कविता के अंतर्मन में झांकते शब्दों से प्रेम को परिभाषित करतीं प्रेमा झाकी कविताएँ ……|

उसका प्रेमी 

प्रेमा झा

प्रेमा झा

तस्वीर का आगाज़
जाने कब हुआ
तब जब आइना भी नहीं खोजा गया था!
खुद को भी न पहचानता वो शख्स
पहचानने लगा था तुमको
वो तुम कौन थी?
कोई प्रेमिका या कोई बंजारन
तुम भटकी हुई आई थी और/
खूबसूरत तुम्हारी आँखों ने
बांध लिए जाने कितने चेहरे
और
चित्रकारी का आगाज़
तभी हुआ था शायद
वो शख्स कलाकार बन गया
एक तस्वीर खींच दी उसने
तुम झाँकने लगी थी
तुम्हारी आँखें बोलने लगीं
जाने क्या बोली तुम पहले कि आह-हा निकला
और
भाषा बढती चली गयी
तुम्हारे बेशुमार पनियाले चेहरे ने गीत रच डाले
ग़ज़ल कहने लगा वो/
वो शायर बन गया
तुम्हारी तारीफ़ में
नज़्म पढ़ी गयी
जलसे होने लगे
शब्द नाचते चले गए
गीत, ग़ज़ल, कविता
सब मचलने लगे!
वो स्त्री अपनी विजय पर
मुस्कुराने लगी
शख्स जानें कहाँ-कहाँ
क्या-क्या बनता चला गया
याद करने लगा
सपने देखता हुआ
नज़्म कुरेदता रहा
उसके मस्तिष्क का सिरा
जज्बाती होने लगा
कभी अपने हाथों से तो कभी/
उँगलियों से वो सहलाता रहा
एक स्त्री कि कल्पना और/
उस कल्पना की पीड़ा
फिर
उस पीड़ा को बताने की ज़हमत का शोर
वो करने लगा
फिर
कोयल गाने लगी
उस कोयल के गीत को उसने
उस स्त्री के कंठ से जोड़ लिया
और/
तस्वीर को आवाज़ दे डाली
वो आज भी मचलता है
जब-जब कोयल गाती है
बारिश में भीगता वो
अभी भी चित्रकारी कर रहा है|

एहसास दीया 

google से साभार

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सारी दीवारें साफ़ की
झाड़ा और पोछ दिया
शाम घर संवारकर सुखा दिया/
नम दीवारों पर
सांझ-बाती की चमक में
अब भी कुछ चित्र बन रहे हैं/
ये क्या है?
सब उपक्रम करने के बाद भी
ये चित्र क्या बोलने लगे हैं?
मॉडर्न-पेंटिंग तो नहीं ये
न ही किसी चित्रकार कि मजबूर कोशिश
कितना कुछ साफ़ किया
सब पोछ दिया/
जब तुम आये थे यहाँ तुमने
इन दरवाजों-दीवारों को छुआ
फिर चले गए
वो एहसास दरवाज़ों पर चिपक गए/
दीवारों पर झाँकने लगी हमारे-तुम्हारे मिलन कि आभा.
मैंने सब साफ़ कर दिया मगर
नहीं पोछ पायी वो छुअन/
अब नहीं पोछना कुछ
तुम दिखने लगे दीवारों पर मुस्कुराते हुए –
उन धागों में
जिनसे कुछ सजावटी चिड़ियाँ
बाँध दी थी मैंने!
तुम उनके प्रणय-कम्पन में
थिरकने लगे हो
चुहल करने लगे हो
लो, छोड़ दिया मैंने उन्हें
वही पर टँगी
वो खूब शोर करती है
मेरे भूलाने के ज़ज्बे पर
और
मैं, मौन!
उन्हें वहीं पर टिका दिया
तुम, उन चित्रों, आलोड़नों
और
धागों में हो फँसे हुए.
मेरे दरवाज़े के भीतर
क्या साफ़ करूँ?
इन एहसासों को-
नहीं, कभी नहीं!
मैं दीवाली की शाम
यहाँ रौशनी दूँगी
अमावस्या की रात
ज़ज्बातों के तेल में
नयन-बाती से
यादों का एक दीया जला लूंगी/
तुम आ जाना
दीवाली में प्रिय!

कोशिश में

बहुत पहले की बात है
शब्दों के सीखने कि सुगबुगाहट में
जाने कितने पहर
हम यूं ही नीचे पीपल के
काट लिया करते थे
हर रोज़ एक कोशिश
कलम पकड़ने की छटपटाहट में
और कागज़ दोस्त जो हमेशा
हमारी पीठ पर लदा होता
झट से उतारकर
जाने कितने हर्फ़ उकेरते और सोचते
कितना कुछ सीख रहे हम
धीरे-धीरे वाक्यों को भी रचने लगे
रचने लगे कविता, कहानी
और जाने कितनी शब्द संहिताएं
ये संहिताएँ वहन करने लगी
कारीगरी लेखन की
और भाषा, बातें और वाक्य
सब जटिल होते चले गए
पीपल से भी घनघोर.
हम समीक्षा कर रहे हैं अब
क्या शुरूआती शिशु शब्द
हो गए हैं इतने प्रौढ़ कि लोरियां नहीं लिखते
मनोव्वल नहीं गढ़ते?
मैं पीपल के नीचे
प्यार लिखने की कोशिश में हूँ.

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    By: प्रेमा झा

    प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कहानियाँ और कविताएँ प्रकाशित. फिलवक्त अपने एक उपन्यास को लेकर शोधरत . संपर्क : ईमेल – [email protected]
    बी- ९७, ईस्ट ऑफ़ कैलाश,
    नई दिल्ली- ११००६५
    सम्प्रति : हॉस्पिटैलिटी इंडस्ट्री में ‘सीनियर कंटेंट राइटर एंड एडिटर’ के पोस्ट पर कार्यरत

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    इंसानियत, एवं अन्य कविताएँ (प्रेमा झा)

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