आजकल एक आम धारणा है कि जिसके हाथ में झंडा है और जिसके जुबान पर नारे हैं उसी का वैचारिक पक्ष सशक्त है । लेकिन लेखक ने ऐसे झंडाबरदारों को नहीं बल्कि उन्हें नायक कहा है जो झंडे और नारे की राजनीती से अलग जमीन पर गुमनाम से अपने हिस्से की क्रांति को अंजाम दे रहे हैं । जैसा कि वे मधु शर्मा , कमलिनी दत्त , रंजना अड़गड़े को नारी शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित करते हैं जो कि नारी सशक्तिकरण के प्रचलित और प्रचारित रूप से अलग लेकिन सार्थक प्रतीत होता है ।

इंसान हैं’

अरुण श्री

अरुण श्री

भाई नित्यानंद गायेन के तात्कालिक वाराणसी प्रवास की अनेक उल्लेखनीय स्मृतियों में से एक महत्वपूर्ण दृश्य था थके-थके से लोलार्क द्विवेदी जी का अस्सी घाट की असुविधाजनक सीढियाँ उतरना । अपने पूरे साहित्यिक और बनारसी भंगिमा के साथ लोलार्क जी वहाँ वरिष्ठ साहित्यकार विष्णुचंद्र शर्मा का सद्य प्रकाशित संस्मरण “इंसान हैं” देने आए थे , जिसे लेखक ने स्टडी स्केच कहा है । किताब के पन्ने पलटते ही डॉ रामदरश मिश्र की कृति ‘स्मृतियों के छंद’ की याद आई ।

विस्मृतियों और मानवीय मूल्यों के ह्रास के समय में कोई वरिष्ठ साहित्यकार जिसकी उम्र तक पहुँचते-पहुँचते हमारे बुजुर्ग स्मृतिलोप से पीड़ित हो जाते हैं , अगर ये दावा करता है कि “इंसान हैं” तो विश्वास के साथ-साथ जिज्ञासा का पैदा होना स्वाभाविक है ।%e0%a4%95%e0%a4%bf%e0%a4%a4%e0%a4%be%e0%a4%ac

इस संस्मरण में उन्होंने बड़े सम्मान और जरुरी ईमानदारी के साथ जिन्हें याद किया है , उनमें रामनारायण शुक्ल , शम्भुनाथ मिश्र , अनिल करंजई , महेश दर्पण , मंगलेश डबराल , काशी नाथ सिंह साथ नामवर सिंह , अशोक बाजपेयी , प्रशांत , कमलेश , कमलिनी दत्त , श्याम शर्मा , मधु शर्मा , काजल पाण्डेय , संजना तिवारी , नित्यानंद गायेन , रंजना अड़गड़े , लोलार्क द्विवेदी , वाचस्पति , कमर मेवाड़ी और रजत कृष्ण के नाम शामिल हैं । लेकिन ये संस्मरण कोई नास्टेल्जिक अभिव्यक्ति न होकर अपने वितान में एक समग्र विषयगत अवलोकन है । इस क्रम में वे किसी व्यक्ति की बात करते कभी व्यक्ति केंद्रित नहीं होते , बल्कि उसके पूरे कॉल-खंड का विश्लेषण करते दिखते हैं ।

रामनारायण शुक्ल की साहित्यिक प्रतिबद्धता की चर्चा के क्रम में वे ‘ऐयाश प्रेतों’ द्वारा पश्चिम से आयातित द्वितीय विश्वयुद्धीय ‘विद्रोह’ की बात करना नहीं भूलते । शम्भुनाथ मिश्र को याद करते बनारस के संगीत पुराधाओं के साथ साथ घरानों में उलझे संगीत के भविष्य के प्रति भी खूब आश्वस्त दिखते हैं । रजत कृष्ण के बहाने तत्कालीन राजनितिक गतिविधियों के विश्लेषण और सत्ता के प्रति अपने तेवर से ये साबित करते हैं कि साहित्यकार सत्ता के विरुद्ध रहने के लिए अभिशप्त होता है । जहाँ एक ओर वे महेश दर्पण ,मंगलेश डबराल और संजना तिवारी को बेहद आत्मीय शब्दों के याद करते हैं वहीँ दूसरी ओर लीलाधर जगूड़ी , काशीनाथ सिंह , नामवर सिंह या अशोक वाजपेयी की चर्चा के दौरान जीवन और सच की कड़वाहट को महसूसा जा सकता है ।

आजकल एक आम धारणा है कि जिसके हाथ में झंडा है और जिसके जुबान पर नारे हैं उसी का वैचारिक पक्ष सशक्त है । लेकिन लेखक ने ऐसे झंडाबरदारों को नहीं बल्कि उन्हें नायक कहा है जो झंडे और नारे की राजनीती से अलग जमीन पर गुमनाम से अपने हिस्से की क्रांति को अंजाम दे रहे हैं । जैसा कि वे मधु शर्मा , कमलिनी दत्त , रंजना अड़गड़े को नारी शक्ति के प्रतिनिधि के रूप में रेखांकित करते हैं जो कि नारी सशक्तिकरण के प्रचलित और प्रचारित रूप से अलग लेकिन सार्थक प्रतीत होता है ।

विष्णुचंद्र शर्मा

विष्णुचंद्र शर्मा

तॉल्स्तॉय  ने लिखा कि “जब हम किसी सुदूर यात्रा पर जाते हैं , आधी यात्रा पर पीछे छूटे हुए शहर की स्मृतियाँ मँडराती हैं” , जैसे निर्मल वर्मा अपने यात्रा वृतांत में लिखते हैं कि “मैं आइसलैंड जा रहा हूँ किन्तु सोच रहा हूँ बराबर प्राग के बारे में” । इस संस्मरण में भी छूटा शहर बनारस मानो प्राग हुआ जा रहा है । लेकिन जब वे अनिल करंजई के विषय में लिखते हैं कि “उस संकरी गली के बंद कमरे में जिस युवा कलाकार ने एक चुनौती स्वीकार की थी , उसकी कृतियाँ बनारस में खोजने से न मिलेंगी” तो सहज ही अंदाजा हो जाता है कि उनका व्यवहार अपनी स्मृतियों के प्रति मुग्धता का आवरण ओढ़े नहीं है बल्कि सच के पथरीले रस्ते पर चहलकदमी कर रहा है । जाहिर है कि ऐसे में उनके पाँव भी जख्मी हुए होंगे । अपनी पीड़ा का जिक्र करते जब वे लिखते हैं कि “हर पीढ़ी के कहानीकारों की सूचियाँ बनी लेकिन किसी में विष्णुचंद्र शर्मा कहानीकार नहीं” या फिर काजल पांडे के प्रति आलोचकों के उदासीन रवैये के विरुद्ध शिकायती होते हैं तो साहित्यिक गुटबाज़ी और मठाधीशी को अनावृत कर देते हैं ।

ये संस्मरण पढ़ते हुए महसूस हुआ कि जैसे साँझ की चौपाल में ‘एक बेघर और खाली जेब यात्री’ अपने अमूल्य अनुभव बाँट रहा है , और ये भी कि जिस पीढ़ी को ध्यान से सुनना चाहिए वो ऊँघ रही बैठे-बैठे जबकि शब्दों के बीच आत्मसंघर्ष की कई-कई उपकथाएँ गिरी पड़ी हैं जिन्हें बार-बार पढ़ा जाना चाहिए था ।

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