एक मामूली आदमी का इंटरव्यू 

अवधेश प्रीत

अवधेश प्रीत

वह एक मामूली आदमी थे। उतने ही मामूली, जितना कि कोई दो-चार बार भी देखे तो, उसमें ऐसा कुछ नजर नहीं आये, जिसके जरिए उसे याद रखा जा सके। रहन-सहन ही नहीं, कद-काठी भी इतनी मामूली कि वह कहीं भी, किसी भीड़ में इस प्रकार खफ जाये, कि उसे अलगाना कतई संभव नहीं हो। ऐसे आदमी का होना, हद से हद महज एक वोट भर होना होता है। सांख्यिकी गणना में वह एक जनसंख्या भर होता है। यानी कि सवा सौ करोड़ की जनसंख्या में उसका नंबर कहां है,यह जानना जितना दुरूह है, उतना ही दुरूह है, उसके होने की पहचान को तलाशना।
ऐसे में आपका यह प्रश्न जायज है कि इतने मामूली आदमी के इंटरव्यू का क्या मतलब है? ऐसे नामालूम आदमी के इंटरव्यू में किसी की भला क्या रूची हो सकती है? खासतौर पर एक ऐसे समय में, जब टीवी चैनलों से लेकर अखबारों तक में ‘एक ढूढ़ो हजार मिलते हैं’ की तर्ज पर एक से एक दिग्गज मौजूद हों। जब आप राजनीति के महान नायकों के साक्षात्कार से धन्य हो रहे हों। अर्थशास्त्र से लेकर ज्योतिषशास्त्र तक के प्रकांड-पंडितों के दिव्यज्ञान से आपके ज्ञान चक्षु चमत्कृत हो रहे हों। आपकी सेहत से लेकर आपके पैसों तक के सही उपयोग और समृ(ि की गारंटी देने-दिलानेवाले पैनलिस्ट आपसे रू-ब-रू हों और उनसे सहमत होते हुए आप अपनी समस्या का समाधन, सीध्े उनसे फोन कर प्राप्त कर सकते हों। और तो और आपके उदास एकांत में स्वयंवर रचाने के लिए स्वयं राखी सावंत और मल्लिका सहरावत जैसी सुंदरियां उपलब्ध् हों या कि आपसे बोलने-बतियाने को हर वक्त सदी के महान नायक सहज ही सुलभ हों। तब इस संभव-समय में एक मामूली आदमी के इंटरव्यू को कोई क्यों देखना चाहेगा?

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गूगल से साभार

आप सही सोच रहे हैं कि मामूली से मामूली आदमी को भी इस मामूली आदमी के इंटरव्यू में कोई दिलचस्पी नहीं हो सकती। वह एक मामूली आदमी में अपनी शक्लोसूरत देखना और अपनी ही कथाओं-उपकथाओं को जानना, क्योंकर चाहेगा? वर्षों के अभ्यास से वह जिन दुःस्वपनों से बाहर आ चुका है, वह उन्हीं से दो-चार होने के लिए अपना समय क्यों जाया करेगा?
पिफर, यह सब जानते हुए भी मैंने एक मामूली आदमी का इंटरव्यू करने में क्यों रूचि ली? क्यों मैंने ऐसी हिमाकत की कि आप भी मेरी मूर्खता पर हंसें और एलान करें कि झूठ को सच और सच को झूठ बनाने में माहिर आजकल के पत्राकारों का कोई भरोसा नहीं। हो सकता है, आप ठीेक हों। आपका सोचना ही सच हो। लेकिन मुझ पर भरोसा कीजिए कि यह ‘एक मामूली आदमी का इंटरव्यू’ न तो झूठ को सच और सच को झूठ बनाने की महारत का नमूना है, न ही मेरी हिमाकत की कोई मिसाल। दरअसल, यह मेरा एक इन्नोवेटिव आइडिया है!
एक ऐसा आइडिया जिसे ढूंढ़ने-तलाशने और पिफर उसे क्रियान्वित करने में बहुत मशक्कत करनी पड़ी। यह चूंकि इन्नोवेटिव आइडियाज का दौर है और होड़ इस हद तक जा पहुंची है कि आपकी नौकरी, आपका भविष्य इसी पर मुन्हसर है , इसलिए उफपर से लेकर नीचे तक के तमाम दिमाग, हर दिन, हर वक्त नये-नये आइडिया की तलाश में जुटे हुए हैं। इन्नोवेटिव आइडिया क्या होता है, क्यों होता है, क्यों होना चाहिए और इन्नोवेटिव आइडियाज ने कैसे दुनिया बदलकर रख दी, इस बाबद कंपनियां अपने एंप्लाइज के लिए बकायदे वर्कशॉप आॅर्गनाइज करती हैं। इस वर्कशॉप में इन्नोवेशन के विशेषज्ञ होते हैं। उनके लैपटॉप में गहन-गूढ़ ज्ञान और अनुभवों के चमत्कारिक प्रेजेंटेशन होते हैं। उनके सामने बैठे हुए इंप्लाई निहायत मासूमियत से भरे, उत्सुकता से उफभचुभ होते हुए, अपने अंदर ज्ञान की एक नई दुनिया के खुलने की जिज्ञासा और उसमें विनम्र उतावली से घुस जाने के आत्मविश्वास से होड़ा-होड़ी करते नजर आते हैं। इन्नोवेशन विशेषज्ञ पता नहीं किस लोक से आया होता है कि उसका एक-एक शब्द जादुई जान पड़ता है, एक-एक वाक्य ब्रह्मवाक्य होता है और एक-एक सूचना इतनी नायाब कि हर इंपलाई को महसूस होता है कि वह सिपर्फ और सिपर्फ इसलिए नाकामयाब है कि उसने कोई इन्नोवेटिव आइडिया नहीं सोचा और दुनिया में जो लोग कामयाब हैं, वे सिपर्फ और सिपर्फ इसलिए कामयाब हैं कि उन्होंने इन्नोवेटिव आइडियाज पर काम किया। ये इन्नोवेशन विशेषज्ञ जब बताते हैं कि एक टूथपेस्ट मार्केट में पिछड़ने लगा तो कैसे उस टूथपेस्ट के मुंह को प्वाइंट फाइव मिलीमीटर बड़ा कर देने के एक इन्नोवेटिव आइडिया से वह टूथपेस्ट अपने क्षेत्रा का बादशाह बन गया। कैसे एक शीतलपेय महज ‘ठंडा’ का पर्यायवाची बनकर भारतीय बाजार का लीडर बन गया। कैसे एक ्रफीज कंपनी ने अपने ्रफीजर का साइज बढ़ाकर भारतीयों के आइसक्रीम खाने और ठंडा पानी पीने की चिरइच्छा को साकार करके बाजार पर कब्जा कर लिया, तो इंप्लाइज के मुंह खुले के खुले रह जाते हैं। दिलों में गहरी हूक उठती है कि, अरे, ये आइडिया कभी हमे क्यों नहीं सूझा? और तभी वे इस आश्वस्ति से भर उठते हैं कि वे भी अपने इन्नोवेटिव आइडिया से दुनिया का नक्शा बदल सकते हैं। ऐसे वर्कर्शाप से उनके अंदर सबसे पहले एक नया इंप्लाई जनमता है, जो इन्नोवेटिव आइडियाज की जरूरत से न सिपर्फ सहमत होता है, बल्कि कोलंबस की तरह इन्नोवेटिव आइडिया की खोज में निकल पड़ता है। यह खोज शुरू-शुरू में नैसर्गिक इच्छा की तरह कुलांचे भरती है। लेकिन जल्दी ही अनिवार्य दबाब में तब्दील होकर गले की पफांस हो जाती है। हर हफ्रते जब इंप्लाई से एक नये आइडिए की मांग होती है और नया आइडिया न दे पाने की वजह से उसपर ‘फायर’ किये जाने का खतरा मंडराने लगता है, तो वह दुनिया का नक्शा बदल देने के बजाय, खुद का नक्शा बदलता हुआ पाता है। उसकी चमकीली दुनिया में अंधेरा केआर की शक्ल में दाखिल होने लगता है।
इस विस्तृत सूचना और सोदाहरण व्याख्या से, मुझे पूरा यकीन है कि आप ‘इन्नोवेटिव आइडिया’ के महात्म्य को अच्छी तरह समझ गये होंगे और मुझे यह भी कतई संदेह नहीं कि आप मेरे केआर की ओर बढ़ते अंध्ेरे को भी नहीं भांप चुके होंगे। समझदार के लिए इशारा की ही तर्ज पर इतना बताना काफी होगा कि मैं अर्से से एक इन्नोवेटिव आइडिया की तलाश में जी-जान से जुटा था और यह ‘एक मामूली आदमी का इंटरव्यू’ उसी आइडिए के गर्भ से जन्मा था। इस गर्भ-कथा को भी जान लेने की जहमत उठा लें, तो ही आप इस इंटरव्यू के लिए मेरी छटपटाहट को ठीक-ठीक महसूस कर पायेंगे क्योंकि जो गर्भ में होता है, उसे बाहर आने में चाहे जितना वक्त लगता हो, इस बीच जो पीड़ा होती है, जिसे प्रसव-पीड़ा कहा जाता है, उसे सिपर्फ वही समझ सकता है, जो इससे होकर गुजरता है। यह भोगा हुआ यथार्थ, बगैर परकाया प्रवेश के महसूस नहीं किया जा सकता। इसलिए आपसे अनुरोध है कि पत्राकारों की पर-काया में प्रवेश कर आप देखें कि उन्हें हर दिन कितनी प्रसव-पीड़ओं से गुजरना पड़ता है और कितने गर्भपातों का अभिशाप ढोना पड़ता है। जनाब यह पत्राकारिता किसी हंसी-ठठ्ठे का काम नहीं है। इसमें हर दिन जीना और हर दिन मरना पड़ता है। यह ‘एक मामूली आदमी का इंटरव्यू’ मेरे उसी मरने-जीने का आख्यान है। तो, जैसे ही मेरे दिमाग में इस इंटरव्यू का आइडिया आया, मैंने उसे अपने एसाइनमेंट एडीटर पंकज मिश्रा को मेल किया। थोड़ी देर बाद ही पंकज ने मुझे बुलाया और उस पर डिस्कशन किया। मेरे यह समझाने पर कि इस मामूली आदमी के इंटरव्यू का एंगल इक्कीसवीं सदी के एक अजूबे के रूप में होगा, वह कंविंस हो गया। उसकी आंखें चमकीं और एकाध सुझावों के साथ ही उसने इस इंटरव्यू के लिए हरी झंडी दे दी।
मैंने अपने पांच साल की पत्राकारिता के कॅरियर में छोटे-बड़े कई इंटरव्यू किये हैं। उन इंटरव्यूओं के लिए मुझे कभी कोई खास मशक्कत नहीं करनी पड़ी। इसके उलट मैंने जब भी किसी विशिष्ट व्यक्ति को इंटरव्यू के लिए चुना और उसे फोन से सूचित किया, उसने इस कदर गर्मजोशी से स्वागत किया कि मेरे अंदर कई-कई दिनों तक उसकी उष्मा बना रही। जब मैं उस सेलेब्रिटी से उसकी सहूलियत से दिन और समय तय करने के लिए कहता तो वह निहायत विनम्रता से पूछता, ‘अरे भाई, आप बताइए आपको क्या सूट करेगा?’
और होता यह कि कभी मेरी सहूलियत से, कभी उनकी सहूलियत से और कभी हमदोनो की सहूलियत से दिन और समय तय हो जाता और सब कुछ उतनी ही सहूलियत से संपन्न हो जाता। लेकिन यह जो मामूली आदमी का इंटरव्यू है, मत पूछिए! इसने मुझे जमीन पर ला खड़ा किया। इस आदमी पर न मेरे चैनल का जादुई असर पड़ा, न ही इसने मेरे निवेदन को तवज्जो। उसके सामने मेरी वाकपटुता भी धरी की धरी रह गई। उसने मुझे एक ही झटके में निरस्त कर दिया, ‘माफ कीजिए, मेरी कोई रूचि नहीं है।’
अब मैं उसे केसै बताता कि मेरी उसमें रूचि है, कि मेरे एसाइनमेंट एडीटर को उसमें रूचि है और हम दोनों को पूरा विश्वास है कि जब यह इंटरव्यू प्रसारित होगा, तब देश के तमाम दर्शकों की उसमें रूचि होगी और कहने की जरूरत नहीं कि इससे हमारे चैनल के टीआरपी में जो उछाल आयेगा, उससे अंततः मेरे कॅरियर में उछाल आयेगा। लिहाजा प्रश्न उसकी रूचि का नहीं, हमारी रूचि का है। जाहिर है, मेरे लिए उस आदमी के इस अडि़यल रवैये के आगे हथियार डालना संभव नहीं था। मैने इसे एक चुनौती की तरह लिया और जैसा कि कई ट्रेनिंग कार्यक्रमों में हमे सिखाया गया था, हर काम को एक चुनौती की तरह लो और उसे तब तक मत छोड़ो, जब तक कि उसमें कामयाबी न हासिल कर लो। मैने इस मूलमंत्रा की प्रेरणा से इस चुनौती को स्वीकार किया और जैसा कि किसी ‘मोटिवेशनल गुरू’ ने कहा है, सफल आदमी कोई नया काम नहीं करता, वह, बस उस काम को नये तरीके से करता है। मैने यही नया तरीका आजमाया!
यूं जो तरीका मैने आजमाया, हो सकता है, उसे आप नया न मानें, क्योंकि ऐसा तरीका मुझसे पहले भी कई लोगों ने आजमाया होगा। लेकिन मेरा मानना है कि जो तरीका बार-बार आजमाये जाने के बावजूद , कारगर हो जाये, तो वह हर बार नया जैसा ही होता है। लेकिन ठहरिए! उस कारगर तरीके को जानने से पहले, आप यह जान लीजिए कि मैने इस ‘इन्नोवेटिव आइडिया’ को हासिल कैसे किया?
यह बात रविवार की है, जब मैं आॅफ में था और अपने फेसबुक एकाउंट को चेक कर रहा था। मैने पाया कि मेरे नोटिपिफकेशन बॉक्स में ढेरों सूचनाएं भरी पड़ी हैं। मैने जब उत्सुकता से नोटिपिफकेशन बॉक्स क्लिक किया तो एक फेंड्स आॅफ ्रफेंड्स के एक टैग पर लाइक्स और कमेंट्स की भरमार थी। पहले तो बड़ी झुंझलाहट हुई इस ‘टैग’ पर। लेकिन इतने लाइक्स और कमेंट्स देखकर थोड़ी उत्सुकता भी हुई कि देखें तो सही यह क्या बला है? बस, यही वह क्षण था, जब ‘सिमसिम’ की मानिंद मेरे सामने एक रहस्मय खजाना खुल रहा था। फेसबुक का यही तो मायाजाल है कि वह किसी न किसी रास्ते हर करिश्मे से आपको रू-ब-रू करा ही देगा। तो यह करिश्मा, जिससे मैं रू-ब-रू था और जिसे सैकड़ों लोगों ने ‘लाइक’ किया था, मेरी दिलचस्पी का बायस बना! यहीं ठीेक यहीं, मेरे दिमाग में कौंध कि, जिसे इतने लोग पसंद कर रहे हैं और कमेंट्स की बौछार कर रहे हैं, वह एक सेलेबल आइटम है। यह आइटम एक ‘इन्नोवेटिव आइडिया’ था और इसने मुझे एक इंटरव्यू के लिए प्रेरित किया। यह एक ऐसी प्रेरणा थी, जैसा कि हम जानते हैं, कुछ प्रेरणाएं लोगों कि जिन्दगियों में ‘टर्निंग प्वाइंट’ बन जाती हैं, मेरे लिए भी ‘टर्निंग प्वाइंट’ बन गई। मैं वाकई एक ‘टर्निंग प्वाइंट’ पर खड़ा था।
इस ‘टर्निंग प्वाइंट’ का दिशा नियामक था वह शख्स, जिसका नाम था प्रेम प्रकाश। उसने अपने ‘स्टेटस’ पर ‘मोबाइल अपलोड’ के जरिए एक फोटो डालते हुए लिखा था- इक्कसीवीं सदी का अजूबा। मेरे मुहल्ले का एक ऐसा इंसान, जो न टेलीविजन देखता है, न मोबाइल का इस्तेमाल करता है। इसकी बीबी और बच्चे भी किसी गैजेट का इस्तेमाल नहीं करते। हद् तो यह कि इसे इस बात का अहसास तक नहीं कि उसे पूरा मुहल्ला अजूबा मानने लगा है। आप क्या कहते हैं?
‘मुहल्ले का अजूबा’ यह पंक्ति मेरे दिमाग में ठक्क से बजी और पिफर बजती ही चली गई- अगर यह आदमी एक मुहल्ले का अजूबा है, तो पूरे शहर, पूरे राज्य और पिफर पूरे देश का अजूबा क्यों नहीं हो सकता? यह आइडिया ही इन्नोवेटिव था। मेरी सारी इंद्रियां सक्रिय हुईं और मैने सूंघ लिया कि इस सूचना में एक बड़ी संभावना छुपी है। यह ‘सूंघना’ पत्राकारिता की वह पवित्रा शब्दावली है, जिसके जरिए ही हर पत्राकार अपनी काबलियत साबित कर पाता है। हर सीनियर पत्राकार, अपने जूनियर पर ‘सूंघने’ का इस कदर दबाब डालता है, कि लगता है, अगर वह सूंघ नहीं सकता तो कुछ भी हो, वह पत्राकार तो किसी कीमत पर नहीं हो सकता। आप कह सकते हैं, ‘सूंघना’ पत्राकार होने का ‘गुणधर्म’ है। यह पीढ़ी दर पीढ़ी गुणसूत्र के रूप में स्थानांतरित होते हुए मुझ तक पहुंची है।
काफी सूंघने-सांघने के बाद मैं इस नतीजे पर पहुंचा कि इस आइडिये में हिट हो जाने की पूरी खासियत मौजूद है। मैने फौरन से पेश्तर प्रेम प्रकाश नाम के उस शख्स को प्रफेंडशिप रिक्वेस्ट भेजा। आश्चर्य किन्तु सत्य की तरह, थ्री जी स्पीड के सदके, प्रेम प्रकाश का एक्सेप्टेंस मेरे लैपटॉप पर चमकने लगा। प्रेम प्रकाश ने मेरी दोस्ती स्वीकार करते हुए लिखा था- सर, मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि इतने बड़े चैनल के पत्राकार ने मेरी ओर दोस्ती का हाथ बढ़ाया है। मुझे आपको अपनी प्रफेंडलिस्ट में शामिल करते हुए गर्व महसूस हो रहा है।
मैं मुस्कराया। मेरा निशाना सटीक बैठा था। मैने प्रेम प्रकाश के इन बॉक्स में मैसेज डाला- मित्रा, मैं आपसे मिलना चाहता हूं। क्या आप अपना मोबाइल नंबर दे सकते हैं?
थ्री जी स्पीड के सदके, प्रेम प्रकाश ने जवाबी मैसेज में एक नहीं दो-दो मोबाइल नंबर भेजे। मैने उन्हें शुिक्रया अदा किया । उनसे विस्तृत बातचीत के लिए मैने तत्काल उनका नंबर डायल किया। पहले नंबर पर नॉट रीचेबल की सूचना मिली, तो मैने झट से दूसरा नंबर ट्राई किया। रिंग जाती रही, मैं इंतजार करता रहा। आखिरकार प्रेम प्रकाश ने कॉल रिसीव किया। मैने जैसे ही उन्हें अपना परिचय दिया, मुझे लगा, वह जहां भी थे उत्तेजना के मारे उछल पड़े हैं। उनकी अकबकायी-सी आवाज आ रही थी, ‘सर…सर, मुझे विश्वास नहीं हो रहा कि मैं आपसे बात कर रहा हूं।’
प्रेम प्रकाश से बहुत सारी बातें हुईं। यहां उनका जिक्र करके मैं आपको बोर नहीं करूंगा। सीध्े-सीध्े उस प्रसंग पर आता हूं, जो आपको बताना जरूरी है। बातों-बातों में यह तय हो गया कि मैं उनसे मिलता हूं और वह मुझे उस आदमी से मिलाने में मेरी मदद करेंगे।
तय कार्यक्रम के अनुसार में प्रेम प्रकाश के मुहल्ले के नुक्कड़ पर पहुंचा, जहां मोबाइल रिचार्ज की एक दुकान थी और उसमें इस कदर भीड़ थी कि दुकानदार को दम लेने की पफुरसत नहीं थी। मुझे तो ऐसा लगा कि पूरा मुहल्ला मोबाइल रिचार्ज कराने की किसी प्रतियोगिता में शामिल है। जब तक दो बंदे दुकान से हटते, चार हाजिर हो जाते। मैं इस दौरान दुकान तक आने वाले हर बंदे में प्रेम प्रकाश ढूंढ़ता रहा।
चूंकि प्रेम प्रकाश से यहीं मिलना निश्चित हुआ था और मैं उन्हें पहचानता नहीं था, इसलिए हर आने वाला मुझे लगता कि हो न हो यही प्रेम प्रकाश होगा। लेकिन उनमें से किसी के प्रेम प्रकाश न होने की कोफ्रत और पन्द्रह मिनट की निरर्थक प्रतीक्षा से उबकर मैने जैसे ही उसका नंबर डायल किया, किसी करिश्मे-सा वह मेरे सामने नमूदार हुए और मुस्कराते हुए पूछा, ‘आप टीवी पत्राकार नीलेश रंजन जी हैं न?’
‘ओम प्रकाश?’ मैने उत्तर देने के बजाय प्रतिप्रश्न किया। उन्होंने गर्मजोशी से हाथ मिलाया। विलंब के लिए क्षमा मांगते हुए सपफाई देने लगे, ‘मैं अंकल को देखने चला गया था कि वह घर में हैं या नहीं?’
मुझे हल्की-सी हंसी आई। जिस शख्स को प्रेम प्रकाश अभी अंकल बोल रहे हैं, उसे ही इन्होंने फेसबुक पर मुहल्ले का अजूबा लिख रखा है। मेंने हंसी को पीछे धकेलते हुए पूछा, ‘वह घर में हैं?’
‘हां !’ प्रेम प्रकाश ने अपनी चमकती आंखें मुझपर टिकाते हुए कहा, ‘आइए मेरे साथ!’
तकरीबन पच्चीस साल के प्रेम प्रकाश मेरे साथ चलते हुए बेहद रोमांच से भरे बताते रहे, ‘मैने एमबीए किया है। जॉब की तलाश में हूं। कई जगह इंटरव्यू दिया है। उम्मीद है कहीं न कहीं जल्दी ही लग जाउंगा। वैसे सर, जर्नलिस्ट होने की तो बात ही कुछ और है। हर कोई जर्नलिस्ट थोड़े ही न बन सकता है।’
अपने टीवी जर्नलिस्ट होने के ग्लैमर पर मैं मन ही मन इतराया और धन्य-धन्य होते प्रेम प्रकाश को पूरे ध्यान से सुनने का नाटक करता रहा।
‘जानते हैं सर, मैने गली से गुजरते हुए अंकल की तस्वीर चुपचाप खींच ली थी। बस मौज में ही उसे फेसबुक पर अपलोड कर दिया। मुझे क्या पता था कि इसे लोग इतना लाइक करेंगे? प्रेम प्रकाश ने जब यह बताया, तब मेरे दिमाग ने कहा-बेटा, तेरी इस मौज को देख, मैं कैसे कैश करता हूं!’
प्रेम प्रकाश की बातें और गली दोनों एक साथ खत्म हुईं। हम जिस मकान के सामने खड़े थे, वह बहुत पुराने किस्म का था। संभवतः पुश्तैनी होगा। हालांकि बाद में इसकी पुष्टि भी हो गई थी। लेकिन तब तो सिपर्फ संभावना ही थी। मैं प्रेम प्रकाश की अगली कार्रवाई की प्रतीक्षा कर ही रहा था, कि अचानक उस मकान के दरवाजे से एक ग्यारह-बारह साल का बच्चा निकलता दिखाई दिया। प्रेम प्रकाश ने तपाक से उस बच्चे को बताया, ‘बिट्टू, ये अंकल तुम्हारे पापा से मिलने आये हैं।’
बिट्टू ने बिटबिटाकर मुझे देखा और वापस हो गया। पता नहींं, बिट्टू कहीं जा रहा था या संयोग से बाहर आ गया था, कुछ समझ में नहीं आया। लेकिन संयोग अच्छा है, यह सोचकर अच्छा लगा।
बमुश्किल दो मिनट बाद जो शख्स दरवाजे पर दिखा, वह लगभग पैंतालीस साल का, मामूली कद-काठी का, बिल्कुल फेसबुक पर देखे गये धुंधली फोटो की तरह ही था। पफर्क इतना था कि फोटो में जो शर्ट उसने पहन रखी थी, इस वक्त उसने वह शर्ट नहीं पहन रखी थी। कुलजमा उसमें कुछ भी ऐसा नहीं था, जिसकी वजह से रोमांचित हुआ जा सके। अलबत्ता एक पल को तो यह भी लगा कि मुझे अपना आइडिया ड्रॉप कर देना चाहिए। ठीक इसी वक्त उस आदमी ने पूछा, ‘कहिए, क्या बात है?’
मैने उसे अपना परिचय दिया। मुझे आश्चर्य हुआ कि न तो उसके चेहरे पर चकित भाव आया, नही आंखों में जिज्ञासा दिखाई दी। मेरे अंदर आहत-अहं कुनमुनाया। सायास उसे दबाते हुए मैने अपने आने का मकसद बताया, ‘मैं आपका इंटरव्यू करना चाहता हूं।’
मुझे लगा, यह सुनकर, शायद वह चौंकें या चमत्कृत हो जायें। लेकिन वह तो हंस पडे। पता नहीं, खुद पर हंसे या मुझ पर, पक्का नहीं कह सकता। उनकी हंसी के बीच जो स्वर उभरा, वह बेहद सपाट था,‘माफ कीजिए मेरी कोई रूचि नहीं है।’
मेरे लिए यह स्थिति घड़ों पानी पडने जैसी थी। मेरी प्रतिक्रिया देखे-जाने बगैर वह मुडे़ कि प्रेम प्रकाश ने मेरी मदद करने के लिहाज से उन्हें बड़े आदर से आवाज दी, ‘अंकल प्लीज{।’
वह पलटे । मैं अबतक संभल चुका था। मैने भरसक प्रोपफेशनल अंदाज अपनाते हुए कहा, ‘सर, मेरी पूरी बात तो सुन लीजिए।’
उन्होंने सहमति में सिर हिलाया और आमंत्रित करते हुए कहा, ‘आइए, अंदर आकर बात कीजिए।’
मैने राहत की सांस ली। उनके पीछे-पीछे हम यानी मैं और प्रेम प्रकाश जिस कमरे में दाखिल हुए, वह ड्राइंगरूम तो नहीं, कुछ-कुछ बैठका किस्म का था। पुराना होने के बावजूद खुला-खुला। खिड़की ऐसी कि रोशनी भरपूर आ रही थी। हवा भी आती ही होगी। कमरे में प्लास्टिक की चार कुर्सियां थीं। बीच में प्लास्टिक की ही टेबुल। बाईंं दीवार से लगी एक आलमारी के उफपरी खाने में किताबें थीं और निचले खाने में एक पर एक तह किये अखबार थे। कुल जमा इस उपस्थिति के उस कमरे में न कोई कंप्यूटर था, न ही टीवी। कहीं से आता-जाता कोई केबिल कनेक्शन भी नहीं था, जिससे जाहिर था कि उनके घर में कहीं टीवी नहीं है।
उन्होंने मुझे बैठने का इशारा किया और सवाल प्रेम प्रकाश से किया, ‘तुम्हारे पापा कहां हैं, कई दिनों से दिखे नहीं?’
मैं एक कुर्सी पर बैठ गया। प्रेम प्रकाश शायद इसलिए खड़े थे कि वह पहले बैठें, तब वह बैठें । यह फेसबुक से बाहर मुहल्ले की संस्कृति थी।
यह जानकर कि प्रेम प्रकाश के पापा शहर से बाहर गये हुए हैं,उन्होंने इत्मीनान से मेरे सामने की कुर्सी खींची और बैठ गये।
‘ कहिए, क्या कहना चाह रहे थे आप?’ शुक्र है उन्होंने मुझे तवज्जो दी।
मैने इस बार कहीं ज्यादा विनम्रता के साथ ‘सर’ पर जोर देकर कहा, ‘सर, मुझे आपका इंटरव्यू चाहिए।’
मुझे उम्मीद थी कि वह पूछेंगे-मेरा इंटरव्यू क्यों करना चाहते हो? लेकिन उन्होंने ऐसा कुछ नहीं पूछा।
इस बीच वही बच्चा, जिसका नाम बिट्टू था, एक ट्रे में दो गिलास पानी लेकर हाजिर हुआ।
‘पानी पीजिए!’ उन्होंने इसरार किया।
उनके इसरार में मेजबान होने की शिष्टता थी। पानी खत्म होते-होते एक प्यारी-सी बच्ची, जिसकी उम्र नौ-दस साल होगी, जो दो चोटियों में बेहद क्यूट लग रही थी, एक ट्रे में दो कप चाय लेकर दाखिल हुई। उसने सिर हिलाकर नमस्ते कहा और ट्रे टेबुल पर रख दिया। प्रेम प्रकाश ने उस प्यारी-सी बच्ची की एक चोटी को हिलाते हुए पूछा, ‘गुडि़या, कैसी चल रही पढ़ाई?’
‘ठीक चल रही, भइया।’ गुडि़या गुडि़या की तरह ही मुस्कराई।
उन्होंने चाय लेने का अनुरोध किया। मैने उन्हें याद दिलाया, ‘मुझे आपका इंटरव्यू करना है।’
उन्होंने बगैर मुरव्वत दो टूक जवाब दिया, ‘देखिए, इसमें मेरी कोई रूचि नहीं है।’
मेरे भीतर एक गहरा क्षोभ उठा और मैं झटके से उठ खड़ा हुआ। चाय का कप मैने छुआ तक नहीं था। यह इस बात का एलान था कि मैं अब अपना पैंतरा बदलने वाला हूं।
उन्होंने मेरे इस पैंतरे को मेरी नाराजगी समझा। बोले, ‘लगता है, आप नाराज हो गये?’
‘नहीं सर, मैं आपसे नाराज होकर भी क्या कर लूंगा।’ मैने अब भावुक स्वर में वह तरीका अपनाया, जो पुराना होने के बावजूद हर बार नये जैसा असर करता है, ‘मेरा एसाइनमेंट पूरा हो न हो, इससे आपको क्या लेना-देना? मेरी नौकरी पर भी बन आये, तो आपको क्या पफर्क पड़ने वाला? मैं तो बस रिक्वेस्ट ही कर सकता हूं।’
वह पहली बार मुझे गहरे तक हिले नजर आये। प्रेम प्रकाश तो मुझे देखकर हैरान थे । शायद उन्हेें अपनी कल्पना के हीरोनुमा पत्राकार को ऐसी लाचार स्थिति में देखने की उम्मीद नहीं थी। दोनो बच्चे बिट्टू और गुडि़या के चेहरों पर कुछ भी न समझ पाने की उलझन सापफ दिख रही थी।
इस बीच वह, अपने पूरे मामूलीपन में तब्दील होते नजर आये। दयाभाव की तरलता हिलोेरें मारने लगी थी। अपने दोनो बच्चों को पास खींचते हुए उन्होंने जैसे मुझमें उनका भविष्य देखा और गहरी करूणा से मुस्करा पड़े। बोले, ‘चाय पीकर जाइए!’
‘चाय तो सर, मैं तभी पिउंगा जब आप हां कहेंगे।’ मैंने भी उनके मर्म को बेध् दिया।
आखिरकार, मर्मबेध्ी इस मार्मिक माहौल में उन्होंने कल सुबह दस बजे तक आ जाने की सहमति दे ही दी। कल चूंकि रविवार था और उनकी छुट्टी का दिन था, इसलिए उन्होंने इसे मुपफीद बताते हुए ताकीद की, ‘दस का मतलब दस।’
मैंने उन्हें आश्वस्त किया। वह बाहर छोड़ने आये। प्रेम प्रकाश ने बकायदे मुझे गली के नुक्कड़ तक आकर विदा किया। यह वापसी एक विजेता की-सी थी।
उस रात मैने उनसे इंटरव्यू के लिए अच्छा खासा ‘होमवर्क’ किया। इसे एक्सक्लूसिव बनाने की तैयारी के साथ मैं देर रात तक जागता रहा। पिफर भी अगली सुबह मैं जल्दी उठ गया।
दस बजते-बजते मैं कैमरामैन महेन्द्र के साथ उनके घर पहुंच गया। हां, मैने जानबूझकर प्रेम प्रकाश को कांटेक्ट नहीं किया। इसकी एक वजह तो यह थी कि अब उनकी कोई जरूरत नहीं थी और दूसरी वजह यह थी कि मैं नहीं चाहता था कि उनकी उपस्थिति से इस इंटरव्यू की गोपनीयता लीक हो।
वह हमे समय पर हाजिर देख मुस्कराये। लेकिन कैमरे पर नजर पड़ते ही थोड़ा ‘नर्वस’ हो गये। पहली बार उन्हें इस स्थिति में देख मुझे गुदगुदी हुई। अब आया है उंट पहाड़ के नीचे। मैने हावी होने के अंदाज में कहा, ‘आप एकदम सहज रहें। आपको कैमरे की तरपफ देखने की जरूरत नहीं है। बस, आप मुझसे वैसे ही बात करेंगे जैसे किसी दोस्त-रिश्तेदार से बात करते हैं।’
महेन्द्र हमदोनो के बैठने और कैमरे की दूरी को आगे-पीछे होते हुए एडजस्ट कर रहा था।
वह किंचित संकोच में थे, इससे उनके मामूलीपन में कुछ और इजाफा हो गया था। धारीदार सफेद कमीज और नीले रंग की पतलून। कमीज पतलून से बाहर लटकी हुई। खिचड़ी बालों में जरा-सा तेल की चमक,लेकिन लापरवाही से संवारे गये। यह पूरी तरह से मामूली आदमी का ‘एपीएरेंस’ था और मेरी योजना में एकदम फिट बैठ रहा था।
उन्होंने कुर्सी पर बैठते हुए कहा, ‘पहले चाय पी लेते।’
‘नहीं सर, पहले काम शुरू करते हैं। चाय बाद में पी लेंगे।’ मुझसे पहले महेन्द्र टपक पड़ा। उसके स्वर में सौजन्यता नहीं, हड़बड़ी थी।
वह थोड़े मायूस दिखे। पिफर सहमति में सिर हिलाकर मेरी ओर देखने लगे। मैने महेन्द्र को देखा। महेन्द्र ने कैमरे में देखते हुए दाहिने हाथ से शुरू करने का संकेत दिया। मैने बगैर देरी किये उनका इंटरव्यू शुरू किया।
मैं ः सर, जैसी कि जानकारी मिली है, आप टीवी नहीं देखते, क्या यह सच है?
वह जी, सच है। मैं टीवी नहीं देखता। मेरे घर में टीवी नहीं है।
मैं ः आज के जमाने में देश-दुनिया की ताजा खबरों के लिए टीवी एक जरूरी माध्यम है। आपको नहीं लगता कि आप इससे वंचित हो रहे हैं?
वह मैं अखबार पढ़ता हूं। इससे मेरा काम चल जाता है।
मैं ः पिफर भी टीवी तो…
उन्होंने हस्तक्षेप किया।
वह जहां तक मैं समझता हूं टीवी की खबरें स्मृति में टिकती नहीं हैं। अखबार की खबरें टिकती हैं। उन्हें मैं जरूरत के हिसाब से सुरक्षित भी रख लेता हूं।
मैं ः लेकिन अखबार में ज्यादातर खबरें एक दिन पुरानी होती हैं, टीवी में लेटेस्ट खबरें उस दिन, उसी वक्त मिल जाती हैं।
वह मेरे पिताजी के जमाने में टीवी नहीं था। वह अखबार पढ़ते थे। दुनिया भर की की खबरों से वाकिफ रहते थे। मैं भी अखबार पढ़ते हुए बड़ा हुआ। मुझे कभी ऐसा नहीं लगा कि मैं देश-दुनिया की खबरों से वाकिफ नहीं हूं। कई खबरों पर पर मैें अपनी सहमति-असहमति अखबारों को भेजता हूं। वे छपती भी हैं। टी वी मुझे ये सुविधा नहीं देता।
मुझे लगा, यह आदमी कुछ ज्यादा ही नॉस्टेल्जिक है। अतीतमोह से ग्रस्त आदमी को बाहर निकालना कठिन होता है, यह जानते हुए भी मैने एक कमजोर नस पर उंगली रखने की सोची।
मैं ः आपको पफर्क न पड़ता हो। लेकिन आपकी पत्नी, आपके बच्चों की इच्छा नहीं होती कि वे भी टीवी देखें जैसे तमाम लोग देखते हैं? सीरियल्स, फिल्म, कार्टून?
वह मुस्कराये गोया उन्हें इस सवाल का अंदाजा हो।
वह उन्होंने कभी ऐसी इच्छा जाहिर नहीं की। आप कह सकते हैं,यह हमारा सामूहिक निर्णय है। मेरी पत्नी अपनी पसंद की पत्रिकाएं पढ़ती हैं। नॉवेल्स पढ़ती हैं। खाली वक्त में पड़ोस की महिलाओं के साथ गप्प-करती हैं। बच्चे भी पफुरसत में खेलते-कूदते हैं। मैं स्वयं उनके साथ समय बिताता हूं। उन्हें कहानियां सुनाता हूं। मेरे पास कई बुजुर्ग आते हैं, उनके घर में टीवी है। लेकिन उनका समय नहीं कटता। हम सब मिल बैठकर बातें करते हैं। सुख-दुख बांटते हैं। हमे तो पता ही नहीं चलता है कि समय कब और कैसे गुजर गया।
इस बार वह ज्यादा खुलकर और विस्तार से बोले। मुझे लगा वह अब भी पिछले वक्त में ही हैं, अपनी जिद के साथ। मैने विषय बदलते हुए अगला सवाल किया।
मैं ः आप मोबाइल क्यों नहीं रखते?
वह कभी जरूरत महसूस नहीं हुई।
उनके दो टूक जवाब से मैं असहज हुआ। उन्हें घेरने की कोशिश की ।
मैं ः लेकिन यह तो आज की एक बड़ी जरूरत है। एक-दूसरे के संपर्क में रहने के लिए । आपको नहीं लगता कि मोबाइल बेहद उपयोगी है?
वह आपके पास तो मोबाइल है। अभी आपने उसे बेद कर रखा है। आपको क्या पफर्क पड़ रहा है? आप अपना काम इत्मीनान से कर रहे हैं। मोबाइल क्या अवांछित हस्तक्षेप का बायस नहीं है? जब मोबाइल नहीं था, तब भी लोगों से संपर्क होता था। जुड़ाव था। कहीं ज्यादा आमीयता थी।
मैं ः लेकिन यह एक तरह का कुतर्क है। आप जानबूझकर सुविधाओं को नकार रहे हैं।
वह एक बात बताइए, आपने अपना मोबाइल कब खरीदा?
मैं ः एक साल पहले।
वह उससे पहले आपके क्या था?
मैं ः मोबाइल ही था।
वह पिफर दूसरा क्यों खरीदा ?
मैं ः पुराने मोबाइल में फीचर्स कम थे । नये में ज्यादा फीचर्स हैं। नई टेक्नोलॉजी है ।
वह ः पुराने मोबाइल से काम नहीं चल रहा था?
मुझे लगा, इंटरव्यू मैं उनका नहीं, वह मेरा ले रहे हैं। मैं ठिठका। वह मुझे देख रहे थे।
मैं ः चल तो रहा था लेकिन …
उन्होंने मेरी बात काट दी।
वह फीचर्स ने लुभाया, आपने नया मोबाइल ले लिया। कल पिफर नये फीचर्स आयेंगे। डिजाइन बदलेगी। आप ले लेंगे। यह आपकी च्वाइस है या लुभाये जाने का अकर्षण?
मैं अचकचाया। वह बदस्तूर बोले जा रहे थे।
वह आप चिट्ठियां लिखते हैं? आपके पास एसएमस आते होंगे। दो-चार लाइनें। उन्हें भी एकाध दिन में डिलीट कर देते होंगे। मैं चिट्ठियां लिखता हूं।। मेरे पास चिट्ठियां आती हैं।
मेरे मन में उठा-आप चिट्ठियां लिखते होंगे। लेकिन आपके पास चिट्ठियां आती भी हैं, तो ये चिट्ठियां लिखता कौन है?
वह ः मेरा डाकिया कहता है, मुहल्ले मेें बस आपकी ही चिट्ठियां आती हैं। लगता है, विभाग जल्दी ही मेरी छुट्टी कर देगा। एक आदमी के लिए विभाग कब तक डाकिया रखेगा? मैने उससे पूछा, ऐसा कैसे हो सकता है? मेरी चिट्ठियों का अधिकार कैसे छीना जा सकता है?
बातचीत दिलचस्प मोड़ पर थी मैने उन्हें टोका।
मैं ः लेकिन चिट्ठियां मोबाइल का विकल्प तो नहीं?
वह मोबाइल भी चिट्ठियों का विकल्प नहीं।
मैं ः मोबाइल त्वरित सूचना-संपर्क का माध्यम तो है?
वह यह हमारी असुरक्षा बोध् को भी तो जाहिर करता है। हम हर वक्त कहां हो, कहां पहुंचे, कब पहुंचोगे जैसे सवालों के साथ क्या जानना चाहते हैं? क्यों जानना चाहते हैं? इसीलिए न कि हम आशंकाओं में घिरे होते हैं। यह स्थिति कैसे पैदा हुई? चिट्ठियां और मोबाइल के बीच ये कौन आ खड़ा हुआ है? किसने खड़ा किया?
उनके प्रश्न का जवाब मेरे पास नहीं था। मुझे लगा वह जवाब देंगे। लेकिन उन्होंने इसे अनुत्तरित ही छोड़ दिया। मैने झट से अगला सवाल किया।
मैं ः आपके पास कंप्यूटर, इंटरनेट भी नहीं है। आपको नहीं लगता कि आप समय के साथ नहीं चल रहे हैं? ग्लोबल होती दुनिया से आप नावाकिफ है?
वह ः मैं अपने पड़ोसियों को पहचानता हूं। मुहल्ले के लोगों को नाम से पुकार सकता हूं। मुझे ये ज्यादा जरूरी लगता है।
यह आदमी वाकई अजूबा है। इसके अपने तर्क हैं, बेहतर होगा जिद कहें। भीतर खीझ भी पैदा हुई। लेकिन मैने प्रोपफेशनल मुस्कराहट के साथ उन्हें छेड़ा।
मैं ः आप अपने बच्चों को भी पिछड़े हुए समय में रखे हुए हैं, इस बात का अहसास है आपको?
वह पिफर मुस्कराये। मुझे लगा यह आदमी अव्वल दर्जे का ढीठ है।
वह ः देखिए, मैने बच्चों पर कोई प्रतिबंध नहीं थोपा है। अगर उन्हें लगता है कि कंप्यूटर, इंटरनेट, मोबाइल उनके लिए अनिवार्य है, तो वे अवश्य लेंगे। पिता होने के नाते उनकी जरूरतों को पूरा करना मेरा कर्तव्य है।
मुझे लगा, कुछ तो रास्ते पर आये। गांठ ढीली तो हुई।
वह लेकिन जहां तक समय के साथ न चलने का प्रश्न है तो मुझे बताइए कि जब ये गैजेट नहीं थे, तब क्या इंसान समय से पिछड़ा हुआ था? इंसान का समय गैजेट तय करेगा या उसके समय की चुनौतियां तय करेंगी? समय के साथ चलने का अर्थ अपनी निजता और आपसदारी का विलोम नहीं हो सकता।
मैं उनके भारी-भरकम शब्दों और उनकी गूढ़ता से चकराया। ऐसे शब्दों की तो मीडिया में खिल्ली ही उड़ाई जाती है। क्या पता हमारे दर्शक भी समझ पायेंगे या नहीं? सोचा, एडिटिंग में कुछ ट्रिक इस्तेमाल कर लेंगे ।
वह मेरी ओर ताक रहे थे। मुझे लगा, उनकी आंखों में कोई सवाल मुखर हो । इससे पहले कि वह वाकई कोई सवाल पूछ दें, मैने एकबार पिफर उनको घेरने की कोशिश की।
मैं ः आपके बच्चे ऐसा महसूस नहीं करते कि इन सुविधाओं के बगैर वे अपने सहपाठियों से पिछड़ रहे हैं?
वह मेरे दोनो बच्चे अपने स्कूल के बेहतर छात्रा हैं। पढ़ाई में भी अव्वल। उनकी कोई कंपलेन नहीं आती। मैं स्वयं उन्हें पढ़ाता हूं । उनकी समस्याओं के समाधन के लिए तत्पर रहता हूं।
मैने सहज उत्सुकता से पूरक प्रश्न किया।
मैं ः कोचिंग बगैरह?
वह नहीं ,वे कोचिंग नहीं करते। मैं उन्हें पराश्रित नहीं बनाना चाहता। उन पर अतिरिक्त बोझ डालने का पक्षधर नहीं। वे स्कूल से घर आयें। घर से कोचिंग भागें। पिफर डबल होमवर्क करें। बच्चे हैं या बोझ ढोने वाले जानवर? मुझे अपने बच्चे चाहिए, जानवर नहीं।
लोग जिन सिद्धांतों को बघारते हैं, यह आदमी तो उन्हीं को जीता है। ऐसे लोग वाकई मामूली आदमी ही होते हैं। बिल्कुल अजूबा। मुझे प्रसन्नता हो रही थी कि इंटरव्यू सही लाइन पर जा रहा था।
ृ मैं ः आपको नहीं लगता कि ये तमाम गैजेट्स आज की जीवनशैली की अनिवार्य आवश्यकता हैं?
इस बार वह मुस्कराये नहीं। थोड़ा हिले-डुले। हल्का-सा पोस्चर बदला। कैमरामैन महेन्द्र ने कोई आपत्ति नहीं की।
वह ः देखिए, मेरा मानना है कि हम जरूरत के हिसाब से चीजें चुनेंगे न कि चीजों के हिसाब से जरूरतें पैदा करेंगे। चुनने की स्वतंत्रता मेरी है। मुझे अपनी निजी स्वतंत्रता की कीमत पर कोई खरीद-फरोख्त स्वीकार नहीं। मेरी जीवनशैली कोई और कैसे तय कर सकता है?
यह एक तरह से उनका निष्कर्षात्मक वक्तव्य था, क्योंकि वह जिस तरह आजिज नजर आ रहे थे, उससे यह सापफ था कि इससे ज्यादा उनके पास कहने को कुछ नहीं है।
मैने कैमरामैन महेन्द्र की तरपफ देखा। महेन्द्र ने कैमरा आॅफ करते हुए बताया, ‘तेरह मिनट, सात सेकेंड।’
फुटेज पर्याप्त हो चुका था। मुझे लगा काम की बातें हो चुकी हैं, बाकी तो हम जरूरत के हिसाब से क्रिएट कर लेंगे। वॉयस ओवर और दूसरे विजुअल्स के जरिए इस इंटरव्यू को कहीं ज्यादा रोचक और उत्तेजक बना लेना कोई मुश्किल काम न था।
मैने उनसे आग्रह किया, ‘क्या आपकी पत्नी और बच्चों के कुछ शॉट्स ले सकते हैं?’
उन्होंने मना नहीं किया। वहीं से उन्होंने बेटे को आवाज लगाई। बेटा मुस्कराता हुआ आया। उन्होंने मां और बहन को बुलाने की हिदायत के साथ कहा, ‘अरे यार, अंकल लोगों को चाय-वाय तो पिलाओ !’
बच्चा के अंदर जाने से पहले ही कैमरामैन महेन्द्र ने सख्ती से मना किया, ‘चाय छोड़ दीजिए। बहुत सारा काम है। हमे तुरंत निकलना होगा।’
बच्चा ठिठका पिफर अंदर चला गया ।
थोड़ी देर बाद उनकी पत्नी, बेटी और बेटा कमरे में आये। महेन्द्र ने पिफर कैमरा आॅन किया।
मैने सबसे एक सीध-सा सवाल किया, ‘आप कंप्यूटर, मोबाइल, टीवी का इस्तेमाल नहीं करते कैसा लगता है?’
‘जो लोग इन चीजों का इस्तेमाल करते हैं, उनसे आपने पूछा, उन्हें कैसा लगता है?’ छोटी-सी मासूम-सी दिखने वाली लड़की, जिसे गुडि़या कहा जाता है, टक से पूछ बैठी।
मैं कटकर रह गया।
उनकी पत्नी ने कहा, ‘खाना तैयार है, आपलोग खाकर जाइएगा।’
‘जी पिफर कभी!’ हड़बड़ाते हुए महेन्द्र ने हस्तक्षेप किया ,उसे लगा कहीं मैं उनके इस निमंत्राण को स्वीकार न कर बैठूं।
बेटे ने कुछ नहीं कहा। महेन्द्र ने कैमरा आॅफ किया। मैने माइक्रोफोन संभाले। उठकर विदा लेने के लिए उन्हें धन्यवाद कहा।
उन्होंने दरवाजे पर पहुंचकर कहा, ‘उम्मीद है, अब आपका केआर बेहतर हो जायेगा।’
मैं लज्जित-सा मुस्कराया। हंसी भीतर थी, बाहर शालीनता। मैने उन्हें सूचित किया, ‘कम से कम अपना इंटरव्यू जरूर देखिएगा टीवी पर। मैं आपको सूचित कर दूंगा।’
‘मुझे कोई रूचि नहीं है!’ उन्होंने पिफर वही जुमला दुहराया। मैंने असहाय भाव से उन्हें देखा-कुछ नहीें हो सकता इस आदमी का। ठीक इसी वक्त मेरे भीतर पंच लाइन बजी-इक्कसवीं सदी का अजूबा।
हो सकता है, इस लाइन में कुछ सुधर हो। पंकज का दिमाग ज्यादा उर्वर है। वह सडि़यल से सडि़यल स्टोरी को भी अपनी सनसनीखेज पंचलाइनों से, इस कदर शानदार बना देता है कि उसे दिन भर तानकर दर्शकों को फंसाये रखने में कामयाबी मिल जाती है। एडीटर तो उसका मुरीद है। हर मीटिंग में वह उसकी तारीपफ करते हुए एक ही बात दुहराता है, ‘स्टोरी कैसे बेची जाती है, यह पंकज जानता है।’
पंकज यानी पंकज चतुर्वेदी । उसे एडीटर एक दूसरे चैनल से उड़ाकर लाया था और उसकी इस कृपा के एवज में पंकज अपनी पूरी प्रतिभा झोंके हुए था। इसमें कोई संदेह नहीं कि पंकज स्टोरी प्लानिंग, पैकेजिंग और प्रेजेंटेशन का मास्टर था। कोई आश्चर्य नहीं कि उसे जल्दी ही प्रमोशन मिल जाये।
शुक्र है कि मैं पंकज के गुडबुक में था। वह एक्सक्लुसिव स्टोरीज के लिए मुझे प्रेरित करता है और मैं भी जी-जान से जुटकर उसके दिये एसाइनमेंट को पूरा करता हूं। मुझे पूरा यकीन है कि ‘यह एक मामूली आदमी का इंटरव्यू’ उसके हाथों में जाकर एक्सक्लुसिव हो जायेगा।
और वही हुआ।
पंकज ने पूरा फुटेज देखा। इस देखने के दौरान उसके चेहरे पर कई तरह के भाव आते-जाते रहे। कई बार उसने फुटेज को रिपीट किया। कुछ सोचा और पिफर मुस्कराते हुए मेरी तरपफ देखा। पंकज के साथ एक अच्छी बात यही है कि उसकी मुस्कुराहट रहस्यमय नहीं होती। वह खुश है, नाराज है या कि असमंजस में है उसके चेहरे पर सापफ-सापफ देखा जा सकता है। दूसरे साथी इसे दूसरे अर्थ में लेते हैं- पंकज से कुछ छिपता नहीं है। यही कमजोरी उसे ले डूबेगी। फिलहाल तो वह अबतक डूबा नहीं है और जैसा कि मैं समझ पाया हूं वह उफपर से लेकर नीचे तक सबको साधने में माहिर है। हां, मैं मन ही मन उसे ‘ब्रेन विद ब्यूटी’ की तर्ज पर ‘ब्रेन विद बटर’ मानकर मजे लेता हूं और यह सोचकर खुश होता हूं कि पंकज को प्रतिभाओं की पहचान और कद्र है। आखिर ऐसे ही थोड़े न मैं उसके ‘गुडबुक’ में हूं।
इस इंटरव्यू की एडीटिंग के दौरान भी वह बैठा। स्क्रिप्ट में भी उसने पूरी मदद की। वॉयस ओवर से लेकर संबंधित विजुअल्स इनसर्ट करने तक उसने मदद की। आखिरकार जब वह संतुष्ट हो गया तो उसने मेरी पीठ थपथपाते हुए कहा, ‘वेलडन!’
मैं कृतज्ञता से भरा, उसके प्रति आभार प्रकट करने के लिए दोहरा हो गया, ‘थैक्यू सर! ए लॉट आॅफ थैंक्स!’
उस दिन मेरे दिमाग में बार-बार एंकर की आवाज गूंजती रही-‘आइए, हम आपकी मुलाकात कराते हैं, इक्कीसवीं सदी के एक ऐसे अजूबे इंसान से, जिसे देखकर आपकी आंखें फटी की फटी रह जायेंगी। आप इसे देखकर दांतों तले उंगलियां दबा लेंगे और सोचने पर मजबूर हो जायेंगे-क्या इस जमाने में ऐसा भी मुमकिन है! जी हां, हम आज आपकी मुलाकात ऐसे ही एक शख्स से कराने जा रहे हैं। एक ऐसा शख्स, जिसे आपने पहले कभी, टेलीविजन पर नहीं देखा होगा। आप आज उस अजूबे इंसान से मिलिए सिपर्फ और सिपर्फ इस चैनल पर।’
मुझे उस वक्त बहुत गुदगुदी हो आयी थी, जब पंकज ने एंकर को झिड़की दी थी, ‘पॉज तो ठीेक है, लेकिन आवाज में फोर्स नहीं। थोड़ा और जोर दो।’
और फाइनली एंकर ने कमाल कर दिखाया था। लगा था, सड़क के किनारे खड़ा फेरीवाला आवाज लगा रहा हो, या कि मदारी मजमा जुटाने के लिए गला फाड़ रहा हो। शुरू-शुरू में मुझे यह सब अजीब लगता था। लेकिन माल बेचने और मजमा जुटाने का कोई और तरीका अब तक न खोज पाने की वजह से सारे चैनलों की यह मजबूरी थी। अब तो मैं खुद इस तरीके का इतना अभ्यस्त हो गया हूं कि लगता है, एंकर ऐसे ना चीखे तो कोई चैनल चलेगा कैसे? हमारा चैनल तो पिफर भी हिट एंड हॉट था, पिफर कोई रिस्क लेने की जरूरत क्या थी?
जो भी हो, यह इंटरव्यू मेरे लिए एक एक्सक्लुसिव था और पंकज का मानना था कि इसे ‘प्राइम टाइम’ मिलना चाहिए। वह अपनी ओर से ‘टाइम स्लॉट’ के लिए प्रयासरत था।
कई दिनों की प्रतीक्षा के बाद, आखिरकार एक दिन एडीटर का बुलावा आ गया। बुलावा पंकज के पास आया था। पंकज ने मुझे अपने पास बुलाया और कहा, ‘चलो बॉस ने बुलाया है। वह तुम्हारे इंटरव्यू पर डिसकस करना चाहते हैं।’
बॉस यानि कि एडीटर यानि परितोष पार्थ, जिसे हमारे कई साथी पार्थिव कहते हैं। पार्थिव का अर्थ बेजान ही होता है। लेकिन सारे साथी इसे इस अंदाज में बोलते हैं कि यह बेहद जानदार जान पड़ता है। अंग्रेजीनुमा जीभ और मुंह की कसरत से उचरा यह शब्द इतना प्रिय और प्रचलित हो गया था कि स्वयं पार्थ भी इसे गर्व से स्वीकार चुका था।
उसी पार्थिव के बुलावे की सूचना पाकर मैं क्षणभर को सन्न हुआ। लेकिन पंकज की हौसला आफजाई से खुद को संभालते हुए उसके साथ हो लिया, इस विश्वास के साथ कि आखिर मेरे एसाइनमेंट में कुछ तो ऐसी बात है कि पार्थ ने मुझे भी अपने चैंबर में मिलने के लिए बुलाया है।
पार्थ से मिलना और उसके चैंबर में मिलना, मुझ जैसे जूनियर पत्राकारों के लिए आमतौर पर संभव नहीं होता है। अगर किसी के लिए यह संभव होता है, तो वह उसके लिए दुर्लभ अवसर होता है। और यह दुर्लभ-अवसर वाया पंकज इस वक्त मुझे हासिल हुआ था।
पार्थ के चैंबर में दरवाजे के अंदर सिर डालकर पंकज ने अपनी उपस्थिति की सूचना दी और अंदर आने की अनुमति भी ली। मैं उसके पीछे था, इसलिए ऐसी कोई प्रक्रिया मुझे नहीं दुहरानी पड़ी। लेकिन उसके भव्य चैंबर में दाखिल होते ही मेरा दिल धड़का और मैने सहमे अंदाज में झुककर उसे अपना अभिवादन निवेदित किया। उसने सिर हिलाया और सामने खुले लैपटॉप के स्क्रीन पर देखने लगा। इस बीच उसने न बैठने को कहा, न हमने ऐसा कोई उपक्रम किया। पंकज जब स्वयं आज्ञाकारी मुद्रा में खड़ा था, तो मेरी क्या बिसात!
इस चुप्पी में बहुत कुछ था। डर, उपेक्षा, आशंका, रौब और औकात जैसे तमाम रस-गंध का कंपलीट पैकेट। कितने मिनट के बाद यह चुप्पी स्वर में बदली, कहना मुश्किल। लेकिन जब पार्थ ने सिर उठाया और दाहिने हाथ के संकेत से बैठने को कहा, तो लगा कि हाथ भी बोलते हैं। पंकज पहले बैठा। मैं सकुचाया-सा उसके बगल की दूसरी कुर्सी पर बैठ गया जैसे मैं उसका बगल बच्चा होउ!
पार्थ ने घंटी बजाई। प्यून नमूदार हुआ। पार्थ ने उसे आदेश दिया, ‘अरे यार, कॉफी-वाफी कुछ पिलाओ।’
यह क्या, पार्थ इतना सहज है? इतना उदार? इतनी सौजन्यता से भरा हुआ? चैंबर के बाहर, उसकी जो छवि है, उससे निहायत उलट थी पार्थ की यह छवि। मैं तो भीतर तक अभिभूत हो उठा- आखिरकार पार्थ भी है तो पत्राकार ही। मैं विनम्रता और उत्सुकता से उसे देखता रह गया। हालांकि अभी तक उसने सीध्े-सीध्े मुझे नहीं देखा था।
‘यह इंटरव्यू’, एक मामूली आदमी का इंटरव्यू आपने किया है?’ अचानक पार्थ मुझसे मुखातिब हो गया था।
‘जी … जी!’ मैं हकला-सा गया।
‘गुड!’ पार्थ मुस्कराया, ‘काम तो अच्छा है। कुछ और इनपुट की जरूरत थी। लेकिन कोई बात नहीं, जो है, वह भी काफी अच्छा है।’
मेरा हौसला बढ़ा। आतंक, आशंका का दबाब कम होता-सा जान पड़ा। मैं टुशिष्य-सा सुन रहा था।
पार्थ ने पूछा, ‘वैसे ये आइडिया, आपको मिला कैसे?’
‘सर, फेसबुक से। एक छोटी-सी जानकारी थी, जिसे काफी लोगों ने लाइक किया था।’ मैने मिली शह की रौ में खुलकर बताया।
‘और इसे तुमने!’ पार्थ अचानक पंकज से मुखातिब हो गया, ‘एसाइन किया?’
‘सर!,?’ पंकज फुसफुसाया या बोला अंदाज लगाना मुश्किल था।
‘इस लड़के ने जो किया, सो किया।’ पार्थ कुछ आक्रामक हो आया था, ‘लेकिन पंकज तुमने क्या किया? एक मामूली से इंटरव्यू को इस कदर सनसनीखेज बना दिया है, मानो दुनिया का आठवां अजूबा हो।’
यह मेरे औंधे मुंह गिरने की बारी थी। मैने अपने भीतर खुद को इसी मुद्रा में पाया। उठ पाने की न हिम्मत हुई और न उठ पाने का बल था।
‘सर!’ पंकज मानो इस एक शब्द के सिवा कुछ बोलना जानता ही न हो।
‘इस इंटरव्यू को कौन देखेगा? कौन देखेगा इसे?’ अपनी बात पर जोर देता पार्थ पंकज से पूछ रहा था, ‘कौन है हमारा व्यूअर, क्या यह भी तुमको बताने की जरूरत है?’
‘सर!’ पंकज के मुंह से निकला, तो मेरी हंसी निकलते-निकलते रूकी।
‘भइया, हमारा व्यूअर इन बातों से बहुत आगे जा चुका है। वह तरक्की चाहता है। वह ग्लोबल होना चाहता है। उसकी अनंत इच्छाएं हैं। हम उसकी इन इच्छाओं को रोक नहीं सकते। रोका भी नहीं जा सकता।’
पार्थ प्रवचन तो कतई नहीं दे रहा था। पिफर? मुझे लगा वह हमे अपने अनुभवों से पत्राकारिता और व्यूअर के रिश्ते को समझाने की कोशिश कर रहा है। वह जारी था, ‘पंकज, यह सच तुम भी जानते हो। पिफर तुमने इस इंटरव्यू को कैसे ओके कर दिया?’
पंकज कठघरे में था। मेरा तारणहार ही डूब रहा था, मेरे लिए बचाव का विकल्प ही कहां था। मेरा दिल डूबने लगा। ‘सर!’ पंकज ने कोई सपफाई नहीं दी। गोया हर सवाल का जवाब ‘सर’ हो। गोया हर मुश्किल का हल ‘सर’ हो। गोया यही उसका अस्त्र हो और यही शस्त्र हो।
अचानक दरवाजा खुला और ट्रे में कॉफी के तीन प्याले लिए प्यून हाजिर हुआ। उसने इस सलीके और सपफाई से हमारे सामने कॉफी के प्याले रखे कि चैंबर की शालीनता कतई भंग नहीं हुई। प्यून की इस कला पर मैं मुग्ध होना चाहता था। लेकिन स्थिति इसके लिए माकूल नहीं थी।
प्यून बाहर गया।
पार्थ ने कॉफी का प्याला उठाते हुए संकेत दिया कि हम भी कॉफी पियें। लेकिन मेरे तो हाथ ही नहीं बढ़े। पंकज ने जरूर प्याला उठा लिया था। हालांकि घूंट उसने तुरंत नहीं भरी।
‘मैने पूरा इंटरव्यू देखा है।’ कॉफी का घूंट अंदर और प्याला टेबुल पर रखते हुए पार्थ ने बोलना शुरू किया, ‘यह पिछड़े जमाने की पत्राकारिता है। अस्सी के दशक की। हम ऐसी चीजें दिखाकर टीआरपी नहीं हासिल कर सकते। यू नो, मीडिया मार्केटिंग का क्या कहना है?’
हम दोनो यानी मैं और पंकज दोनो पार्थ को जिज्ञासा भाव से देखने लगे। पार्थ ने पिफर कॉफी का लंबा घूंट भरा। प्याला किनारे सरकाया और बोला, ‘मार्केटिंग हेड दिवाकर मेरे पास आया था। उसने सापफ-सापफ कहा कि हम यह इंटरव्यू किसी भी हाल में एअर ना करें। पहले तो मैं समझ नहीं पाया। तब उसने बताया कि यह इंटरव्यू हमारे क्लाइंट के खिलाफ जाता है। टी वी, ्िरफज, कंप्यूटर, मोबाइल, इंटरनेट यहां तक कि कोचिंग वाले सभी हमारे क्लाइंट हैं। वे ही हमे एड देते हैं। और यह इंटरव्यू तो उन्हीं चीजों का निषेध करता है।’
मैं चकराया। मेरी सांसें सीन में ही अटक गई थीं। एक इंटरव्यू, एक मामूली आदमी का इंटरव्यू, इतना खतरनाक था? इतना भयावह? मैने तो सोचा तक नहीं था। इतनी दूर तक सोच भी नहीं सकता था। लेकिन पंकज क्यों नहीं सोच पाया? वह तो सोच ही सकता था। पिफर उसने यह जोखिम क्यों उठाया? मेरे पास कोई जवाब नहीं था। हो भी नहीं सकता था।
मेरे इंटरव्यू की ही नहीं, मेरी भी हवा निकल चुकी थी। पार्थ के सामने, पार्थ के चैंबर में बैठे रहना भारी गुजर रहा था। बगैर पार्थ की अनुमति के उठना, चले जाना भी संभव नहीं था। और पार्थ था कि उसकी तरपफ से कोई संकेत मिलता नहीं दिख रहा था।
‘पंकज, मुझे तुमपर। तुम्हारी समझ पर बहुत भरोसा रहा है। बट सॉरी टू से, तुमने मुझे निराश किया।’ पार्थ की आवाज निहायत ठंडी थी। काफी कुछ अनपहचानी-सी, ‘एनीवे, आप दोनो के नाम मेल भेजा है। जाइए, देख लीजिएगा।’
उस वक्त यह सोचना कतई मुमकिन नहीं था कि भेजे गये मेल में क्या है, क्या होगा? बड़ी बात यह थी कि पार्थ से, उसके आतंक से बाहर निकलने का अवसर मिल गया था और मैं इस अवसर के आवेग में पंकज से पहले उठ खड़ा हुआ।
पंकज भी उठा। उसके उठने में कोई हड़बड़ी नहीं थी। मुझे लगा, चलते-चलते वह कहीं पिफर ‘सर’ ना बोल पड़े। लेकिन उसने कुछ नहीं कहा। मेरे पीछे पंकज किसी अनसुलझे सवाल-सा आ रहा था। इस बार मैं आगे था। पंकज पीछे। चैंंबर का दरवाजा मैने खोला। पंकज मेरे पीछे-पीछे बाहर आया।
मैं ठिठका। पंकज ने मुझे मुस्कराकर देखा। मेरी आंखों में अचरज था, जिसे उसने लक्ष्य किया। मेरे कंधे पर हाथ रखते हुए उसने खेद जताने के अंदाज में कहा, ‘मेरी वजह से तुमको इतना सुनना पड़ा।’
‘नहीं सर, मेरी वजह से खामखाह आपको एम्बेरेस होना पड़ा।’ मैने शिष्टता ही नहीं दिखाई अपनी धृष्टता के लिए भी क्षमा याचना की।
‘ओके। ओके!’ मुस्कराकर सिर हिलाते पंकज ने याद दिलाया, ‘जाओ, पहले अपना मेल चेक करो!’
मैं जमीन पर लौटा। यथार्थ में उतरा। हमारे साथी, कुछ कौतूहल से, तो कुछ दबी मुस्कराहट से, तो कुछ ईर्ष्या भाव से हमे देख रहे थे। कम से कम मुझे तो ऐसा ही लगा। मैं इतनी आंखों, इतने भावों से घिरा कुछ ज्यादा ही असहज हो आया। तेजी से अपनी सीट की ओर लपका।
लैपटॉप आॅन था। मेल बॉक्स खुला था। इन बॉक्स में कई मेल थे। मैने पार्थ के मेल को क्लिक किया। मेल बीस मिनट पहले भेजा गया था। इसका मतलब यह हुआ कि पार्थ ने यह मेल तब सेंड किया था, जब हम उसके चैंबर में दाखिल हुए थे और वह ठीक उसी वक्त अपने लैपटॉप पर बिजी था। यानी उसने जो बीस मिनट लेक्चर दिया, पत्राकारिता की एबीसीडी समझाई और कॉफी पिलाई, उससे पहले ही वह अपना मेल हमे भेज चुका था। यह ‘फायर’ करने का नया तरीका था क्या?
मैं सिहर गया। पार्थ का मेल खुला था। लेकिन का पढ़ने साहस नहीं हो रहा था। अचानक मुझे वह मामूली आदमी याद आया। उसकी बेफिक्री, उसकी मुस्कराहट और उसकी जिद याद आई। टी वी, मोबाइल, कंप्यूटर, इंटरनेट, लैपटॉप कुछ भी नहीं था उसके पास। यह बात तब भले ही अजूबा लगी थी। लेकिन अब असाधारण लग रही थी। वह अपने विरू( खड़ी शक्तियों के मुकाबिल खड़ा था। यह उसका साहस था। मैने मन ही मन उसे सैल्यूट किया और अपनी भावनाओं पर काबू करते हुए पार्थ का मेल पढ़ना शुरू कर दिया।
डियर नील रंजन,
आपके द्वारा किये गये ‘एक मामूली आदमी का इंटरव्यू’ की उच्चस्तरीय समीक्षा में पाया गया है कि यह एक सोची-समझी साजिश के तहत किया गया। यह कंपनी की नीति और नियमों के विरू( है। कंपनी की छवि को क्षति पहुंचाने के आपके इस कृत्य को देखते हुए क्यों नहीं आपके विरू( अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाये?
होना तो यह चाहिए था कि मैं इस मेल के मजमून से डर जाता। मेरी आंखों के आगे अंधेरा छा जाता और एक लगी-लगाई नौकरी के चले जाने का खौफ मेरे वजूद को अपनी गिरफ्रत में ले लेता। लेकिन आश्चर्य ऐसा कुछ नहीं हुआ।
मैने स्वयं को सहज पाया। दृढ़ता से निश्चय किया कि पार्थ के इस ‘शो कॉज नोटिस’ का जवाब दिया जाना चाहिए। लेकिन क्या? क्या हो सकता है सटीक उत्तर?
उत्तर की तलाश में मैं भागा-भागा पंकज के पास पहुंचा। पंकज अपनी सीट पर नहीं था। कहां गया वह? अभी-अभी तो वह मेरे ही साथ पार्थ के चैंबर से बाहर आया था और अपनी सीट पर गया था । पिफर अचानक कहां चला गया वह?
मेरी परेशानी पर हैरानी जताते हुए खूबसूरत-सी एंकर सुध अमृत ने बताया, ‘पंकज तो पार्थ के पास गया है।’
सुध अमृत मुस्करा रही थी। मुझे मुस्कराती हुई वह इस वक्त मेरी खिल्ली उड़ाती जान पड़ी। जी में आया उसी से पूछ बैठूं, ‘मेरे पास जो ‘शो कॉज नोटिस’ आया है, उसका कोई जवाब तुम्हारे पास है?’
मैं जानता था, उसके पास उसकी मुस्कुराहट के अलावा कुछ नहीं था। लेकिन मैं यह भी जानता था कि मेरे पत्राकार साथियों के पास कोई न कोई माकूल जवाब जरूर होगा।
मैने बेहद विश्वास और उम्मीद के साथ अपने कई साथियों से जवाब जानने की कोशिश की। लेकिन ज्यादातर ने दबी जुबान से ‘ना’ कर दिया, तो कुछ ने साहस करके सुझाव दिया, ‘तुम्हें माफी मांग लेनी चाहिए।’
मैं ठगा-सा अपने पत्राकार साथियों को देखता रहा। मुझे माफी मांगने में कोई गुरेज नहीं। लेकिन यह पार्थ के सवाल का जवाब तो नहीं हुआ? क्या आपके पास काई जवाब है?

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    By: अवधेश प्रीत

    जन्म : 13 जनवरी 1958, तराँव, गाजीपुर (उत्तर प्रदेश )
    भाषा : हिंदी
    विधाएँ : कहानी
    मुख्य कृतियाँ
    कहानी संग्रह : हस्तक्षेप, नृशंस, हमजमीन, कोहरे में कंदील, चाँद के पार एक चाभी
    सम्मान- विजय वर्मा कथा सम्मान, बनारसी प्रसाद भोजपुरी कथा सम्मान, डॉ. सूरेंद्र चौधरी कथा सम्मान, फणीश्वरनाथ रेणु कथा सम्मान
    सुमति पथ, रानीघाट, महेन्द्रू, पटना-800 006 (बिहार)
    फोन – 91-9431094596
    मेल- [email protected]

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