आखिर आत्म-कथाओं में ऐसा क्या होता है कि वे साहित्य ही नहीं साहित्येतर पाठकों को भी आकर्षित करती हैं. क्या दूसरों की ज़ाती ज़िन्दगी में ताक-झाँक और उससे उत्पन्न ‘विकेरिअस प्लेज़र’ इस आकर्षण के मूल में होता है? या प्रसिद्ध और कामयाब शख्शियतों की ज़िन्दगी से जुड़े संघर्षों, उनकी दुविधाओं, उनकी नाकामियों, उनके मान-अपमान में कहीं हम अपनी साधारण सी ज़िन्दगी का कोई अक्स तो नहीं ढूंढ रहे होते; अपने सच और झूठ के प्रिज्म से दूसरों के सच-झूठ तो नहीं तलाश रहे होते ?” मन्नू भंडारी की आत्म-कथा ‘एक कहानी यह भी’ का आलोचनात्मक दृष्टि से  गहन, गंभीर विश्लेष्ण कर रहे हैं सौरभ शेखर‘ …..| –  संपादक 

एक ‘मलाल’ यह भी 

सौरभ शेखर

सौरभ शेखर

बर्नाड शॉ को किसी ने एक बार आत्मकथा लिखने की सलाह दी. वे छूटते ही बोले- ‘मैं गाँधी नहीं हूँ कि आत्म-कथा लिख डालूं. मुझमें सच लिखने का साहस नहीं है.’ बात भी सही है कि अनुमानों, सुनी-सुनाई बातों से बने अर्धसत्यों से तो किस्से-कहानियों का संसार गुलज़ार होता ही है, मगर आत्म-कथा की विधा ‘कहानी’ नहीं सच; देखा और भोगा हुआ सच मांगती है. और इस सच को कागज़ पर उतारना अपने अतीत के उस अग्नि-कुंड से पुनः-पुनः गुज़रना है, जिसकी दाह के निशानात जिस्म पर ही नहीं, हमारी रूह पर भी दर्ज होते हैं. अकारण नहीं है कि अच्छी आत्म-कथाएं जितनी ज्यादा लोकप्रिय होती हैं,उतनी ही विरल भी. हिंदी समाज में तो निजी जीवन को ले कर बरते जाने ख़ास एहतिआत की पृष्ठभूमि में आत्म-कथाओं के लिए सत्य के उदघाटन की यह चुनौती विशेष तौर पर विकट हो उठती है.

आखिर आत्म-कथाओं में ऐसा क्या होता है कि वे साहित्य ही नहीं साहित्येतर पाठकों को भी आकर्षित करती हैं. क्या दूसरों की ज़ाती ज़िन्दगी में ताक-झाँक और उससे उत्पन्न ‘विकेरिअस प्लेज़र’ इस आकर्षण के मूल में होता है? या प्रसिद्ध और कामयाब शख्शियतों की ज़िन्दगी से जुड़े संघर्षों, उनकी दुविधाओं, उनकी नाकामियों, उनके मान-अपमान में कहीं हम अपनी साधारण सी ज़िन्दगी का कोई अक्स तो नहीं ढूंढ रहे होते; अपने सच और झूठ के प्रिज्म से दूसरों के सच-झूठ तो नहीं तलाश रहे होते? क्या यह भी संभव है कि इन आत्म-कथाओं में हमारे भीतर जड़ें जमा चुका सभ्यता-जनित ‘सैडिस्ट’ दूसरों के दुखों, चोटों, ज़ख्मों और असमर्थताओं को ही गिनने उतरता है?

मन्नू भंडारी की आत्म-कथा ‘एक कहानी यह भी’ जब 2008 आई तो दो कारणों से उसे बहुत पढ़ा गया और उसकी बहुत चर्चा भी हुई. पहला चूँकि, यह आत्म-कथा उनके रचना-कर्म में एक लम्बे ठहराव के बाद आ रही थी, इसलिए उनके पाठकों के बीच उन्हें फिर से पढने की एक सहज ललक थी. दूसरा और शायद ज्यादा महत्पूर्ण कारण था, राजेन्द्र यादव के साथ उनके तनाव-पूर्ण दाम्पत्य और उम्र के उत्तरार्ध में उनके अलगाव की सार्वजनिक जानकारी और इस प्रकरण में उनका पक्ष जानने की तीव्र उत्सुकता. राजेन्द्र जी साहित्य में एक सेलिब्रिटी का दर्ज़ा रखते थे और स्त्री अस्मिता, स्त्री-अधिकारों के सबसे मुखर पैरोकार के रूप में प्रतिष्ठित हो चुके थे. सो जाहिर है कि उन्हें उनके निजी जीवन के भीषण ‘अंतर्विरोधों’ की कसौटी पर कसा जाना अपेक्षित था. राजेन्द्र जी की ख्याति उनकी बेबाकियों के लिए थी, मगर मन्नू जी के लिए आत्म-कथा में राजेन्द्र जी के साथ अपने संबंधों के बारे में सार्वजनिक रूप से बात करना कितना कठिन था, इसकी झलक उन्होंने शुरुआत में ही दी है: “लेखन और साहित्य से हट कर अपने निजी जीवन की त्रासदियों भरे ‘पूरक प्रसंग’ को लेखकीय जीवन पर केन्द्रित इस कहानी में सम्मिलित किया जाये या नहीं, इस दुविधा ने कई दिनों तक मुझे परेशान रखा….बाद में तो मैं भी सोचने लगी कि मेरा और राजेन्द्र का संबंध जितना निजता और अंतरंगता के दायरे में आता है, उससे कहीं अधिक लेखन के दायरे में आता है.” बहरहाल, अंततः इस द्वंद से ठीक ही उबर कर उन्होंने इसे भी आत्म-कथा में शामिल करने का निर्णय किया. और फिर जो सामने आया, वह जितनी मन्नू जी की कथा थी, उतनी ही राजेन्द्र जी की भी. बल्कि कहना तो यह चाहिए कि अपनी इस पूरी अतीत-यात्रा वे निरंतर राजेन्द्र यादव के आईने में ही खुद को देखती रहीं.

मन्नू भंडारी

मन्नू भंडारी

मन्नू जी ने साहित्य के अंतःपुर को एक सुदीर्घ अवधि तक देखा और जिया है. उनका नाम अपने समय के सफलतम कहानीकारों में हमेशा एहतेराम के साथ लिया जाएगा. इस नाते उनकी आत्म-कथा में कुछ ऐसे अनछुए प्रसंग आने ही चाहिए थे, जो हिंदी साहित्य के समकालीन इतिहास पर नई दृष्टि डालने में सहायक होते. और यहाँ ऐसे प्रसंग हैं भी. साठ के दशक में जिस प्रकार कमलेश्वर, मोहन राकेश और राजेन्द्र यादव की त्रयी नई कहानी को स्थापित करने की मुहिम में लगी थी, मन्नू जी ने उसका लगभग निरपेक्ष वर्णन किया है. इस त्रयी की आपसी इर्ष्या, उठापटक और उनके महत्वाकांक्षाओं के टकराव की दास्तान में हालांकि कुछ भी गोपन नहीं है, मगर मन्नू जी के नजरिये से इन सबको देखना कहीं ज्यादा प्रमाणिक है. मोहन राकेश के साथ उनका खुद का जो स्नेहिल और स्वतंत्र रिश्ता था, उसे उन्होंने पूरी ऊष्मा से याद किया है. इसी तरह, कहानी लेखन की  अनिवार्यताओं और उसके कला-पक्ष के जटिल प्रश्न पर वे जिस स्पष्ट नजरिये से बात करती हैं, वह हिंदी साहित्य आलोचना के लिए बेहद महत्वपूर्ण है. यह वाकई दिलचस्प है कि निपट यथार्थवादी शैली की कहानीकार मन्नू जी कहानी के बरअक्स कला के बारे में क्या सोचती हैं: “मैं नहीं सोचती कि लोकप्रियता कभी भी रचना का मानक बन सकती है. असली मानक तो होता है रचनाकार का दायित्व बोध, उसके सरोकार, उसकी जीवन दृष्टि और उसकी कलात्मक निपुणता. यहाँ मैं कलात्मक निपुणता को पूरे बलाघात के साथ ज़रूर रेखांकित करना चाहूंगी. क्योंकि यही आपके गहरे-से-गहरे यथार्थ बोध को संवेदना के धरातल तक ले जाती है..आपके अनुभव को एक रचना में…एक कलाकृति में ढाल देती है.” यह साफगोई कला बनाम यथार्थ की पूरी बहस को एक मानीखेज आयाम देती है और इसी बात को दूसरे शब्दों में कहती है कि यथार्थ की प्रस्तुति के कलाविहीन और प्रभावविहीन होने में ज्यादा फासला नहीं है.

हिंदी साहित्य का सिनेमा, रंगमंच और टेलीविजन से रिश्ता पिछले डेढ़-दो दशकों में सतत कमज़ोर हुआ है. द्रश्य-श्रव्य माध्यमों की ज़रूरतों में चाहे जितने बड़े बदलाव आये हों, मगर इस अबोले को इतिहास समकालीन हिंदी साहित्य की विफलता के रूप में ही दर्ज करेगा. मन्नू जी उस दौर की साक्षी रही हैं, जब उनकी लिखी कहानियों पर हिट फ़िल्में, टीवी सीरियल्स और नाटक मंचित किये गए. और इस लिहाज से साहित्य और द्रश्य-श्रव्य माध्यमों के अंतर्संबंधों, अंतर्विनिमय पर उनकी बातें नोट की जानी चाहिए. एक रचनाकार की आत्म-कथा इस दृष्टिकोण से भी महत्वपूर्ण होती है कि वह उसके रचनाकार के गढ़न और उसकी चर्चित रचनाओं का पसमंज़र हमारे सामने लाती है. मन्नू जी की रचना प्रक्रिया, जिसमें राजेन्द्र जी के साथ लिखी गई प्रयोगधर्मी किताब ‘एक इंच मुस्कान’ भी आई, को करीब से देखना और जानना भी इस आत्म-कथा की एक उपलब्धि है. आत्म-कथा का एक अत्यंत रोचक प्रसंग वह भी है जिसमें मन्नू जी कलकत्ते में अपनी नई गृहस्थी के लिए किराए का मकान ढूंढ रही होती हैं, मगर यह जानने पर कि उनके पति लेखक हैं, कोई भी उन्हें मकान देने को राज़ी नहीं है. समाज में साहित्य और साहित्यकारों की प्रतिष्ठा को ले कर अतीत के वर्षों के बारे में आम तौर पर हिंदी समाज में जो नोस्टेल्जिया है, मन्नू जी का यह कटु अनुभव उसे एक झटके में मिथक में तब्दील कर देता है. हिंदी समाज में साहित्यकार हाशिये पर हैं और हाशिये पर थे; हाशिये पर रहेंगे, इसमें मुझे संदेह है.

book-coverइन जाहिर विशेषताओं के बावजूद मन्नू जी की आत्म-कथा का फलक नितान्त सीमित है; अधिक से अधिक उनकी ज़िन्दगी का एक अध्याय भर. और इसे उन्होंने अपनी भूमिका में ही साफ़ कर दिया है- “यह भी मेरी ज़िन्दगी का एक टुकड़ा मात्र ही है, जो मुख्यतः मेरे लेखकीय व्यक्तित्व और लेखन यात्रा पर केन्द्रित है.” हाँ, यह बात दीगर है कि आत्म-कथा में वे अपने इस ‘व्यक्तित्व’ और अपनी इस ‘यात्रा’ का सुविधाजनक विस्तार करती चलती हैं. दरअसल, यह विचार करने की बात है कि कोई लेखक खुद को अपनी रचनाओं में ज्यादा अनावृत करता है या अपनी तथाकथित ‘आत्म-कथा’ में. आत्म-कथा चाहे जितना भी अपनी तटस्थता और निरपेक्षता के दावे कर ले, अंततः वह एक सजग, सुनियोजित और सिलसिलेवार विवरण ही होता है. लेखक जब अपने पात्रों, परिस्थितियों, परिदृश्यों, परिघटनाओं से अपने जानते पूरी निस्संगता मगर स्वतःस्फूर्तता के साथ मुखातिब होता है, तुलनात्मक रूप से उस अवस्था में उसे पकड़ना ज्यादा आसान है. बहता जल, ठहरे पानी की तुलना में हमेशा ज्यादा पारदर्शी होता है. इसीलिए, किसी आत्म-कथा के लेखक को समझने का अर्थ जितना उसके कहे को पढना है, उससे अधिक अनकहे पर गौर फरमाना है; जितना उसके कोलाहल से भरे पलों को दर्ज करते चलना है, उससे कहीं ज्यादा उसकी खामोशी के अंतरालों पर भी कान धरते चलना है.

मन्नू जी अपनी पूरी आत्म-कथा में अपनी ‘हीनता-ग्रंथि’ पर किसी टेक की तरह बार-बार लौटती हैं. मैं नहीं कहता कि अपनी हीनता को सायास रेखांकित करने का यह उपक्रम, अवचेतन में अपनी श्रेष्ठता-बोध से उपजने वाली एक नकली विनम्रता है. ऐसा इसलिए कि उनकी सोच में खुद को गलत समझे जाने का भाव गहरे बैठा हुआ है. और इसीलिए वे जगह-जगह सफाई देती है. और तो और आत्म-कथा की अपनी भूमिका को उन्होंने ‘स्पष्टीकरण’ का शीर्षक दिया है. अपनी खुद की कहानी कहने में उन्हें कितनी झिझक और ऊहापोह है इसकी कुछ बानगी इन वाक्यों में देखिये: “अगर कोई चाहे तो मेरे इस बाँधने-डुबोने को औरताना भावुकता के खाने में डाल कर खारिज कर सकता है”; “खैर, यह एक अवांतर प्रसंग है, जो आज एक भावुकता भरा प्रलाप भी लग सकता है”; “लेकिन जो कहना चाहिए था, वह न तब कहा, न आज ही कहूँगी, क्योंकि उसमें भी ‘नाटक’ लगने की संभावना है.” इसके अलावा, कोई बात शुरू करने के लिए वे जगह-जगह पर आत्म-संशय से भरे पद जैसे, “आज जब अवसर आया है …एक बात ज़रूर कहना चाहूंगी”; “इसी सन्दर्भ में एक बात और याद आई..तो उसका भी उल्लेख कर दूँ”, इस्तेमाल करती हैं. आखिर, क्या है वह जो मन्नू जी के आत्म-विश्वास को इतना खोखला और उन्हें अपने निर्णयों के प्रति इतना शंकालु बनाता है? क्या यह वाकई उनकी वही ‘हीनता-ग्रंथि’ है, जिसका गान उन्होंने घूम-घूम कर पूरी किताब में किया है? अपनी इस ‘हीन-ग्रंथि’ को स्थापित करने के क्रम में वे अपने पति के साथ-साथ अपने पिता तक को लपेट लेती हैं और भरसक इसे मनोवैज्ञानिक जामा पहनाने की कोशिश करती हैं. लेकिन कहीं ऐसा तो नहीं कि मन्नू जी अपनी आत्म-कथा में इस स्व-घोषित ‘हीन-ग्रंथि’ के आवरण में अपनी किसी और ग्रंथि को छुपाने के लिए यत्नशील हैं, जिससे स्वीकारना तो दूर पहचानने तक की जहमत वे नहीं उठाना चाहतीं?

मनुष्य का सबसे पहला शिकार उसकी चेतना ही करती है. यही दोधारी चेतना उसे विकसित करने के साथ-साथ एक ‘ग्रंथि-पुंज’ में भी तब्दील करती चलती है. अव्वल तो जीते-जी इन ग्रंथियों की पहचान नहीं हो पाती, और अगर पहचान हो जाये तो हम में से विरले ही उन्हें तोड़ने का साहस जुटा पाते हैं. भयंकर संताप देने वाली यही ग्रंथियां विडंबनात्मक रूप से हम में से अधिकाँश का कवच बन जाती हैं. मन्नू जी अपनी पूरी कहानी में जिसे अपनी ‘हीन-ग्रंथि’ कह कर अपने लिए सहानूभूति जगाने का प्रयास करती हैं, वह हकीकत में उनकी ‘हीन-ग्रंथि’ है ही नहीं; सोचने की बात है कि कॉलेज के दिनों में पिता की इच्छा के विरुद्ध स्वतंत्रता संग्राम की रैलियों में भागीदारी और भाषण करने वाली लड़की, अपनी मर्ज़ी से अंतर्जातीय विवाह करने वाली मन्नू, व्यावसायिक और साहित्यिक दोनों मानदंडों पर अपने समय की एक बेहद सफल लेखिका और नई पीढ़ी के लेखकों की बनावटी बौद्धिकता पर ‘तरस खाने वाली’ वरिष्ठ, किस कोण से हीन या दीन हो गईं? तो क्या एक लेखक के रूप में मन्नू जी का व्यक्तित्व पूरी तरह ग्रंथि-मुक्त है? नहीं. मन्नू जी की असली ग्रंथि ‘पश्चाताप ग्रंथि’ है. पश्चाताप जो अपनी तमाम समर्थता के बावजूद अन्यायकारी परिस्थितियों, स्वार्थपरक विचलनों, विभाजक प्रवृत्तियों और शोषक यथास्थिति का  प्रतिरोध, विरोध और आलोचना न कर सकने की कुंठा से जन्मा है. सहज अंदाजा लगाया जा सकता है कि इस आत्म-कथा के बाद ‘नहीं कर पाने का मलाल’ उनके मन में ‘नहीं कह सक पाने के मलाल’ के रूप में कितना सघन हो गया होगा!

मन्नू जी का पहला और सबसे गहरा मलाल तो उनका 35 वर्षों तक चलने वाला खोखला दाम्पत्य ही है, जिसमें उनके पक्ष को हास्यास्पद ढंग से कई बार गरिमामय कहा गया है. राजेन्द्र यादव की तमाम बेवफाईयों, झूठ, पोले अहम्, असंवेदनशीलता, क्रूरता, भयानक स्वार्थपरता और बौद्धिक मक्कारियों को चुप-चाप झेलते रह कर क्या मन्नू जी ने पितृसत्ता की उन्हीं कड़ियों का संपोषण और संवर्धन नहीं किया जिससे मुक्त होने के लिए भारतीय समाज सदियों से छटपटा रहा है, और जिसके विरुद्ध बिगुल फूंकना हर रचनाधर्मी का पहला कर्तव्य होना चाहिए? मन्नू जी वैयक्तिक अंतर्विरोधों का अवलंबन ले कर स्वयं और किसी हद तक राजेन्द्र जी को भी दोष-मुक्त करने का प्रयास करती हैं. मगर ‘अंतर्विरोध’ और ‘विरोधाभास’ जैसी अवधारणाओं का तो विकास ही अपनी या दूसरों की अनैतिकता पर पर्दा डालने के लिए किया गया है. सवाल है कि अपनी एकमात्र संतान की हाड़ी-बीमारी तक से बेपरवाह रहने वाले पति को बर्दाश्त करते चले जाने में मन्नू जी उन करोड़ों अभागी औरतों से किस तरह अलग दिखाई देती हैं, जो रोज़ अपने पति से पिटती हुए भी उसकी ज्यादतियों के ख़िलाफ़ मुंह नहीं खोलतीं? वे ऐसा ‘नसों का चटका देने वाला आघात’ क्यों झेलती चली जाती हैं, जो न सिर्फ उनके तन-मन को रोगों का घर बना डालता है, बल्कि अंततः उनकी रचनात्मकता को भी सोख लेता है? वहीँ, राजेन्द्र जी की उर्जा पर इस पूरी यंत्रणा से कोई नकारात्मक प्रभाव न पड़ना किंचित आश्चर्य का विषय नहीं है. स्त्री-अस्मिताओं को लील कर निरंतर मुटा रहे इसी मर्दवादी अजगर को तो ललकारने की अपेक्षा थी मन्नू जी से! मगर ‘भला है-बुरा है, चाहे जैसा भी है/ मेरा पति मेरा देवता है’ की सनातनी परंपरा में वे जगह-जगह पर इस अजगर को चन्दन-रोली लगाती दिखाई पड़ती हैं. अक्षर प्रकाशन की गुणवत्ता के गुण-गान, अपनी रचनाओं को राजेन्द्र जी के पाठ के लिए प्रस्तुत करने में निहित संतोष, और राजेन्द्र जी की बौद्धिकता के आगे साष्टांग समर्पण की छवियाँ देख लीजिये. मन्नू जी अधिक से अधिक राजेन्द्र जी की एक घनिष्ट लेखक मित्र नज़र आती हैं. वफ़ा जैसी नामुराद शय को छोड़ भी दें, तो उनके दाम्पत्य के बिलकुल शुरूआती दिनों में भी किसी तरह की रागात्मकता, साहचर्य या प्रेम नहीं है. मेरा कहना इतना भर है कि अपनी ज़िन्दगी की  जिस मूक वेदना का मन्नू जी आह्वान कर रही हैं, वह उनकी चुनी हुई पीड़ा है, जिसका मलाल उन्हें रहना ही था.

‘एक कहानी यह भी’ में दूसरी सबसे ज्यादा खलने वाली अनुपस्थिति मन्नू जी के राजनैतिक मत की है. लगभग 60-65 साल के घटनाओं और त्रासदियों से भरे एक लम्बे काल-क्रम में मन्नू जी का राजनैतिक स्टैंड साफ़ न हो पाना बेहद हैरान करता है. आपात-काल और दिल्ली के सिख दंगों पर उन्होंने फिर भी रस्मी तौर पर मुंह खोला है, हालांकि 84 के सिख दंगों के दौरान वे अनावश्यक रूप से सिक्खों के इक्का-दुक्का उकसावे को रेखांकित करती दिखाई पड़ती हैं, मगर 89 के मंडल आंदोलन और 92 के बाबरी मस्जिद विध्वंस पर तो वे साफ़ चुप लगा गई हैं. गौर करने वाली बात है कि यही वह अवधि थी, जब वे सत्ता-संस्थानों के भी करीब आ रही थीं. बहरहाल, मन्नू जी को इसका गहरा पश्चाताप तो अवश्य होगा कि इतिहास के ऐसे निर्णायक मोड़ों पर उनकी कलम रुक गई और उनकी जुबान पर ताला पड़ गया. याद करना ज़रूरी है कि मंडल विरोधी आन्दोलन सबसे ज्यादा उग्र दिल्ली विश्वविद्यालय में था. मन्नू जी उसी विश्वविद्यालय में पढ़ा रही थीं. हम उनसे विश्वविद्यालयी राजनीति के टुच्चे किस्से नहीं सुनना चाहते, मगर क्या इस राष्ट्र-व्यापी प्रकरण ने उनकी संवेदना को तनिक भी न छुआ? उसी तरह बाबरी-मस्जिद विध्वंस को साबूत पचा जाने का हाजमा उन्होंने किस योगासन से बनाया? और यही सवाल 2002 के गुजरात नरसंहार के बारे में भी पूछा जाना चाहिए. अपने बचाव में दिए जाने वाले, ‘यह मेरी लेखकीय यात्रा है’ जैसे कातर तर्क उन्हें और बेनकाब करते हैं. मुझे यकीन है कि मन्नू जी को इस बात का गहरा मलाल होगा कि इन्हीं चुनी हुई चुप्पियों पर आरूढ़ हो कर आज सांप्रदायिकता के दैत्य ने देश के तर्कशील और सहिष्णु मानस को वशीभूत कर लिया है और वैज्ञानिक चिंतन के लिए भविष्य बेहद अंधकारमय नज़र आ रहा है.

मन्नू जी ऐसी ही निराशाजनक ख़ामोशी अपने बाद की पीढ़ी के साहित्यिक परिदृश्य को ले कर भी अख्तियार करती हैं. दिलचस्प है कि अपने समकाल की भी पतनशील प्रवृतियों की आलोचना वे उन्हीं व्यक्तियों के सन्दर्भ में करती हैं, जो अब इस दुनिया में नहीं हैं, यानि उनके नाराज़ होने का कोई खतरा नहीं है. बल्कि, निहायत दुनियादार अंदाज़ में किसी समय पर मददगार रहे लोगों के प्रति आभार व्यक्त करने में उन्होंने कोई कसर नहीं छोड़ी है. जाहिर है, सादगी और सरलता के प्रकट चरित्र के अवचेतन में पल रही इस दुनियादारी को अंततः एक ‘पश्चाताप-ग्रंथि’ में ही तब्दील होना था.

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    By: सौरभ शेखर

    जन्म: 7 जनवरी, 1977, मुज़फ्फ़रपुर,बिहार
    शिक्षा: एमए (अंग्रेजी साहित्य)
    युवा ग़ज़लकार, कवि, आलोचक.
    • उर्दू की कई पत्रिकाओं में ग़ज़लें और नज्में प्रकाशित.
    • विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं, अखबारों के लिए नियमित अनुवाद और लेखन.
    • राष्ट्र-स्तरीय मुशायरों में शिरकत, रेडियो और टीवी पर ग़ज़ल पाठ.
    राज्य सभा सचिवालय में उप निदेशक के तौर पर कार्यरत.
    पता: एफएफ-13, वरदान अपार्टमेन्ट, अभय खंड-III, इंदिरापुरम, गाज़ियाबाद
    मोबाइल: 9873866653
    ईमेल: saurabhshekhar7@gmail.com

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    बे-सिर-पैर की बातें : कवितायें (सौरभ शेखर)

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