पटना के ‘इंडिया कॉफी हाउस’ के बंद हुए अभी मात्र तीन वर्ष ही बीते हैं। पर उसकी याद ऐसे आती है जैसे कि वह कोई गुजरे हुए जमाने की सु-सुखद स्मृति हो।-  सूर्यनारायण चौधरी

(सूर्यनारायण चौधरी को उनके जन्म दिन पर याद करते हुए उनका एक संस्मरण आलेख -)

2014-11-24-23-25-37

सूर्य नारायण चौधरी

इंडिया कॉफी हाउस का गुजरा हुआ जमाना

जिक्र प्रारम्भ से ही कर रहा हूं। सातवे दशक के प्रारम्भ में ही पटना आ जाने के बाद प्रसिद्ध लेखक फणीश्वरनाथ रेणु और पटना विश्वविद्यालय के दो प्रख्यात समाजशास्त्री डा. नर्मदेश्वर प्रसाद और डा. गोपीकृष्ण प्रसाद से भी उनके समाजवादी होने के कारण शीघ्र ही परिचय हो गया और हम उनकी बैठकों में भी शामिल होने लग गए। उन लोगों की दुनिया-जहान की बातों में, जिनकी शैली मिथिला और बंगाल में समादृत ‘गप्प’ शैली ही हुआ करती थी, कॉफी हाउस की चर्चा बार-बार आती थी। कभी वह इलाहाबाद का कॉफी हाउस होता तो कभी कलकत्ता या दिल्ली का या फिर कभी लंदन, पेरिस या न्यूयार्क का भी। डा. नर्मदेश्वर प्रसाद कई बार यूरोप और अमेरिका का भ्रमण कर चुके थे और फ्रांस के प्रसिद्ध लेखक और दार्शनिक ज्यां पाल सार्त्र के ‘कॉफी हाउस’ प्रेम की चर्चा भी अपनी रोचक शैली में हम सबों को सुना चुके थे। इसलिए हमारा उन कॉफी हाउसों के लिए मन मचलने लग जाता था। पर, उस समय तक पटना में जो एक-दो कॉफी हाउस थे उनमें उस स्वरूप का कोई आभास नहीं नजर आता था। डाक बंगला के सामने वाले ‘भारत कॉफी हाउस’ में तो हम प्रायः शाम के समय रात का खाना खाने के लिए जाते ही रहते थे। वहां जगह बहुत कम थी। इसलिए चाहते हुए भी हम अपनी बैठक अधिक देर तक नहीं जमा पाते थे। पर जब कभी उस कॉफी हाउस में बसावन सिंह, रामानंद तिवारी या कर्पूरी ठाकुर जैसे समाजवादी नेता आ जाते थे तो बहस-मुबाहिसे का भी कुछ सिलसिला चल पड़ता था और हमें भी उसमें शिरकत करने का कभी-कभी अक्सर प्राप्त हो जाता था। उन नेताओं के बाहर आते ही जिस तरह से उनके चारों ओर लोग जमा हो जाते थे, उससे सहज ही में यह अंदाजा हो जाता था कि अब बिहार के शासन की बागडोर भी इन्हीं लोगों के हाथों में आने वाली है। 67 के आते-आते डा. राममनोहर लोहिया का गैर कांग्रेसवाद सफल भी हो गया और इनके हाथों में सत्ता भी आ गई। उस समय भी उस कॉफी हाउस में नियमित रुप से आने वालों को ऐसे लगा था जैसे कि सत्ता उन्हीं के हाथों में आयी है। महामाया मंत्रिमंडल के शपथ ग्रहण करने के अवसर पर बाबा नागार्जुन ने गवर्नर हाउस के सामने जयघोष करती जनता के समक्ष उछलकर जो प्रसन्नता प्रकट की थी वह तो देखते ही बनती थी। रेणु ने प्रारंभ में उस संविद सरकार के अच्छे कामों के लिए ‘दिनमान’ में नियमित रिपोटिंग के सिलसिले में तथ्यों, भावनाओं और शब्दों के जो कसीदा काढ़े उसकी गणना आज भी एक अच्छी सर्जनात्मक रिपोर्टिंग के रूप में की जा सकती है।

उस कॉफी हाउस में डा. लोहिया के आने की जानकारी तो मिलती रहती थी पर हमें कभी उस समय उपस्थित रहने का संयोग नहीं मिल सका। इसकी भी एक कसक उस समय बनी रहती थी।

यह सब चलता रहा। पर, हम प्रतीक्षारत रहे पटना में उस कॉफी हाउस के अवतरण की जिसकी लालसा रेणु और प्रसाद द्वय हमारे दिलों में जगा चुके थे। हमें पूरे एक दशक तक उनके लिए इंतजार करना पड़ा। 1971 के मध्य में न्यू डाक बंगला रोड पर विदेश व्यापार मंत्री ललित नारायण मिश्र की सदिच्छा से कॉफी बोर्ड द्वारा संचालित वैसे ही एक इंडिया कॉफी हाउस का अस्तित्व सामने आया। जिस दिन बिहार के तत्कालीन राज्यपाल देवकांत बरूआ ने, जिनकी स्वयं भी इस प्रकार के अभियोजनों में दिचचस्पी रहा करती थी, राजधानी के प्रमुख साहित्यकारों, बुद्विजीवियों और गण्यमान्य नागरिकों की उपस्थिति में इसका विविधत् उद्घाटन किया, उस दिन मैं संयोग से पटना से बाहर गया हुआ था। इसलिए उस प्रथम दिन के विशेष समारोह अवसर पर उपस्थित नहीं रहने का अफसोस कई दिनों तक मन पर छाया रहा।

पर, पटना लौटने के बाद भी कई दिनों तक वहां नहीं गया। कुछ तो इसलिए कि एक-आध बार जब उस सड़क से गुजरा तो वहीँ से इसमें लगे शीशे और उस पार बैठे लोगों को देखकर मेरे ग्रामीण संस्कार वाले मन पर एक आतंकनुमा असर पड़ा कि कहीं यह जगह बहुत खर्चीली तो नहीं है। मगर इससे भी बड़ा एक और कारण था- रेणु जी के प्रति अपने मन में पाला गया एक सहज मनुहार भाव। मन में प्रतिदिन इस बात की चोट लगती रहती थी कि अब तक तो बाहर कितनी बार उनसे भेंट हो चुकी है, एक-दो बार उनके निवास पर भी हो आया हूं पर उन्होंने स्वयं अब तक यहां आने के लिए क्यों नहीं कहा।

पर, मुझे अधिक दिनों तक इसके लिए विचलित नहीं रहना पड़ा। एक दिन रेणु जी ने उल्टे लगभग उलाहना के स्वर में कहा-‘‘आप कॉफी हाउस क्यों नहीं आते हैं ? दोपहर और शाम को वहीं सब लोग नियमित रूप से जमते हैं।’’

अंधे को क्या चाहिए-दो आंखें। मैंने दूसरे ही दिन दोपहर की बैठक में जाने का निश्चय कर लिया। तब तक वहां जमनेवाली बैठकों की ‘डेली रिपोर्टिंग’ करने वाले अख्तर हुसैन, जो बाद में बिहार आंदोलन में काफी चर्चित हुए, उसकी तहजीब के बारे में काफी बता चुके थे कि किस तरह अंदर जाकर दूसरे कमरे वाले सोफे पर ही बैठना चाहिए, अपना आर्डर आप देना चाहिए और कॉफी का अपना पैसा भी खुद ही चुकाना चाहिए।

लिहाजा जब हम कॉफी हाउस में दाखिल हुए तो वह साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों का चर्चित सोफा लगभग भरा हुआ था। रेणु जी उस दिन नहीं आए थे। मैं पसोपेश में था कि इस पर किस प्रकार जगह बनाऊं। मेरी इस स्थिति को भापकर घनश्याम पंकज जी (अब ‘दिनमान’ के संपादक) ने मुझसे सोफा पर बैठने का अनुरोध किया और खुद ही उन्होंने मेरे लिए एक ‘मिक्स्ड’ कॉफी का भी आर्डर दे दिया। फिर बारी-बारी से सभी लोगों से मेरा रेणु जी का मित्र और -यात्रा वृतांत’ का लेखक कहकर परिचय कराया। उस दिन देवेंद्र प्रसाद सिंह (जो बाद में भागलपुर वि. वि. के कुलपति हुए), सतीश आनंद, सूर्य कुमार सिंह, भूपेंद्र अबोध, विनीता अग्रवाल आदि सभी लोग उपस्थित थे। इनमें से कई लोगों से अलग-अलग संदर्भ में पहले ही परिचय हो चुका था। उन्हें प्रसन्नता हुई कि उनकी मजलिस में एक और स्थायी सदस्य आ जुड़ा। इस तरह हम कॉफी हाउसबाजों के बीच अंतरंगता का जो संबंध बनना शुरू हुआ, वह आज भी अनेक विचार विभेदों के बावजूद किसी-न-किसी रूप में कायम ही है। आगे भी रहेगा।

रेणु जी के वहां प्रायः प्रतिदिन आते रहने से शाम की बैठकों में नए लेखकों, कवियों, रंगकर्मियों, छायाकारों और चित्रकारों के आ जुड़ने का जो सिलसिला शुरू हुआ, वह उनके जीनकाल तक चलता रहा। लेखक-कवियों में सत्यनारायण, डा. रामवचन राय, परेश सिन्हा, गोपीबल्लभ सहाय, रवींद्र भारती, कुमारेंद्र पारस नाथ सिह, जुगनू शरदेय, भूपेंद्र अबोध, ज्ञानेंद्रपति, आलोकधन्वा, इन पंक्तियों का लेखक, वसंत कुमार, मधुकर सिंह, रिपुदमन सिंह; रंगकर्मियों में सतीश आनंद, किरण कांत वर्मा, सुमन कुमार, श्रीराम पांडे; चित्रकारों में श्याम शर्मा, अवधेश अमन, अनिल कुमार सिन्हा; छायाकारों में सत्यनारायण वासुदेव साह और विद्याभूषण तथा राजनीतिकों एवं विधायकों में सच्चिदानंद सिंह, विनोद नारायण दीक्षित, रामेश्वर प्रसाद सिह, शिवनंदन पासवान, लक्ष्मी साहु, सुदर्शन, मुंशीलाल राय, भाई नरेंद्र, विजय कृष्ण, रघुपति रघुनाम गुप्ता, अख्तर हुसैन, शिवानंद तिवारी, नीतीश कुमार, वशिष्ठ नारायण सिंह और बजरंग सिंह अगर एक-दूसरे से परिचित हुए और एक-दूसरे की विधाओं को जानने का कोई प्रयास किया तो इसका सबसे बड़ा श्रेय ‘इंडिया कॉफी हाउस’ को ही जाता है। कहना नहीं होगा कि इन सबों की घनिष्ठता ‘बिहार आंदोलन’ के समय ही परवान चढ़ी जब रेणु जी ने जयप्रकाश जी के मौन जुलूस में भाग लिया था। और तभी रेणु जी नागार्जुन जी के साथ होकर परेश सिन्हा, गोपी बल्लभ सहाय, जुगनू शारदेय, सतीश आनंद आदि कवियों-रंगकर्मियों की टोली बनाकर पटना की सड़कों पर नुक्कड़ कवि सम्मेलन, नाटक और चित्र प्रदर्शनियों के आयोजन को निकले थे।

सभी लोग किस तरह आपस में एक-दूसरे से जुड़ गए थे, इसका एक नजारा तब देखने में आता था जब सतीश आनंद की नाट्य संस्था ‘कला संगम’ की कोई प्रस्तुति ‘भारतीय नृत्यकला मंदिर’ में होती थी। उस समय तो कॉफी हाउस के इस जीवंत समाज के कदम अपने-आप प्रेक्षागृह की ओर मुड़ जाते थे। उस दिन आरा, गया और दूसरे शहरों से कॉफी हाउस आए रचनाधर्मी अचरज करते कि आज कहां चले गए सारे लोग फिर बेयरों से जानकारी मिलने पर उनके कदम उसी ओर मुड़ जाते। सिर्फ कला संगम के प्रदर्शनों में ही नहीं, परेश सिन्हा भी जब अपनी रंग संस्था ‘रूप-रंग’ के माध्यम से कोई नाट्य प्रस्तुति प्रदर्शित करते तो उसमें भी प्रायः सभी लोग जाते ही थे। बाद में जब किरण कांत वर्मा ने कला संगम से टूूटकर अपनी एक अलग रंग संस्था ‘अंकुर’ बना ली तो उनके प्रदर्शनों में भी ये लोग उसी तरह से जाने लग गए। किरण जी प्रायः विजय तेंदुलकर के ‘हौट’ नाटकों का ही प्रदर्शन किया करते थे। उनके ही नाटकों से हम लोगों ने प्रसिद्ध महिला कलाकार नूर फातिमा को जानना-पहचाना शुरू किया, यद्यपि वे इसके पहले भी कई नाटकों में उतर चुकी थीं।

रेणु जी को इन सब नाटकों के चलते रंगकर्म से एक बार फिर कितना लगाव हो गया था, यह इससे भी जाना जा सकता है कि आपातकाल में उन्होंने कला संगम द्वारा प्रस्तुत किया जाने वाला भारतेंदु हरिश्चंद्र कृत नाटक ‘अंधेर नगरी चौपट राजा’ में स्वयं भी भाग लेना स्वीकार कर लिया था और वे उसका पार्ट गंभीरतापूर्वक याद करने लग गए थे।

यदि पटना के जिलाधिकारी ने उस प्रदर्शन के लिए स्वीकृति देने से मना नहीं कर दिया होता तो हम जान पाते कि पूर्णिया के इस अनोखे कलाकार में अभिनय की कितनी सामर्थ्य अब भी बची हुई है।

कहना नहीं होगा कि कॉफी हाउस के माध्यम से इन आत्मीय बने लोगों की जमात में सिर्फ विपक्षी विचारधारा के लोग ही नहीं थे, इंका के कुमुद रंजन झा, अशोक सिंह और विजय शंकर दूबे इसके नियमित बैठने वालों में थे। रेणु जी की मृत्यु के कई साल बाद जब एक बार हम लोगों ने कॉफी बोर्ड के केंद्रीय प्रबंधन के द्वारा पकौड़ी, मसाला डोसा आदि के मूल्य में अचानक बहुत वृद्धि कर दिए जाने के खिलाफ कॉफी हाउस के गेट पर बैठकर बाजाब्ता सत्याग्रह किया था तो उस अवसर पर हम लोगों की पूरी आवभगत इंका के युवा नेता विजय शंकर दूबे और अशोक सिंह ने ही की थी। इंका के पुराने नेता केदारनाथ सिंह की गिनती, जो कई उर्दू अखबारों के मालिक भी हुआ करते थे, कॉफी हाउस के एक रईस और शालीन व्यक्ति के रूप में होती थी। उनकी अचानक मृत्यु के बाद बहुत दिनों तक उनकी कमी हम सबको खलती रही। इसी तरह की उदासी हम लोगों के अजीज मित्र और समाजवादी नेता रामेश्वर सिंह के कैंसरग्रस्त होकर गुजर जाने पर हुई थी। इलाहाबाद से आते रहने वाले कवि-विचारक विजयदेव नारायण साही, दिल्ली से आते रहने वाले ‘जन’ के पूर्व संपादक ओमप्रकाश दीपक और कलकत्ता से आते रहने वाले ‘चौरंगी वार्ता’ के संपादक रमेशप्रसाद सिंह के असामयिक निधन के संवाद को भी हम लोगों ने उसी संवेदना के साथ ग्रहण किया था।

इस कॉफी हाउस के खुलते ही उसमें उच्च मध्यवर्ग की शिक्षित और शालीन महिलाओं का आना और उसमें कुछ देर तक उनके बैठे रहने का भी सिलसिला शुरू हो गया था। मगर अपने-अपने परिवार वालों के साथ ही। अकेली या अपने मित्र के साथ आने वाली लड़कियों के दर्शन होने में अभी कुछ वर्षों की और देर थी। उनका इस रूप में आना बिहार आंदोलन के समय से ही शुरू हुआ। राजनीतिक आंदोलन न जाने अपने साथ कितने बहाव लाते हैं।

विनीता अग्रवाल जी का तो आना शुरू सेे ही रहा। कहना नहीं होगा कि उन्होंने ही बिहारी महिलाओं में प्रायः सर्वप्रथम ‘कला संगम’ के नाटकों में भाग लेकर विनीता सिंह, माया सिन्हा, सीता सिन्हा, रश्मि सिन्हा और अंजू झा जैसे संभ्रात परिवारों से आयी लड़कियों के लिए रंगमंच पर उतरने का मार्ग प्रशस्त किया था। इसके पहले बंगाली परिवार की लड़कियां ही हिंदी के नाटकों में उतरती थीं।

कॉफी हाउस में विनीता जी साहित्यिक लहजे में ही बातचीत किया करती थीं और उनकी वाणी में प्रसाद, पंत, निराला आदि कवियों की कोमल रचनाएं भी जब-तब गुंजरित हो उठती थीं। अब तो उनके दिल्ली चले जाने पर दूरदर्शन पर ही कभी-कभी हम लोग उन्हें देख पाते हैं। कला संगम की दूसरी कान्वेंट कल्चर में पली-बड़ी अदाकारा श्रुति शुक्ला (अब पत्रकार) तो कॉफी हाउस नहीं आती थीं, पर जब कभी किसी नाटक में उनका कोई अभिनय होता तो उसकी चर्चा इस मजलिस में कई दिनों तक चलती रहती थी। ‘लहरों के राजहंस’ में वे देवांगना-सी सुंदरी की भूमिका में सौंदर्य-सुंदरता अवश्य दिखाती रहीं पर भावों की अपेक्षित अभिव्यक्ति नहीं दे पायीं। लेकिन ‘ठहरा हुआ पानी’ में उन्होेंने जो उम्र बीत रही युवती को पूरी शिद्दत के साथ जिया उसे शायद ही कभी पटना के रंगदर्शक भूल सकते हैं। उनके कला संगम से अलग हो जाने की उदासी भी हम सबों पर काफी दिनों तक छायी रही। इसके पहले विनीता के अलग हो जाने की उदासी के एक दौर से हम गुजर ही चुके थे।

‘बिहार आंदोलन’ के समय में डा. करुणा झा नाम की एक समाजवादी विचार वाली मेडिकल छात्रा भी इस समूह के साथ आ जुड़ीं, जो तब तक डॉक्टरी की परीक्षा पास कर हाउस सर्जन के रूप में पटना जेनरल अस्पताल में काम करने लग गयी थीं और जिनका झुकाव आंदोलन के कार्यक्रमों की तरफ भी पूरे तौर से हो चुका था। वैसे तो करुणा जी ने भी कई नाटकों में भाग लिया था और अपनी कई नृत्य प्रस्तुतियों से भी वे चर्चित हो चुकी थीं, पर तब तक उन्होंने इन सक्रियताओं से विदा ले ली थी और अपने को अपने डॅाक्टरी पेशे के अतिरिक्त ‘रचना’ की साहित्यिक गोष्ठियों में भाग लेने, पटना से प्रकाशित होने वाले समाजवादी साप्ताहिक ‘जन’ में कभी-कभार बेलाग ढंग से कुछ लिखने, कॉफी हाउस आने और आंदोलन के कार्यक्रमों में संलग्न रखने लग गई थीं।

बिहार आंदोलन, जनता (शासन के) प्रयोगों और उसकी विफलता के काल से लेकर अंत तक कॉफी हाउस की इस मंडली के संपर्क में आने वाली महिलाओं में छात्र युवा संघर्ष वाहिनी की परिवर्तनकामी लड़कियों के नाम का विशेष रूप से उल्लेख किया जा सकता है। उनमें नूतन, मणिमाला, कंचन और किरण शाहीन तो हर क्षण अपनी बहस में संपूर्ण क्रांति की बातों के साथ-साथ स्त्री और पुरुष के बीच कायम की जाने वाली बराबरी की बातों को उठाने की कोशिश में लगी रहती थीं। मणिमाला और किरण शाहीन तो अब बाजाब्ता पत्रकार बन गई हैं और अच्छा लिख भी रही हैं।

राजनीतिक दलों से जुड़ी महिलाओं में जनता-लोकदल से जुड़ी कवयित्री विधायिका रमणिका गुप्ता, पूर्व विधायिका कौशल्या देवी, कालिंदी राय, महाश्वेता चटर्जी और नीलिमा सिन्हा (दोनों ही अब अधिवक्ता, पटना उच्च न्यायालय) का भी इस मजलिस से अच्छा-खासा परिचय हो चुका था।

इन महिलाओं को कॉफी हाउस के बेयरे भी पहचानते थे और उन्हें इस बात की भी जानकारी थी कि इनमें से किसको किसके साथ बातचीत करने और बहस चलाने में रस आता है। इसलिए उनके हाल में प्रवेश करते ही वे आगे बढ़कर उन्हें बता दिया करते थे कि उनसे बातचीत करने वाले कहां बैठे हुए हैं।

इस सबों की उपस्थिति के कारण हमें इस बात को मान लेने में भी कोई हिचक नहीं हो रही है कि हम लोगों ने दूसरे परिवार की महिलाों के साथ बैठने और उनसे बातचीत करने का सलीका भी कॉफी हाउस से ही सीखा। उनका यह प्रभाव हर उम्र और हर स्वभाव के लोगों पर इतना गहरा रहा कि कॉफी हाउस की गिरावट के काल में भी कभी किसी ने किसी महिला के साथ कोई अशिष्टता नहीं दिखलाई।

पर कॉफी हाउस में बैठने वालों ने वहां आने वाली सुंदर महिलाओं से निरपेक्ष रहने का स्वांग भी कभी नहीं रचा। उनके महिलाओं के निरखने-परखने के अपने ढंग थे। जब भी कोई सुंदर महिला सोफा के नजदीक से गुजरती तो उनकी चलती हुई बातचीत स्वतः रूक जाती। वे उन्हें देखने लग जाते और नजरें तभी वापस लौटती जब वे किसी ‘सीट’ पर बैठ चुकी होती। फिर वे सब बगैर कुछ कहे पहले की अपनी बात के प्रसंग पर आने की कोशिश करते। कभी तो तुरंत ही वहां पहुंच जाते, पर कभी सम्मोहन इतना गहरा होता कि इसमें कई मिनटों का वक्त लग जाता। ऐसे समय में अपने चेहरे पर आप उभर आए मुस्कान की अनुभूति से हम अभिभूत भी होते।

कॉफी हाउस आने वालों का समय अलग-अलग बंटा हुआ था। दिन में इसके खुलते ही जहां शहर में घूमते रहने वाले, कुछ काम-धाम नहीं करने वाले नए-पुराने रईस चले आते, ग्यारह बजते-बजते जहां रेणु जी की एक छोटी-सी मंडली आ धमकती वही बारह बजे के बाद से अपने कारोवार के सिलसिले में शहर का चक्कर लगाने वालों, दूसरी जगहों से आने वालों तथा अपने परिवार के साथ मसाला-डोसा खाने और कॉफी पीने वाले पारिवारिक लोगों का भी प्रवेश होने लग जाता था। कभी-कभी इसी समय कुछ पत्रकारों के भी दर्शन हो जाते जो या तो अपनी ड्यूटी पर जा रहे होते या शहर में समाचार पाने के क्रम में इसे एक पड़ाव मानकर यहां भी पहुंचे होते। ऐसे पत्रकारों में देवी दयाल, सुरेंद्र किशोर, काशी कांत झा, नर्मदेश्वर सिन्हा तथा मुक्ता किशोर और आकाशवाणी के संवाददाता एच. पी. शर्मा का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। संपादकों में ‘प्रदीप’ के हरिओम् पांडेय और ‘सर्चलाइट’ के आर. के. मकर तो प्रायः यहां आते ही रहते थे। मगर उनका बैठना औरों से अलग, छंटकर होता था। मकर के पहले के सर्चलाइट के संपादक आर. के. राव भी अपनी सवाददाता पैट्रीशिया कफ के साथ आते थे। रेणु के समाजवादी आंदोलन के जमाने के मित्र और पुराने पत्रकार गुरु प्रसाद उत्पल तो बिना नागा कॉफी हाउस आने वालों में थे। दफ्तरों में छुट्टी हो जाती तो काम करने वाले साहित्यकार और रंगकर्मी भी अपने नए तेवर के साथ रेणु मंडली के साथ आ मिलते।

रेणु जी की मृत्यु के बाद तो रेणु के खेमें का उस रूप में नियमित मिलना प्रायः बंद ही हो गया। पर तब भी कुछ लोग आते ही रहे और कभी-कभी उनकी अलग पहचान वाली बैठके भी जमती रही। फिर भी उनकी इस जमात की कोई बड़ी उपलब्धि नहीं दर्ज हो सकी। इसका एक बड़ा कारण तो यह था कि उनके बाद जितने लोग उस मंडली में कायम रहे, वे सभी सामान्य क्षमता वाले लोग थे। उन्हें बिहार के अन्य समुदायों की तरह ही मिलकर कुछ करना गवारा नहीं था। एक की बढ़ती से दूसरे को जो जलन होती थी, वह उन्हें आपस में सहयोग करने से हर क्षण रोकती ही रहती थी। ऐसा नहीं था कि पहले रेणु के समय में आपस में सबों के बीच हमेशा घनिष्ठता ही बनी रहती थी। उस समय भी आपस में मतभेद होते थे, कई-कई महीनों तक आपस में बातचीत भी बंद रहती थी और वे दूर-दूर पर बैठने भी लग जाते थे। पर रेणु जी के कारण वे सब फिर शीघ्र ही एक साथ बैठने लग जाते थे। और आपस का सारा मनोमालिन्य धुल जाता था।

रेणु जी और वरिष्ठ पत्रकार जितेंद्र जी भी इस मनमुटाव के अपवाद नहीं थे। उनके बीच में कभी हफ्तों तक बातचीत बंद रहती थी। एक बार की बात है ‘रचना’ (जिसके अध्यक्ष रेणु जी थे) की कोई वार्षिक गोष्ठी की अध्यक्षता डा. करुणा झा कर रही थीं। मुख्य वक्ता थे जितेंद्र सिह। जितेंद्र जी ने इस विषय पर जो कुछ कहा उस पर टिप्पणी करते हुए उस मंडली के सबसे युवा सदस्य जुगनू शारदेय ने कुछ वैसा भी कह दिया जो उन्हें नागवार गुजरा। वे उसी क्षण से फिर मौन हो गए और दूसरे दिन भी काशी से कृष्णनाथ जी के आ जाने के बाद नहीं खुले। उस दिन से वे काफी हाउस में भी हम लोगों से बहुत दूर हटकर बैठने लग गए। रचना गोष्ठी का मैं सचिव था, इस नाते वे मुझे भी गुनहगार मानते होंगे, यह मानकर मुझे भी उनको सोफा सेट पर फिर से बुला लाने का साहस नहीं हुआ। निदान, जब रेणु जी गांव से लौटे तो उन्होंने उनसे सविस्तार इस घटना की चर्चा कर मन ही मन यह अपेक्षा की होगी कि वे भी अब ऐसे लोगों के साथ बैठना पसंद नहीं करेेंगे। परंतु ऐसा कुछ नहीं हुआ। पहले की तरह हम लोगों के साथ रेणु जी का बैठना जारी रहा। अब वे रेणु जी से भी कटने लगे, पर कब तक! दो-तीन दिनों के बाद ही निर्मल हृदय के भावुक व्यक्ति जितेंद्र जी पिछड़ने लग गए और उनके बैठने का स्थान भी क्रमशः रेणु जी के पास ही सरकने लग गया। जब इन दो प्रौढ़ मित्रों के बीच की दूरी मात्र दो पंक्तियों की ही रह गई तो रेणु जी अपने को नहीं रोक पाए और उठकर उनकी कुर्सी के पास जाकर कहा-‘‘आइए जितेंद्र जी, इन लड़कों की बात पर कैसा परेशान होना! आखिर अब हम सबों को तो अपनी जवानी की उल्फुल्लता इन्ही युवकों के संपर्क से बरकरार रखनी है।’’ जितेंद्र जी गद्गद हो उठकर रेणु जी के पास सोफे पर आए। इस खुशी में हम लोगों के बीच कॉफी का एक दौर और चला। फिर तो पहले की तरह ही जितेंद्र जी और जुगनू जी के बीच छनने लग गई। यह था कॉफी हाउस में बैठने वाले रचनाधर्मियों का क्षणे रूष्टा और क्षणे तुष्ठा वाला मिजाज। राजनीति कर्मियों को हम लोगों के इस तरह झगड़ने और फिर एकाएक झगड़ा समाप्त करने की बात पर बड़ा मजा आता था।

निर्देशक शिवेंद्र सिन्हा, जब कई वर्षो के बाद अपनी कलात्मक फिल्म ‘फिर भी’ के प्रिंट के साथ पटना आए तो सबसे पहले सुधी दर्शकों की खोज में कॉफी हाउस ही पधारे। वहीं उनकी भेंट रेणुजी से हुई और दूसरे ही दिन ‘प्रिंसेज होटल’ में साहित्यकारों- कलाकारों की एक छोटी-सी गोष्ठी का आयोजन कर दिया गया जिसमें श्री सिन्हा ने हम लोगों को इस फिल्म की निर्माण प्रक्रिया से परिचित कराया। फिर जब यह फिल्म ‘अप्सरा’ में लगी तो हम सबों ने उसे सामूहिक रूप में ही देखा और अभिभूत हुए। हमें अपने प्रांत के इस निर्देशक पर गर्व भी हुआ।

उसके बाद भी सिन्हा साहब का कॉफी हाउस आना जारी रहा। कभी भूपेंद्र अबोध के साथ तो कभी अपने वितरक भूषण जी के साथ। बाद में उनका आना पूरी तरह से बंद हो गया। न उनकी कोई दूसरी फिल्म और न वे स्वयं दीखे। पता नहीं आजकल वे कहां हैं और क्या कर रहे हैं।

इस तरह ‘73 के मई-जून में एक दिन बम्बई के एक फिल्म निर्माता मुंशी जी स्क्रीन का एक अंक लिए हुए कॉफी हाउस में आ धमके और उसे खोलकर रेणु जी के सामने रखकर हताश भाव से कहा, ‘‘देखिए, यह सब क्या हो रहा है। ‘मैला आंचल’ का पूरे पेज का विज्ञापन था। मगर यह ‘मैला आंचल’ रेणु जी का नहीं था जिस पर मुंशी जी फिल्म बनाने जा रहे थे। कोई दूसरा निर्माता इस नाम पर फिल्म बना रहे थे किसी दूसरे गुमनाम लेखक की कहानी को लेकर। शायद मुंशी जी ‘मैला आंचल’ नाम का रजिस्ट्रेशन कराना भूल गए थे।

अब क्यो, लिहाजा हम कॉफी हाउस से जुड़े लेखकों-कलाकारों ने इस पर दूसरे दिन वहीं एक छोटी-सी मीटिंग की और भारत सरकार से अनुरोध किया कि वह ऐसा कोई कानून बनाए जिससे कोई निर्माता किसी साहित्यिक कृत्ति के नाम की चोरी नहीं कर सके। कहना नहीं होगा कि इसके पहले भी एक निर्माता ने किसी और कहानी को लेकर ‘गुनाहों के देवता’ नाम से फिल्म बनाने की घोषणा कर दी थी, जबकि यह धर्मवीर भारती के प्रसिद्ध उपन्यास का नाम था।

जब तक रेणु जी जीवित रहे तब तक बाहर से पटना आने वाले साहित्यकार उनसे मिलने के लिए कॉफी हाउस अवश्य आते थे। ऐसे साहित्यकारो में कमलेश्वर जी, विजयदेव नारायण साही और विद्यानिवास मिश्र जी के साथ साहित्य चर्चा में शामिल होने का मुझे भी कई बार अवसर मिला। रघुवीर सहाय जी का तो ‘दिनमान’ के संपादक होने के कारण पटना आना फिर कॉफी हाउस में पधारना प्रायः लगा ही रहता था। ‘बिहार आंदोलन’ को ‘कवर’ करने में उनकी जो भूमिका रही और जनता शासनकाल में भी उन्होंने सरकार के प्रति रचनात्मक आलोचना का जो सिलसिला चलाया उसके कारण कॉफी हाउस वालों के बीच उनका अत्यंत सम्मानप्रद स्थान बन गया था। उनके आसपास इकट्ठे होकर उनसे बातचीत करने में लोगों को गौरव का अनुभव होता था।

रघुवीर सहाय को छोड़कर जब भी कोई संपादक बाहर से आते तो कुछ लोग उनको ‘स्मगल’ करके ‘राजस्थान’ में ले जाने की कोशिश करते कि अन्य लोगों को उनसे संपर्क बढ़ाने का मौका नहीं मिले और वे उनके पत्रों में नहीं छप सकें।

रेणु जी जब अज्ञेय, दिनकर या वी. पी. कोइराला के साथ आते तो हम सब प्रायः उन्हें आपस में ही बातचीत करने के लिए छोड़ देते थे। इनके बीच हम तभी जाते जब उनमें से कोई स्वयं हमें बुलाता। कोइराला और अज्ञेय तो हमें कई बार बुला भी लिया करते थे। पर याद नहीं आता कि कभी दिनकर जी ने किसी को बुलाया हो। पर इस संपर्क से वंचित रह जाने पर भी हम में से कोई कभी अपना चेहरा नहीं लटकाता था।

रेणु के जाने के बाद नागार्जुन जी के आने पर भी हम कुछ लोग उनके आस-पास आ-आकर बैठते थे। उनके सान्निध्य से एक रचनात्मक सुकून भी मिलता था। पर जिस ढंग से उन्होंने बिहार आंदोलन में स्वयं भाग लेकर भी उसकी तीखे शब्दों में आलोचना की, उसे सब लोग जज्ब नहीं कर पाए। फिर समय के अंतराल के साथ यह दुराव भी मिट गया और वे हमारे सम्माननीय कवि ही बने रहे अपनी रचनाधर्मिता के कारण। तब तक हम साम्यवादी खेमें से जुड़े लेखक और कवि कुमारेंद्र पारस नाथ सिंह को केंद्र बनाकर बैठने लग गए थे। ऐसे लोगों में हरिहर प्रसाद, जितेंद्र सिंह राठौर, नचिकेता, राम निहाल गुंजन, राणा प्रताप सिंह और गोपेश परीक्षित का नाम विशेष रूप से लिया जा सकता है। इस मंडली में कभी-कभी खगेंद्र ठाकुर और नंदकिशोर नवल भी आ विराजते थे। हम भी कभी इन लोगों के साथ बैठते थे।

कॉफी हाउस के बेयरे भी हमारी रचनाधर्मिता के अंग बन गए थे। जब भी हममें से कोई कॉफी दिनों के बाद लौटता तो वे यह पूछना नहीं भूलते कि इतने दिनों तक हम कहां रहे। मुझे अपनी पूर्वांचल की हर यात्रा से लौटने के बाद उनमें से कई को अपना मौखिक वत्तांत भी सुनना पड़ता था।

रेणु जी की कहानियों का जब किसी दक्षिणी भाषा-तेलुगु, तमिल, मलयालम या कन्नड़ की पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशन होता और उसकी प्रतियां उनके पास आती तो वे उसे लेकर पहले ही कॉफी हाउस चले आते और उस भाषा को जानने वाले बेयरे को खोजकर उसे पढ़ने के लिए कहते। वह पूरी तन्मयता के साथ अपनी भाषा में कहानी पढ़ता होता और हम सब उसी तन्मयता के साथ सुनते भी होते। भाषा तो समझ में नहीं आती, पर उन कहानियों में आए नामों को जानकर ही जान लेते कि रेणु जी की किस कहानी का पाठ हो रहा है। उस समय रेणु जी और उस बेयरे के चहेरे पर जो गर्व-भरा संतोष का भाव होता था, वह हम सबों को भी रोमांचित कर देता था।

इस रेणु मंडली के संबंध में एक अति उच्च धारणा यह बन गई थी कि हम लोगों के बीच हमेशा साहित्य एवं राजनीति संबंधी गंभीर बहसें ही चला करती हैं। लेकिन बात ऐसी नहीं थी, बल्कि हकीकत यह थी कि हम लोगों के बीच हल्की-फुल्की बातचीत और गपबाजी ही अधिक हुआ करती थी। हां, रेणु जी कभी-कभी अपने नेपाल प्रवास और फिल्मी संसार-संबंधी बातों को बड़ी ही गंभीरता के साथ सुनाया करते थे। इसके साथ ही हम लोगों को कोइराला परिवार के साथ उनकी अंतरंगता की भी जानकारी मिलती रहती थी। उनके इस अत्यंत गहरे लगाव की जानकारी उस समय भी मिली थी जब एक बार अस्पताल में उन्होंने कहा कि अगर उनकी मृत्यु हो जाए तो उनके शव को बनारस में ‘दाजू’ भाई (विश्वेश्वर प्रसाद कोईाला) के चरणों के पास ले जाया जाए। हम उनकी इच्छा को इसलिए पूरा नहीं कर पाए कि उस समय कोइराला जी नेपाल सरकार के काठमांडु स्थित कारागार में बंद थे।

जब बाहर से कोई साहित्यकार आते या हल्की बातों के बीच भी साहित्य या राजनीति का कोई वैसा गंभीर प्रश्न आ जाता तो हमारी बातें अपने-आप गंभीरता की पटरी पर चढ़ जाती थीं। संभवतः इसे ही देख-सुनकर लोगों ने अनुमान लगा लिया होगा कि हम लोगों के बीच हमेशा गंभीर बातें ही होती रहती हैं।

इस कॉफी हाउस में इंका के बड़े नेता प्रायः नहीं ही आते थे। केंद्रीय मंत्री धर्मवीर सिंह इसके अपवाद थे। कभी-कभी प्रो. सिद्धेश्वर प्रसाद भी आ जाते थे। पर उन्होंने काफी हाउस के साथ अपनी कोई पहचान नहीं बनाई थी। विपक्षी दल के नेताओं में मधु लिमये, जार्ज फर्नांडीस और चंद्रशेखर तो कई बार यहां सदलबल पधारे थे। इस अवसर पर अन्य दलों के युवजनों ने भी उनके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया था।

कॉफी हाउस में ‘बिहार आंदोलन’ के समय आंदोंलनकारियों का जमावड़ा लगा रहता था। विपक्षी दलों की ओर मुखातिब कुछ लोगों ने साहित्य एवं कला के क्षेत्र में भी अपना स्थान बना लेने में सफलता प्राप्त कर ली थी। इन कारणों से ही इंका के कई छुटभैये नेताओं ने यह भी कहना शुरू कर दिया था कि इसके कारण ही विपक्षी आगे बढ़ते जा रहे हैं। कहना नहीं होगा कि ऐसे लोगों में उन्ही बेकार लोगों की संख्या अधिक थी जिन्हें नेताओं के पास चापलूसी करने के लिए ‘कॉफी हाउस’ भी एक विषय के रूप में सहज ही प्राप्त हो जाता था। सच्चाई तो यह है कि इंका समेत सभी दलों की नई पीढ़ी ने जो निखार पाया, उसमें कॉफी हाउस का भी एक महत्वपूर्ण योगदान था।

यह भी मानने के कई कारण हैं कि आज राजधानी पटना में जो कला, साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में तीन-चार सौ ऊर्जावान लोग काम कर रहे हैं, उनमें से कुछ लोग भटककर गलत रास्ता पर भी चले गए होते, अगर उन्हें कॉफी हाउस का संपर्क और साहचर्य नहीं मिला होता।

रेणु जी के गुजर जाने के बहुत दिनों बाद तक भी ‘रेणु कार्नर’ की चर्चा चलती रहती थी जो पश्चिम-उत्तर कोने में था। इसके संबंध में इतनी ही बात कही जा सकती है कि पहले तो हम लोगों ने अंदर में सोफे पर बैठना शुरू किया था। पर जब दोनों सोफाओं को हॉल में रख दिया गया तो हम लोग वही बैठने लग गए थे। फिर कुछ वर्षों के बाद कुछ अन्य लोगों ने हम लोगों का ख्याल नहीं कर पहले से ही उस पर कब्जा जमाना शुरू कर दिया तो रेणु जी ने सोफा को छोड़ कर वह कोना पसंद कर लिया। मगर इसका लिहाजा सबों ने किया। रेणु जी चाहे जितनी देर से आए, वह कोना यानी उस कोने की चार कुर्सियां और एक टेबुल खाली ही पड़ी रहती थी।

मगर इस कॉफी हाउस के साथ सब कुछ अच्छा-अच्छा ही नहीं चल रहा था। धीरे-धीरे इसमें बैठने वालों के स्तर में गिरावट आने लग गई थी। 80 के आम चुनाव के बाद जो पीढ़ी समाज के विभिन्न क्षेत्रों में प्रमुखता में आई, उसने इसकी संस्कृति को बिगाड़ने में कोई संकोच नहीं किया। कभी-कभी पिस्तौल भी निकलने लगे और गांजा-चरस-भरे हुए सिगरेट के धुएं से भी आसपास के लोगों का दम घुटने लग गया। जो कुछ हो रहा था, उससे महिलाओं का विशेष रूप से घबराना स्वाभाविक ही था। एक बार की बात है, एक दल-विशेष के युवा मंच के एक गुट के कुछ लोग आए और अपने ही मंच के दूसरे गुट के नेता को गाली देते हुए उसकी खोज करने लग गए। आने के साथ ही उन लोगों ने अपना पराक्रम दिखलाने के लिए टेबुलों को उलटना और गिलासों को फोड़ना भी शुरू कर दिया था, जिससे पूरे हाल में शीशे की टुकडि़यां बिखरने लग गई थी। हम बड़ी मुश्किल से अपने को इससे ‘हिट’ होने से बचा सके थे। निदान, जब वे दूसरे गुट के नेता नहीं मिले तो उन लोगों ने उस गुट के एक-दूसरे युवा कार्यकर्ता को ही पीटना शुरू कर दिया। हमसे बे लोग खामोश ही रहे। हां, माकपा के युवा नेता सर्वोदय शर्मा ने अपने शरीर पर आघात सहकर भी उनका विरोध किया। उस दिन से श्री शर्मा के प्रति मेरे दिल में एक अतिरिक्त सम्मान का भाव पैदा हो गया।

इन हादसों के बीच भी भाई नरेंद्र जी कभी-कभी मनोरंजक स्थिति पैदा कर देते थे। दूसरी बार जब इसी तरह की घटना घटी और लोग भयभीत होकर निकलने लग गए तो भाई जी ने सोफे पर जाकर हनुमान चालीसा का पाठ करना शुरू कर दिया। हादसे के इस वातावरण में भी हमारे होठों पर हंसी आ गई। लगा, अभी कॉफी हाउस की जिंदादिली बची हुई है।

परंतु इस तरह के प्रसंग जब बार-बार होने लग गए तो न मालूम क्यों हमें भी आभास होने लग गया कि अब इस कॉफी हाउस का भी अंत समय आ गया है। इसके कुछ ही दिनों के बाद यह जानकारी मिली कि कॉफी हाउस की पटना सिटी में रहने वाली मालकिन इसका ‘लीज’ अब आगे नहीं बढ़ाना चाहती है।

इस तरह पंद्रह वर्षों के बाद’ 86 के जुलाई के अंतिम सप्ताह में यह बंद हो गया और इसके साथ ही पटनावासियों के लिए आपसी परिचय बढ़ाने का यह महत्वपूर्ण स्थान भी खो गया।

जिस दिन इसकी बंदी हो रही थी, सभी लोगों के चेहरे पर एक गम का भाव; था उनकी एक प्यारी चीज उनसे विदा ले रही थी। सबों ने उस अवसर पर कॉफी हाउस की संस्कृति की शानदार परंपरा के अनुसार एक शोक सभा का आयोजन किया जिसमें बी.पी. कोइराला से लेकर रामेश्वर प्रसाद सिंह तक सभी दिवंगत हुए लोगों को श्रद्धाजंलि अर्पित की गई।

कभी कॉफी हाउस में साथ बैठने वाले उन दिवंगत हुए लोगों के माध्यम से कॉफी हाउस को ही श्रद्धांजलि अर्पित करने का यह तरीका भी कितना अपनापन-भरा था!

(लेखक की पुस्तक ‘बिहार की अस्मिता’ से साभार)

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अरुण नारायण

प्रस्तुति – अरुण नारायण 

अरुण नारायण, नई पीढ़ी के पूरावक्ती समाजिक, साहित्यिक कार्यकर्ता के रूप में सक्रिय अरुण नारायण की रपटें, इंटरव्यू, कविताएं और षोध | यत्र-तत्र पत्र-पत्रिकाओं और विभिन्न ब्लाग्स पर प्रकाषित होते रहे हैं। संप्रति पटना में रहते हैं। स्थाई संपर्कः आष्वासन षाखा बिहार विधान परिसद, पटना 800015 मो 8292253306.

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