अखिेलश्वर पांडेय का एक कविता संग्रह ‘पानी उदास है’ हालिया प्रकाश्य है। भारी-भरकम शब्दावलियों से बाहर फिजाओं में तत्सम और तद्भव के बीच तैर रहे देसी आमफहम शब्दों से लैस इनकी कविता पढऩे पर एकबारगी यह कवितानुमा लगती ही नहीं। यह एक सूचना, खबर और बयान ’ज्यादा  लगता है। लेकिन इन हल्के-फुल्के शब्दों के पार जब आप उतरते हैं तो पता चलता है कि इन साधारण शब्दों के पीछे बड़े गहरे भाव हैं। इनकी एक कविता ‘वह कौन था’ कि कुछ पंक्तियां देखें-

जाहिर है
उसके सोचने के बारे में
भला हम क्‍या सोच सकते थे
हमने उसकी ओर गौर से देखा,
पर पहचानना मुश्किल था
बावजूद इसके कि
वह आया हमीं में से था।

बिना भारी-भरकम शब्दावलियों और विमर्श में पड़े मौजूदा हालात के बारे में सबकुछ कह देने वाला यह व्यक्ति भी ‘आया हमीं में से है’। वह चिल्ला नही रहा, लेकिन उसके भीतर लगातार चल रही चीख को बखूबी सुना जा सकता है। छोडि़ए इन विवेचनाओं को इनके  कविता संग्रह के इंतजार के साथ पढि़ए इनकी चंद कविताएं…..| – संपादक

अखिलेश्वर पांडेय की कविताएँ… 

१-

वह कौन था

एक दिन सुबह वह
अपनी उत्‍पति के बारे में जानने की
खुनी और रुहानी जल्‍दबाजी में पाया गया,
वह पागलों की तरह खुद को
कभी हिंदू तो कभी मुसलमान कहकर
चिल्‍ला रहा था,
जाहिर है
उसके सोचने के बारे में
भला हम क्‍या सोच सकते थे
हमने उसकी ओर गौर से देखा,
पर पहचानना मुश्किल था
बावजूद इसके कि
वह आया हमीं में से था.

२-

हम किस खबर की प्रतीक्षा में हैं…?

अब कोई भी खबर
रोमांचित नहीं करती
बड़ी नहीं लगती
उत्तेजना से परे
बर्फ की तरह
ठंडी लगती है
टीवी की स्क्रीन पर अंधेरा है
नेताओं की ग्लैमर की तरह ही
विकास का मुद्दा अब बासी हो चला है
किसानों-मजदूरों का जहर खा लेना
या लगा लेना फांसी भी
विज्ञापन से भरे पेज पर छिप जाता है
चारों तरफ सन्नाटा है
शोर सुनायी नहीं पड़ता
देशभक्ति, राष्ट्रवाद चरम पर है
इंसानियत खामोश है
एकदम तमाशबीन बनकर
कानून के नुमाइंदे ही
कानून तोड़ रहे
सब चुप हैं
राष्ट्रद्रोही कौन कहलाना चाहेगा भला?
किसी से सहमत होना
गिरोहबंदी है
साथ होना लामबंदी
नपूंसकता की परिभाषा
हिजड़े तय कर रहे हैं
सीना का पैमाना 56 इंच हो गया है!
गुंगे फुसफुसा रहे हैं
बहरे सुनने लगे हैं
लंगड़ों की फर्राटा दौड़ हो रही है
हम किस खबर की प्रतीक्षा में हैं…?

३-

एक दिन

मैं तुम्हारे शब्दों की उंगली पकड़ कर
चला जा रहा था बच्चे की तरह
इधर-उधर देखता
हंसता, खिलखिलाता
अचानक एक दिन
पता चला
तुम्हारे शब्द
तुम्हारे थे ही नहीं
अब मेरे लिए निश्चिंत होना असंभव था
और बड़ों की तरह
व्यवहार करना जरूरी.

४-

कालाधन

रोटी हमारा पोषण करता है
रोटी देने वाले हमारा शोषण
चुल्हे की आग डराती है हर रोज
जंगल तेजी से खत्म हो रहे हैं
जलावन कहां से आयेगा?
‘जनधन’ खाता अब ‘अनबन’ हो गया है
संदेह की बिजली गरज रही
किसी ने बिना कहे-बताए
डाल दिए लाखों रुपये
पुलिस, बैंक, नेता, पड़ोसी
सब पूछ रहे मेरी कैफियत
क्या कहूं मैं-
घरवाली के इलाज को एक पैसा नहीं
बिटिया के फटे कपड़ों से झांक रही लाचारी
मां लड़ रही है टीबी से
कालाधन क्या होता है-
मुझे क्या मालूम!

५-

google से साभार

रोया नहीं एक बार भी

जिंदगी का बोझ उठाया न गया तो
लाश ही कंधे पर उठा ली उसने
सब सोच रहे-
कठकरेजी होगा वह
रोया नहीं एक बार भी
बीवी के मरने पर रोना तो चाहिये था
कैसे रोता वह-
बीवी तो बाद में मरी
मर गयी थी इंसानियत पहले ही
उसके लिए
कैसे रोता वह-
बिटिया जो साथ थी उसके
सयानी सी
उम्र और मन दोनों से
कैसे रोता वह-
दिखावा थोड़े न करना था उसे
मुआवजा थोड़ी न मांगनी थी उसे
शिकायत थोड़ी न करनी थी उसे
कैसे रोता वह
क्यों रोता वह-
जब बीवी ही मर गयी
जब खो दिया उसने आधी जिंदगी
जब जीना ही है बिटिया के लिए
दीना मांझी नहीं, इंद्रजीत है वह
सीख लिया है उसने
कैसे लड़ी जाती है अपनी लड़ाई
दुनियावी बेहयाई को नजरअंदाज करके.

६-

इतनी सी गुजारिश

मुझे गालिब न बनाओ
गाली न दो!
मैं बड़ा कद्र करता हूं उनका
मैं तो उनकी सफेद दाढ़ी का
एक बाल जितना भी नहीं
उर्दू मेरी मौसी (हिन्दी मां) जरूर है
पर ठीक से जान-पहचान नहीं अभी
शेरो-शायरी भाती है (आती नहीं)
गजल सुनकर
वाह-वाह कह सकता हूं
सुना नहीं सकता
माफ करो यारों मुझे
मैं गुलजार भी नहीं हूं
सुना बहुत है उनको
पढ़ा भी है काफी
पर मतला और कैफियत
मेरे समझ से बाहर है
निराला, प्रसाद, बच्चन, त्रिलोचन भी नहीं मैं
सक्सेना, धूमिल जैसी जमीन नहीं मेरी
मैं किसी की छवि बनना भी नहीं चाहता
किसी से प्रतिस्पर्धा नहीं मेरी
प्रेरक हैं सब मेरे
आदरणीय हैं सब
पर उनके दिखाये रास्ते पर चलकर
मैं अपनी मंजिल नहीं पा सकता
मुझे अपनी राह अलग बनानी है
आप मुझे साधारण समझ सकते हैं
पर दूसरों से अलग हूं मैं
मैं नहीं चाहता किसी से संघर्ष
किसी को भयाक्रांत या
तनावग्रस्त करना
नीचे गिराना या कुचलना
करना जलील या ओछा देखना
मैं तो सबका मित्र बनना चाहता हूं
मेरे पास जो थोड़ी सी दौलत है
उसे खर्च करना चाहता हूं
लुटाना चाहता हूं अपनी शब्द संपदा
इस बाजारी कहकहा में
नीलाम होना फितरत नहीं मेरी
मैं शब्दों का सुगंध फैलाना चाहता हूं
विचारों को रोपित करना चाहता हूं
आपके कोमल मन की धरालत पर
मैं अब भी इन बातों पर
विश्वास करता हूं कि
हवा शुद्ध हो न हो
प्रेम अब भी सबसे शुद्ध है
हम अपनी मूर्खतापूर्ण इच्छाओं से
धोखा भले खा जाएं
खुद पर भरोसा हो तो
प्रेम में धोखा नहीं खा सकते
आप जानकर भले ही चकित न हों
पर सच यही है कि
धरती की शुद्ध हवा
इसलिए कम हो गयी क्योंकि
हमने प्रकृति से प्यार करना कम कर दिया
इसलिए मित्रों!
मैं कहता हूं-
हवा को हम शुद्ध भले न बना पाएं
प्रेम तो शुद्ध करें
यह एक ऐसी प्रक्रिया है जिससे
सबकुछ सहज ही शुद्ध हो जाएगा
अगर शुद्ध होगा
हमारा अंतर्मन
हमारा वातावरण
हमारे विचार
हमारे कर्म
हमारे व्यवहार
तो बची कहां रह जायेगी
गंदगी!
मेरा मानना है-
किसी के पीछे दौड़ना छोड़ो
खुद से मुकाबला करो
खुद के ही बनो दुश्मन
और रक्षक भी
रोज मारो खुद को
रोज पैदा हो जाओ खुद ही
अहं का पहाड़ आखिर कब तक
खड़ा रह सकता है
खुद पर काबू पाना सबसे
आसान काम है और सबसे कठिन भी
यह जानते हैं सब
फिर आजमाने में हर्ज क्या है!

७-

साभार google

मास्क वाले चेहरे

मैं अक्सर निकल जाता हूँ भीड़भाड़ गलियों से
रोशनी से जगमग दुकाने मुझे परेशान करती हैं
मुङो परेशान करती है उन लोगों की बकबक
जो बोलना नहीं जानते

मै भीड़ नहीं बनना चाहता बाज़ार का
मैं ग्लैमर का चापलूस भी नहीं बनना चाहता
मुझे पसंद नहीं विस्फोटक ठहाके
मै दूर रहता हूं पहले से तय फैसलों से

क्योंकि एकदिन गुजरा था मै भी लोगों के चहेते रास्ते से
और यह देखकर ठगा रह गया कि
मेरा पसंदीदा व्यक्ति बदल चूका था
बदल चुकी थी उसकी प्राथमिकताएं
उसका नजरिया, उसके शब्द
उसका लिबास भी

लौट आया मैं चुपचाप
भरे मन से निराश होकर
तभी से अकेला ही अच्छा लगता है
अच्छा लगता है दूर रहना ऐसे लोगों से
जिन्होंने अपना बदनुमा चेहरा छिपाने को
लगा रखा है सुंदर सा मास्क

८-

साभार google

मां की तस्वीर

यह मेरी मां की तस्वीर है
इसमें मैं भी हूं
कुछ भी याद नहीं मुझे
कब खींची गयी थी यह तस्वीर
तब मैं छोटा था

बीस बरस गुजर गए
अब भी वैसी ही है तस्वीर
इस तस्वीर में गुड़िया-सी दिखती
छोटी बहन अब ससुराल चली गयी
मां अभी तक बची है
टूटी-फूटी रेखाओं का घना जाल
और असीम भाव उसके चेहरे पर
गवाह हैं इस बात के
चिंताएं बढ़ी हैं उसकी

पिता ने भले ही किसी तरह धकेली हो जिंदगी
मां खुशी चाहती रही सबकी
ढिबरी से जीवन अंधकार को दूर करती रही मां
रखा एक एक का ख्याल
सिवाय खुद के

मैं नहीं जानता
क्या सोचती है मां
वह अभी भी गांव में है
सिर्फ तस्वीर है मेरे पास
सोचता हूं
मां क्या सचमूच
तब इतनी सुंदर दिखती थी.

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    By: अखिलेश्वर पांडेय

    जन्म : 31 दिसंबर 1975 को बिहार के छपरा जिला अंतर्गत बसंतपुर गांव में.
    संप्रति : पत्रकारिता. विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं व समीक्षा लेख प्रकाशित.
    प्रकाशन : पानी उदास है कविता संग्रह.
    सम्मान : कोल्हान (झारखंड) में तेजी से विलुप्त हो रही आदिम जनजाति सबर पर शोधपूर्ण लेखन के लिए फेलोशिप व नेशनल मीडिया अवार्ड.
    संपर्क : प्रभात खबर, संपादकीय विभाग, ठाकुर प्यारा सिंह रोड, काशीडीह, जमशेदपुर, झारखंड, पिन- 831001
    मोबाइल – 8102397081

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