शब्द और संवेदनाओं के सम्मलित एहसास से गुथी जिजीविषा रजनी की कविताएँ सहज ही मानवीय अन्तःकरण में इंसानी उद्वेग को झकझोरती सी प्रतीत होती हैं | जैसे खड़े हैं कुछ सवाल खुद जवाब बनकर …..| – संपादक 

एक मोर्चा

जिजीविषा

जिजीविषा

‘अच्छे’ ‘बुरे’ कितने ही शब्द खोकर अपने चेहरे
जब सकपकाए से देखते हों एक दूसरे को
अंधेर नगरी में चौपट राजा का अट्टाहस गूंजता हो
वक्त के पहिए को पीछे खींचने में
मशगूल हों गिजगिजे लकड़बग्हे
इन सब के खिलाफ़ तकरीरों का मोर्चा संभालते वक्त
हो सकता है तुम्हें खलती हो मेरी ख़ामोशी
हो सकता है मेरी प्रतिबद्धता पर होता हो शक़
अपने मोर्चे पर डटे तुम शायद देख न पाओ मुझे साफ़ साफ़
मगर डटी हूं मैं इस लड़ाई के एक ज़रूरी मोर्चे पर
अंधेरा फ़ैलाने वालों के खिलाफ़
जब तुम पैने करते होगे अपने हथियार
मैं खमोशी से इस अंधेरे में एक दिया जला रखूंगी
नफ़रत से सनी दीवारों पर मैं ‘प्रेम’ लिखूंगी

जिंदगी का मंच 

उसने कुछ कहना चाहा
बल्कि बहुत कुछ
फिर बिना बोले कह दिया
सुना भी गया
फिर न सुनने का अभिनय
जिंदगी के मंच पर
यूं भी होते हैं कुछ नाटक
बिना संवाद के
जिजीविषा
अनंत तक टूटते अणु सी हो गई उम्मीद
कितना भी तोड़ो मगर टूटती नहीं
छीन कर साज़ उसने
कर दिया बेआवाज़ मुझे
गुनगुनाने की आदत ये मगर छूटती नहीं

साथ

यूं ही बेतकल्लुफ़ी में
मेरा हाथ थाम उस दिन
हथेलियों में रख दिए थे
जो स्नेह के बीज तुमने
मेरी हथेलियों की
नमी पा अंकुरा आए हैं
फिर बुलाती हूं तुम्हें
चलो मिलकर सींचे इन्हें
ताकि मई-जून आने तक
ये बन जाएं पूरे पूरे पेड़
मीठी छांह में बहुतों को
सुकून मिलेगा

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