हिन्दी की पुस्तकों के पीछे जैसे पागल था मैं! पुस्तक-महल से छपी पुस्तक ’संसार के 501 अद्भुत आश्चर्य’ जब बैकुण्ठपुर के बस-स्टैंड की पुस्तक-दुकान पर बिकने आई, तो उसे महीनों तक दुकान के सामने खड़े होकर निहारता रहा व उसके भीतर छिपे आश्चर्यों की कल्पना किया करता था। घर से तो पैसे मिलते नहीं, सो किसी प्रकार यहाँ-वहाँ से पैसे जुगाड़ कर कई माह पश्चात् उस पुस्तक को खरीद पाया। जब तक पैसे इकट्ठे नहीं हुए, मैं दुकान में देख-देख कर अपने आपको आश्वस्त करता रहा कि कहीं वह पुस्तक बिक तो नहीं गई।….

ए गुड सेकेण्ड बॉय

                 (भाग-1)padmnabh-gautam-alang-1

इससे पहले कि पाठक आगे बढ़ें, अग्रलिखित से संक्षिप्त परिचय कराना आवश्यक समझता हूँ। यह संस्मरण वस्तुतः पढ़ाई नाम के दानव के साथ मेरे जूझने की दास्तान है। कह लीजिए, यह मुझ जैसे उन लाखों लड़कों की दास्तान है, जो मूल रूप से पढ़ने के लिए नही बने थे। या फिर यदि पढ़ना उनकी नियति थी, तब वे उन हनुमान की तरह थे, जिन्हें अपनी क्षमता का ज्ञान ही नहीं था। औसत बुद्धि के छात्र, जिन्हें पढ़ने में, या कह लीजिए कि लार्ड मैकाले की छोड़ी शिक्षा पद्धति पर जरा भी यकीन नही होता है, किंतु जो लोक-लाज, मान-मर्यादा वगैरह के नाते पढ़ लेते हैं, यह ऐसे छात्रों में से एक का अतीत है। उम्र के वह अठारह वर्षों का संस्मरण जो मैंने पढ़ाई नाम के गोलियथ से जूझने में लगाये। इसे औसत बुद्धि (मंद ही कह लीजिए) की गुलेल लेकर गोलियथ को परास्त करने उतरे डेविड की गाथा समझ लीजिए।
ईमानदारी से कहूँ तो पढ़ना मुझे कभी रुचिकर लगा ही नहीं। कम से कम इंटर तक तो ऐसा ही था। यहां पढ़ने से तात्पर्य है विज्ञान, गणित, सामाजिक-विज्ञान व संस्कृत विषयों का अध्ययन। बचपन में मुझे केवल हिन्दी पढ़ना ही अच्छा लगता था, हिन्दी की किताबों में छपी किस्से-कहानियों की वजह से! साथ ही अंग्रेजी सीखने की भी हार्दिक इच्छा थी, क्योंकि तब प्राथमिक विद्यालयों में अंग्रेजी पढ़ाने का प्रावधान नहीं था। अंग्रेजी माध्यम से शिक्षा देने वाले केन्द्रीय विद्यालय के बच्चों को देख कर मन में हीन भावना उत्पन्न होती। लोग केन्द्रीय विद्यालय के बच्चों को प्रशंसा की दृष्टि से देखते तो मन में जलन होती। बचपन में ही मन में अंग्रेजी भाषा के प्रति एक अजीब सा लगाव हो गया। तब से ही हृदय में अंग्रेजी सीखने की अदम्य लालसा घर कर गई। कह लीजिए कि यह मैंने अपने जीवन में कुछ विशेष रूप से सीखना चाहा, निष्काम भाव से, अधिकार करने की नीयत से, तो वह अंग्रेजी भाषा ही रही। जिसे मैं आज भी सीखता हूं, अनवरत्।
तो कह लीजिए कि शुरुआती पढ़ाई में मुझे हिन्दी पढ़ना ही सर्वाधिक प्रिय था तथा जब मैं प्राथमिक पाठशाला में ही था, भाई-बहनों की मैट्रिक तक की हिन्दी की समस्त पाठ्य-पुस्तकें पढ़ चुका था। माध्यमिक विद्यालय की पढ़ाई पूर्ण होते तक प्रायवेट परीक्षार्थी के रूप में पढ़ाई कर रहीं अम्मा के हिन्दी-स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम की समस्त कहानियाँ व उपन्यास पढ़ चुका था। बारह वर्ष की उम्र में ही मैंने प्रेमचन्द के मानसरोवर के समस्त भागों की कहानियों को पढ़ चुकने के अतिरिक्त अमृतलाल नागर जी के ’नाच्यौ बहुत गोपाल’ जैसे उपन्यासों का भी आस्वादन कर लिया था। इसी वय में एक दिन ”कायाकल्प” पढ़ते पाए जाने पर पिता जी ने ठीक-ठाक गाली दी और उपन्यास छीन कर रख दिया। जाने क्यों, पता नही! फिर मुझे कभी कायाकल्प पढ़ने का अवसर नही मिला। हो सके तो आप पाठक बता देंगे।

पाठ्य-पुस्तकों के अतिरिक्त गृहशोभा, मनोरमा, सरिता, मुक्ता, समाचार-पत्रों के साप्ताहिक रंगीन परिशिष्ट, धर्मयुग व साप्ताहिक-हिन्दुस्तान में प्रकाशित कहानियाँ, लघुकथाएँ, आलेख इत्यादि जो कुछ भी कागज पर छपा मिल जाए, उसे पढ़ डालता था। हाँ, मुझे हिन्दी की कविताएँ अवश्य नहीं भाती थीं, न ही वे मुझे जरा भी समझ ही आतीं। चूँकि पिताजी के द्वारा चित्रकथा व बाल-उपन्यास इत्यादि खरीदने की सख्त मनाही थी, इस लिए सबसे छिपा कर चित्रकथाएँ व एस.सी.बेदी के राजन-इकबाल सीरीज़ के जासूसी बाल-उपन्यास खरीद कर लाता था। घर में जेब-खर्च दिए जाने का प्रावधान नहीं था, अतः रिश्तेदारों से मिली विदाई इत्यादि की रकम से बाल-साहित्य खरीदता। पकड़ा जाता तो पिता की डाँट खाने के साथ-साथ बिना पढ़ी चित्रकथाएँ आधे दामों पर लौटानी पड़तीं, बच जाता तो रजाई में टॉर्च की रोशनी में या खलिहान में पुआल के ढेर के पीछे छिपकर चित्रकथाओं का आनंद उठाता। हम चित्रकथाएँ किराए पर लाकर भी पढ़ते थे।
हिन्दी की पुस्तकों के पीछे जैसे पागल था मैं! पुस्तक-महल से छपी पुस्तक ’संसार के 501 अद्भुत आश्चर्य’ जब बैकुण्ठपुर के बस-स्टैंड की पुस्तक-दुकान पर बिकने आई, तो उसे महीनों तक दुकान के सामने खड़े होकर निहारता रहा व उसके भीतर छिपे आश्चर्यों की कल्पना किया करता था। घर से तो पैसे मिलते नहीं, सो किसी प्रकार यहाँ-वहाँ से पैसे जुगाड़ कर कई माह पश्चात् उस पुस्तक को खरीद पाया। जब तक पैसे इकट्ठे नहीं हुए, मैं दुकान में देख-देख कर अपने आपको आश्वस्त करता रहा कि कहीं वह पुस्तक बिक तो नहीं गई। उसी पुस्तक में मैंने पढ़ा कि संसार का सबसे लम्बा आदमी पाकिस्तान का नागरिक मुहम्मद आलम चन्ना है, सियामी जुड़वाँ भाइयों के सर अलग हैं किंतु बाकी का शरीर एक तथा यह कि जूलिया पास्ट्राना संसार की सबसे बदसूरत महिला कहलाती थी, जिसे नुमाइश में दिखा कर उसका पति पैसे कमाया करता था।
पुस्तकों के प्रति मेरा प्रेम देख कर हमारे कस्बे की इकलौती पुस्तक-दुकान के संचालक ने मुझे अपनी सहायता करने के एवज में दुकान पर बैठकर पुस्तकें पढ़ने की अनुमति दे दी थी। अब वह मुझे दुकान पर छोड़ कर अपने दूसरे काम सम्भालता तथा मैं पुस्तकें बिक्री कर उनका हिसाब रखता व इसके एवज में मुफ्त में पुस्तकें पढ़ने का आनंद उठाता। हिन्दी के ही साथ-साथ मुझे अंग्रेजी पढ़ने की भी चाह थी, परंतु विश्वविद्यालय पहँचने के पूर्व तक वह जी भर कर पूरी नहीं हो पाई। हिन्दी माध्यम से पढ़ने के कारण, जिसमें कि छठवीं कक्षा के पूर्व अंग्रेजी की वर्णमाला भी नहीं पढ़ाई जाती थी, अंग्रेजी को शौक से पढ़ना एक सपना ही था। फिर भी लगाव के कारण कुछ अंग्रेजी तो मैं पढ़ ही गया था। बचपन में जब मुझे अंग्रेजी की पाठ्य-पुस्तकों की कहानियाँ समझ में नहीं आतीं, तब मैं उन पुस्तकों की कुंजियाँ पढ़ता, जिनमें मुझे कहानियों के शब्दशः हिन्दी अनुवाद मिल जाते। उन्हीं कुजियों के माध्यम से मैंने खुशवन्त सिंह जैसे लेखकों की कहानियाँ पढ़ीं। इन दो विषयों के अतिरिक्त मुझे अपने बचपन में अन्य किसी विषय से कोई लगाव नहीं था।
अपने व विद्यालय के मध्य के संबंध की बात करूँ तो मुझे विद्यालय जाना कभी अच्छा ही नहीं लगा। बचपन में मुझे किसी तरह से ढो-टाँग कर विद्यालय पहुँचाया जाता था। ताड़ना-प्रताड़ना, लोभ-प्रलोभन का एक पूरा अध्याय है जो मुझे विद्यालय भेजने के संबंध में लिखा जा सकता है। विद्यालय में मुझे हिन्दी के अतिरिक्त अन्य कोई भी विषय अधिक समझ में नहीं आता था। हिन्दी की कक्षा के अतिरिक्त विद्यालय का बाकी समय मेरे लिए कैदखाने से कम नहीं होता। मास्टर साहब जो कुछ भी पढ़ाते, वह सर के ऊपर से गुजर जाता तथा मैं उस समय अपनी ही दुनिया में खोया रहता, एक कल्पना लोक में। शिक्षक श्यामपट पर लिखते जाते व मैं उनको निर्विकार भाव से ताकता रहता। मेरी कापियाँ भी कभी पूरी नहीं रहतीं। शिक्षकों ने भी जैसे अन्य विषयों में मुझे दूध-भात दे रखा था।

बस, हिन्दी के लिए पूरे विद्यालय में मेरा नाम था। यहाँ तक कि बड़ी कक्षाओं के शिक्षक गण भी मेरी हिन्दी का परीक्षण करते व मुझे निरूत्तर करके प्रसन्न होते। मुझे याद है जब मैं तीसरी कक्षा में था, तब पाँचवीं कक्षा के शिक्षक सुबोध चन्द्र गुप्त ने मुझे बुलाकर मुहावरों का वाक्यों में प्रयोग पूछा। वह शिक्षक विजयी भाव से मुस्कुराए जब मुझसे एक मुहावरे ’बस न चलना’ का वाक्यों में प्रयोग नहीं बन पाया। यह प्राथमिक पाठशाला में हिन्दी के उन इने-गिने प्रश्नों में से एक था, जिसका मैं अपने शिक्षक को उत्तर नहीं दे पाया था। लेकिन हिन्दी-व्याकरण से मेरा कोई लेना-देना नहीं था। संज्ञा के आगे सर्वनाम मुझे कभी भी समझ नहीं आया; संज्ञा के प्रकार भी मुझे कभी समझ नहीं आए। शेष व्याकरण तो बड़ी दूर की बात थी। व्याकरण का जो भी ज्ञान मुझे मिला, वह स्वतःस्फूर्त पठन-अभ्यास से अर्जित ज्ञान ही था। हिन्दी के अतिरिक्त अन्य विषयों में मुझे पढ़ाए गए का अधिकांश समझ में ही नहीं आता था। जैसे गणित में कुछ सरल बातें यथा जोड़, घटाव, गुणा, भाग व महत्तम समापवर्तक इत्यादि तो थोड़ा-बहुत समझ में आ भी जाते, किंतु भिन्न और लघुत्तम समापवर्तक जैसी बलाएँ सदा सिर के उपर से ही निकलती रहीं।
लघुत्तम समापवर्तक, चक्रवृद्धि ब्याज व भिन्न जैसे खतरनाक प्रेतों के मध्य, यदि मुझे हिन्दी के अतिरिक्त कुछ अन्य भी अच्छा लगता, तो वह थीं हमारी कक्षा शिक्षिका श्रीमती पार्वती जायसवाल, जिन्हें सभी बचिया बहिनजी बुलाते थे। परंतु बचिया बहिनजी मुझे इस लिए अच्छी नहीं लगती थीं कि उनका पढ़ाया मुझे पसंद था, अपितु वह इस लिए कि रोज दोपहर डेढ़ बजे खाने की घंटी पर मैं उनके पास जाता तथा टिफिन न लाने का बहाना कर छुट्टी माँगता और वे अविचल भाव से कह देतीं-’जाओ’। यह झूठ बोलते समय मेरे सफेद कपड़े के लम्बे से झोले में (तब आज की तरह महँगे स्कूल-बैगों का प्रचलन नहीं था/यदि था, तो उसे खरीदने की हमारी हैसियत नहीं थी)

घर से दिया हुआ टिफिन उपस्थित रहता, जिसे मैं टाँगों के पीछे छिपा लिया करता। फिर छोटी कक्षा के एक विद्यार्थी, जिसका नाम गामा था, के साथ विद्यालय से भाग कर होकर मैं बैकुण्ठपुर के पास के गाँव धौरा-टिकुरा अपनी नानी के घर पहुँच जाता। वहाँ हम पूरा अपरान्ह आम के पेड़ों पर खेलते हुए हुए बिताते। मामा तो घर पर होते नहीं और सीधी-सादी मामी ने कभी भी अम्माँ के पास शिकायत नहीं की हमारी। हम मामा के घर पर लगी दीवार घड़ी देखते तथा छुट्टी के समय ठीक पौने पाँच बजे घर पहुँच जाते। चूँकि विद्यालय में अपरान्ह की उपस्थिति दर्ज किए जाने का प्रावधान नहीं था, अतः हमारी आधे दिन की अनुपस्थिति अनुशासनप्रिय प्रधान-पाठक स्व.शंकर लाल गुप्ता जी के पास कभी पहुँच ही नहीं पाती। अपने-आप में ही मगन रहने वाली बचिया बहिनजी के द्वारा तो शिकायत करने का प्रश्न ही नहीं था। महीनों तक भोजनावकाश के पश्चात् विद्यालय से फरार रहने पर भी कभी घर तक शिकायत नहीं पहुँची, इसलिए बचिया बहिनजी आज भी मुझे बहुत अच्छी लगती हैं।
जिस तरह का विद्यालय के प्रति मेरा प्रेम व विषयों के प्रति रूझान रहा, वैसे ही अंक भी आया करते। छोटी कक्षाओं में कभी प्रथम श्रेणी उत्तीर्ण हुआ होऊँ, ऐसी याद कम ही है। अम्मा ने मेरी स्थिति देख कर घर पर ट्यूशन लगा दिया था। किंतु जो भी शिक्षक ट्यूशन पढ़ाने आते, वह हमारी शरारतों के कारण एक-डेढ़ महीने से अधिक नहीं टिक पाते। फिर भी हम परीक्षाओं में पास अवश्य हो जाते। हालाँकि बचपन का एक रहस्य मुझे आज तक समझ में नहीं आया।

वह यह, कि वर्ष भर मटरगश्ती करने के पश्चात् भी जब मैं वार्षिक परीक्षा में परचा लिख कर बाहर आता तो ऐसा लगता जैसे मुझे सौ में सौ अंक मिलेंगे। प्रत्येक विषय के परचे में मुझे यही विश्वास होता। किंतु जब परीक्षा का परिणाम आता, तो ढाक के वही तीन पात, सेकेण्ड डिवीजन में कक्षा उत्तीर्ण। समझ में ही नहीं आता कि गलती हुई कहाँ। विद्यालय में उत्तर-पुस्तिकाएँ दिखाने व अभिभावक से हस्ताक्षर कराने जैसा कोई प्रावधान नहीं था। मुझे आज की कुछ माताओं को देख कर आश्चर्य होता है जो दूसरी-तीसरी के बच्चे की उत्तर-पुस्तिका में कटे एक-एक अंक हेतु शिक्षकों से उलझ कर अंक बढ़वा लेती हैं। मेरे विचार से इस प्रकार एक-आध अंक बढ़वाकर बच्चे का भविष्य तो क्या उज्जवल होता होगा, उल्टे उनमें असहिष्णुता व स्वार्थ की प्रवित्ति ही को ही बढ़ावा मिलता है।
इस प्रकार सेकेण्ड डिवीजन से उत्तीर्ण होते हुए, छत्तीसगढ़ के कोरिया जिले के मुख्यालय बैकुण्ठपुर की सबसे नामचीन प्राथमिक विद्यालय ’अभ्यास शाला’ (पुराना नाम नार्मल स्कूल) से प्राथमिक शिक्षा पूरी कर के मैंने नगर के इकलौते बालक उच्चतर माध्यमिक विद्यालय ’शासकीय आदर्श रामानुज उच्चतर माध्यमिक विद्यालय’ में प्रवेश ले लिया। रामानुज विद्यालय में छठी कक्षा से आगे पढ़ाई करने का अलग ही रोमांच था। विद्यालय में सुबह की पाली में माध्यमिक कक्षाएँ लगतीं। अब मुझे विद्यालय से भागने की आवश्यकता नहीं थी, क्यों कि हमारा विद्यालय सुबह साढ़े सात बजे आरम्भ हो कर साढ़े ग्यारह बजे ही पूर्णावकाश हो जाता। कुल चार घण्टे का विद्यालय था। बाकी का दिन खेलने-कूदने, गेज नदी और मिशन तालाब जाकर नहाने, बेर-अमरूद तोड़ने तथा पुस्तक-दुकान पर चित्रकथाएँ पढ़ने के लिए पर्याप्त था। मुझे याद नहीं कि मैंने कभी गृहकार्य किया भी या नहीं। जहाँ तक याद है, माध्यमिक शाला में शिक्षक गृहकार्य देते ही नहीं थे। शिक्षक यदा-कदा पिटाई कर देते, किंतु उस जमाने में शिक्षकों के द्वारा ठुकाई को एक पुनीत कार्य ही माना जाता- ’गुरु कुम्हार शिशु कुम्भ है’ की तर्ज पर, अर्थात् शिकायत करने पर हम स्वयं ही सन्देह के घेरे में आ जाते।
हमारी पढ़ाई का स्तर देखकर अम्मा की अनुशंसा पर एक दिन पिता जी ट्यूशन के लिए एक शिक्षक राजेन्द्र शुक्ल को लेकर आए। हमने उन्हें भी शरारतें करके दफा करने का पूरा जाल बिछाया, किंतु वे शिक्षक तो अंगद के पाँव निकले। उन पर हमारी शरारतों का कोई असर ही नहीं पड़ा। इसके विपरीत वेे घर पर हमारी लायसेंसशुदा ठुकाई अलग करते। किंतु राजेन्द्र गुरुजी पढ़ाते बढ़िया थे। तो उनकी कृपा से हम भाई-बहिन अधिकांशतः पचास से साठ प्रतिशत के मध्य अंक प्राप्त कर अपनी-अपनी कक्षाओं में उत्तीर्ण होते रहे। जब कभी अंक-सूची पचपन प्रतिशत से ऊपर का आँकड़ा दिखाती, तब मुँगौड़ी-जलेबी मँगाकर खिलाए जाते तथा उत्साहवर्द्धन हेतु कहा जाता-’तुम ’गुड-सेकेण्ड’ आये हो, और अच्छा करने का प्रयत्न करोे’। लेकिन मैं इण्टर तक की पढ़ाई में, कठिनाई से एक-दो बार ही, नकल वगैरह मार कर ही प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण हुआ; इसके अतिरिक्त प्रथम श्रेणी को तरस गया। हमारा यह गुड सैकिण्ड पत्थर की सिल पर पड़ा निशान था, जहाँ रस्सी राजेन्द्र गुरुजी घिसते तथा शिला होता हमारा दिमाग।

कक्षा में हमारे साथ राजेश पटेल, हर्ष श्रीवास्तव जैसे कुछ मेधावी छात्र भी हुआ करते, जो असंभव प्रतीत होते प्रश्नों का हल चुटकियों में निकाल देते थे। हमें आश्चर्य भी होता, हम उनकी तारीफ भी करते, तथा उनसे जलते भी। परंतु शिक्षक हमारे जैसे बच्चों को भी अधिक नापसंद नहीं करते थे। वह इस लिए, क्यों कि हम उर्जा से भरपूर बच्चे थे, जो शैक्षणेतर गतिविधियों में बढ़-चढ़ कर भाग लेते थे। स्कूल में नाटक-गीत, वाद-विवाद, भाषण प्रतियोगिता, स्काउट, एन.सी.सी., खेल-कूद अर्थात् लगभग समस्त सह-शैक्षणिक गतिविधियों में हम सहभागी होते। किशोरावस्था पहुँचते तक मैं स्काउट का राष्ट्रीय कैम्प कर आया था व एन.सी.सी. के कैम्प में जाकर कम उम्र में ही बाहर की दुनिया सीख ली थी। हाँ, पढ़ाई का वह रहस्य अब भी रहस्य बना हुआ था; जब भी मैं परीक्षा में परचा हल कर बाहर निकलता तो प्रतीत होता कि इसमें सौ में से पूरे सौ अंक आएँगे, पर जाने कैसे अंक आधे ही रह जाते, बहुत हुआ तो गुड-सेकेण्ड मिल जाता।
हाई-स्कूल की पढ़ाई पचास प्रतिशत से कुछ अधिक अंकों के साथ उत्तीर्ण करने पर अम्मा ने कहा कि मैं गणित लेकर पढूँ। गणित के साथ भौतिकी और रसायन भी। पहले-पहल तो मन में उल्लास था; युगबोध प्रकाशन की इन विषयों की मोटी-मोटी किलो भर की पाठ्य-पुस्तकों को सामने रख कर बड़ा गर्व महसूस होता। परंतु कुछ दिनों तक गणित पढ़ने के पश्चात् आँखों के सामने अंधेरा छाने लगा। कहाँ हाई-स्कूल तक तो त्रिकोणमिति व अलजेबरा ही अबूझ लगते थे, और अब तो गणित में से अंक जैसे पूरी तरह से गायब थे तथा इनके स्थान पर केवल अंग्रेजी के छोटे अक्षरों में लिखे विचित्र प्रकार के बहुपदों व श्रेणी इत्यादि ने ले ली थी। इसके साथ-साथ ही रसायन-शास्त्र भी था, जिसमें अकार्बनिक रसायन तो जैसे महाभारत का चक्रव्यूह था (जिसे हम कभी भेद भी न पाए)! तो यहाँ भी मुझे श्याम-पट पर चिड़िया, कौवे, किस्से-कहानी, वेताल-मैण्ड्रेक इत्यादि दिखने लगे। थोड़ा बहुत भौतिकी का ही सहारा था, जिसमें कुछ तो गद्यांश होते। हारकर मैंने अम्मा से अनुनय-विनय की, कि यह गणित मुझे समझ में नहीं आती, मुझे वाणिज्य पढ़ने दीजिये। वाणिज्य उस समय गुड-सेकेण्ड विद्यार्थियों की शरणस्थली थी। कला पढ़ने के अपमान व विज्ञान पढ़ने की प्रताड़ना से बचने का सहारा। परंतु अम्मा नहीं मानीं। पिताजी स्वर्गवासी चुके थे व अब अम्मा के ऊपर ही मेरे भविष्य की जिम्मेदारी थी। मेरे अधिक घिघियाने पर कहा कि जो मन में आए वह करो, मैं कुछ नहीं जानती। अंततः ’इमोशनल ब्लैकमेलिंग’ ने मुझे परास्त कर गणित की पढ़ाई जारी रखने को मजबूर कर दिया।
अब मेरी नियति में रसायन व गणित की रस्सी को अपने दिमाग की सिल पर घिसना था। कुछ शरारती संगी-साथियों के साथ विभिन्न शिक्षकों के घर पर ट्यूशन पढ़ते हुए, जो कि औसतन दो-तीन महीनों में ही हमारी शरारतों और बदतमीजियों से त्रस्त होकर हमें भगा दिया करते तथा किसी तरह थीटा-बीटा-गामा रटते व आवर्त सारणी को घांटे कर पीते हुए एक दिन सत्तावन प्रतिशत अंकों के साथ गुड-सेकेण्ड में ही इण्टर भी फतह हो गया। मुझे लगता है कि शिक्षक हम जैसे गुड-सेकेण्ड लड़कों की उत्तर-पुस्तिकाएँ सूँघकर ही पहचान लेते थे। दो-तीन प्रतिशत अंक और मिल जाएँ तो प्रथम श्रेणी बन जाती है। परंतु वे तो जैसे जान जाते हैं कि ’द राइटर इज़ ए गुड-सेकेण्ड बॉय- डिजर्विंग समथिंग बिटवीन फिफ्टी फाइव एण्ड सिक्सटी’।
इण्टर के पश्चात् मुझे विज्ञान-स्नातक उपाधि पाठ्यक्रम हेतु मध्य-प्रदेश के रीवा शहर के प्रतिष्ठित स्वशासी विज्ञान महाविद्यालय भेज दिया गया। वहाँ मैंने भूगर्भ-शास्त्र चुनकर रसायन-शास्त्र से तो अपना पिंड छुड़ा लिया था। अम्मा के मन में भी कम से कम रसायन-शास्त्र हेतु कोई पूर्वाग्रह नहीं था। साथ ही अब तक गणित का भूत काबू भले ही न आ पाया हो, कुछ हद तक मन से उसका भय अवश्य दूर हो गया था। भौतिकी अब भी मेरा प्रिय विषय था। ऐसा प्रतीत होता है कि प्रत्येक शैक्षणिक पाठ्यक्रम में शिक्षाशास्त्री कुछ ऐसा प्रावधान रखते हैं, जिसमें अनुत्तीर्ण होने वाला विद्यार्थी अनुत्तीर्ण हो कर रसातल में चला जाए, तृतीय व द्वितीय श्रेणी वाले अपना खेत-खलिहान पक्का कर लें तथा प्रथम श्रेणी व मेरिट वाले अपने बुर्जों-मीनारों पर चढ़ जाएँ। तो उस हिसाब से, यदि गणित के तीन भागों में से एक ’डिफरेंशियल कैलकुलस’ देख कर मेरे प्राण सूखते, तब ’डिस्क्रीट मैथमेटिक्स’ व सांख्यिकी जैसे बोधगम्य विषय मुझे ढाढ़स बंधाते- ’भयभीत मत होओ वत्स, गुड-सेकेण्ड तो मिल ही जाएगा’।

उस समय माना जाता था कि जो छात्र बी.एस.सी. के प्रथम वर्ष में उत्तीर्ण हो गया, वह फिर स्नातक होकर ही निकलता था। इस में ’डिफरेंशियल कैलकुलस’ सबसे बड़ा खलनायक था। न जाने कौन-कौन से प्रमेय- टेलर, गॉस, मैक्लारिन के प्रमेय, अजब-गजब की श्रेणियाँ। पढ़ो तो लगता सब समझ में आ गया, लिखो तो सारा गलत। कुल मिला कर प्रथम वर्ष में ’डिफरेंशियल कैलकुलस’ में प्रोफेसर टी.पी. सिंह का कहा एक वाक्य ही समझ पाया था – ’लिमिट टेण्ड्स टू इनफिनिटी’! इस अनंत की पढ़ाई किस लिए की जाती है, इसका मुझे कोई औचित्य समझ में नहीं आता था। मन में प्रश्न उपजता कि व्यावहारिक जीवन में इन सब का महत्व ही क्या है। खैर, जब एक वर्ष की पढ़ाई के पश्चात् परिणाम आया तो जहाँ ’डिफरेंशियल कैलकुलस’ में पचास में से केवल चार अंक मिले थे, वहीं अन्य दो परचों – विविक्त-गणित तथा सांख्यिकी दोनों ही में पचास में से छत्तीस-छत्तीस अंक आए थे। तीनों भागों का औसत ठीक ही रहा। भूगर्भ-शास्त्र व भौतिकी से मुझे तकलीफ नहीं थी, अतः कुल जमा गुड-सेकेण्ड बना रह गया। हाँ, यह सारी पढ़ाई हुई तो बस अपने ही बूते पर, स्वयं ही पुस्तकों को पढ़-समझ कर। किसी शिक्षक का पढ़ाया मुझे अब भी समझ में नही आता था; केवल प्रोफेसर उषा किरण भटनागर के द्वारा पढ़ाई जाने वाली आधार पाठ्यक्रम की अनिवार्य हिन्दी को छोड़ कर। अर्थात् हिन्दी की कक्षा को छोड़ कर, मैं अब भी अपने कल्पनालोक में मस्त रहता था।
काॅलेज का हाॅस्टल छोड़ कर मैंने रीवा शहर से बारह किलोमीटर दूर अलाहाबाद रोड से उत्तर की दिशा में तीन किलोमीटर भीतर स्थित पुरैना गाँव में अपना डेरा जमाया, जो कि मेरी बुआ का गाँव था। वहाँ से मैं अपनी सायकल चलाकर रीवा आता। यह सायकल का सफर और गाँव का जीवन मुझे आनंद में डुबो हुए था। गेंहू के खेत, अमराई-बगीचे, नहर-तालाब, बस मेरा जीवन यहां आवारगी में ही कटता। गाँव में बुआ जी के नाती, बबलू भाई जो कि मेरी ही तरह बी.एस.सी. की पढ़ाई कर रहे थे, उनके साथ मेरी खूब जमती। हम दोनों रातों-दिन मटरगश्ती करते। इस बीच मैं थोड़ा पढ़ भी लेता था। थोड़ा-बहुत पढ़ लेता, और साल पूरा होने पर गुड सेकेण्ड डिवीजन से पास भी हो जाता। बबलू भाई पिछले कई वर्षों से बी.एस.सी. प्रथम वर्ष में ही अटके थे, तथा मेरे स्नातक होते तक भी वे प्रथम वर्ष में ही रहे आए, प्रायवेट परीक्षार्थी के रूप में परीक्षाएं देते हुए। परंतु इससे हमारी मित्रता में जरा भी असर नही पड़ा, कि वह निरंतर मुझसे पीछे होते जाते थे।
मुझे अपने पूरे स्नातक पाठ्यक्रम की पढ़ाई में आगामी तीन वर्षों तक इस गुड-सैकिण्ड से निजात नहीं मिल पाई। जब मैं काॅलेज से पढ़ कर निकला तो मेरी स्नातक की अंक-सूची मुझे जीवन भर का दुख देने को तैयार थी। मैं असल मायनों में गुड-सेकेण्ड था – मुझे कुल ’उनसठ दशमलव सात पाँच’ प्रतिशत अंक मिले थे। अर्थात् ’शून्य दशमलव दो पाँच’ प्रतिशत अंकों की खातिर मैं फिर से गुड-सेकेण्ड रह गया था। आज स्मरण करता हूँ तो प्रतीत होता है कि मेरा प्रारब्ध उन लड़कों से बहुत अच्छा था, जिन्हें मैंने तीसरी कक्षा में ही तीन-तीन बार अनुत्तीर्ण होते हुए देखा था। कई साथी अनुत्तीर्ण होकर पीछे रह गए थे। किसी ने ग्यारहवीं में अनुत्तीर्ण होकर कला या वाणिज्य ले लिया, तो किसी ने इण्टर तक की पढ़ाई पूरी कर के विज्ञान से पिण्ड छुड़ा लिया। कुछ विद्यार्थी थे जो लगातार अच्छा करते रहे, परंतु मेरे बैच से इण्टर करने वाले छात्रों में कुछ ही आगे तक निकल पाए; इनमें से सम्पन्न घरों के वे लड़के ही थे, जिन्होंने डोनेशन के दम पर इंजीनियरिंग में डिप्लोमा या बी.टेक. कर लिया था। फिर भी, केवल तीन अंकों से प्रथम श्रेणी चूक जाने का मुझे अत्यंत दुख था; तीन वर्षों में प्रत्येक वर्ष मुझे बस एक अतिरिक्त अंक चाहिए था, जिससे मैं स्नातक की परीक्षा प्रथम श्रेणी से उत्तीर्ण हो जाता। खैर, इस प्रकार गुड-सेकेण्ड डिवीजन से स्नातक की पढ़ाई पूर्ण करके मैंने रीवा छोड़ दिया।

——– क्रमशः——–

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