एफ जी एम / सी यानि 'योनि' पर पहरा: आलेख (नीलिमा चौहान)
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स्त्री  के बाहरी यौनांग यानि भग्नासा को स्त्री देह के एक गैरजरूरी , मेस्क्यूलिन और बदसूरत अंग के रूप में देखने की बीमार मानसिकता  का असल यह है कि पितृसत्ता को इस अंग से सीधा खतरा है । इस अंग के माध्यम से महसूस किया गया यौनानंद स्त्री को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे समाज के स्थायित्व को एक बड़ा खतरा  होता  है  । नैतिकता और यौनाचरण को बनाए रखने में ही सामाजिक संरचनाओं का स्थायित्व व उपलब्धि  है । यह स्त्री की देह के प्रति उपनिवेशवादी नजरिया है जिसका सीधा मंतव्य यह भी है स्त्री केवल प्रजनन के लिए है अत: उसका गर्भाशय तो वांछित है  किंतु  वह यौनानंद प्राप्त करने की हकदार नहीं है इसलिए उसके बाह्य यौनानंग अवांछित हैं । इस तरह से स्त्री की समस्त देह पुरुष के आनंद के लिए और सम्पत्ति के  उत्तराधिकारी को जन्म देकर पितृसत्ता को पुखता करने के लिए काम आती है ।  उसकी देह का केवल वही हिस्सा पितृसत्ता को अखरता है जिससे पितृसत्ता को कोई लाभ नहीं वरन हानि ही हानि है । स्त्री के यौनिक आनंद को गैरजरूरी और असंभव बनाने के इरादे भर से संवेदन तंत्रियों से भरे उस अंग को देह से विलग करने के पीछे दंभी पितृसत्ता को बनाए रखने की सोची समझी पुरानी साजिश है । इस साजिश को तरह तरह के आवरणों में सजाकर स्त्री को इस प्रक्रिया से गुजरने के लिए विवश किया जाता है । स्त्री समाज की आबादी के एक बड़े हिस्से को यौन दासी के रूप में बदल देने वाली अन्य परम्पराओं के साथ साथ स्त्री  यौनांगों के खतना जैसी  अतिचारी अमानवीय प्रक्रिया के विषय में जानकारी देता नीलिमा चौहानका आलेख …….|

एफ जी एम / सी यानि ‘योनि’ पर पहरा 

नीलिमा चौहान

नीलिमा चौहान

पिछले 29 मई को नाईजीरिया ने क़ानून बना कर अपने यहाँ महिलाओं के होने वाले खतना ( एफ जी एम / सी – फीमेल जेनिटल म्युटीलेशन / कटिंग ) पर पूरी तरह प्रतिबन्ध लगा दिया . इस अमानवीय प्रथा को हमारे ही विश्व के एक भाग की महिलायें झेल रही थीं. यह एक बड़ी पहल है. हममें से बहुत कम को पता है कि ऐसी कुप्रथा भारत में भी कहीं न कहीं मौजूद रही है . इस क़ानून के लागू होने के परिप्रेक्ष्य में नीलिमा चौहान का लेख

सनी लियोन जैसे पॉर्न स्टार के स्टाडम को मनातेइसी देश में वे स्त्रियां भी रहती हैं जिनकी योनि के बाहरी वजूद को काटकर देह से अलग कर देने जैसे अमानवीय कृत्य के प्रति एक सामाजिक अनभिज्ञता और असंवेदना दिखाई देती है । हमारे समाज में स्त्री की यौनिकता के सवाल समाज के लिए बहुत असुविधाजनक हैं । जिस समाज में स्त्री की यौनिकता का अर्थ केवल पुरुषकेन्द्रित माना जाता है उस समाज के पास स्त्री की यौन शुचिता और यौन नियंत्रण को बनाए रखने के कई तरीके हैं । इन्हीं में से एक तरीका FGM / C भी है यानि स्त्री की योनि के बाहर उभरा हुआ अंग देह से अलग कर दिया जाना । स्त्री का सेक्सुअल आनंद दुनिया को कितना डराता है इसका अंदाज़ा इस बात से लगाया जा सकता है इस समय दुनिया के 29 देशों में करीबन 130 मिलियन बच्चियां / औरतें FGM / C की शिकार हैं । इन ताज़ा आंकड़ों में दुनिया के कुछ विकसित देशों का भी नाम शामिल है । हाल ही में एक पीड़ित भारतीय महिला द्वारा एक विदेशी स्वयंसेवी संस्था के नाम लिखे गए खत से इस बात का खुलासा पूरे विश्व को हुआ कि भारत में भी एक वर्ग के स्त्री सदस्यों के यौनांगों को आंशिक या पूर्ण रूप से काट दिए जाने की पुरानी प्रथा आज भी जारी है । हैरानी है कि धर्म संस्कृति या सामाजिक अभ्यासों के नाम पर होने वाले इस जधन्य आपराधिक कृत्य को स्त्री के मानवाधिकार के हनन के रूप में देखे जाने लायक संज्ञान अभी लिया नहीं गया है ।

FGM के कई प्रकार प्रचलित हैं जिनमें भग शिश्न को आधा या पूरा काटने से लेकर उसको महीनता से सिल दिये जाने का प्रकार भी प्रचलित है । योनि पर तालाबंदी से स्त्री को गुलाम बनाने की जघन्यता के अलावा क्लीटोरिअस लगभग पूरी तरह सिल कर योनि द्वार को बंद कर दिया जाता है । इस सिलाई को संभोग के अवसर पर खोले जाने के अलावा यौन प्रक्रिया और प्रसव की जरूरतों के मुताबिक अनेक बार सिला और खोला जाता है । इन प्रक्रियाओं की शिकार होने वाली स्त्री अनेक यौन रोगों और असहनीय पीड़ा से ही नहीं गुजरती वरन मानसिक त्रासदी के साये के तले अपना पूरा जीवन बिताने के लिए विवश होती है । स्त्री के कौमार्य का संरक्षण तथा पुरुष केन्द्रित यौनानंद को सुनिश्चित करने वाली इस प्रक्रिया से विश्व की असंख्य स्त्रियां सदियों से चुपचाप गुजरती आ रही हैं ।

साभार google से

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स्त्री को यौन उत्तेजना और स्खलन के आनंद से वंचित रखने की यह साजिश इतनी अमानवीय है कि संयुक्त राष्ट्र संघ के संगठनों , जैसे यूनिसेफ और विश्व स्वास्थ्य संगठन आदि ने इस प्रचलन को समाप्त करने के लिए विविध प्रकार के कदम उठाए हैं । दिसम्बर 12 में संयुक्त राष्ट्र संघ ने एक आम सभा कर एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसके तहत विश्व भर में इस अमानवीय प्रक्रिया को समूल खत्म करने की दिशा में पहल की गई थी । कुछ देशों में नए कानून बनाकर और कुछ देशों ने पुराने कानूनों की नई व्याख्या में इसपर प्रतिबंध को घोषित कर दिया है । नाइजीरिया में 29 मई को ऎतिहासिक कदम उठाते हुए FGM को कानूनी रूप से प्रतिबंधित कर दिया है । परंतु फिर भी ताज़ा हालात यह हैं कि विश्व के कई अन्य देशों में इस प्रक्रिया के जरिए असंख्य स्त्रियों को उनके मानवाधिकार से वंचित किया जा रहा है । भारतीय समाज में भी एक ओपन सीक्रेट के रूप में इस अमानवीय कृत्य की मौजूदगी है जिसकी चर्चा या विरोध करने योग्य जागरूकता का अभाव है ।

इसी दुनिया के कुछ हिस्सों में स्त्री के सी स्पॉट व जी स्पॉट के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व के प्रति जागरूकता का माहौल दिखाई देता है । जिस दुनिया में स्त्री के हस्तमैथुन करने को पुरुष के हस्तमैथुन के समान ही सामाजिक मान्यता दिए जाने योग्य जागरूकता बन रही हो ; उसी दुनिया में स्त्रियों की आबादी का एक बहुत बड़ा हिस्सा अपने यौनांग़ों को अपनी देह से अलग किए जाने की त्रासदी का शिकार है । स्वीडन में स्त्री के क्लिटोरिअस के यौनानंद की प्रक्रिया में महत्त्व को स्थापित करते हुए “क्लिटरा” जैसी शब्दाभिव्यक्तियां बनाई गई हैं वहीं दूसरी ओर यूनीसेफ के द्वारा जारी किए आंकड़े ‘ यौनानंद की उत्पत्ति की स्थली : क्लीटोरिअस ‘ को स्त्री की देह से अलग करने वाले इस नृशंस कृत्य की मौजूदगी का रहे
स्त्री के बाहरी यौनांग यानि भग्नासा को स्त्री देह के एक गैरजरूरी , मेस्क्यूलिन और बदसूरत अंग के रूप में देखने की बीमार मानसिकता का असल यह है कि पितृसत्ता को इस अंग से सीधा खतरा है । इस अंग के माध्यम से महसूस किया गया यौनानंद स्त्री को उन्मुक्त यौनाचरण के लिए प्रेरित कर सकता है जिससे समाज के स्थायित्व को एक बड़ा खतरा होता है । नैतिकता और यौनाचरण को बनाए रखने में ही सामाजिक संरचनाओं का स्थायित्व व उपलब्धि है । यह स्त्री की देह के प्रति उपनिवेशवादी नजरिया है जिसका सीधा मंतव्य यह भी है स्त्री केवल प्रजनन के लिए है अत: उसका गर्भाशय तो वांछित है किंतु वह यौनानंद प्राप्त करने की हकदार नहीं है इसलिए उसके बाह्य यौनानंग अवांछित हैं । इस तरह से स्त्री की समस्त देह पुरुष के आनंद के लिए और सम्पत्ति के उत्तराधिकारी को जन्म देकर पितृसत्ता को पुखता करने के लिए काम आती है । उसकी देह का केवल वही हिस्सा पितृसत्ता को अखरता है जिससे पितृसत्ता को कोई लाभ नहीं वरन हानि ही हानि है । स्त्री के यौनिक आनंद को गैरजरूरी और असंभव बनाने के इरादे भर से संवेदन तंत्रियों से भरे उस अंग को देह से विलग करने के पीछे दंभी पितृसत्ता को बनाए रखने की सोची समझी पुरानी साजिश है । इस साजिश को तरह तरह के आवरणों में सजाकर स्त्री को इस प्रक्रिया से गुजरने के लिए विवश किया जाता है ।

स्त्री की स्वतंत्रता और अस्मिता का एक बहुत जरूरी अर्थ स्त्री की दैहिक व यौनिक आजादी से है । दरअसल हमारे समाज में स्त्री स्वातंत्रय और स्त्री की सेक्सुएलिटी को एकदम दो अलग बातें मान लिया गया है ! पुरुष की सेक्सुएलिटी हमारे यहां हमेशा से मान्य अवधारणा रही है ! चूंकि पुरुष सत्तात्मक समाज है इसलिए स्त्री की सेक्सुएलिटी को सिरे से खारिज करने का भी अधिकार पुरुषों पास है और और अगर उसे पुरुष शासित समाज मान्यता देता भी है तो उसको अपने तरीके से अपने ही लिए एप्रोप्रिएट कर लेता है ! जिस दैहिक पवित्रता के कोकून में स्त्री को बांधा गया है वह पुरुष शासित समाज की ही तो साजिश है ! यह पूरी साजिश एक ओर पुरुष को खुली यौनिक आजादी देती है तो दूसरी ओर स्त्री को मर्यादा और नैतिकता के बंधनों में बांधकर हमारे समाज के ढांचे का संतुलन कायम रखती है ! स्त्री दोहरे अन्याय का शिकार है- पहला अन्याय प्राकृतिक है तो दूसरा मानव निर्मित ! ! कोई भी सामाजिक संरचना उसके फेवर में नहीं है क्योंकि सभी संरचनाओं पर पुरुष काबिज है ! दरअसल स्त्री के अस्तित्व की लड़ाई तो अभी बहुत बेसिक और मानवीय हकों के लिए है । सेक्सुअल आइसेंटिटी और उसको एक्स्प्रेस करने की लड़ाई तो उसकी कल्पना तक में भी नहीं आई है ! अपनी देह और उसकी आजादी की लड़ाई के जोखिम उठाने के लिए पहले इसकी जरूरत और इसकी रियलाइजेशन तो आए ! हमारा स्त्री-समाज तो इस नजर से अभी बहुत पुरातन है ! स्त्री के सेक्सुअल सेल्फ की पाश्चात्य अवधारणा अभी तो आंदोलनों के जरिए वहां भी निर्मिति के दौर में ही है, हमारा देश तो अभी अक्षत योनि को कुंवारी देवी बनाकर पूजने में लगा है ! एसे में शेफाली जरीवाला अपनी कमर में पोर्न पत्रिका खोंसे उन्मुक्त यौन व्यवहार की उद्दाम इच्छा का संकेत देती ब्वाय प्रेंड के साथ डेटिंग करती दिखती है तो इससे हमारे पुरुष समाज का आनंद दुगना होता है उसे स्त्री की यौन अधिकारों और यौन अस्मिता की मांग के रूप में थोड़े ही देखा जाता है । लेकिन पर्दे की काल्पनिक दुनिया के बाहर का सामाजिक यथार्थ में स्त्री के लिए न केवल आनंद के सारे द्वार बंद हैं बल्कि स्त्री की देह के सामाजिक नियंत्रण और शोषण के तमाम विकृतियां बदस्तूर जारी हैं ।

स्त्री समाज की आबादी के एक बड़े हिस्से को यौन दासी के रूप में बदल देने वाली अन्य परम्पराओं के साथ साथ स्त्री यौनांगों के खतना जैसी अतिचारी अमानवीय प्रक्रिया को जल्द से जल्द समाप्त किए जाने की आवश्यकता है । इस तरह की कबीलाई मानसिकता की वाहक प्रथाओं की जड़ में स्त्री के प्रति उपेक्षा गैरबराबरी और गैरइंसानी रवैये को मिलती रहने वाली सामाजिक स्वीकृति है । स्त्री की यौनिकता के सवालों से बचकर भागते समाज को शीध्र ही स्त्री के मानवाधिकारों में उसकी दैहिक – यौनिक उपस्थिति को ससम्मान तरजीह देने का उपक्रम शुरू कर देना चाहिए । उम्मीद है कि नाइजीरिया के द्वारा लिए गए इस ताज़ा वैधानिक फैसले के प्रकाश में दुनिया के दूसरे देशों में भी स्त्री के मौलिक अधिकारों के प्रति चेतना आएगी ।

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    By: नीलिमा चौहान

    सहायक प्रोफ़ेसर, दिल्ली विश्वविद्यालय

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4 Responses

  1. Dr K.S. Bhardwaj

    स्त्री तरह तरह के अत्याचार चुपचाप सहती रही है। महिलाओं का खतना भी उन्हीं में से एक है। एक देश ने इसे कानूनन समाप्त किया, प्रसन्नता हुई। आलेख जानकारी पूर्ण है। लेखिका को बधाई।॰

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  2. Sudhanshu Shekhar Trivedi

    स्त्री शक्ति के साथ ऐसा जहाँ भी हो रहा है बिल्कुल गलत है ।

    पर निहायत शर्म की बात है कि पूरा आलेख केवल शाब्दिक विलासिता मात्र है । यह अंतर्राष्ट्रीय समुदाय को संबोधित एक बुनावट है जिसमें यह दर्शाने की चेष्टा है कि लेखिका रुई धुनने की कला में पारंगत है । उसे यह मालूम है कि भारत में भी यह घटना हो रही है मगर यह बताने में वह संकोच और शर्म से दब जाती है कौन है वो लोग / कहाँ हैं । उसे भगनाशा / योनि / स्खलन इत्यादि शब्दों का प्रयोग करते हुये शौर्य महसूस होता है पर गलित लोगों की प्रत्यक्ष चर्चा करने में डर जाती है । क्या यही नारीवादी मुक्ति कामना है ? क्या ऐसे ही प्रलाप की चेष्टा की श्रेणी साहित्य है ? धिक्कार ।

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  3. Krishna Pandey

    इस तरह की घटनाएं,अत्याचार यदि महिलाओं के ऊपर भारत में हो रही हैं तो निसंदेह गलत है। सेक्स करना हर इंसान की शारीरक और मानसिक जरूरत है। हाँ ये सही है कि सेक्सुअल आज़ादी का एकाधिकार सिर्फ पुरुष समाज ने अपने कब्जे में कर रखा है और अपने सुविधानुसार उस अधिकार का इस्तेमाल भी करता है। किन्तु औरतों की खतना वाले घटना में शामिल पुरुष निसंदेह भर्त्सना के पात्र है जिनको उचित सजा मिलना जरूरी है। मुझे लगता है कि यदि भारत में ये घटना हो रही है तो उसको उजागर करने की जरूरत है ताकि उसके खिलाफ अवाम आवाज़ उठा सके।

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  4. Tarawati Agarwal

    Unless and until all the facts about this particular trend are studied at length,all discussions are vague… women liberation as a basic issue should be discussed and understood under a complete understanding of different nature of men and women

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