सामाजिक एवं राजनैतिक दृष्टि से निरंतर होते मानवीय क्षरण को देखती शहनाज़ इमरानीकी कवितायें ………

आत्महत्या 

शहनाज़ इमरानी

शहनाज़ इमरानी

आत्महत्या पलायन है

आत्महत्या की सोच
अपरिपक्व होती है
मुझे मालूम है
मेरी चीख़ को तुम
चीखने का अभ्यास समझोगे
तुम्हारे लिए यह आशचर्य पैदा करने वाला तथ्य है
अपनी मुक्ति का भ्रम पालती रही हूँ झूठ ही
इस तरह तो कभी चुप्पी नहीं थी
निस्तब्धता तो ऐसी नहीं थी
काटती हूँ चिकोटी अपने आपको
पता नहीं इस प्रस्ताव पर सहमति हो या नहीं
पर नब्ज़ काट लेने दो मुझे
सरकारी तफ्तीशों में मेरी आत्महत्या
एक नैसर्गिक मौत मान ली जाएगी
कोई भी मृत्यु टेक्निकली नैसर्गिक नहीं होती
घटना अगर स्मृति नहीं बनती
तो सिर्फ हादसा बन जाती है।

गंदी बस्ती

लोहे के टुकड़े, काग़ज़ के गत्ते, प्लास्टिक
कचरों के ढेर से चुनते है वो दिन भर
कबाड़ियों को बेचते
और फिर लौटती है चीज़ें
लेकर नया रूप, नया रंग
ऊँची इमारतों के पीछे
पड़ा है सभ्यता का कचरा
बेतरतीब झोंपड़ियां
कपड़ों की जगह चीथड़े और
ज़ुबान के नाम पर
बेशुमार गालियाँ
समाज के क़ायदे कानून भी
यहाँ लागू होते नहीं
आर्थिक कोई भी कोण बनता नहीं
काग़ज़ी आंकड़ों में बदल जाती हैं तस्वीर
पॉलीथिन, टूटे काँच, कागज़
मिमियाती ख्वाहिशों के सामने
खड़ी रहती है हताशा
चाट जाएगा समय का अँधेरा इस बस्ती को भी
कोई नहीं पूछेगा न कोई बताएगा।

एक साफ़ सच 

साभार google से

साभार google से

ख़याल खूबसूरत होते हैं
भूली नज़्म का न जाने कौन सा हिस्सा
ख्यालों की दुनिया भी अजीब है
कभी चाहकर भी कुछ नहीं
और कभी न चाहते हुए भी
एक भीड़ सी लग जाती है
रोज सुबह कई मुखोटे डाल कर निकलते
ओर दिन पर ज़िन्दगी का मुलम्मा चढ़ाकर
रात की ओर धकेल देते
फिर खुद से नज़रे बचा कर उस पर
“दुनियादारी ‘ का बोर्ड लगा देते
ख़यालों में जीना ऐसा ही है शायद
जैसे हादसों से भरे वक्त की चादर ओढ़े
आगे बढ़ते जाना
सब कुछ अपनी जटिल संरचनाओं में
बनता बिगड़ता है
बहार की ज़ंग जिस्म पर वार करती
अन्दर चल रही ज़ंग
लफ़्ज़ों में छुपी उदासियाँ बायां करती
नहीं लिखते हुए भी लिखने जैसा
सभी कुछ कहना भी कौन चाहता है
कांच कि तरह एक साफ़ सच।

क़िला 

पहाड़ों के बदन पर
लिपटा है कोहर
उड़ रहे हैं सूखे पत्ते
कुछ छोटे-छोटे फूल भी
पत्थरों की दीवार पर खिल रहे है
चिड़ियाँ उड़ती है बेमतलब पंख फैलाये
झील के किनारे खड़ा
किसी गार्ड की तरह यह क़िला
कर रहा है झील की रखवाली
कहते है रानी ने
युद्ध हार जाने के बाद
झील में कूद कर जान दी थी
पत्थरों के घेरों से जकड़ा हुआ
उम्र क़ैद का मुजरिम
यह क़िला काट रहा है अपनी सज़ा
इस क़िले का भी अपना इतिहास
देखे होंगे कितने अत्याचार
तलवारों ने पिया होगा कितनो का खूं
अनगिनत जिस्मों कि खाद पर
खड़े है क़द्दावर दरख्त
सब शान-ओ-शौकत ख़त्म हुई
समय कि मार से खंडर हो रही
बूढ़े क़िले कि दीवारों से
ईटें झाँकती हैं उदासी से पानी में
लगता है अब भी मुंतज़िर है
किसी कूँची की, किसी रंग कि
किसी शिल्पी कि छैनी हथौड़ी की।

इन दिनों     

google से

बी.पी.ओ. का कॉल सेन्टर
कम उम्र में बड़ी आमदनी
सब कुछ घूमता है सेंसेक्स,सेक्स
और मल्टीपलेक्स के आस-पास
माँ बाप कहते हैं
बच्चों से ज़माना बदल गया है
बदल गए हैं सभ्यता, संस्कृति, रीति-रिवाज
इस समय का सच
बाज़ार और विज्ञापन तय करते है
मोबाईल पर सॉफ्ट टच
चौकन्ना रहते है रूपये की लूट में
लेन-देन आमद-रफ़्त का तालमैल
अब हैं वातानुकूलित बाज़ार
सिमटी सकुड़ी बन्धुता
सारे सरोकार हुए दरकिनार
पूँजीवाद को बढ़ा रहा है बाज़ार
इंसान की जगह ले रही हैं मशीने
रोज़ बदलाव, तरक़्क़ी और कामियाबी
की ख़बरों से भरा होता है सुबह का अख़बार
समाज और देश के विकास के लिए
व्यवस्थाआें में परिवर्तन जरूरी है
तो चूल्हे के लिए आग भी उतनी ही ज़रूरी है
पर सब के घरों में नहीं जलते है चूल्हे
और घर भी सबके लिए नहीं होते
पुराने शहर में सब कुछ वैसा ही है
वही टूटे घर, वही दुकानें, वही गड्डे
वही नालियाँ और कचरे का ढ़ेर
नंगे पाँव अर्ध नंगे बच्चे , खाँसते बीमार बूढ़े
राशन की दुकान और पानी के लिए नलों पर
लोगों की लम्बी लाईने
ग़रीबी, बेकारी, बीमारी, तकलीफें और भूख।

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