कुछ व्याकुल सवालों के साथ इंसानों की बस्ती में इंसानियत और प्रेम को खोजतीं प्रेमा झा की कवितायें …..

इंसानियत

प्रेमा झा

तुमने मुझे प्यार किया

मजहब की दीवारें तोड़कर

मुल्क की दीवारें लांघकर

मगर ख्याल रखना

इंसानियत की जो टूटनी नहीं चाहिए

एक सिक्का उछाला हमनें

दोनों हाथों की बंद मुट्ठी से

दूर तक आकाश में और

नीचे छोड़ दी!

ये टॉस रहा

न आगे, न पीछे/

कौन-सा पक्ष तुम्हारा रहा/ कौन मेरा

मैं नहीं बताऊंगी/

तुम भी मत बताना

ये टॉस इंसानियत है

और

अब इसके लिए सिक्के को पेटी में बंद कर दो.

हमने वक़्त की आधी रात से पूछा

दिन कौन-सा पक्ष मज़बूत रहेगा?

उजाला मुस्कुरा पड़ा/

पेटी का कब्ज़ा

चमक रहा है

सिक्के जो बंद किए हमने इसमें

कभी खनकता है/

कभी खुद-ब-खुद खेलता है.

पक्षों की मजबूती के मद्देनज़र

दीवारें तोड़ी/

लकीर लांघी

और/

खारिज़ किया

हमने समुद्रों, पर्वतों की दूरी

इसी तरह टॉस होते हुए

इंसानियत के ज़ज्बे में|

लड़कियाँ

ये लड़कियाँ कवरेज़ एरिया से

बाहर नहीं जानी चाहिए

इनकी उपलब्धता के हरेक कोने का

परम्परा के नेटवर्क से

एक पुराना कनेक्शन है

तुम्हें बताना चाहिए इन्हें

जब ये रिंगटोन-सी बजती हुई

किसी भी चौराहे पर चमकने लगती है

अपनी लचकती कमर पर

हाथ रखकर

दबा लेती है

बैलेंस-कार्ड की तरह कई फ़ाइलें

जो सबूत है

इनके सुनहरे भविष्य का

किसी सोनचिरैया का

पिंजरे में इस तरह कैद हो जाना

एक आत्मबोध भी है|

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    By: प्रेमा झा

    प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ और कविताएँ प्रकाशित. फिलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत . संपर्क : ईमेल – prema23284@gmail.com
    बी- ९७, ईस्ट ऑफ़ कैलाश,
    नई दिल्ली- ११००६५
    सम्प्रति : हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में ‘सीनियर कंटेंट राइटर एंड एडिटर’ के पोस्ट पर कार्यरत

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    उसका प्रेमी: एवं अन्य कवितायेँ (प्रेमा झा)

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