स्त्री विमर्श के बीच युवा लेखिका शालिनी श्रीवास्तव की कहानियां स्त्री मुक्ति को सदियों से घेरे खड़ीं सामाजिक रूढ़िवादी मान्यताओं से सीधे मुठभेड़ करती हैं | शालिनी की स्त्री आक्रान्ता नहीं बनती बल्कि सहज और पारिस्थितिक घटनाओं के साथ वैज्ञानिक तर्क प्रस्तुत करती गुजरती हैं | – संपादक

शालिनी श्रीवास्तव

         शालिनी श्रीवास्तव

आगाज़

श्वेता का मन उत्सुकता से भरा हुआ था। पूरे दस महीने बाद अपने मायके जाना, बार बार छम से मन में उमंगों की लहर दौड़ा जाता। उसने शाम को ही सारी पैकिंग निपटा ली, रुकना सिर्फ दो दिन था पर कपड़ों से एक बड़ा बैग तैयार हो गया था। ‘‘उफ…., एक-एक, दो-दो जोड़ी कपड़े रखे हैं फिर भी ये बैग इतना भर गया है और अब यह बंद भी नहीं हो रहा……!‘‘ कई बार प्रयास करने पर भी विफल हुई श्वेता ने आखिरकार रोहित से मदद मांगी।‘‘ श्रीमती जी क्या जरूरत है इतना सब कुछ ले जाने की… कुछ निकाल दूँ ?‘‘ ‘‘नहीं…. नहीं एक भी चीज़ फालतू नहीं है आप बस इसे बंद कर दीजिए‘‘ ‘‘जो हुकुम सरकार का…… लो जी बंद हो गया, पर खुलने लायक बचा है या नहीं ये हमारी गारंटी नहीं ‘‘ रोहित ने शरारत भरी अदा में कहा।‘‘
‘‘ सुबह छः बजकर दस मिनट की ट्रेन है इसलिए जल्दी उठ जाना और मुझे भी जगा देना‘‘ श्वेता से कहकर रोहित बेफि़क्र होकर अपनी रज़ाई में दुबक गया। श्वेता को तो आज नींद ही कहां आनी थी, उसे तो बस अपने अम्मा-बाऊजी से मिलने की बेचैनी थी। उसकी शादी को दो साल हो गये हैं पर इतना लम्बा वक्त उसने कभी अपने अम्मा-बाऊजी को मिले बिना नहीं गुज़ारा था। रोहित जब भी श्वेता के चेहरे को उदास पाता था वह तुरंत उसे उसके अम्मा-बाऊजी से मिलाने ले जाता, लेकिन जब से कुदरत के एक नन्हे वरदान ने उसकी कोख में जगह बनाई तब से सासू माँ का सख़्त आदेश था-‘‘ऐसी हालत में यमुना पार नहीं करते‘‘ इन बातों पर ना तो श्वेता को विश्वास था और ना ही रोहित को, पर अपनी माँ के आदेश को न मानने का साहस रोहित में नहीं था। अब श्वेता की गोद में एक स्वस्थ और सुंदर बेटा आ जाने के बाद उसकी पहली इच्छा अम्मा-बाऊजी से मिलने की ही थी चार दिन हॉस्पीटल और चार दिन घर में बिताने के बाद रोहित ने किसी तरह माँ से श्वेता को उसके मायके ले जाने की इज़ाज़द माँगी चाराें बहनों में सबसे छोटी होने के कारण श्वेता अपने अम्मा-बाऊजी की लाड़ली थी। वह अपने पिता को बाऊजी और माँ को अम्मा कहती थी उसके बाऊजी ने अपनी पूरी पूँजी लगाकर श्वेता की शादी इस परिवार में की थी। इस बात से श्वेता काफी नाराज़ हुई थी पर बाद में रोहित जैसे खुश मिज़ाज इंसान को पाकर वह अपनी इस नाराजगी को भूल गई । रोहित का परिवार सम्पन्न और धन-धान्य से पूर्ण था। बड़े भाई साहब का चाँदी के तार का बिज़नेस था और रोहित भी इण्टर कॅालेज में मैथ्स पढ़ाता था। घर में किसी बात की कोई कमी नहीं थी। श्वेता के बाऊजी को शायद इस बात का भय था कि यदि शादी में कोई कमी रह गई तो कहीं इसका मूल्य उनकी बेटी को न चुकाना पड़े। ये परिस्थिति भारतीय समाज के हर उस पिता की होती है जो बचपन से अपनी बेटी को सिर्फ इस चिंता के साथ पालता है कि मुझे अपनी बेटी की शादी एक अच्छे परिवार में करनी है ताकि उसके आगे का जीवन भी ख़्ाुशी के साथ बीत सके। और फिर एक-एक पैसा जमा करते हैं उसके सुखद भविष्य के लिए कयोंकि जितना ज़्यादा दहेज़ देगें उतना ही अच्छा लड़का मिलेगा। कभी-कभी तो हँसी आती है जैसे लड़को की पैंठ लगी हो आर खरीददार मुँह माँगी रकम देकर खरीद रहे हाें जिसमें सबसे ज्यादा कीमत वाला साकारी नौकर होता है जिसके साथ लाइफ इन्श्योरेंस फ्री होता है।
मथुरा जंक्शन से करीब डेढ़-दो घंटे में गाडी हाथरस स्टेशन पर पहुँच गई रास्ते में पड़ने वाले स्टेशनों पर गाड़ी रुकती और श्वेता की अकुलाहट बढ़ जाती पर कुछ ही मिनटों बाद गाड़ी दोबारा अपने लक्ष्य को भेदने के लिए दौड़ जाती। आखिरकार श्वेता के इंतज़ार का लम्बा वक़्त खत्म हो गया। ये छोटा-सा शहर उसका अपना था, यहाँ की हर गली, मौहल्ले, बाज़ार से उसका कभी न कभी आना-जाना होता ही था। यहाँ के रिक्शे भी मथुरा के रिक्शों से अलग थे। स्टेशन से बाहर आते ही रिक्शों, आॅटो वालाें की भीड़ ने उन्हें घेर लिया। उस भीड़ में एक बूढ़े आदमी ने अपनी आँखे थोड़ी छोटी करके श्वेता की तरफ देखा, श्वेता का ध्यान भी अनायास उसकी तरफ गया-‘‘श्वेता बिटिया बहुत दिनों बाद आई हो‘‘ उस बूढ़े व्यक्ति ने किसी शक के बिना ही श्वेता को पहचान लिया। ‘‘अरे भोलू चाचा……….! आप अब भी रिक्शा चलाते हो‘‘ ‘‘हाँ बिटिया पापी पेट के लिए सब कछु करन पड़े, लाओ अपना सामान हमें दे दो और आराम से रिक्शा में बैठ जाओ हम तुम्हे घर पहुँचा दें‘‘ ‘‘भोलू चाचा हमारे घर के पास ही रहते हैं एक समय था जब इनके घर में किसी चीज की कोई कमी नहीं थी पर बेटे ने इन्हे बर्बाद कर दिया तब चाचा को अपना और चाची का पेट पालने के लिए रिक्शा चलाना पड़ा।‘‘ श्वेता दुख और पछतावे के साथ अपनी बात रोहित को बता रही थी। ‘‘और बिटिया घर मां सब कछु ठीक-ठाक ‘‘ ‘‘हाँ चाचा सब बढि़या है आप और चाची कैसे हो…..?‘‘ ‘‘चाची थोड़ी बीमार रहने लगी है बेटा, एक तो बूढ़ा शरीर और दूजा दुखी मन। उसका बेटा तो खाता है, पीता है और बेशमरे की तरह टाँग फैलाकर सो जाता है पर तेरी चाची को तो जैसे रोटी अंग ही नहीं लगती, दिन भर का वही सब, बेटे की हरकतों को देखकर कुढना,कितना समझाता हूँ उसे,मत ध्यान दिया कर, पर मानती ही नहीं है।‘‘ ‘‘चिंता न करो चाचा मैं मैं चाची को समझा दूँगी‘‘ ‘‘हाँ बिटिया तुम घर आओगी तो उसे बड़ा अच्छा लगेगा……‘‘ श्वेता का घर बस आने ही वाला था गली के इस नुक्कड़ पर उसका स्कूल था, जहाँ उसने अपनी पढ़ाई पूरी की थी- ‘‘रोहित मैं इसी इण्टर कॉलेज में पढ़ती थी और जानते हो यहाँढेर सारे चांट-पकौड़ी, भेलपुरी, चूरन और न जाने कितने कितने ही ठेले लगे रहते थे, हम बारी-बारी से एक-एक करके कभी कुछ और कभी कुछ खाया करते थे, बड़ा अच्छा लगता था। वो दिन भी ना……..!‘‘ श्वेता किसी नये पंखों वाली चिडि़या की तरह चहक रही
थी, एक बच्चे की माँ खुद बच्चा बन गई थी। रोहित भी श्वेता के इस चमकते-चहकते चेहरे को देखने लिए तरस गया था । ‘‘लो बिटिया तुम्हारा घर आ गया, बाऊजी को हमारा राम-राम कहना, अच्छा बिटिया चलता हूँ‘‘ ‘‘ क्यों चाचा आप भी अंदर चलो ना, थेड़ा पानी-वानी पी लेना और सुस्ता लेना‘‘ ‘‘ना बिटिया दूसरी ट्रेन का बखत हो गया है, अगर ट्रेन निकल गई तो सवारी नहीं मिलेंगी…… अच्छा जमाई बाबू राम-राम….‘‘ थके हुए बूढ़े शरीर ने रोहित के आगे झुक कर उसे नमस्कार किया। रोहित के लाख आग्रह पर भी उन्होंने रोहित से अपना मेहनताना भी नहीं लिया।
घर में प्रवेश करते ही खुशियों के साथ-साथ आंसू भी बहे, श्वेता की अम्मा समय और उम्र से ज़्यादा बूढ़ी नजर आती थी बाऊजी भी कुछ ठीक-ठाक नहीं थे दोनों बस इस बुढ़ापे में एक दूसरे का सहारा थे। श्वेता के बाऊजी को आंखों से कम दिखाई देता था जिसके कारण वह कहीं आ-जा नहीं सकते थे। श्वेता की शादी के बाद जब भी कोई त्यौहार पड़ता था तब श्वेता का चचेरा भाई आनंद ही उसके ससुराल में परम्परा और रीति-रिवाज़ के अनुसार पहुँचाता था। रोहित ने पिछले कई दिनों से कॉलेज से छुट्टियाँ ले रखी थी इस लिए वह श्वेता के साथ नहीं रुका और खाना खाकर वापस मथुरा चला आया। श्वेता के अम्मा- बाऊजी अपने नाती को देखकर फूले नहीं समा रहे थे ‘‘ लल्ली बिल्कुल तुम पर गया है, वही नैन-नक्स, गोरा रंग……, भगवान का लाख-लाख शुक्र है कि हमरी आँख मुंदने से पहले तुम्हारी भी गोद भर गई‘‘ आँखो में नमी लिए श्वेता की अम्मा ने कहा ‘‘कैसी बातें करती हो अम्मा अभी तो तुम इसकी शादी भी करोगी‘‘ श्वेता की बातें सुनकर तीनों के चेहरे पर हँसी आ गई।
दोपहर से शाम हो चली थी श्वेता ने बेटे को बाऊजी के पास सुलाकर माँ के साथ रसोई में खाना बनाने चली आई ‘‘पता है अम्मा आज हमें भोलू चाचा मिले थे बेचारे इस उम्र में भी रिक्शा चला रहे हैं…..,अम्मा सुना है चाची बीमार हैं….? ‘‘ ‘‘हाँ लल्ली निकम्मे बेटे को देख-देखकर कुढ़ती रहती है‘‘ ‘‘अम्मा हमें उनसे मिलने जाना है तुम कुछ मिठाई और ये नमकीन बांध दो हम उन्हें दे भी आएंगे और इसी बहाने उनसे मिल भी आएंगे।‘‘ ‘‘पर लल्ली इतनी ठंड में क्यों जा रही हो कल दोपहर में चली जाना।‘‘ ‘‘नहीं अम्मा कल समय नहीं मिलेगा हमें और भी कई काम करने हैं हम अभी चले जाते हैं मुन्ना अभी सो रहा है आप बस उसका ख्याल रखियेगा हम बस अभी आये।‘‘ ‘‘अच्छा ठीक है अभी मिल आओ पर ज़्यादा रात न करना लल्ली…….‘‘ ‘‘ना अम्मा हम जल्दी आ जायेगें‘‘
सुमित्रा चाची का घर श्वेता के घर से चंद घरों के फासले पर था कुछ मिनटों में ही श्वेता सुमित्रा चाची के घर पहुँच गई। ‘‘राम-राम चाचीजी‘‘ कौन……? अरे श्वेता बिटिया तुम कब आईं, बड़े दिना बाद आई हो बिटिया… आजाओ यहाँ बैठ जाओ……।‘‘ चाची के घर में कुछ नहीं बदला था, वही दो कमरों का छोटा-सा घर। अंदर वाले कमरे का दरवाजा बाहर के पहले कमरे से होकर ही जाता है, छोटा सा आंगन और उसी में एक कोने में लकड़ी के खंभे पर टिकी टीन के नीचे उनकी रसोई। सुमित्रा चाची के घर गैस थी पर अब वह दिखाई नहीं दे रही है शायद उसे वहन करने लायक आमदनी नहीं रही। चाची ने लगभग बुझे हुए चूल्हे को फिर से सुलगा कर श्वेता के लिए चाय बनाई। ‘‘ये लो बिटिया गर्म चाय, तुम्हारे चाचा अभी आये नहीं हैं वरना कछु खाने-पीने को मँगा देती‘‘ ‘‘नहीं चाची इतनी तकलीफ मत करो मैं तो बस आपको ये मथुरा के पेड़े देने आयी थी आपको अच्छे लगते हैं ना, अब तुम्हारी बिटिया मथुरा की रहने वाली है तो इतना तो ख्याल रख ही सकती हूँ‘‘ और बिटिया तुम्हारा बेटा कैसा है, और मेहमान क्यों नहीं आये तुम्हारे साथ….?‘‘ ‘‘ सब बढि़या चल रहा है, चाची मुन्ना भी ठीक है और रोहित भी कल आयेगें मुझे लेने, थोड़ा व्यस्त थे इसलिए आज छोड़कर लौट गय थे। अच्छा चाची अब चलती हूँ मुन्ना जग गया होगा तो अम्मा को परेशान कर रहा होगा, उसे सोता हुआ छोड़कर आई हूँ‘‘ ‘‘ठीक है बिटिया, ठंड बहुत होगई है मुन्ना को ठंड से बचाकर रखना,पहली ठंड है ना।‘‘ ‘‘ठीक है चाची।‘‘ ‘‘बिटिया सुनो……, तुम से एक बात पूछनी थी पर पूछूं या नहीं समझ नहीं आ रहा……….!‘‘ ‘‘अरे चाची इसमें इतना सोचने वाली क्या बात है……… कहिए ना क्या बात है।‘‘ ‘‘बिटिया तुम्हारे बाऊजी पर तुम्हारी शादी का कोई कजऱ्-वजऱ् बाकी है क्या……..?‘‘ ‘‘नहीं चाची आपसे किसने कहा……,बाऊजी को तो मैंने कभी कोई कजऱ् नहीं लेने दिया…..!‘‘ ‘‘पता नहीं बिटिया लोगाें को कुछ बातें करते सुना था तो मन बेचैन था इसलिए पूछ लिया।‘‘ श्वेता ने चाची के घर से विदा ली। घर आई तो आनंद को घर पर बैठा पाया-‘‘अरे… भईया आप…..! हम अम्मा से कह ही रहे थे कि कल आपसे मिलने जाएंगे ‘‘मुझे भी जैसे मालूम चला कि तुम आई हो तो मिलने चला आया,कैसी हो…. रोहित जी कैसे हैं….?‘‘ श्वेता और उसकी तीनों बहनें रोहित के लिए अपनी बहने ही थीं, श्वेता भी रोहित को अपने बड़े भाई की तरह ही मान-सम्मान दिया करती थी। ‘‘सब अच्छा चल रहा है भईया‘‘ अम्मा ने दोनों के लिए खाना लगा दिया था, बाऊजी दूसरे कमरे में मुन्ना को निहारते हुए वहीं खाना खा रहे थे अम्मा के रसोई घर वापिस जाते ही आनंद ने श्वेता से कहा-‘‘श्वेता तुम्हें कुछ बताना है खाना खाकर ज़रा बाहर चलना‘‘ अम्मा भी अपना खाना लेकर उनके साथ खाने लगी। श्वेता का मन अब खाने में नहीं लग रहा था उसके मन में एक साथ कई ज्वार-भाटे फूट रहे थे, पहले चाची और भईया…..। आनंद ने बड़े गम्भीर स्वर में अपनी बात कही थी जल्दी से खाना निपटा कर श्वेता आनंद के साथ बाहर जाने के लिए तैयार होने लगी पर तभी दूसरे कमरे से बाऊजी की आवाज़ आई मुन्ना जग चुका था श्वेता अपने बेटे को लेकर इतनी ठंड में बाहर नहीं जा सकती थी आनंद ने श्वेता से कल आने का वायदा किया और अपने घर चला गया। श्वेता का दिमाग शंकाओं से चकरा रहा था ‘‘ऐसी कौन-सी बात हो सकती है जो आनंद भईया मुझसे कहना चाहते हैं….? क्या वाक़ई चाची की बात सच है या कोई और बात है‘‘ सोचते-सोचते न जाने कब श्वेता नींद के सागर में डूब गई उसे पता ही नहीं चला। सुबह बाहर घना कोहरा था जनवरी की ठंड अपनी पूरी रंगत दिखा रही थी रोहित भी दस-साढे़ दस तक आने वाला था पर रोहित के आने से पहले ही आनंद आ गया श्वेता ने मुन्ना को अम्मा के पास लिटा दिया और रसोईघर में आनंद के लिए चाय बनाने चली आई, आनंद भी वहीं उसके पास चला आया ‘‘भईया आप रात को क्या बात करना चाह रहे थे प्लीज़ मुझे बताओ मुझे रात भर यह बात परेशान करती रही। ‘‘देखो श्वेता मैं तुम्हें परेशान नहीं करना चाहता था पर बात ही कुछ ऐसी है कि तुम्हें बताना ज़रूरी है तुम जानती हो श्वेता घर का सारा खर्च सिर्फ चाचाजी की पेंशन से चलता है उसमें भी हर दूसरे महीने कोई ना कोई त्यौहार पड़ जाता है और पेंशन का लगभग आधा हिस्सा तुम्हारे घर पर दिये जाने वाले त्यौहारों पर खर्च हो जाता है कई बार तो हालात ऐसे भी आये हैं कि चाचाजी ने पैसे उधार माँग कर त्यौहार पर भेजे जाने वाला सामान खरीदा है पहले मुझे लगा शायद बहन-बेटियों को देने से कभी कमी नहीं आती पर बात अब कछ ज्यादा ही बिगड़ गई है। तुम्हारे बेटे होने की खुशी में अब तुम्हारे घर छोछक भेजने की तैयारियाँ हो रहीं हैं और जानती हो श्वेता छोछक में होने वाले खर्च के पैसे कहाँ से आएंगे…….? चाचाजी इस मकान को गिरवी रखकर कन्हैया सुनार से चालीस हजार रूपया उधार ले रहे हैं उन्होनें मुझे बुलाकर सारे कागज़ वग़ैरह दिखाये थे ताकि पैसे उधार ले सकें। श्वेता चाचाजी के पास ले-देकर सम्पत्ति के नाम पर सिर्फ यह मकान बचा है अगर ये घर भी चला गया तो बुढ़ापे में क्या होगा चाचा-चाचीजी का……? तुम तो जानती हो ये सुनार लोग मूल से ज़्यादा ब्याज़ वसूलते हैं। ईश्वर ना करे……. अगर बुढ़ापे में सर से छत भी चली गई तो कहां रहेंगे….? बेटियों के घर का पानी भी नहीं पीते रहना तो बहुत दूर की बात है…….। अब तुम ही बताओ इन हालातों में क्या करना चाहिए…..?‘‘ श्वेता को जैसे एक धक्का-सा लगा हो वह सब जानती थी कि घर के क्या हालात है पर क्या करे त्यौहारों पर इतना सब कुछ करने के बावजूद उसकी सास कमियां ही निकालती थी पर अब उसे कुछ करना होगा वह अपने अम्मा-बाऊजी के हालातों को और नहीं बिगड़ने देगी। उसने अपना मन पक्का किया और आनंद से कहा-‘‘भईया आप मुन्ना के प्रोग्राम में ज़रूर आना मगर अपने साथ कोई भी सामान मत लेकर आना, अम्मा-बाऊजी को मैं समझा लूँगी पर आप किसी भी तरह ये मकान गिरवी मत रखने देना‘‘ ‘‘लेकिन श्वेता चाचाजी तो आज ही जाने वाले हैं उस कन्हैया सुनार के यहां……‘‘ ‘‘भईया आप चिंता मत करो,मैं बात करुँगी‘‘ आनंद चला गया मगर श्वेता अब भी मकड़ जाल में फंसी थी कि आखिर किस तरह अम्मा-बाऊजी को मनाये तभी दरवाज़े से रोहित ने घर में प्रवेश किया श्वेता ने बिना किसी देरी के सारी बाते रोहित को बता दी और रोहित ने अम्मा-बाऊजी को घर गिरवी न रखने के लिए मना लिया श्वेता ने भी मुन्ने का वास्ता देकर किसी भी तरह का कोई भी खर्चा न करने का वायदा ले लिया। श्वेता के दिल में अब कुछ तसल्ली सी महसूस हुई मगर साथ ही साथ ही एक डर भी उसे अंदर से हिला रहा था कि प्रोग्राम के दिन घर में किस तरह का माहौल बनेगा?
श्वेता को अपने घर आये कई दिन बीत चुके थे मुन्ना के प्रोग्राम की प्लानिंग शुरू हो गई रोहित के माँ-बाप अपने पोते के होने की खुशी में उसका प्रोग्राम बहुत धूम-धाम से करना चाहते थे किसी भी तरह की कोई कमी नहीं रखना चाहते थे। सासू माँ बहाने-बहाने से श्वेता को बता जाती कि उसके घर से क्या-क्या आना चाहिए मगर इस बार श्वेता बधिरों की तरह व्यवहार करती जैसे कुछ सुना ही नहीं। आखिरकार वो दिन भी आ ही गया जिस दिन के लिए श्वेता को सारी बातें सुनाई जा रही थीं सुबह से ही घर में मेहमानों का जमावड़ा शुरू हो गया था दूर के रिश्तेदार एक दिन पहले ही आगये थे। सुबह सत्यनारायण की कथा, हवन, गृहशुद्वि आदि का कार्यक्रम था। हलवाई ने अपनी कढ़ाई रात से ही चढा रखी थी तरह-तरह की मिठाइयाँ-पकवान तैयार किए जा रहे थे। सभी के चेहरे खिले-खिले थे सिवाय श्वेता के। श्वेता को इस माहौल में अपनी ननद कम और सहेली ज्यादा गीता की याद आ रही थी गीता और श्वेता की उम्र में ज़्यादा फ़र्क नहीं था दोनों ही सहेलियों की तरह ही व्यवहार करती़ थीं। गीता ने जब प्रेम विवाह करना चाहा तब रोहित और श्वेता ने ही उसका साथ दिया था। श्वेता की शादी के छः महीनों बाद ही गीता ने भी शादी कर ली और अब उसकी भी गोद हरी होने वाली है जिसके कारण वह आज प्रोग्राम में नहीं आ पा रही है। श्वेता का दिल बार-बार तेज़ी से धड़क रहा था ‘कहीं मैं उस वक़्त कमज़ोर न पड़ जाऊँ क्या मैं अपनी बात को इतने लोगों के सामने कह पाऊँगी…….?‘शायद रोहित ने श्वेता के मन की हलचल को भँाप लिया था वह बार-बार श्वेता की तरफ देख रहा था पर श्वेता न जाने किस गहन सोच में डूबी हुई थी ‘‘क्या बात है श्वेता… इतनी परेशान क्यों हो……?‘‘ अधीर हेते हुए रोहित ने पूछ ही लिया। ‘‘रोहित मुझे बहुत घबराहट हो रही है शाम को जब आनंद भईया आएंगे तब क्या होगा……… माँ जी किस तरह का व्यवहार करेंगी……?‘‘ ‘‘तम इतनी चिंता क्यों करती हो श्वेता, कुछ नहीं होगा, हम माँ को समझा लेगें‘‘
शाम के कुछ साढ़े-सात बजे थे। फरवरी की गुलाबी ठंड से माहौल सज रहा था। सभी रिश्तेदार माहौल की रंगीनियत का लुत्फ़ उठा रहे थे साथ-साथ तीर की तरह एक सवाल श्वेता के सीने में चुभा जाते-‘‘मायके से कोई नहीं आया बहू…..?‘‘ श्वेता जानती है कि सभी को उसके मायके वालों का इंतज़ार क्यों है?, तभी आनंद हाथ में मिठाई का डिब्बा लिए श्वेता के सामने खड़ा था आनंद को देख श्वेता की आँखों से उसकी कमज़ोरी आँसू बनकर बहने लगी। आनंद विचलित हो गया ‘‘क्या बात है श्वेता,सब ठीक तो है ना….. तुम्हारी आँखों में आँसू क्यों है……..?‘‘ ‘‘कुछ नहीं भईया, मेरा साहस धीरे-धीरे कमज़ोर पड़ रहा है‘‘ ‘‘देखो श्वेता इतना बड़ा फैसला तुमने एक साहस के साथ लिया था फिर इस तरह कमज़ोर पड़ना……. नहीं श्वेता तुम कमज़ोर नहीं हो सकती। आनंद श्वेता को समझा ही रहा था तभी रोहित कमरे में आया,अब आप ही इसे समझाइये रोहित जी इस तरह अब कमजोर न हो‘‘ आनंद ने अपने मन की बेचैनी रोहित के सामने रखी, तभी एक और व्यक्ति का कमरे में प्रवेश हुआ ये रोहित की मौसी थी ‘‘आनंद बेटा तुम जो भी सामान लाये हो वह मुझे दे दो वो क्या है ना दीदी को सामान बाहर सबके सामने रखना है‘‘ मौसी ने अपनी बात को कहते हुए पूरे कमरे का मुआयना कर लिया शायद वह आनंद द्वारा लाये जाने वाले सामान को ढूँढ रही थी मगर कुछ न दिखाई देेने पर उनके चेहरे पर कुछ सवालिया निशान उभर आये। आनंद ने बड़ी शालीनता के साथ मिठाई का डिब्बा मौसी जी के आगे बढ़ा दिया धीरे-धीरे बात हवा की तरह उड़ती हुई सभी के कानों में पहुँच गई, रोहित की माँ गुस्से में तमतमाते हुए कमरे में आयीं ‘‘बहू ये क्या मज़ाक है मैंने तुम्हें पहले ही बता दिया था कि क्या-क्या सामान आना है, कितने जोड़ी कपड़े आने हैं तुम्हारा भाई सिर्फ मिठाई का एक डिबबा लेकर चला आया है, क्या इन्हे रीति-रिवाज़ नहीं मालूम…….?‘‘ ‘‘रीति-रिवाज…….? अभी तक सारे रीति-रिवाज़ ही तो निभाते आ रहे थे मेरे अम्मा-बाऊजी लेकिन मैं अब और रीति-रिवाज़ के नाम पर अपने अम्मा-बाऊजी का खून नहीं चुसने दुँगी….., माँ बाऊजी मकान गिरवी रखकर सारा सामान जुटा रहे थे इसलिए मैंने ही उनसे कुछ भी भेजने के लिए मनाकर दिया।‘‘ श्वेता के होठ लड़खड़ा रहे थे पर उसका सुर निर्भीकतापूर्ण था।
हमारे भारतीय समाज में आत्म हत्याऐं कई प्रकार से की जाती है मगर सबसे ज़्यादा आत्म हत्याऐं इन रीति-रिवाज़ों,परम्पराओं के नाम पर ही होती हैं। बेटी का बाप सिर्फ परम्पराओं को निभाते-निभाते ही कजऱ्दार हो जाता है और बाद में उसका खून इस कदर चूस लिया जाता है कि दम निकल ही रहता है।
रोहित की माँ ने बाहर जाकर बात को संभालते हुए बोल दिया सामान तैयार नहीं था इसलिए दो-एक दिन में आयेगा। सारे मेहमान खाना खाकर खाकर विदा हो गये, कुछ एक सुबह तक रुके और बाद में वे भी चले गये। मेहमानोंं के जाते ही रोहित की माँ ने घर में बखेड़ा खड़ा कर दिया, उन्हाेंने श्वेता के घर से आया दहेज़ का सारा सामान घर से अलग कर दिया और उन दोनों को अलग पका-खाने को कह दिया रोहित और श्वेता के लाख समझाने पर भी रोहित की माँ का गुस्सा कम नहीं हुआ आखिरकार उनकी मर्जी के अनुसार रोहित और श्वेता को अलग होना ही पड़ा यहां तक कि उन्हें परिवार के दूसरे सदस्यों से बात करने तक की मनाही थी।
श्वेता के फोन पर अचानक गीता का नम्बर घनघनाया दूसरी ओर से एक खुश मिज़ाज़ आवाज़ ने श्वेता का स्वागत किया ‘‘हैलो भाभी कैसी हो, हमारा मुन्ना कैसा है…….?‘‘ गीता की आवाज सुनकर श्वेता का दर्द उभर आया। उसने अपनी ननद को नहीं बल्कि अपनी सहेली को सारा हाल बयाँ कर दिया। ‘‘भाभी आप दुखी मत हो मैं आपकी तकलीफ को महसूस कर सकती हूँ आप बस पाँच महीनों का इंतज़ार कर लो उसके बाद देखना मैं सब कुछ ठीक कर दूँगी अभी रखती हूँ शेखर आने वाले हैं ओ.के. भाभी बाय और हाँ किसी तरह की चिंता मत करना सब ठीक हो जायेगा।‘‘ गीता के शब्दों ने श्वेता के जख्मो पर कुछ मरहम लगाया। गृहस्थी की गाड़ी एक बार फिर पटरी पर आई,रोहित और श्वेता ने इस नये माहौल में खुद को ढाल लिया था। एक शाम रोहित घर पर कुछ परेशान-सा लौटा, श्वेता के पूछने पर उसने बताया ‘‘बड़े भईया का बिज़नेस फेल हो गया है उन्हीं की फैक्टरी में काम करने वालेे एक क्लर्क ने उनका पूरा बिज़नेस टेक ओवर कर लिया है उसने भइया से कम दाम पर माल बेच कर भईया के सारे ग्राहक अपनी ओर कर लिए हैं।‘‘ रोहित के सम्बंध अपने भाई से जस के तस थे सिर्फ माँ के आदेश का पालन करने करने के लिए दोनों भाई एक दूसरे से बात नहीं किया करते थे लेकिन घर से बाहर वह दोनों अपनी परेशानियां बांट लिया करते थे ‘‘अब क्या होगा रोहित…..? उस घर का सारा खर्च सिर्फ भइया की कमाई से ही चलता है पिताजी को मिलने वाली पेंशन से तो पूरे घर का गुज़ारा नहीं होगा‘‘ ‘‘तुम ठीक कह रही हो श्वेता मैं भी इसी बात के लिए परेशान हूँ , माँ को हम से किसी भी तरह की मदद गवारा नहीं होगी‘‘ ‘‘एक बार कोशिश करके देखते हैं शायद माँ जी कुछ पिघल जायें‘‘ ‘‘मैं माँ को अच्छी तरह से जानता हूँ श्वेता वह ऐसे वक्त में तो वह हमें कभी नहीं अपनाएंगी, वह हमारी मदद लेना कभी पसंद नहीं करेंगी।‘‘
गीता ने पाँच महीनों का इंतजार करने को कहा था,पाँच महीने पूरे होने में बस कुछ ही हफ़्ते बाकी थे। समय बीता और एक दिन गीता के बेटा होने की खबर आई। घर में सब लोग बहुत खुश थे। बड़ी भाभी ने चोरी-छुपे श्वेता को यह खबर सुनाई थी। ‘‘शयद गीता इसलिए पाँच महीनों का इंतजार करने को कह रही थी ताकि अब वह घर आकर माँ और हमारी सुलह करा सके।‘‘ मगर अगले ही दिन भाभी ने एक और बात श्वेता को बताई-‘‘श्वेता गीता ने छोछक पर भेजे जाने वाले सामान की लिस्ट भेजी है जिसमें सोने-चाँदी और कपड़ों को मिलाकर कुल साठ-सत्तर हजार का खर्च आयेगा। अब तुम ही बताओ, गीता से हमारे घर के हालात छुपे नहीं है फिर भी उन्होंने ये लिस्ट घर पर भिजवा दी………!’’ श्वेता चुप थी क्योंकि वह इस स्थिति का सामना कर चुकी थी। ‘‘माँ जी का क्या कहना है…..?‘‘ वह तो मेरे और अपने गहनों को बेचकर सामान लाने को कह रही हैं‘‘ ‘‘भाभी क्या आपको ये ठीक लग रहा है, क्या भइया कभी दोबारा आपके गहने जुटा पायेंगे और ईश्वर न करे अगर कोई इमरजेंसी आ जाये तब क्या होगा तब किस तरह उसका सामना किया जायेगा…….?‘‘ यही सब सोचकर मैं परेशान हूँ श्वेता‘‘
कितना अज़ीब माहौल था घर का। श्वेता ने गीता को सब कुछ बता दिया था फिर भी उन्हाेंने माँग क्यों रखी। ये बात श्वेता की समझ से परे थी। इस बात को हुए दो दिन बीत गये थे, अचानक खबर आई कि गीता शेखर और अपने बेटे के साथ घर आई है और श्वेता को माँ जी के कमरे में बुलाया गया है ‘‘कैसी हो भाभी……?‘‘ गीता के स्वर में एक ख़नक मौज़ूद थी मगर श्वेता को माँ जी की आँखों में गर्माहट महसूस हो रही थी। कुछ ही देर में घर के सारे सदस्य एक-एक करके उस कमरे में जमा होते चले गये। ‘‘माँ हमें कुछ नहीं चाहिए इस लिस्ट में लिखा एक भी सामान हमें नहीं चाहिए‘‘ गीता ने बड़े ही शांत और स्थिर स्वर में अपनी बात कही। गीता के शब्दों को सुनकर सभी के चेहरे सवालिया हो गये। माँ क्या परम्परा निभाना इतना ज़रूरी है कि उसकी कसावट से रिश्ते ही दम तोड़ दें……? में आपसे पूछती हूँ कि क्या रीति-रिवाज़ हम इंसानी सांसों से ज़्यादा ज़रूरी हैं क्या परम्पराओं को तोड़ा नहीं जा सकता या उन्हें अपने जीवन की सहूलियत के अनुसार मोड़ा नही जा सकता…….? आज घर के हालात मुझसे छुपे नहीं है तो क्या ऐसे में परम्पराओं की घिसी-पिटी रूढ़ीवादी सोच को बदलकर एक नई सोच को आगे नहीं ले जाना चाहिए जो हमारी आने वाली पीढ़ी को एक नई दिशा दे……। माँ मैं तो कहती हूँ कि हर लड़की को ऐसी बोझिल परम्पराओं का विरोध करना चाहिए। आज अगर भाभी ने ये कदम न उठाया होता तो शायद आज मेरे अंदर भी इतनी हिम्मत न आई होती। माँ आपको तो भाभी का हौसला बढ़ाना चाहिए था, उनकी इस पहल का स्वागत करना चाहिए था तब शायद आज आप अपनी बेटी के लिए एक मिसाल बन सकतीं थीं। माँ परम्पराऐं इंसानों द्वारा बनाई गई हैं पर इन्हें निभाना या न निभाना भी इंसानों पर निर्भर है और जिन परम्पराओं से रिश्ते टूटें उससे पहले उन परम्पराओं को ही तोड़ देना चाहिए‘‘ कमरे में बैठा हर आदमी शायद गीता से पूरी तरह सहमत था। रोहित की माँ की आँखों का रंग भी बदल चुका था।
श्वेता की एक पहल ने एक रूढ़ीवादी सोच को बदला, अगर हमें भी कहीं बदलाव चाहिए तो पहल खुद ही करनी होगी।

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