sujata

                  सुजाता

एक शरीफ सांड की सच्ची कहानी…

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फोटो गूगल से साभार

कहने को वह एक सांड था लेकिन मरखना नहीं था।शरीफ था। दिनभर मतवाला सा जंगल मे घूमता और साँझ ढले गाम आ जाता था। गाम मे उसकी इज़्ज़त थी। जिस दरवज्जे पर खड़ा होता एक रोटी मिल ही जाती थी।इतना सज्जन कि बच्चे खेलते फलांगते उसके पैरों के बीच से निकल जाते थे।जंगल के मरखने सांडों से गाम के लोग-लुगाई डरते थे।वेजंगल से जब भी गाम की ओर आ जाते थे हड़कम्प मच जाता था। गाय की फिज़ूल रम्भाहट के समय उसे सांड के पास ले जाना ज़रूरी होता था जिसके लिए शरीफ सांड बहुत काम का था जंगलियों से कौन पंगा ले।उधर ट्रैक्टर के प्रचलन में आ जाने ने यूँ भी बैलों की आजीविका पर लात मार दी थी उस पर से एक सांड ले लिए गामवालों का दिल खोलकर स्वागत करना पर्याप्त ईर्ष्या का कारण था उनके लिए। शरीफ सांड को छोड़ दो तो बाकी जंगली मरखने सांड को भी बैल फूटी आँख सुहाते नहीं थे। बधिया किए हुए….जुआ उठाए…बुझे …थके…। यहाँ जवानी की उमंगें थीं वहाँ ज़िम्मेदारियों का बस्ता। जो कुछ बचे खुचे बैल रह गए थे उन्हें भी मरखने सांडों से बचाना होता था। इधर हमारा सज्जनकुमार …शरीफ बैल…मज़े में दिन काट रहा था। भूख लगने पर रोटी और दुलार और गाम भर की गाएँ गाभिन करने को।आराम से धूप में बैठा वह एक दिन सोचने लगा …मरखने सांड मूर्ख हैं …और बधिया बैल भी…सोच बधिया हो जाए तो जीवन में आनंद ही आनंद है !

बरसात के बाद

बरसात के बाद भीगे पत्तों की महक के साथ काली धुली, अकेली सडक पर चलते हुए वे दोनो जाने क्या कुछ सोच रहे थे. चुप्पी दीवार न थी पर सहारा तो थी ही ।शायद दोनो में से कोई भी पहल करने का जोखिम नही उठाना चाहता था. कीचड भरी फ़ुटपाथ पर रपटते हुए ,कदमों को धीरे-धीरे नज़ाकत से उठाते हुए हलकी डगमगाहट में कान्धे से कान्धा टकरा जाता है. एक सुखद अनूभूति के साथ लडकी कदमों को फिर से डगमग़ा जाने देती है. वह चंचल है. लडका समझ रहा है. वह सम्भाल लेता है हाथों का सहारा देकर और उसका तुरंत ही हाथ छोड देना लडकी को खिझा देता है वह कुछ और देर थामे रहता तो ? लडका शांत और गम्भीर है जैसे बहुत कुछ हो उसके पास कहने के लिए या कुछ भी न हो कहने के लिए लडकी से या शायद वह सोच रहा हो कि इस समय मेँ वह और बहुत से काम निपटा सकता था. लडकी को उसपर लाड आता है. घर से बाहर उसके भीतर की अल्हड प्रेमिका करवटें लेने लगती है. वह उसका सर गोद मेँ रख कर थके मुख को चूम लेना चाह्ती है. लडके के भीगे –बिखरे बालों को समेटने के लिए उसका मन मचलता है, पर सडक पर ? कोई बात नही. वह हाथ बढाती है तो लडका कहता कुछ नही भवें सिकोडता हुआ उसे नादानी न करने को कहता- सा देखता है. फिर पलट कर पीछे और दाएँ -बाएँ देखता है. लडकी उबासी लेने लगती है. उसका मन बुझने लगता है. उसे समझ नही आता कि वे दोनो साथ क्यों हैं और लगातार चल क्यों रहे हैं ! वह पार्क के बेंच पर बैठना चाहती है, वह लडके के कन्धे पर सर रखना चाह्ती है. वह चाहती है कि लडका उसके नर्म रेशमी बालों में उंगलियाँ फिराए और इस प्रेमिल नीरवता में वह घर लौट कर सैकडों कर्म करने और कई भूमिकाएँ निभाने के लिए वापस समेट ले ऊर्जा.

अचानक उसने पलट कर लडके की ओर देखा – लडका अब लडका सा नही रहा. वह आदमी हो गया है या वह आदमी ही था ? क्या मैने इसे आज से पहले कभी नही देखा इस तरह ? अचानक लडकी के तेवर बदलते हैं. वह कदमों को मोड लेती है बाज़ार की ओर जैसे सहसा याद आ गया हो कोई बहुत ज़रूरी काम. आदमी नही पूछता, मानो वह तेवर समझ गया हो ! वह सब समझ जाता है. वह इसलिए अनूकूल व्यवहार कर पाता है. कमरे के भीतर चाहे जो हो, वह बाहर एक ज़िम्मेदार पति है. लडकी याद दिलाती है कि बाज़ार से उसे लेना है सासू माँ के अचार डालने को सौंफ और कलौंजी और सुबह का टिफिन पैक करने को अल्यूमीनियम फ़ॉएल.

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