रविदास ने ऐसे समाज की परिकल्पना की जिसमें कोई ऊंच-नीच, भेदभाव, राग-द्वेष न हो। सभी बराबर हो सामाजिक कुरीतियों न हो, जिसे कालान्तर में महात्मा गांधी द्वारा रामराज्य की अवधारणा के रुप में महत्व मिला। संत रैदास के काव्य में आदर्श राज्य के लिए चिंतित दिखते है। उन्होंने राज्य के आवश्यक तत्वों पर विचार किया तथा उनकी नई व्यवस्था करके बेगमपुर शहर की परिकल्पना की। हम इनके इस परिकल्पना को इनके काव्य में देख सकते है। आपने आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक तीनों क्षेत्रों में अपने विचार व्यक्त किये है।…. संत रविदास की जयंती पर शिव प्रकाश त्रिपाठी का विस्तृत आलेख ..|

आदर्श समाज की परिकल्पना-संत रैदास 

शिवप्रकाश त्रिपाठी

शिवप्रकाश त्रिपाठी

मध्यकालीन युग में भक्ति साहित्य का जो स्वरुप परिलक्षित होता है, वह रामानन्द से शुरु हुआ माना गया है। रामानन्द ने उत्तर भारत में भक्ति की धारा प्रवाहित की। रामानन्द के शिष्य परम्परा में अनेक प्रसिद्ध संत हुए जिन्होंने भक्ति साहित्य के माध्यम से तत्कालीन समाज को एकसूत्र में बांधने का कार्य किया, जिसमें मुख्यतः कबीर और रैदास थे जो लगभग 15वीं-16वीं शती का समय था। उस समय मुस्लिम आक्रान्ताओं का शासन था। संतों का धार्मिक दृष्टिकोण विशाल और उदार था। इस युग में हिन्दू और मुस्लिम संस्कृति एक मिलन बिन्दु पर खड़ी थी, जिसे पुरोहित तथा कठमुल्ला मिलने नहीं दे रहे थे। इस समय रैदास कबीर आदि ने दोनों ही धर्मों के कट्टर और रुढि़वादी तत्वों की खुलकर आलोचना की। रविदास ने अन्य संतों की तरह एकता की आवाज उठाई। धर्म युद्धों के खिलाफ वातावरण पैदा किया। रैदास ने सहज साधना पर बल दिया तथा सभी बाह्मआडम्बरों को व्यर्थ बताया। आम आदमी को सादगी बरतने, नैतिक मूल्यों की प्रतिष्ठा और हृदय में पवित्रता रखने की बात की।
रविदास ने ऐसे समाज की परिकल्पना की जिसमें कोई ऊंच-नीच, भेदभाव, राग-द्वेष न हो। सभी बराबर हो सामाजिक कुरीतियों न हो, जिसे कालान्तर में महात्मा गांधी द्वारा रामराज्य की अवधारणा के रुप में महत्व मिला।

भारतीय संविधान निर्माता बाबा भीमराव अम्बेडकर, संत रविदास जी से बहुत प्रभावित थे। अपने जीवन में संघर्ष करने की प्रेरणा उन्होंने आप से ही पाई थी। आपके ही आदर्श सामाजिक समता तथा प्रजातान्त्रिक समाजवाद की कल्पना को भारतीय संविदान में निरूपित कर साकार करने की कोशिश की।
संत रैदास के काव्य में आदर्श राज्य के लिए चिंतित दिखते है। उन्होंने राज्य के आवश्यक तत्वों पर विचार किया तथा उनकी नई व्यवस्था करके बेगमपुर शहर की परिकल्पना की। हम इनके इस परिकल्पना को इनके काव्य में देख सकते है। आपने आर्थिक, धार्मिक तथा सामाजिक तीनों क्षेत्रों में अपने विचार व्यक्त किये है।
संत रैदास के समय में ऐसी परिस्थितियाँ समाज में मौजूद थी जिनसे समाज में आर्थिक विषमतः बढ़ गयी थी जिससे सामाजिक व्यवस्था भी डगमागने लगी थी। आपने अर्थशास्त्र की सैद्धान्तिक अवधारणा के अनुसार तो नहीं पर प्रकारान्तर से श्रम को महत्व देकर आत्मनिर्भरता की बात की है जो कि आपकी आर्थिक चिंतन तथा दृष्टिकोण को परिलक्षित करती है। गरीबी, भुखमरी, बेकारी और बदहाली से जूझ रहे भारत के लिए अंत सिर्फ और सिर्फ रविदास के आर्थिक दर्शन से ही सम्भव है। रविदास श्रम को महत्व देते हुए कहते है कि-

‘‘रविदास श्रम करि खाइहि, औ लों पार बसाई ।
नेक कमाई जऊ करहि, कबहूँ न नहि फल जाई।।’’1

रविदास का जन्म एक ऐसे घर मेें हुआ जिसका कार्य मृत पशुओं को ढोना, उनका चमढ़ा छीलना तथा जूते बनाना था। रैदास ने अपना पैतृक व्यवसाय न सिर्फ बेझिझक होकर अपनाया बल्कि अपने पैतृक व्यवसाय का अपने काव्य में उल्लेख भी किया, अपने काव्य को लेकर उनके अंतर कोई दुराव छिपाव नहीं था वो स्पष्टतः कहते है कि-

‘‘जाके कुटुबं के ढेढ सभ ढोर ढोवंत फिरहि,
अजहु बनारसी आस पासा ।।’’2

संत रैदास को बखूबी मालूम था की सामाजिक एकता तभी आ सकती है एक आदर्श राज्य की स्थापना तभी हो सकती है जब सभी के पास अपना घर हो, पहनने के लिये कपड़े हो तथा खाने के लिए पर्याप्त अन्न हो, और यह सब तभी होगा जब श्रम के महत्व को समझा जायेगा आप कहते है कि-

‘‘ऐसा चाहूँ राज मैं, जहां मिलै सबन को अन्न।
छोट बड़ो सब सम बसे, रविदास रहै प्रसन्न।।’’3

शायद रैदास जी की इस बात को समझकर ही महात्मा गांधी ने अपने रामराज्य या फिर स्वतंत्रत भारत के विकास के लिए पारम्परिक व्यवसाय हथकरधा तथा कुटीर उद्योगों को ज्यादा महत्व देने की बात की है। यह निश्चित भी है कि भारत की आर्थिक विषमता या आर्थिक विकास दोनों के लिए ये समाधान अति आवश्यक हो चुका है।
संत रैदास चूंकि मूलतः भक्त कवि है। वह निर्गुण भक्ति के उपास संत है। किन्तु उन्होंने अपने आराध्य को कभी राम, हरि, माधव के नाम से पुकारा तो कभी गोविन्द, मुकुद और मुरारे आदि के नाम से पुकारा। अन्य संत कवियों की तरह रैदास भी शंकराचार्य के अद्वैत दर्शन से प्रभावित हंै। उनके अनुसार परमात्मा परमब्रह्म एक ही है। उसका कोई आकार नहीं है वह निरापद, निराकार, निर्गुण है। उनके राम कबीर के ‘राम’ की तरह दशरथ के पुत्र नहीं है बल्कि वह कहते हैं-

‘‘रविदास हमारो राम जी, दशरथ करी सुत नहीं।
राम हम माहि रमि रह्यो, विश्वकुटम वह माही।।4

रैदास कहते हैं कि यदि व्यक्ति के हृदय में भगवान के प्रति सच्ची लगन नहीं है यदि सच्चा प्रेम नहीं है तो मूर्ति पूजा करना, मंदिर जा के पूजापाठ करना ढकोसला मात्र है-

‘‘थोथी काया, थोथी माया ।
थोथा हरि बिन, जनम गँवाया।।’’5

रैदास के वाणी में धर्म के विविध आयाम देखने को मिलते है। रैदास अन्य संत कवियों की तरह एकेश्वरवाद में विश्वास रखते है। वह साफ कहते हैं-

‘‘रविदास कोउ अल्लह कहई, कोई पुकारहि राम।
केसन क्रिसन करीम सभ, माधव मुकुन्द नाम।।’’6

रैदास तो भक्ति को ही ईश्वर प्राप्ति का साधन मानते है किन्तु ऐसी भक्ति जिसमें आत्मा और परमात्मा के बीच में कोई अंतर न सके दोनों का एकाकार हो जाये दोनों अभिन्न रुप से जुड़ जाये उनका एक पद देखिये-जिसमें अपने भक्ति की रट लगाने की बात करते है-

‘‘अब कैसे छूटे राम, नाम रट लागी ।
प्रभु जी तुम चन्दन हम पानी, जाकी अंग-अंग बास समानी।

प्रभु जी तुम मोती हम धागा, जैसे सोने मिलत सुहागा।
प्रभु जी तुम स्वामी हम दासा, ऐसी भक्ति करै रैदासा।।7

तो रैदास जिस आदर्श समाज की परिकल्पना करते है उसमें धर्म के नाम पर बाह्माडम्बर तथा धार्मिक कुरीतियों को दूर ही रखना चाहते हैं।
रैदास के काव्य में सामाजिक समरसता देखने को मिलती है। वह आदर्श समाज की परिकल्पना करते हैं जहां जाति-पाति का कोई भेदभाव न हो सभी बराबर हो ऊंच नीच की प्रथा समाप्त हो जाये, यही उनका हमेशा से प्रयत्न रहा। वह ऐसा समाज बनना चाहते है कि जहां कोई किसी की जाति पाति न पूछे-

‘‘जनम जात मत पूछिये, का जात का पात।
ग् ग् ग् ग्
जात पात के फेर महि, उरिझ गई सब लोग
मनुषता को खात है, रविदास जात का रोग।।8

‘रविदास के वाणी’ में वर्ण व्यवस्था पर भी रैदास ने अपने विचार व्यक्त किये हैं वह वर्ण व्यवस्था को पूरी तरह नकारते तो नहीं है बल्कि उनकी नई व्याख्या करते है, वह ब्राह्मण के लिए कहते है कि केवल ऊंचे कुल में ही जन्म लेने से ब्राह्मण परिवार में ही जन्म लेने से कोई ब्राह्मण नहीं होता बल्कि-

ब्राह्मण ‘‘ऊचै कुल के कारणै, ब्राह्मण कोय न होय
जऊ जानहि ब्रह्म आत्मा, रविदास कहि ब्राह्मण होय।।
क्षत्रिय दीन दुखी के हेतु जऊ, बौर अपने प्रान
रविदास उह नर सूर कौं, सांचा छत्री जान।।
वैश्य रविदास बैस सोई जानिये, जऊ संत कार कमाय
पुन कमाई सदा लहे, लौरे सर्वत्त सुखाय।।
शूद्र रविदास ने शूद्र का अर्थ शद्ध मानते हुए कहते है कि-
हरिजन करि सेवा लागै मन अहंकार न राखै
रविदास सूद सोई धन है, जऊ अस वचन न भाखै।।’’9

रैदास के समय मुस्लिम, साम्राज्य का शासन था। हिन्दू पराजित जाति थी। दोनों के कुलीन वर्ग एक दूसरे से नफरत करते थे, जहां मुल्ला अपने धर्म को श्रेष्ठ बता कर सभी को इस्लाम धर्म मानने में मजबूर कर रहे थे, वहीं पुरोहित वर्ग अपने को श्रेष्ठ सिद्ध कर रहे है। इस खीचतान से समाज निरन्तर पतन की ओर अग्रसर हो चला था। गुरु रविदास ऐसे समय में सर्वधर्म समभाव की बात करके समन्वय पर जोर देते हैं। वह कहते हैं कि कोई धर्म छोटा या बड़ा या श्रेष्ठ नहीं होता, सभी का सिर्फ एक ही उद्देश्य है मानव मात्र का कल्याण तथा परम आनन्द की प्राप्ति। सभी की मंजिल एक है लक्ष्य एक है-

‘‘रविदास हमारो राम सोई, सोई है रहमान।
काबा काशी जानी यहीं, दोनों एक समान।।’’10

संत रैदास अच्छे से जानते थे कि जब तक हिन्दू और मुसलमान एक नहीं होंगे तब तक समाज में शांति एवं स्थिरता नहीं आयेगी, इसीलिए वह हिन्दू और मुस्लिम के मिलजुलकर रहने की बात करते हैं, एकता की बात करते हैं, जो कि उनके दूरदृष्टा होने को स्पष्ट करता है। वह कहते हैं कि-

‘‘मुसलमान ले कर दोस्ती, हिंदूअन से कर प्रीत।
रविदास ज्योति सब राम की, सभी है अपने मीत।।’’11

संत रैदास का मत है कि इंसान की पहचान धर्म या जाति से न हो बल्कि उसके गुणों के आधार पर हो। इस विषय पर वह कहते हैं-

‘‘रविदास बामन न पूजिये जो होय गुणहीन।
पूजिये और चांडाल के, जो होय गुण परवीन।।’’12

संत रैदास एक ऐसा राज्य चाहते है जिसमें केाई ऊंच नीच और भेदभाव न हो। जहां कोई लगान न हो। वह पूरी तरह से गणतन्त्रात्मक हो जहां कहीं भी आने जाने में रोक टोक न हो। उन्होंने प्रजातान्त्रिक समाजवाद की पूरी रूपरेखा अपनी सुप्रसिद्ध साखी ‘बेगमपुरा शहर’ में यो वर्णित है-

‘‘बेगमपुर शहर को नाऊं
दुःख अदोह नहीं तिहि ठाऊं
ना सवीस खिराजु, न मालू
खउमू दाइमू सदा पातिसाही
दोम न सेम एक सो आही
आबा दानु सदा मसहूर
उहां गनी बसहि मामूर
तिऊ तिऊ सेल करहि, जिऊ भावे
मरहम माहिल न को अटकावे
कह रविदास खलास चमारा
जो हम सहरी सो मीत हमारा।।’’13

इस आधार पर हम कह सकते है कि आज के संविधान तथा महात्मा गांधी के रामराज्य की अवधारणा के मूल में कहीं न कहीं संत रैदास के विचारधारा है। जो मानववाद को बढ़ावा देती है तथा किसी भी प्रकार की वैमनश्यता को दूर कर एक आदर्श समाज (राज्य) की परिकल्पना प्रस्तुत करती है।

संदर्भ- 
1. भारतीय संस्कृति के प्रेरक-संत गुरु रविदास-डा0 सेाहन पाल सुमनाक्षर, गुरु रविदासः वाणी एवं महत्व सं0 मीरा-पृ0 409
2. हिन्दी साहित्य का दूसरा इतिहास-डा0 बच्चन सिंह-पृ0 93
3. संत रविदासः जीवन दर्शन-कन्हैया लाल चचंरीक, पृ0 97.
4. गुरु रविदासः वाणी एवं महत्व, स0-मीरा-पृ0 406.
5. संत रविदासः जीवन और दर्शन, कन्हैया लाल चंचरीक, पृ0 93.
6. आचार्य पृथ्वी सिंह आजाद, रविदास दर्शन, पृ0 58.
7. हिन्दी साहित्य का इतिहास-डा0 नगेन्द्र, डा0 हरदयाल, पृ0 122
8. संत रविदास की वाणी और वर्तमान परिदृश्य-प्रो0 मीरा गौतम, रविदास, वाणी एवं महत्व सं0 मीरा, पृ0 413
9. गुरु रविदासः वाणी एवं महत्त, सं0 मीरा पृ0 226
10. गुरु रविदासः वाणी एवं महत्व, सं0 मीरा, पृ0 405
11. गुरु रविदासः वाणी एवं महत्व, सं0 मीरा, पृ0 405
12. गुरु रविदासः वाणी एवं महत्व सं0 मीरा, पृ0 408
13. गुरु रविदासः वाणी एवं महत्व, सं0 प्रो0 मीरा, पृ0 406

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