समय के बीच मानव मन की व्याकुल रिक्तता को विवेचित करतीं नित्यानंद गायेनकी समय सापेक्ष रचनाएँ …..

उम्मीद ही तोड़ती है आदमी को हर बार 

नित्यानंद गायेन

मिटा दिया जाऊंगा एक दिन
तुम्हारी डायरी के उस पन्ने से
जिस पर लिखा था कभी
तुमने मेरा नाम

इतिहास के किसी अध्याय में जिक्र भी नहीं होगा मेरा
यह जानते हुए भी
कि सभी अपने छोड़ जाएंगे एक दिन
जब मुझे सबसे ज्यादा जरूरत महसूस होगी उनकी
वे बंद कर लेंगे अपने द्वार
फिर भी
मैं उम्मीद भरी नज़रों से ताकता रहता हूँ
तुम्हारे द्वार की ओर

उम्मीदों की सीमा कहाँ होती है !
उम्मीद ही तोड़ती है आदमी को हर बार ||

डरता हूँ कि टूट जाएगा ये ख्याब सुबह के साथ

आँखे भर आती हैं मेरी
जब कभी मैं ख्याबों में करता हूँ तुमसे प्यार
सोचता हूँ तुम्हें …
शब्द कम पड़ते हैं
रात की गहराई के साथ होता जाता हूँ अकेला
बहुत अकेला
और तब याद आती हैं तुम्हारी बातें
चेहरा तुम्हारा
फिर डरता हूँ कि टूट जाएगा ये ख्याब सुबह के साथ
हर सुबह के साथ
मैं हो जाता हूँ अनाथ
जिसके लिए नहीं बना कोई
अनाथालय |

इस दुनिया की नीव तुम्हारे संघर्ष से है 

हम सच बोलेंगे
और क़त्ल कर दिए जाएंगे
सत्ता डरती है सच से
हर सच को अपनी आलोचना मानती हैं सत्ता

हम भूले नहीं हैं
सुकरात को
उसके ज़हर के प्याले में
मिला दिया गया था हमारे हिस्से का ज़हर भी
सत्ता नहीं जानती
ज़हर से व्यक्ति मरता है
सच नहीं ||

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