उनको अपने हुश्न पे है नाज़… ग़ज़ल (उपेन्द्र परवाज़)

उपेन्द्र परवाज़

उपेन्द्र परवाज़ यूं तो भौतिकी में शोधरत छात्र हैं लेकिन शौकिया तौर पर आप ग़ज़ल लिखते हैं आपकी दो ग़ज़लें यहाँ आपके सम्मुख हैं | विधा के अग्रज साथी उपेन्द्र की इन रचनाओं पर अपनी कीमती राय देंगे ऐसी अपेक्षा है | संपादक 

1-

उनको अपने हुश्न पे है नाज़ तो फिर क्या कीजे ?
मेरी आँखों से छुपते नहीं राज़ तो फिर क्या कीजे ?
डूबा के खुद ही कर रहे साहिल पे इंतज़ार अब वो
निराले उनके ये अंदाज़, तो फिर क्या कीजे ?
उन्ही का शहर वही मुद्दई वही मुन्सिफ
फैसले में हम ही निकले दगाबाज़, तो फिर क्या कीजे ?
उन्होंने देखा ही नहीं आईने से आगे कुछ भी
ख़ुदपरस्ती में डूबे हुश्न के जहाज, तो फिर क्या कीजे ?
मुझे यकीन है वो खुद ही लौट आयेंगे
पर मै वैसा न रहूँ जैसा हूँ आज, तो फिर क्या कीजे ?
मै रहबर हूँ, रहजन और मंज़िल खुद भी
गुम होना ही तुझको अब “परवाज़”, तो फिर क्या कीजे ?

2 –

ज़मीन से ताल्लुक ख़त्म करके, कभी बेखबर नहीं होते
परिंदे भी बताते है, कि आसमां में घर नहीं होते |
भटकता हूँ यादो के दस्त में नंगे पाँव मै हर पल
की यादो के सफ़र में मील के पत्थर नहीं होते |
ये दिल के रोग है जिनको लगे है, अब वही जाने
की इसमे ज़हर निकालने के भी नश्तर नहीं होते |
तुम जीत कर भी खो गये गुमनाम दुनिया में
हमारी हार के चर्चे, अभी किस घर नहीं होते ?
संभल कर अब चलो “परवाज़” तुम भी रहबरों के संग
ज़माने कातिलो के हाथ अब खंजर नहीं होते |

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