सामाजिक और राजनैतिक, वैचारिक समानता और द्वन्द के बीच साहित्य से लालित्य और भारतीय संस्कृति के लोक रंग कहीं विरक्त हो रहे हैं | निसंकोच साहित्य की सार्थकता वैचारिक प्रवाह एवं राजनैतिक चेतन के बिना न केवल अधूरी बल्कि निष्प्राण है और इसलिए भी कि यह लेखकीय चेतन स्थिति ही बेहतर मानव जीवन की दिशा में एक श्रेष्ठ साहित्यिक दृष्टि है | बावजूद इसके ग्रामीण और आम जन जीवन के वे अनेक पात्र जो हमारे जीवन में साँसों की तरह दखल रखते हैं … आधुनिक होती सामाजिक व्यवस्था और साहित्यिक विचार प्रवाह में वे कहीं ओझल न होने पायें यह जीवन के प्रति लेखकीय सरोकार भी हैं … ऐसे ही अनेक पात्रों को जीवन्तता में महसूसने का प्रयास करता डॉ.मोहसिन ख़ानका यह रोचक ललित निबंध …….संपादक 

आवाज़ों के घेरे

डा0 मोहसिन खान ‘तनहा

अपनी पूरी ज़िंदगी में हम सुविधाओं में रहते हुए,अपने भौतिक परिवेश में जीते हुए, जाने कितनी अवस्थाओं,परिस्थितियों और वातावरणों के सान्निध्य में जाने-अनजाने बंधे हुए हैं। कभी हमें मानसिक चिंता आ घेरती है, तो कभी कोई प्राकृतिक विपदा आ घेरती है, लेकिन मानव मूलतः संघर्षी प्रकृति का है, उसे अपने जीवन को बचाने के लिए हर उस विपरीत अवस्थाओं से लड़ना होता है, जिसमें उसका जीवन बचा रहे। इसी प्रवृत्ति ने उसे सुखात्मक किन्तु सुरक्षित जीवन जीने की दिशा में अग्रसर किया है और वह सुविधाओं भरा जीवन का अभिलाषी, आकांक्षी हो गया है। हम सब अपने-अपने घरों में बैठकर स्वयं को बहुत सुखी, सुरक्षित आभासित करते हैं और निश्चिंत होकर जीवन के निश्चित दायरे में दैनिक जीवन के रोज़मर्रा के कामों में जुटे रहते हैं। मैं नौकरी करता हूँ, तो मेरा निश्चित क्रम बंधा हुआ है। किस समय सोना है, किस समय जागना है, किस समय नौकरी पर जाना है, कब लौटना है इत्यादि। अगर कोई व्यापारी है, तो उसका भी दैनिक जीवन का निश्चित क्रम लगभग निर्धारित ही है। यही निश्चित क्रम व्यक्ति के बाहरी और भीतरी जीवन से तादात्म्य बनाए हुए है और व्यक्ति इसी मार्ग पर चलते हुए जीता चला जा रहा है। जब कभी अवकाश हो या सप्ताह के रविवार में यह निश्चित क्रम टूटता है, तो रोज़मर्रा के दैनिक कार्यकलापों से विच्छिन्न होने पर जाने कैसी अव्यवस्था मानस को बेचैन करती है। इस बेचैनी को बढ़ा देने में सबसे अधिक जिन अवस्थाओं का योग है, वह है हमारे आसपास की आवाज़ें।

रात को सोकर, जब अवकाश के दिन सुबह निश्चित समय पर आँख खुलती है, तो कुछ समय तक सारा वातावरण रोज़ की तरह ही आभासित होता है, लेकिन जब घड़ी के मिनिट और घंटे के काँटे अपनी सीमाओं को पार करते हुए जैसे-जैसे आगे बढ़ते हैं एक अलग सा आभास मन पर छाने लगता है। मेरी टेबल पर रखी हुई इलेक्ट्रोनिक घड़ी जिसमें न जाने कैसे आठ बजकर पचपन मिनिट का सुबह का अलार्म लग गया है, वह जब बिप-बिप करके बोल उठती है, तो अचानक दूसरे कमरे में रहते हुए यह आवाज़ मेरे मानस को क्रमबद्धता के टूटते दायरे को सूचित कर जाती है। मेरा घर से रोज़ सुबह सात बजे महाविद्यालय में अध्यापन के लिए निश्चित समय पर सप्ताह के छह दिनों में निकल जाना निश्चित ही है, इस कारण अलार्म की आवाज़ अटपटी परंतु जानी पहचानी सी लगती तो है, लेकिन कुछ भूली हुई सी याद दिलाती है,जो मुझे अवकाश की अधिक जानकारी प्रेषित करती है। इसी बीच घर में नलों से पानी का गिरना,मेरी पत्नी का पानी की व्यवस्था करते रहने के दौरान बाल्टियों, घड़ों की आवाज़ों का मुझ तक आना, साथ ही रसोई घर में बर्तनों के धुलने तथा उनके जमाने की आवाज़ों का कानों से टकराते रहना। फिर खाना बनाने के दौरान अलग-अलग आवाज़ों की उपस्थिति और मेरे मानस पर उसका प्रभाव एक अलग ही अहसास भीतर जागता रहता है, जो रोज़मर्रा की ज़िंदगी से अलग होता है।

यह सब आवाज़ें तो बेजान चीज़ों की जानदार आवाज़ें हैं, इनके होने न होने से न्यून और अधिक प्रभाव तो होता ही है। कुछ आवाज़ें ऐसी जानदार आवाज़ें हैं, जिनके प्रभाव से मानस को बचाया नहीं जा सकता है। अपने बचपन की ओर मैं लौट रहा हूँ, सुबह दूध वाले की साइकिल पर लगे भोपूँ की आवाज़और माँ का रसोई घर से पतेली उठाकर ले जाने की आवाज़ और कभी-कभी दूध वालेभय्या के बतियाने की आवाज़ बिस्तर में सुनाई देती। मैं और मेरे भाई-बहन रोज़ ही सुबह उठने में काहिली करते और सोचते कि माँ आज न उठाए या स्कूल की छुट्टियाँ अधिक क्यों न होती हैं। घड़ी में लगभग उस समय छह सवा छह बज रहे होते थे। माँ का दूसरा काम हम सबको उठने का ही होता। उस समय माँ का स्वर कुछ कड़क और बदला हुआ होता था। रोज़ दूध वाले भय्या उसी समय के दर्मियाँ आते, चाहे कोई भी मौसम क्यों न हो। वह ठीक समय पर दूध लाते और चले जाते, मोहल्ले में बहुत जगह पर बहुत घरों में वे ही दूध बाँटते थे। दूर तक उनके भोपूँ की आवाज़ आती रहती और फिर धीरे से कमज़ोर पड़ते हुए गली के मोड़ के साथ मुड़ जाती। सुबह सब स्कूल चले जाते, मेरे भाई-बहनों से अलग मेरा स्कूल था। वह मुझसे उम्र में बड़े थे, इसलिए वे बड़ी कक्षाओं में सरकारी स्कूल में पढ़ रहे थे। मेरा स्कूल प्राईवेट था और बारह बजे लगता था। मैं अपने मित्र के घर जाकर उसे लेकर पैदल ही स्कूल जाता था।पिता अधिक कमा नहीं पाते थे, अर्धसरकारी बैंक में मामूली से क्लर्क थे। मित्र के पिता नगरपालिका के वाटरवर्क्स विभाग में थे और मित्र की माँ का तो देहांत हो चुका था। हम दोनों मित्र पैदल ही कस्बे के मुख्य बाज़ार के बीच से होकर गुज़रते थे,जहाँ पर सब्ज़ी मंडी और एक बड़ा बाज़ार जिसे ‘हाथा’ कहा जाता था, वह मार्ग में बीच में पड़ता था। मैंने अलग-अलग मौसमों में इन बाज़ारों  आवाज़ों को सुना था, जिसकी गूँज आज भी मेरे मानस में गूँजती रहती है। मंडी में सब्ज़ियों के नीलाम होने की आवाज़ें, कुंजड़ों की सब्ज़ियाँ और फल बेचने की आवाज़ें बचपन में साथ कब जुड़ गईं और भीतर उतर गईं पता ही न चला। मुख्य बाज़ार ‘हाथा’ के बीच से होते हुए जब गुज़रते तो तरह-तरह की सुगंधों-दुर्गन्धों के साथ दुकान के मालिकों और उनके नोकरों की आवाज़ों के साथ-साथ सामान की उठा-पटक की आवाज़ें बचपन का हिस्सा बन गईं। गर्मियों के मौसम में जब वहाँ से गुज़रते तो मधुशाला(गन्ने के रस की दुकान) में गन्ने का रस निकालने के लिए चल रही मशीन के पहिये में बंधे घुंगरुओं की आवाज़ें भीतर एक मनभावक सी लय पैदा कर देती थी और बहुत दूर तक सुनाई देती थी। जब ‘हाथा’ पार करने के बाद कस्बे की मुख्य सड़क पड़ती थी, वहाँ पर भीड़-भाड़ होने के साथ तांगों की आवाजाही लगी रहती थी। तांगेवाले जाने किस अंदाज़ से होंठ टेड़े करके किच-किच की आवाज़ निकालते थे और साथ में भीड़ को हटने की भी चेतावनी देते जाते थे। हवा में घूम रहे चाबुकों की साँय-साँय आवाज़ घोड़ों की गति को बड़ा देती थी। तांगों में जुते घोड़ों के टापों की टॉक-टॉक आवाज़ें ओ.पी. नय्यर के संगीत का आभास कराती थीं। मैं दिनभर स्कूलमें रहता वहाँ स्कूल में लटकी घंटी की आवाज़ें कभी तो राहत देतीं कभी भीतर भय उत्पन्न कर देती। राहत तब मिलती जब घंटी रेसिस या छुट्टी की सूचना देती और भय तब उत्पन्न कराती जब घंटी अंग्रेजी या गणित के कालखंड की सूचना देती। स्कूल से जब घर लौट आता तो पिता की साइकिल की आवाज़ आती तो मन हर्ष से भर जाता और दौड़कर पिता की गोद में चढ़ जाता। मोहल्ले में बच्चों की आंटियाँ (गोटियाँ) और भंवरी (लट्टू) खेलने की आवाज़ें आकर्षित करतीं, तो बेलगाम होकर पागलों की तरह उस ओर दौड़ जाता। जब धीरे-धीरे अंधेरा घिर आता तो फिर माँ की आवाज़ आती “चलो अब घर” न चाहते हुए भी बुझे मन से घर जाना होता था।

शाम के समय खाने से पहले एक दो फ़कीर हमारे मोहल्ले में आया करते थे और उनकी बुलंद लयबद्ध आवाज़ रोज़मर्रा के जीवन की अनुभूति जागा जाती थी। वे लयबद्ध तरीके से कहते- “या मौला कर सब का भला, दुआ करे दरवेश और रहम करे अल्लाह” माँ हमें बुलाती और फ़कीर को रोटी दे आने को कहती। बचपन की फ़कीर की वह आवाज़ आज भी मानस में ताज़ा है। आज भी मैं खाना खाने का शाम का समय उस आवाज़ को भीतर सुनता रहता हूँ। माँगने वालों में एक और आवाज़ मेरे ज़हन तक पहुँच रही है, वह आवाज़ बड़े-छोटे घुंघरुओं की है। एक रूपधारक माँगने वाला बाबा था, जो केवल शनिवार को ही माँगने आता था। उसका रूप देखकर मन सहम जाता था। वह अपना रूप बंदर की तरह बनाता था, तब मुझ सहित मेरे भाई-बहनों हनुमान जी के चरित्र का ज्ञान नहीं था। उसके पूरे शरीर पर सफ़ेद पावडर लगा रहता था (शायद वह हनुमान मंदिर की अगरबत्तियों की राख़ मलता होगा), बाल लंबे थे और चोटी बांधे रहता, कपड़े उसके रंग-बिरंगे थे, पीछे कपड़े की पूँछ भी लटकी रहती थी। वह जब माँगने आता था तो हम सब डर जाते। वह खड़े-खड़े अपने पैरों के घुटनों से लटके हुए बड़े से घुंघरुओं को बजाता रहता, उसके टखनों और कमर में भी घुंघरुओं की लड़ियाँ बंधी रहती थीं। मुंह से वह कभी बोलता न था, वह कभी थमता नहीं था लगातार अपने पैरों की गति देते हुए घुंघरुओं बजाता रहता था, ऐसा लगता था जैसे वह नाच रहा हो। उसको जब दस पैसे घर से दे दिये जाते तो वह मीठी चिरोंजी के सफ़ेद दाने प्रसाद के रूप में दिया करता था । हम सब तो उससे डरे हुए थे कभी उसका दिया प्रसाद ग्रहण न कर पाए, उसपर मुस्लिम संस्कृति में पल-बढ़ रहे थे। उसके घुंघरुओं की आवाज़ें और उसकी मुद्रा आज भी मेरे मानस में निरंतर प्रवाह मान हैं। यद्यपि आज वो कहीं दिखाई नहीं देता है, शायद उसकी मृत्यु हो चुकी है और आज कई साल बीत गए हैं, लेकिन आवाज़ें आज तक नहीं मरी हैं।

सुबह के समय हमारे मोहल्ले में मेरे स्कूल जाने से पहले एक ठेला लेकर कबाड़ी भी आता था, उसका भी रोज़मर्रा का फेरा होता ही था। उसकी तेज़ आवाज़ लयबद्ध तरीके वाली ऐसी थी-“लेयाव लाइलोन का फटा-पुराना जूता, अखबार की रद्दी, खाली शीशी, टीन कनस्तर”। हमारे घर की रद्दी तब बेची जाती जब हम स्कूल की परीक्षा उत्तीर्ण कर लेते और आगे की कक्षा में प्रवेश ले लेते। कभी-कभी कोई पुराना सामान टीन कनस्तर भी माँ बेच देती। बस उन दिनों उसके ठेले तक जाने का अवसर मिल जाता और तरह-तरह की पुरानी वस्तुओं को आश्चर्य से देखते रहते। परंतु उसकी उपस्थिति बिला नागा के रोज़ ही मोहल्ले में समय पर हो जाती और वही आवाज़ मेरे कानों में गूँज जाती। हाँ एक आवाज़ पापड़ बेचने वाले की भी आती थी, वह रोज़ ही शाम के समय झुटपुटे में सिर पर तले पापड़ों की बड़ी तगारी लेकर आता था और कंठ के जाने कौनसे भाग से आवाज़ लगाता था; एक तीखी लेकिन गाढ़ी उसी की कॉपीराइट वाली आवाज़ वैसी कोई और आवाज़ नहीं निकाल सकता था। उसकी आवाज़ को लेकर एक बात और याद आगाई। मैं शुरू से गणित में कमजोर था, मेरे भाई-बहनों को ट्यूशन देने के लिए पिता ने अपने एक परिचित को जी कि न्यायालय में अस्थाई तौर पर मुंशी का काम करते थे, उन्हें कहा था कि मेरे बच्चों को आप पढ़ाइये। उनके पढ़ाने आने का समय और पापड़ वाले के आने का समय अक्सर मिल ही जाता था। उनके आए हुए पंद्रह मिनिट बीतने के बाद पापड़ वाला आता था। जब मुझे गणित सवाल हल करना नहीं आते थे, तो उनका एक संवाद यही रहता था- “तू भी पापड़ बेचेगा” तब मेरा ध्यान उस पापड़ वाले की आवाज़ से प्रतियोगिता में लग जाता कि इससे अच्छी आवाज़ निकालकर मैं पापड़ ज़्यादा और जल्दी कैसे बेच सकता हूँ। बस इसी सोच में मन में पापड़ बेचने की आवाज़ की गूँज चलती रहती, साथ ही मेरा रियाज़ पापड़ बेचने की आवाज़ का मन ही मन होने लगता।

मोहल्ले में एक और छरहरे बदन वाला व्यक्ति सूजी का हलवा बेचने आता था उसे सब ‘लाला जी’ के नाम से पुकारते थे। उसका रूप सबसे अधिक साफ-सुथरा था। उसके सिर पर हमेशा चपटी लाल पगड़ी रहती, जिसपर पर वह गरम हलवे का थाल संतुलित रूप से रहता था। काली दाढ़ी, मूँछें थीं, लेकिन सदैव करीने से व्यवस्थित रहतीं। उसका पूरा परिधान सफ़ेद, या कभी केसरी, या कभी अन्य रंग का हुआ करता था। गोल घेरदार फ़्राक टाइप कुर्ता पहनता था, कुर्ते का गला तिरछा था और कुछ भी बंद लगे थे। नीचे धोती करीने से बांधता था, पैर में काली मोजड़ियाँ और उसकी जुर्राबें लाल हुआ करती थीं। उसका हुलिया गुजरात के कच्छ के लोगों के परिधान जैसा और राजस्थान के रबारियों जैसा था, मुझे लगता है उसका मिश्रित रूप उसने बनाया होगा, लेकिन था वह बहुत ही साफ-सुथरा और आकर्षक चेहरे-मोहरे वाला। अपने बगल में वह एक लकड़ियों से बना हुआ स्टैंड(वह लकड़ियाँ जो मोंडे बनाने में उपयोग मे लाई जाती हैं) भी रखता था जिस पर वह सिर से थाल उतारकर रखता था। उसकी प्यार भरी हलवे जैसी मीठी आवाज़- “मज़ा आजाएगा लाला जी गरमा गरम” कानों में रस घोल देती थी। मैं अक्सर कुछ पैसे लेकर जाता था और हलवा खाया करता था। आज भी जब सूजी का हलवा घर मे बनता है और खाने बैठता हूँ तो लाला जी की स्मृति हो आती है और मैं उन्हीं की आवाज़ की नकल करते हुए कहता हूँ-“मज़ा आजाएगा लाला जी गरमा गरम”। वह आवाज़ भी समय रहते प्रत्यक्ष रूप से खो गई, अब बची हैं तो स्मृति में गूँजती आवाज़ें।

ऐसी कई आवाज़ें मेरे बचपन में मेरे भीतर पैठ गई हैं, जिन्हें अक्सर मेरा ज़हन याद करता रहता है वह भी मुझे बताए बिना। कई आवाज़ें ऐसी थीं जो मोहल्ले में रोज़ सुनाई नहीं पड़तीं, कभी-कभी कोई फेरीवाले चादर, कपड़े या अन्य सामान लेकर आते तो फिज़ाओं में नई आवाज़ें तैर जातीं। उनकी आवाज़ें अक्सर किसी त्योहार के आने के पहले ही मोहल्ले में गूँजती थीं। जब तक मेरे पिता का परिवार मोहल्ले मे रहा, ये आवाज़ें मेरे जीवन का जीवंत भाग हुआ करती थीं। जब मोहल्ला छूटा और हम नए घर में रहने गए जो कस्बे की अंतिम सीमा पर बना था, वहाँ सिर्फ सन्नाटा ही सुनाई दिया। नई बस्ती थी, कोई फेरीवाल, कोई दूधवाला या कोई अन्य सामान बेचने वाला वहाँ कई समय तक नहीं आया। अपने कस्बे से मैं फिर स्नातक की उपाधि लेकर छात्रावास चला गया। छात्रावास मोहल्ले जैसा न था, वहाँ कोई आवाज़ ऐसी न थी जो मेरे जीवन का हिस्सा बन पाए। हाँ उस समय एक महापरिवर्तन यह आया कि टेलीविज़न की शुरुआत हुई और धीरे-धीरे करके एक अलग सभ्यता का होता गया। रेडियो की आकाशवाणी की आवाज़ दब सी गई, जब आकाशवाणी रेडियो प्रारम्भ होता था, तो एक धुन बजती थी, वह धीरे-धीरे खो गई। साथ ही टेलीफोन लगने से एक नई आवाज़ का घर में आगमन हुआ जो हमारे लिए नई सभ्यता में क़दम रखने जैसा था।

जैसा कि पहले बताया है कि अब मैं नौकरी में हूँ, महाराष्ट्र में मुम्बई के पास कोकण क्षेत्र में। समुद्र किनारा है , बहुत अधिक वर्षा है, प्राकृतिक वातावरण भरपूर है। इस नई जगह पर रहते हुए मुझे दस साल बीत गए हैं, अब इन दस सालों में देश-दुनिया में निरंतर नए-नए परिवर्तन आ चुके हैं। सूचना क्रांति ने एक नई सभ्यता को जन्म दिया है, जिससे पुरानी सभ्यता परिवर्तित होते हुए नई चाल में ढल गई। अब सब कुछ तेज़ परिवर्तन की चपेट में है। इन दस सालों की अवधि में नई सभ्यता के उदय और विकास में मोबाइल, कंप्यूटर, इन्टरनेट, डिज़िटलाइज़ेशन इत्यादि ने एक नया अध्याय जीवन में जोड़ दिया है। इस नए युग के आगमन से नई आवाज़ें और नई शब्दावली का उदय और प्रसारण हो रहा है। ये नई आवाज़ें मोबाइल की रिंगटोन, मेसेजटोन, नए सोशल मीडिया में व्हाट्सअप, फेसबुक, हाइक इत्यादि की आवाज़ों ने नए प्रकार से जीवन में प्रवेश किया है और अब सारा ध्यान इन नई आवाज़ों पर केन्द्रित होता जा रहा है। यहाँ रहते हुए भी मेरा ध्यान अपने फ्लेट से बाहर की आवाज़ों पर निरंतर बना हुआ है। महाराष्ट्र की संस्कृति व्यापक, विशेष और अनूठी है, यहाँ एक आवाज़ मुझे बहुत प्रभावित करती है और वह मानस में पैठ गई है। वह आवाज़ ‘वासुदेव’ की आवाज़ है। ‘वासुदेव’ कोई भगवान नहीं, बल्कि यहाँ भिक्षाटन करने वाला वह पात्र है, जो मराठी भाषा के रचनाकारों के भजन मंजीरों और खड़ताल से गाता है। उसकी मधुर आवाज़ खड़ताल और मंजीरों के समागम की ध्वनि मन को प्रफुल्लित कर देती है। ‘वासुदेव’ की आवाज़ से मन प्रफुल्लित हो जाता है और रोम-रोम खिल जाता है। साथ ही कबाड़ खरीदकर बेचने वाले की आवाज़ से मन रोज़ ही खराब और खट्टा भी हो जाता है। वह इसलिए की जहाँ मैं रह रहा हूँ, वह कस्बा पर्यटन स्थल (टूरिस्ट प्लेस) है। यहाँ गोवा की तरह मोज-मस्ती और जीवन का फालतू अवकाश मनाने लोग कई जगह से आते हैं और उसी दृष्टि से यहाँ वैसी सभ्यता का तेज़ी से विकास हो रहा है, जिससे यहाँ की प्राचीन संस्कृति पर बालू रेत की परत चढ़ गयी है। वह कबाड़ बेचने वाला अपनी आवाज़ में शुरूआत में ही कहता है- “बियर बाटली,प्लास्टिक, पेपर भंगारवाला” इस “बियर बाटली” की आवाज़ पर मन क्षुब्ध हो जाता है और सोचने में आता है, नशे की प्रवृत्ति यहाँ के समाज में कितने गहरे में पैठ गई है कि इस शब्द की आवाज़ से किसी को कई फ़र्क ही नहीं पड़ता है। मैंने यहाँ देखा है कि किताबों की दुकानों से कहीं अधिक मात्रा में शराब की दुकानें हैं, यह दु:खद आश्चर्य का विषय और बात है मेरे लिए। कभी-कभी एक बूढ़ी सी औरत सब्ज़ी का टोकरा सिर पर रखे मराठी में आवाज़ देती है, उसकी आवाज़ की लय और धुन तो समझ में आती है लेकिन वह कहती क्या है उसका सही आशय अब तक नहीं समझ पाया हूँ।

बहरहाल बचपन से लेकर वर्तमान तक कई आवाज़ों के घेरे मेरे आसपास रहे हैं, जो कि जीवन का जीवंत संगीत और एक हिस्सा पहले भी बने हुए थे, आज भी बने हुए हैं। बड़ा फर्क यह हुआ है कि पहले ये आवाज़ें मेरे आसपास से आकर मेरे भीतर मानस तक रोज़ ही उतर जाती थीं, आज ये आवाज़ें मानस में तो हैं लेकिन प्रत्यक्ष नहीं। समय के साथ सारी पुरानी आवाज़ें खो गईं और नई सभ्यता के विकास के साथ नई आवाज़ों ने अपना प्रभुत्व जमा लिया। परिवर्तन के इस चक्र में सभ्यता ने नई करवट ली तो सबकुछ बदल दिया दो हिस्सों में आवाज़ों की दुनिया को पाट दिया। एक आवाज़ों का समूह पीछे अपनी यादों में ज़िंदा है, दूसरा प्रत्यक्ष ज़िंदा है। एक की तस्वीर मन को प्रफुल्लित कर जाती है, तो दूसरी तस्वीर इतनी स्पष्ट और नेत्रों को प्रिय नहीं लग पाती है। जीवन गति करता है और हम विकासमान हैं, जिस दिशा में दुनिया बढ़ रही है क्या वह सही है…?  यह तो आप सुनिश्चित करे, किन्तु  चिंतन-मनन के साथ इसे तय करने का वक्त यही है |

Leave a Reply

Your email address will not be published.