आज के युग में जहाँ सब कुछ बहुत तेज़ी से बदल रहा है, बहुत कुछ पीछे छुट रहा है। डिजिटल के दौर में हमें चीज़ों को भूलने की आदत पड़ती जा रही है।हम बहुत कुछ वो खो रहे हैं जिसको सेहजना,सवंरना हमारी ज़िम्मदारी है। इसी में एक है उर्दू ग़ज़ल शेरों शायरी।

सुख़नवर-ए-शायरी का जन्म शेरों शायरी की मक़बुलियत, रिवायत को ज़िंदा, तरोताज़ा रखने, उसे एक नई शक्ल, स्फूर्ति दिलाने की नियत से हुआ था। सुख़नवर-ए-शायरी का मक़सद नई नस्ल के दिमाग़ों से यह ग़लतफ़हमी भी निकालना है कि शायरी ,ग़ज़ल बहुत ‘बोरिंग’ होती है।

सुख़नवर-ए-शायरी का उद्देश्य नए शायरों, शायराओं के हाथों में एक ऐसा डाइस थमाना है जिस डाइस पर आकर वो किसी रिवायत,किसी बंदिश में बधें नहीं, बल्कि उर्दू ज़ुबाँ की रूह में खोकर शायरी पढ़े। ग़ज़ल की खुबसूरती में मदहोश होकर दूसरों के कलाम को सुने और नज़्मों की तिरछी चाल से क़दम से क़दम मिलाकर शायरी की महफ़िलों का लुत्फ उठाएं। वो एहसास जो ज़िन्दगी के हर पहलू को किसी ने किसे तरह से शायरी से जोड़ते हैं,ऐसे ही एक एहसास का नाम है सुख़नवर-ए-शायरी।

एक शाम अदब के नाम – ‘बज़्म-ए-शायरी’ 

सीमा आरिफ

नई दिल्ली, 17 दिसंबर 2017। साहित्यिक संस्था सुख़नवर-ए-शायरी द्वारा पुरानी दिल्ली के ‘द वाल्ड सिटी कैफे एंड लाउंज’ (The Walled City Café & Lounge) में शायरी, कविता, ग़ज़ल और कव्वाली का आयोजन किया गया। शायरी से महकती रविवार की इस दिलकश शाम का नाम ‘बज्म-ए-शायरी’ रखा गया। अनेकों ग़ज़ल प्रेमियों की उपस्थिति में कार्यक्रम का आगाज़ संस्था के संस्थापक, शायरा सलीमा आरिफ और शायर मोनिस रहमान के द्वारा सभी मेहमानों के स्वागत एंव सक्षिप्त में संस्था के बारे में बता कर किया गया ।

पत्रकार सुगंधा राज द्वारा कार्यक्रम के मुख्य अतिथियों एम. ग़नी (रंगकर्मी) एवं तसनीम कौसर साईद (वरिष्ठ पत्रकार-लेखिका) को शॉल से सम्मानित किया गया।

महफ़िल की विधिवत शुरुआत मुख्य अतिथियों एम. ग़नी तथा तसनीम कौसर साईद द्वारा शमा रौशन करने के साथ हुई, । इसके बाद लखनऊ से आए शायर शब्बू मालिक को हम्द पढ़ने के लिए स्टेज पर आमंत्रित किया गया।

शायरी से महकती इस शाम के मौके पर तसनीम कौसर साईद ने कहा कि नए युवा रचनाकारों से अपील है कि वे इस तरह के कार्यक्रम आगे भी करते रहें ताकि समाज में साहित्य की धारा अविरल बहती रहे। उन्होंने नौजवानों से कहा कि वो सभी लोग अपनी ग़ज़ल को और बेहतर बनाने के लिए ग़ज़ल के जानकर उस्तादों से अपनी शायरी की इस्लाह करवाएं.

वहीं, प्रसिद्ध रंगकर्मी मो. गनी ने सुखनवर-ए-शायरी संस्था को बधाई देते हुए कहा कि उनकी वजह से नए युवा जोशीले रचनाकारों के समक्ष आने का उन्हें मौक़ा मिला। उन्होंने इस तरह के कार्यक्रमों को आम लोगों तक पहुंचाने की बात करते हुए कहा कि समाज में रचनाकार लोगों की बेहद कमी हो गई है। उन्होंने नए युवा शायर और कवियों को अधिक से अधिक लोगों तक इस तरह के रचनात्मक कार्यों को पहुंचाने की बात कहते हुए सुख़नवर-ए-शायरी और इसके संस्थापकों सलीमा आरिफ़ और मोनिस रहमान को तहे दिल से शुक्रिया कहा।

कार्यक्रम में सबसे पहले कवयित्री गायत्री मेहता ने स्टेज पर आकर अपना कलाम पढ़ा। गायत्री मेहता ने अपने शेर “जितना मुझसे कमाया जा रहा है, महज उससे घर का किराया जा रहा है“ से मेहमानों की ख़ूब वाहवाही लूटी।

सोशल मीडिया की बेहद चहेती शायरा हुमा बिजनौरी ने इस महफिल ने और भी चार-चाँद लगा दिया। उनके स्टेज पर आते ही बज़्म में थिरकन सी आ गई। “बढ़ी है क़ीमतें जब से घड़ी की, सभी का वक़्त महंगा हो गया है” और “ज़बाँ खामोश रहती है, खमोशी बोल देती है, मुलाक़ातों का सारा राज़ ख़ुशबू खोल देती है” ग़ज़लों के जरिए हुमा बिजनौरी ने शमा रौशन कर दिया।

बुढ़ाना तशरीफ़ लाये युवा शायर इक़बाल अज़हर ने अपनी शायरी से समा बांधे रखा.

इस महफिल में और भी कई नए शायरों ने अपनी प्रस्तुति दी। नए युवा शायरों में वसीम अकरम, अज़हर इक़बाल, नुज़हत शकील, शब्बू मालिक, नासिर फरीदी,विकास राना ने ‘बज़्म-ए-शायरी’ की इस महफ़िल को आख़िर तक शायरी और ग़ज़ल में डुबोए रखा।

कार्यकम के आखिर में क़व्व्ली ग्रुप “ इबादत ” ने अपने कलाम से पुरानी दिल्ली की इस सर्द शाम को रंगीन कर दिया.

महफ़िल के आख़िर में मोनिस रहमान ने सभी महमानों को धन्यवाद करते हुए अपनी संस्था के भविष्य की योजनाओं के बारे में बताया।

(प्रस्तुति – सीमा आरिफ़)

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