प्रतीकों के गहरे संदर्भों के साथ गहन गंभीरता के साथ आती आधुनिक कविता में विमल कुमार की कवितायें एक अतरिक्त खिंचाव के साथ आती हैं | सहज सरल शब्दों में मौजूं वक्ती परिस्थितियों को व्यंग्यात्मक रचनाशीलता के साथ उकेरना उन्हें पठनीय बनाता है ….संपादक 

आयेंगे अमरीका से अच्छे दिन

विमल कुमार

आयेंगे
अब जल्द ही आयेंगे
अच्छे दिन
सीधे अमरीका से आयेंगे
दे दिया गया है आर्डर उनका
पिछले दिनों
दौरे पर
एक कंपनी बना रही है उन्हें
नयी तकनीक से
जल्दी ही आयेंगे
अच्छे दिन
जापान से होते हुए
फ्लाइट से आयेंगे
इंदिरा गाँधी एअरपोर्ट पर
उतारा जायेगा उन्हें

गाजे बाजे के साथ
आयेंगे अच्छे दिन
कार्टन में भर भर कर
ऊपर लगी होगी पन्नी रंग बिरंगी
गुलाबी फीता भी लगा होगा
शानदार पैकेजिंग में आयेंगे
इम्पोर्ट होकर आयेंगे
अच्छे दिन
जब एक्सपोर्ट होगी हमारी संस्कृति
तो आयेंगे अच्छेदिन
एक दिन जरूर
फिर क्या तुम्हे नौकरी मिलेगी
एक बंगला भी मिलेगा
वाई फाई युक्त जीवन होगा

आयेंगे अच्छे दिन
अगर विमान में होती जगह
तो उनके साथ ही आ जाते
लेकिन अब तुम्हारे घर
कुरियर से आयेंगे
घर पर रहना आज तुम
घंटी बजेगी
और एक आदमी तुम्हे करेगा डिलीवर

फिर क्या
बदल जायेगा तुम्हारा जीवन
न्याय ही न्याय होगा
ख़त्म हो जायेंगे अपराध
गरीबी मिट जायेगी
दाखिले में कोई दिक्कत नहीं होगी
इलाज़ भी हो जायेगा मुफ्त
बिजली रहेगी दिन रात
पानी भी चौबीस घंटे

आयेंगे अच्छे दिन
भले ही तुम इंतज़ार करते करते मर जाओगे
अदालत का चक्कर लगाते लगाते बूढ़े हो जाओगे
नौकरी की खोज में बन जाओगे नक्सली
मुसलमान हो तो आतंकवादी कहलाओगे

रोटी के लिए चोरी करना भी सीख जाओगे
पर आयेंगे अच्छे दिन
एक दिन याद रखना
बस कम्युनिस्टों की तरह आलोचना करना बंद कर दो
हर अच्छी शुरुआत की

आयेंगे अच्छे दिन
पर सबसे पहले
अखबार में उसका इश्तहार आएगा
टी वी पर होगी उसकी ब्रेकिंग न्यूज़
रात आठ बजे
टक्कर में होगी उस पर एक बड़ी बहस

फिर तुम नहीं कहना
कि अच्छे दिन नहीं आये आजतक
और वो तो सिर्फ एक जुमला भर था
अच्छे दिन इस तरह आयेंगे
कि तुम देखते रह जाओगे
और उन्हें ढूंढ भी नहीं पाओगे
अछे दिनों के साथ
एक सेल्फी खींचने के लिए बस तरस जाओगे

क्या क्या नहीं सीखा मैंने

क्या क्या नहीं सीखा था मैंने
चाय बनाते बनाते
सब से पहले यही सीखा था
मजमे लगाने की कला
फिर सीखी हाथ चमका कर
बोलने की शैली

चाय बनाते बनाते ही जाना था मैंने
जब पानी और चीनी में अंतर है
तो
दो कौमों में भी है बहुत फर्क

अलग है भाषा और लिपि
तो वे एक कैसे हो सकते हैं
फिर ये भी सीखा
धर्म की बुनियाद से ही होगा विकास मुल्क का
सीखी मैंने चेहरे पर मुखौटे लगाने की कला
यह भी सीखा मैंने
जरूरत पड़ने पर गिरगिट की तरह रंग भी बदला जा सकता है

चाय बनाते हुए ही मैंने सीखा उसे कैसे बेचा भी जाता है
फिर पकेजिंग की कला में निष्णात हो गया
नाम बदल कर उसे बेचने में उस्ताद हो गया

चाय बनाते बनाते मानवता और इमानदारी पर भाषण देना भी सीख गया
सीख लिया कि वक़्त पड़ने पर
कैसे अपना उल्लू सीधा किया जा ता है
और बहुत कुछ सीखा
जिसकी एक लम्बी फेहरिश्त जारी भी की जा सकती है

चाय बनाते बनाते देश को बेचने की तरकीब भी सीख गया मैं
अमीरों के विकास को
गरीबों के विकाश की शक्ल में पेश करना भी सीख गया

चाय बनाते हुए हिन्दी तो सीखी ही
प्रोम्टर पर अंग्रेजी पढना भी सीख लिया मैंने
टिकेट बाँटने का गुर भी सीखा
सब कुछ सीख लिया मैंने
पर एक चीज़ नहीं सीख पाया
कि जिसके कारण लोग धीरे धीरे मेरी हकीकत जान ने लगे है
मेरी कलई अब खुलने लगी है
पर चुनाव जीतने की कला से
मुझे नहीं कर सकता कोई वंचित
सच की तरह झूठ बोलने की महारत से
मैं बदल सकता हूँ इस देश को
जिसकी कल्पना आपने नहीं की होगी कभी
लेकिन जब तक तुम लोग करोगे इंतज़ार
कि किस तरह उतरता है मेरा जादू .
तबतक चाय की चुस्कियों में फैल चुका . होगा ज़हर

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    By: विमल कुमार

    जन्म 09 दिसम्बर 1960
    जन्म स्थान गंगाढ़ी, रोहतास, सासाराम, बिहार, भारत
    कुछ प्रमुख कृतियाँ
    सपने में एक औरत से बातचीत (1992); यह मुखौटा किसका है (2002), पानी का दुखड़ा (कविता-संग्रह)। चाँद@आसमान.कॉम (उपन्यास)
    चोर-पुराण (नाटक) कॉलगर्ल (कहानी-संग्रह)
    विविध
    रूसी भाषा में कविताएँ अनूदित। भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार (1986), प्रकाश जैन स्मृति पुरस्कार (1990) दिल्ली हिन्दी अकादमी का पुरस्कार ठुकराया (2010) बनारसी प्रसाद भोजपुरी सम्मान, शरद बिल्लौरे सम्मान।

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    ‘विमल कुमार’ की तीन कविताएँ

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