उर्दू अदब से शुरू होकर हिंदी साहित्य में बड़ा दख़ल रखने वाले ‘राही मासूम रज़ा’ के व्यक्तित्व और जीवन संघर्षों का परिचायक खुद उनका विपुल साहित्य है बावजूद इसके आपका नाम और साहित्यिक रचनाएं हमेशा चर्चाओं में रहे हैं | इससे एक बात तो साफ़ हो जाती है कि राही के साहित्य की ही तरह राही के जीवन संघर्षों को सम्पूर्णता में जान और समझ पाना अभी भी बाकी है | ‘कारोबारे तमन्ना’ और ‘कयामत’ राही के उपन्यासों का हिंदी अनुवाद के अलावा राही को जानने समझने और समाज के समक्ष लाने की दिशा में डॉ० एम् फीरोज खान ने वर्षों काम किया है | इसी आशय के साथ शोधार्थी ‘मोहम्मद हुसैन’ द्वारा डॉ० फीरोज से की गई बात-चीत का साक्षात्कार स्वरूप……… 

‘आधा गांव’ का सम्पूर्ण दृष्टा, ‘राही’ 

मोहम्मद हुसैन के साथ फीरोज खान

मोहम्मद हुसैन के साथ फीरोज खान

-: राही के साहित्य के अनुवाद एवं शोध के पीछे क्या प्रेरणा रही इस बारे में आप कुछ जानकारी साझा कीजिए।

राही मासूम रज़ा ने उर्दू में बहुत सारे उपन्यास लिखे हैं, लेकिन यह उपन्यास उन्होंने अपने नाम से नहीं लिखे हैं। वह छद्म नाम से लिखा करते थे। हिंदी में इससे पहले कई और लेखक भी है जो छद्म नामों से लिखा करते थे। वैसे राही ने दो नामों से लिखा था, पहला नाम शाहिद अख्तर और दूसरा नाम आफाक हैदर। इस नाम से वे ‘रूमानी दुनिया’ और ‘जासूसी दुनिया’ नामक पत्रिका में लिखा करते थे। यह पत्रिका इलाहाबाद के निकहत प्रकाशन से प्रकाशित होती थी। ‘कारोबारे तमन्ना’ और ‘कयामत’ उपन्यास मुझे राही मासूम रजा की धर्मपत्नी नैयर रज़ा ने दिए थे। उसका हमने लगभग एक साल में अनुवाद किया और लगभग 5 वर्षों तक प्रकाशक के पास पड़ा रहा और फिर बाद में यह राजकमल प्रकाशन, नयी दिल्ली से प्रकाशित हुआ इतनी लंबी अवधि के दौरान मैं तो उन कृतियों को भूल भी गया था। साथ ही मन में यह भी संदेह था कि वे प्रकाशित होंगी या नहीं। पर लंबे समय के बाद ही सही यह कार्य संपन्न हुआ और यह कृतियां अब साहित्य जगत में हमारे सामने उपलब्ध है।

-: राही द्वारा लिखे गए रूमानी दुनिया के उपन्यासों को उनकी चिरपरिचित शैली में समाहित करना कितना उचित होगा?

Rahiराही उस समय जो भी लिखते थे दूसरों का नामों से लिखते थे उसमें अपना वे नाम नहीं देना चाहते थे। उस समय राही साहब की आर्थिक स्थिति अच्छी नहीं थी क्योंकि अपनी खुद्दारी के चलते वे अपनी उच्च शिक्षा के दौरान परिवार वालों से खर्चा नहीं लेना चाहते थे । इस कारण अपनी आजीविका चलाने के लिए ऐसा लेखन किया करते थे। मेरा मानना है कि जो भी कदम राही ने उठाया वह बेहतर उठाया, क्योंकि आजीविका के लिए व्यक्ति कई तरह के काम करता है, शर्त यह है कि वह कार्य इमानदारीपूर्वक हो और राही का यह कार्य उसी ईमानदार श्रेणी के अंदर आता है। इस कार्य से उनका थोड़ा बहुत काम चल जाता था। राही अपने लेखन में रात-दिन लगे रहते थे । रूमानी दुनिया से जुड़े हुए लगभग राही ने कुल 18 से 20 उपन्यास लिखे हैं, पर यह हमारा दुर्भाग्य है कि उनमें से कोई भी उपन्यास इन दो (कयामत और कारोबारे तमन्ना) को छोड़ कर हमारे पास में नहीं है। एक बात और राही साहब का जब एक हाथ थक जाता था तो दूसरे हाथ से लिखते थे। वे काफी देर तक लेखन का कार्य करते रहते थे।

-: राही की कहानियां कुल कितनी है? क्या और भी कहानियां कही हैं? यह कहानियां किन-किन पत्रिकाओं में बिखरी हुई हो सकती हैं?

राही ने तकरीबन 14-15 कहानियां लिखी हैं। उनकी पहली कहानी ‘तन्नू भाई’ के नाम से सन् 1944 में प्रकाशित हुई, लेकिन उसका कोई अता-पता नहीं है। अभी तक ‘धर्म युग’ और ‘सारिका’ पत्रिका में उनकी कहानियां होने का अंदेशा ही लगाया जा सकता है। यह कहानियां भी इन्हीं पत्रिकाओं में मिल पाई है। बाकी की कहानियों के बारे में किसी को जानकारी नहीं है। राही के कथा साहित्य पर 2008 तक जितने भी शोध हो रहे थे, उनमें सिर्फ 2-3 कहानियों का ही जिक्र हुआ करता था, वह कहानियां है, ‘चम्मच भर चीनी’, ‘सपनों की रोटी’ व ‘एक जंग हुई थी कर्बला में’। जब हमने सन् 2008 में ‘वाड़्मय’ पत्रिका का राही विशेषांक निकाला, उसी कार्य के दौरान हमने कुछ पत्रिकाएं देखी तो उसमें यह कुल 8 कहानियां मिली। ‘हीरोइन’ के नाम से लिखी गई कहानी बाद में मिली। जहां तक मेरा अनुमान है राही की और कहानियां उपलब्ध नहीं है, अगर है तो उसे कोई शोधार्थी ही खोज सकता है।

-: राही के उर्दू काव्य ‘क्रांति कथा 1857’ के बारे में कुछ बताइए। Rahi१

राही ने ‘क्रांति कथा 1857’ के नाम से एक काव्य रचना की है जो राजपाल एंड संस से प्रकाशित हुई हैं। इसकी भूमिका पद्मश्री गोपालदास ‘नीरज’ ने लिखी थी। प्रकाशक महोदय भी यह रचना तभी प्रकाशित करने के लिए राजी हुए जब नीरज साहब ने इसकी भूमिका लिखी। मगर राही के देहांत के बाद प्रोफ़ेसर कुंवरपाल सिंह ने उस पुस्तक से नीरज साहब की भूमिका हटा कर उन्होंने इसकी भूमिका लिखी और नीरज साहब का कहीं पर भी उल्लेख नहीं किया। पुस्तक में 1857 की क्रांति से जुड़ी हुई कथा का बहुत ही सुंदर रचनात्मक पहलू देखने को मिलता है। ऐसा मानना है कि यह महाकाव्यात्मक कविता सभी माक्र्सवादियों को पढ़नी चाहिए। यह अपने आपमें एक अनोखी रचना मानी जा सकती है। ऐसा मेरा मानना है।

-: नीम का पेड़ उपन्यास को राही की रचना हम किस आधार पर माने?

राही ने यह रचना विशेष तौर से टीवी सीरियल के लिए लिखी थी। यह रचना धारावाहिक रूप में टीवी पर लगातार प्रसारित हो रहा था। जिसे जनप्रसिद्धि भी बहुत मिल रही थी। बाद में यह रचना राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित हुई, पर यह रचना विवाद मुक्त नहीं रही क्योंकि कुछ विद्वान लोग इस द्वंद्व में फंसे हुए थे कि इसे नाटक माने या उपन्यास। आज भी कुछ विद्वान इसे नाटक की श्रेणी में रखते हैं, तो कुछ उपन्यास की श्रेणी में। मेरा मानना है कि इसे लघु उपन्यास के रूप में ही स्वीकार किया जाना चाहिए।

-: राही की जन्म तिथि को लेकर हल्का-सा मतभेद रहता है, कृपया करके इसे थोड़ा स्पष्ट करने का प्रयास करें।

topi-shukla-cover1राही की अंक तालिका एवं मूल जन्मतिथि में थोड़ा मतभेद है। अकादमी क्षेत्र में राही का जन्मदिन 1 सितंबर माना जाता है।
विमर्श से जुड़ा एक सवाल, विमर्शों की दुनिया में मुस्लिम विमर्श कहां खड़ा है? क्या मुस्लिम विमर्श जैसी कोई अवधारणा वैचारिक जगत् में मौजूद है?
मुस्लिम विमर्श साहित्य में बहुत ज्यादा स्थान नहीं बना पाई है, क्योंकि मुस्लिम विमर्श को साहित्य में स्थापित करने के लिए इसी वर्ग के साहित्यकारों को लेखन के लिए आगे आना होगा। अन्य समाज के लेखक अगर इस विषय पर लिखते हैं तो वह मौलिकता या कहें तो मुस्लिम समाज की बारीकियां देश की जनता के सामने नहीं रख पाएंगे। मुस्लिम जीवन पद्धति के बारे में हमारे समाज में अभी तक ज्यादा जानकारी नहीं है, या कहें तो मुस्लिम जगत् के अलावा दूसरा समाज उनके बारे में बहुत कम जानता है। इसका उल्लेख ‘काला जल’ उपन्यास में सामने आता है। दुरूद और फातिया के बारे में दूसरे समाज के व्यक्ति कितना कम जानते हैं, इस संदर्भ में इस उपन्यास के अंदर कुछ उल्लेख हुआ है। ऐसे कारणों से कोई भी दूसरे धर्म का व्यक्ति किसी दूसरे धर्म के बारे में लिखना उचित नहीं समझता। अज्ञानतावश या अनजाने में अगर कुछ गलत लिख दिया जाए तो विवाद की स्थिति उत्पन्न हो जाती है, इसीलिए जब तक हम हमारे समाज के बारे में खुद नहीं लिखेंगे और लोगों को अवगत नहीं कराएंगे, तब तक वह विमर्श ज्यादा समय तक नहीं चल सकता। यही परिस्थितियां रही जिसके कारण साहित्य जगत् में मुस्लिम विमर्श एक तरह से असफल हो गया।

-: समाज में एक धारणा-सी है कि मुस्लिम विमर्श की जब कभी भी बात आती है तो अक्सर संकीर्ण विचारधारा वाले आदमी उनके विमर्श को सांप्रदायिकता की आवाज मान लेते हैं? क्या मुस्लिम विमर्श के प्रति उपेक्षा के लिए इस कारण को भी जिम्मेदार माना जा सकता है?

नहीं, मेरे हिसाब से ऐसा नहीं है। कुछ लोगों के ऐसे आक्षेप रहे हो। पर हम खुद ही अगर अपने समाज के बारे में नहीं लिखेंगे, उनकी विशेषताओं, उनके रीति-रिवाज का उल्लेख नहीं करेंगे तो और कौन करेगा? मुस्लिम लेखक भी ईष्र्या से मुक्त नहीं है। वे भी यह सोचते हैं कि अगर हम किसी लेखक पर विमर्श या शोध करेंगे तो वह प्रसिद्धि पा जाएगा, यह भी एक कारण है। मुसलमानों पर भी वे अपने-अपने लोगों को लेकर अलग-अलग धारणाएं, अलग अलग विचारधाराएं लेकर के चलते हैं। वे उन्हीं विचारधाराओं के आधार पर अपनी रचनाओं में वैसे ही पात्रों का सृजन करते हैं।

मोहम्मद हुसैन डायर

मोहम्मद हुसैन डायर

-: आपने जो मुस्लिम विमर्श के ऊपर काम किया है, क्या आपने भी इन्हीं सब बिंदुओं को ध्यान में रखकर कार्य किया?

मैंने सन 1998 में ‘मुस्लिम मानस और हिंदी उपन्यास’ विषय पर अपना शोध कार्य प्रारंभ किया। उस समय मुस्लिम कथाकारों के ऊपर जब में किताबें देख रहा था, तब मुझे मुस्लिम साहित्यकारों से जुड़ी किताबें नहीं मिल पा रही थी। जगह-जगह पर मुझे भटकना पड़ा। जब हम लेखकों से संपर्क किया, तब वह लेखक भी उपलब्ध नहीं करवा पा रहे थे। कई साहित्यकारों का देहांत हो चुका था जैसे राही मासूम रजा। राही की रचनाएं तो मिल गई थी, पर शानी साहब की रचनाएं नहीं मिल पा रही थी। इसके बाद धीरे-धीरे कुछ प्रयास करने के बाद मुझे उनकी रचनाएं मिली जिनके आधार पर मैंने अपना शोध ग्रंथ पूरा किया। इसके बाद हमने वाड़्मय पत्रिका का ‘गुलशेर खां शानी’ अंक निकाला तो उनसे जुड़ी हुई कई जानकारियां विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं के माध्यम से सामने आई जैसे शानी साहब का साक्षात्कार विशेष उल्लेखनीय है। इस साक्षात्कार में नामवर सिंह, काशीनाथ सिंह, शानी साहब के साथ विश्वनाथ त्रिपाठी जी की बहस है। इस बहस में यह मुद्दा उठा कि हिंदी उपन्यासों में या कथा साहित्य में मुस्लिम पात्र एक तरह से गायब है। इस वार्ता में सभी साहित्यकार इस तथ्य से सहमत होते हुए दिखते हैं। हकीकत भी है, क्योंकि जब दूसरे लोग अगर मुस्लिम समाज के बारे में लिखते हैं, वह भी बिना जानकारी के तो वे अच्छे पात्रों की खोज नहीं कर पाते हैं जिसके कारण वह उन पात्रों को लाना उचित भी नहीं समझते। यह एक डर उनमें देखा जा सकता हैं, इस डर के पीछे सांप्रदायिकता भी एक कारण है।

-: क्या इस संवादहीनता के कारण समाज में यह बात उभर रही है कि हम एक दूसरे समाज उनके बारे में जानकारी प्राप्त नहीं कर पा रहे हैं जिससे सामाजिक समरसता का कार्य अवरुद्ध-सा हो गया है?

डॉ0 एम्0 फिरोज खान

डॉ0 एम्0 फिरोज खान

साहित्य हमेशा से ही बांटकर पढ़ाया जाता है जैसे आदिकाल, भक्तिकाल, रीतिकाल व आधुनिक काल पढ़ाया जा रहे हैं। हिंदी का इतना फैलाव है कि उसमें हर किसी के बारे में जानना मुमकिन नहीं है जैसे गोरखनाथ की रचनाएं। उनकी रचनाओं को हम आसानी से समझ नहीं सकते और बहुत-सी ऐसी रचनाएं हैं जिन्हें हम आसानी से समझ लेते हैं। अगर देखा जाए तो आजादी के बाद काफी मुसलमान ररचनाकारों कई हिंदी उपन्यास की रचनाएं दी है। बंटवारे पर कई उपन्यास इस वर्ग ने दिए हैं। दस -बारह मुस्लिम कथाकार हैं जो काफी प्रसिद्धि भी पा चुके हैं जैसे असगर वजाहत, अब्दुल बिस्मिल्लाह, राही मासूम रजा, नासिरा शर्मा, शानी, बदीउज्जमां, मेहरूननिंशा परवेज, मंजूर एहतेशाम आदि। अगर आजादी के बाद सबसे बड़ा और सबसे पहला मुस्लिम राइटर देखें तो गुलशेर खां शानी है, उनका ‘काला जल’ उपन्यास विभाजन की पीड़ा को प्रखर रूप से उद्घाटित करता है। यह उपन्यास सन् 1965 के आसपास प्रकाशित हो चुका था। इसके बाद ‘आधा गांव’ तकरीबन दो साल बाद प्रकाशित हुआ है, मगर ‘काला जल’ का उल्लेख कम होता है, क्योंकि उसमें बिल्कुल निचले तबके के मुस्लिम समाज के बारे में दिखाया गया है मगर यह मानना पड़ेगा कि उसमें ऐसी कई चीजें हैं जो दूसरे समाज के व्यक्ति या वर्ग नहीं जानता है। दूसरे वर्ग के साहित्यकार एवं समीक्षक उन मान्यताओं के बारे में अनभिज्ञ होने के कारण भी शायद इस पर विचार विमर्श जगत में कम होता है । पर ‘आधा गांव’ के उल्लेख के पीछे मुख्य कारण यह है कि उसे हर समाज का व्यक्ति आसानी से समझ सकता है। उसमें ऐसी कोई बात नहीं है दूसरे समाज के लोग ना जानते नहींे।

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