हमरंग का संपादकीय आलेख विचलन भी है जरुरी को पढ़ते हुए पद्मनाभ गौतमको यह अपना भोगा हुआ यथार्थ लगा | और सहज ही उनकी कलम से यह कविता आलेख पर टिपण्णी के रूप में निकली | यह कविता एक पद्मनाभ का ही यथार्थ नहीं लगता करोड़ों युवाओं का महसूस होता है संपादक 

एक जोड़ा झपकती हुई आँखें

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक)

पद्मनाभ गौतम

चाह कर भी नहीं कर सकता
जिस घड़ी प्रतिरोध मैं,
बदल जाता हूँ मैं,
निर्लिप्त, भावहीन आँखों की जोड़ी में

मुझे देखकर चीखता है

हड़ताली मजदूर,
गूँजता है आसमान में
”प्रबंधन के दलालों को
जूता मारो सालों को” का शोर
तब एक जोड़ा झपकती हुई
आँखों के सिवा
और क्या हो सकता हूँ मैं

जिस वक्त नशेड़ची बेटे,

बदचलन बेटी या पुंसत्वहीनता का
अवसाद भुगतता अफसर,
होता है स्खलित
पैरों तले रौंदकर मेरा अस्तित्व,
तब भी एक जोड़ा भावहीन
आँखें ही तो होता हूँ मैं

एक सुबह

सर पर तलवार सी टंगी रहने वाली
“पिंक स्लिप”
धर दी जाती है
बेरहमी के साथ हथेली पर,
और कठुआ कर हो जाता हूँ तब्दील
आँखों की भावहीन जोड़ी में/
इन आँखों के हक-हिस्से नहीं
विरोध में एक साथ उठती
हजारों मुटिठयों की ताकत का दृश्य

तब भी होता हूँ मैं एक जोड़ी

झपकती हुई आँखें ही,
जब नामकरण करते हो तुम मेरा
खाया-पिया-अघाया कवि/
झुककर देखती हैं आंखे,
सुरक्षा की हजारों-हजार सीढि़यों में
कदमों तले के दो कमज़ोर पायदान/
और ठीक नीचे जबड़े फैलाए उस गर्त को
जिसे पाट न सकीं मिलकर
समूचे वंशवृक्ष की अस्थियां भी

एक जोड़ी आंखें हूँ मैं

जो झपक कर रह जाती हैं
इस जिद पर कि बेटा नहीं मनाएगा
जन्मदिन उनके बगैर/
झपकती हैं जो उदास बेटी के सवाल पर,
आखिर उसके पिता ही
क्यों रहते हैं उससे दूर/
पढ़ते हुए मासूम का राजीनामा,
कि जरूरी है रहना पिता का
स्कूल की फीस के लिए घर से दूर,
बस एक जोड़ा झपकती हुई आँखे
रह जाता हूँ मैं

एक जोड़ी आँखें हूँ मैं

जो बस झपक कर रह जाती हैं
जब कि चाहता हूँ चीखूँ पूरी ताकत से/
या फिर फूट-फूट कर रोऊँ मैं

और तब, जब कि

एकतरफा घोषित कर दिया है तुमने मुझे
दुनिया पर शब्द जाल फेंकता धूर्त बहेलिया,
क्या विकल्प है मेरे पास
कि बदल नहीं जाऊँ मैं
एक जोड़ी भावहीन आंखों में

सुनो, ध्यान से सुनो,

यह महज झपकना नहीं है आंखों का
पूरी ताकत से मेरे चीखने की आवाज़ है
सुनो,
यह चीखने के साथ  मेरे रोने की भी आवाज़ है

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