि मैं आखिर क्यों लिखूं जब इस लिखे की कोई सामाजिक सार्थकता ही नज़र नहीं आ रही | या ऐसा क्या है मेरे इस लेखन में जो इन्होने, उन्होंने, इसने या उसने नहीं लिख दिया है | वक्ती नाज़ुकता के जिस मुहाने पर हमारी सभ्यता जा खड़ी हुई है वहां पहुंचकर एक ही सवाल बार-बार खुद को दोहराता है कि जो लिखा जा चुका है उसमें इस वर्तमान की कल्पना तो नहीं थी….! तब लगता है कि हाँ निश्चित ही उस चीज़ को कपोल-कल्पित बताकर उसके प्रति निरंतर  नकारात्मक रवैया उसके होने को झुठला रहा है परिणामतः वह चीज़ अस्तित्व विहीन हुई है जिसके लिए अपने बीते जीवन का एक बड़ा हिस्सा मैं लगा चुका हूँ | तब यह वेचैनी आपको भी अस्वाभिक नहीं लगेगी |

मैं यहाँ कुछ न लिखने या लिख पाने के बहाने भी खोज रहा हो सकता हूँ किन्तु इसे भी ध्यान में रखना ही होगा कि लेखकीय मान्यता मिलने के बाद अपने समय की नब्ज़ पर अँगुली रखे हुए हर लेखक चाहता है कि वह कुछ ऐसा लिखे जो सार्थक और रचनात्मकता के साथ प्रासंगिक रूप से अपने वर्तमान में हस्तक्षेप कर सके और वह खुद के होने का एहसास दिला सके | इधर रोहित वेमुला के बाद जे एन यू से कन्हैया तक आते-आते- सुनने-सुनाने, समझने-समझाने की बजाय तार्किक-अतार्किक क्रिया-प्रतिक्रिया की संस्कृति पनप रही है | भारतीय कला, साहित्य और संस्कृति के रूप में सहेजी गई, विशाल राष्ट्रीय चेतना की धरोहर एक शब्द ‘देशभक्ति’ में सिमट रही है | और पल भर में ‘हम’ अपने समाज से विश्वास, प्रेम और हर सुख-दुःख में की गई हिस्सेदारी के रिश्तों को हासिये पर डाल कर भावनात्मक वैचारिकता के साथ अजनबियत से एक दूसरे को देखने को उतारू हो रहे हैं | तब विविधता भरी विराट भारतीयता के बरअक्श एक वैमनस्यता से ओत-प्रोत संस्कृति पनपते समय में यह शब्द अपनी सार्थकता खोते नज़र आते हैं | ऐसे में, लेखक मन का साहित्यिक रोशनी की उम्मीद के बजाय शंकाओं से भर जाना अस्वाभाविक है क्या…?

हो सकता है यह मेरी व्यक्तिगत समस्या हो जिसे मैं आपके साथ बांटकर समझने का प्रयास कर रहा हूँ | हालांकि एक लेखक के तौर पर मिलती पहचान एवं लेखकीय रचनात्मकता और उसके परिणामों से मिलने वाली प्रसन्नता से ही दुनिया के तमाम लेखकों की तरह मेरा ‘मैं’ भी आहार ग्रहण करता है | बावजूद इसके इन दिनों एक अवसाद मुझे निरंतर घेरे हुए है कि जो लिखा है या जो लिख रहा हूँ उसकी सार्थकता कहाँ है…. ? ऐसा भी नहीं है कि मेरे पास लिखने का समय न हो फिर भी यूं रुकने का आशय…? निश्चित ही यह सवाल आपके मन भी आ रहा होगा | दरअसल यह मेरे बाहर की दुनिया से पनपी विवशता है | मेरे गाँव, शहर, राज्य, देश और लोकतंत्र की निरंतर विकसित होती ताज़ा तस्वीर से मेरे भीतर की दुनिया का कुछ टूटा या पिघला है ….|

     यूं मैं पागल या सनकी तो नहीं ही हूँ किन्तु शायद मैं शंकालू हो रहा हूँ और इसीलिए यह सोच रहा हूँ कि प्रेमचंद ने ‘गोदान’, भीष्म साहनी ने ‘तमस’, कमलेश्वर ने ‘कितने पाकिस्तान’ जैसे ‘कालजई’ उपन्यास लिख दिए और शब्दशः बेशुमार हाथों में पहुंचे और पढ़े भी गए…… बावजूद इसके………? ग़नीमत है कि इनमे से कोई भी आज हमारे बीच नहीं हैं नहीं तो निश्चित ही आज ये भी ठहर कर सोचते अपने एक-एक शब्द की सामाजिक और लेखकीय सार्थकता खोजते फिर वर्तमान को देखकर खुद के लिए जस्टिफिकेशन तलाश करते | मुझे तो लगता है कि यह सब उनके लिए भी बहुत पीढ़ादायक होता कि सामाजिक रूप से इंसानी जिम्मेदारी मान कर जिस अभिव्यक्ति के लिए पूरी उम्र दी उसकी ही सार्थकता खत्म हो रही है | इस कुंठा में बीतने वाले इंतज़ार के पल निश्चित ही आशंका को ही जन्म देते |

     ‘लेखक हर समय एक वहस से गुजरता हुआ निकल रहा होता है और वर्तमान की सच्चाइयों से साक्षात्कार करते हुए खुद में आत्मविश्वास भर रहा होता है’ आज मुझे यह लेखकीय सैद्धांतिक बात ही लग रही है जिसे सभी की तरह मैं भी अपनाता रहा हूँ लेकिन क्या कारण है कि आज मुझे वही आत्मविश्वास महज़ भ्रम लग रहा है | हालांकि यही भ्रम जिन्दगी की सार्थकता का बहाना बन जाए तो भी इसमें कोई बुराई नहीं है | तब मुझे लगता है कि मेरी तरह सभी अत्यधिक आत्मविश्वासी लोग इसी भ्रम के सहारे ही खड़े हैं नहीं तो, ‘आज’ की बुनाबट के रेशे-रेशे की सच्चाई को पूरी इमानदारी से बायान न कर पाने की मजबूरी में निश्चित ही आत्महत्या कर लेंगे | तब क्या यही है मेरे बीते पच्चीस वर्षों का परिणाम कि मुझे ऐसा लिखने या कहने से बचना या कतराना चाहिए जिसमें समय की सच्चाई को लिखने की विवशता हो…… तब मैं क्यों न ठहर जाऊं और सोचने को विवश होऊं कि मैं क्यों और क्या लिखूं जो सार्थक हो या वह अपनी सार्थकता बचा सके |

     ‘उम्मीद’ यह एक शब्द भर है किन्तु मैं किसी शब्द की सामर्थ्य और सार्थकता खत्म नहीं कर सकता लेकिन हर लिखे जाने वाली लाइन के साथ उठ खड़े होने वाले सैकड़ों सवालों का मानवीय और वैज्ञानिक मूल्यांकन व्यापक संदर्भों में यह मांग करने लगते हैं कि वर्तमान अत्याधुनिक वक्त में हमारी हज़ारों साल पुरानी ‘प्राचीन संस्कृति और सभ्यता का पुनर्निर्माण के छद्म युद्ध में इंसान से इंसान तक के पुल को टूटते देखने के बाद भी चुप रहने की बाद्ध्यता जो भयानक शून्य की ओर इशारा करता है ऐसे में सबकुछ लिख डालने की ज़द्दो-जहद और न लिखने की विवशता या मजबूरी हम सब के सामने कुछ सवाल तो खड़े करती ही है ….|

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