बाजार की एक पुरानी पुस्तकों की दुकान पर रद्दी में इन्द्रजाल चित्रकथा के अंग्रेजी संस्करण के सैकड़ों पुराने अंक मिल गए थे। अपने प्रिय पात्र फैण्टम, मैंण्ड्रेक, रिप किर्बी, लोथार व गार्थ जिन्हें मैं हिन्दुस्तान-टाईम्स के हिन्दी संस्करण के रविवारीय परिशष्ट में प्रकाशित रंगीन पट्टियों में पढ़ा करता था, उनकी चित्रकथाओं के यह अंक किसी खजाने से कम नहीं थे। चित्रकथाएँ पढ़ना तो अब भी मेरा शौक ही था, किंतु अब उनके माध्यम से मैं अंग्रेजी पर भी अधिकार बना रहा था। …..

’ए गुड-सेकेण्ड बॉय – भाग-2

मैं, उस नगर की कविता (संस्मरण -भाग एक)

पद्मनाभ गौतम

विज्ञान-स्नातक होने के पश्चात् घरवालों का (जिसमें अब इस दिशा में सोचने वाली अम्माँ ही बचीं थीं) मुझ पर स्नातकोत्तर महाविद्यालय अम्बिकापुर से गणित में स्नात्कोत्तर की उपाधि प्राप्त करने का दबाव था। अम्माँ चाहती थीं कि मैं गणित विषय में स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर गणित का व्याख्याता बनूँ। उनका सोचना सही भी था। उस समय गुड-सेकेण्ड बच्चे जो इंजीनियरिंग के योग्य नहीं हुआ करते, वे स्नातक अथवा स्नातकोत्तर के साथ-साथ शिक्षा-स्नातक (बी.एड.) की पढ़ाई करके शिक्षक बन जाते थे। शेष ट्यूशन इत्यादि पढ़ा कर जीवन ठीक-ठाक चल जाता। आज से बीस वर्षों पूर्व अर्थात् सन् 1995 में रोजगार का विकट संकट था। केवल प्रतियोगी परीक्षाओं को ’क्रैक’ करने वाले इने-गिने उस्तादों तथा रिश्वत खिलाकर अपने आत्मजों के लिए पिछले दरवाजे से दबी-छिपी नौकरियाँ झटक लेने वाले धूर्तों के अतिरिक्त किसी को भी सरकारी नौकरी नहीं मिल रही थी। निजी क्षेत्र में नौकरी करने पर नाम-मात्र का वेतन मिलता तथा वहाँ भी नौकरियों का अभाव ही था। यहाँ तक कहा जाता कि ’सिविल-इंजीनिरिंग पढ़ने से अच्छा है बी.ए. कर के सिविल-सेवाओं की तैयारी करो’ अथवा, ’बी.ए. करोगे तो मास्टरी तो कर सकोगे, सिविल-इंजीनियर तो उसके भी पात्र नहीं’। गणित, विज्ञान तथा अंग्रेजी के शिक्षकों का तब अभाव था व इन विषयों में स्नात्कोत्तर उपाधि प्राप्त करने पर व्याख्याता की नौकरी मिलने की संभावना होती थी। यह सब सोच कर मैंने अम्बिकापुर के शासकीय महाविद्यालय में गणित-स्नातकोत्तर की कक्षा में प्रवेश ले लिया। स्नातक की पढ़ाई के बाद अब तक मेरे दिमाग में अंक-सूची में अंक जुटाने का कुछ हुनर तो आ ही गया था। परंतु कुछ दिनों तक स्नातकोत्तर पूवार्द्ध की गणित (इसमें जिसे सामान्यतः गणित समझा जाता है, वह कहीं थी ही नहीं) पढ़ने के पश्चात् मुझे लगा कि अब यह कष्टदायी होने जा रहा। दूसरे, उसी समय हमारी सरकार ने शिक्षकों के लिए एक नए पद का सृजन किया था, जिसे शिक्षाकर्मी कहा जाता था। स्थानीय नगरीय निकायों से जुड़े इन शिक्षकों को नियमित शिक्षकों की अपेक्षा एक तिहाई वेतन ही प्राप्त होता। नियमित शिक्षकों की भर्ती स्थगित थी। तो अब गणित से स्नातकोत्तर उपाधि प्राप्त कर के शिक्षाकर्मी बनने में अब मुझे कोई सार नहीं दिख रहा था। संयोगवश उसी समय मुझे मध्यप्रदेश के डाॅक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय में व्यावहारिक भूगर्भशास्त्र के त्रिवर्षीय एम.टेक. उपाधि पाठ्यक्रम में प्रवेश मिल गया। उस प्रसिद्ध विश्वविद्यालय में पढ़ने की मेरी पुरानी इच्छा थी, सो मैंने सागर का रूख किया। इस बार अम्मा के विरोध करने पर भी। मुख्य आनंद था गणित से पूरी तरह से पिंड छूटने तथा अपने सपनों के विश्वविद्यालय में पढ़ने का। अब मैंने डाॅक्टर हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय (जिसे पूर्व में आधिकारिक तौर पर ’सागर विश्वविद्यालय’ के नाम से जाना जाता था) जाकर व्यावहारिक भूविज्ञान विषय में एम.टेक. करने का संकल्प कर लिया।
उस समय सागर विश्वविद्यालय के व्यावहारिक भूगर्भशास्त्र विभाग के त्रिवर्षीय एम.टेक. पाठ्यक्रम में प्रवेश मिलना बहुत कठिन था, क्योंकि तब के अविभाजित मध्य-प्रदेश की केवल दो ही संस्थाओं में व्यावहारिक भूगर्भशास्त्र में एम.टेक. उपाधि पाठ्यक्रम उपलब्ध था; एक तो रायपुर के शासकीय अभियांत्रिकी महाविद्यालय में तथा दूसरा सागर विश्वविद्यालय के व्यावहारिक भूगर्भशात्र विभाग में। ’जियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया’ के स्वतंत्रता पूर्व महानिदेशक रहे ब्रिटिश मूल के प्रख्यात भूवैज्ञानिक डाॅ.डब्ल्यू.डी.वेस्ट सागर विश्व-विद्यालय में भूगर्भशास्त्र के प्रथम विभागाध्यक्ष थे। ऐसे प्रसिद्ध भूविज्ञानी के द्वारा विभाग स्थाापित व्यावहारिक भूगर्भशास्त्र विभाग में अध्ययन करना सम्मान का विषय था। विभाग का मान व स्तर ऐसा था कि ’जियोलाॅजिकल सर्वे आॅफ इंडिया’ से लेकर विभिन्न अर्द्ध-सरकारी उपक्रमों में कार्य करने वाले बहुसंख्यक भूगर्भशास्त्री सागर विश्वविद्यालय के ही होते। विभाग में प्रवेश हेतु मारा-मारी होती। प्रतीक्षा-सूची के विश्वविद्यालय छात्रावास के छात्र, मुख्य सूची के बाहरी छात्रों को अगवा तक कर लेते तथा प्रवेश लेने पर मार-पीट की धमकी दे कर ट्रेन में बिठा आते। सह-शैक्षणिक गतिविधियों के लिए मिलने वाले अतिरिक्त अंकों के आधार पर मुझे बीस में से अठारहवें स्थान पर प्रवेश तो मिल गया था, किंतु प्रतीक्षा-सूची के एक छात्र ने मुझे व जबलपुर से आए छात्र अनुराग शर्मा को अगवा करवा लिया, जिससे कि हमारे प्रवेश नहीं लेने से रिक्त हुई सीट पर उसका दाखिला हो सके। बाद में विभाग के एक भेदिए क्लर्क ने सूचना दी कि प्रवेश-सूची में ऊपरी क्रम के एक छात्र ने प्रवेश नहीं लिया है, जिससे प्रतीक्षा-सूची के उस छात्र का भी प्रवेश संभव हो गया। तब जाकर उसके साथियों ने हमें रिहा किया व मेरा प्रवेश संभव हो पाया। दूसरा छात्र अनुराग शर्मा तो इतना भयभीत हो गया कि फिर घर से लौटकर वापस ही नहीं आया। इस प्रकार नाटकीय आरंभ के साथ मैंने सागर विश्वविद्यालय में अपना अध्ययन आरंभ किया।
जब मैं पहली बार पढ़ने के लिए विभाग गया, तब मेरे सामने एक और समस्या मुहँ बाए खड़ी थी। वह समस्या थी अंग्रेजी की। मुझे बचपन से इंटर तक हिन्दी-माध्यम में शिक्षा मिली थी, जो कि स्नातक की पढ़ाई में अंग्रेजी व हिन्दी की मिश्रित भाषा हो गई थी। यहाँ मुझे भारत के सर्वश्रेष्ठ भूविज्ञान अध्ययन केन्दों में से एक, जिसे ”मक्का ऑफ़ जियोलाजी” भी कहा जाता, में अध्ययन करना था। पढ़ाई पूर्णतया अंग्रेजी में होती, जहाँ कोई भी प्रोफेसर हिन्दी में बात ही नहीं करता था।
उस दिन व्यावहारिक भूगर्भशास्त्र विभाग में मेरी पहली कक्षा थी ’टोपोग्राफिक सर्वे’ की, जिसके प्रोफेसर थे डाॅ. प्रकाश पी. रोडे (अब स्वर्गवासी)। डाॅ. रोडे ने अमेरिका की शिकागो यूनिवर्सिटी से विश्वविख्यात् भूविज्ञानी प्रो. रेमसे के निर्देशन में संरचनात्मक भूविज्ञान में शोध किया था। कई वर्षों तक अमेरिका रह कर वापस आए डाॅ. रोडे पाश्चात्य तौर-तरीकों में ढल गए थे। छोटी काठी के दुबली-पतली देह वाले डाॅ. रोडे की बनक अनूठी था। वे ’लेवाइस’ की पाँयचे काटकर नाप में लाई गई जींस पर ब्रांडेड टी शर्ट के साथ बाटा के स्लीपर पहन कर विश्वविद्यालय आते तथा दूसरे प्रोफेसर के व्याख्यान-कक्ष खाली करने तक दरवाजे के बाहर खड़े होकर सिगरेट फूँकते रहते। तो उस पहले दिन कक्षा में डाॅक्टर रोडे ने जब अपनी धारा-प्रवाह अमेरिकन अंग्रेजी में व्याख्यान दिया, उसे सुनकर मेरे तो होश ही उड़ गए। कुछ भी समझ में नहीं आया तथा प्रत्येक प्रसंग के समाप्त होने के पश्चात् मुझे बस रोडे साहब का तकिया कलाम ही सुनाई देता- ’हैंग-आॅन’।
कक्षा से बाहर आकर मुझे रोना आ गया। हिन्दी माध्यम से पढ़े होने के कारण मुझे कुछ भी समझ में नहीं आया था। लगा कि यहाँ अपनी दाल नहीं गलने वाली तथा मैंने यहाँ से पलायन का विचार आरंभ कर दिया। विभाग से बाहर आकर उदास होकर उस वृक्ष के नीचे बैठा था, जिसे विभाग के वरिष्ठ छात्र ’बोधि-वृक्ष’ कहा करते थे। बैठे-बैठे तय किया कि अब यहाँ भी ’हैंग आॅन’। लेकिन तब वहीं साथ बैठी मेरी सहपाठी लीना पांडेय ने मेरी कठिनाई समझ कर ढाढ़स बंधाया तथा कुछ दिनों तक धैर्य रखने को कहा। उसके समझाने पर मुझे कुछ हिम्मत बंधी। चूँकि घर से विरोध कर के आया था, अतः वापस जाने में भी पराजय थी। तो मैंने कुछ रोज रुककर प्रयास करने का विकल्प अपनाया। परंतु समस्या कम नहीं थी; जहाँ कुछ प्रोफेसरों का पढ़ाया थोड़ा-बहुत समझ में आ जाता, वहीं कुछ का पढ़ाया तो सर के उपर से ही निकल जाता। हालाँकि, अब मैं उस प्रकार से अपने कल्पना-लोक में नहीं रहता था, जैसा कि अब तक की पढ़ाई में होता आया था। किसी न किसी प्रकार मुझे अंग्रेजी की समस्या का हल निकालना ही था। तब मैंने कुछ अफ्रीकी लड़कों से मित्रता की जो विश्वविद्यालय में केन्या से आकर पढ़ाई कर रहे थे। उनके साथ मैंने अंग्रेजी बोलने का अभ्यास आरंभ किया। मैं उन्हें चाय के साथ समोसे खिलाता तथा एवज में वे मुझे अंगे्रजी का अभ्यास कराते। मैंने पुस्तकालय जा कर अंग्रेजी के उपन्यास भी पढ़ने आरम्भ कर दिए तथा शनैः-शनैः विश्वविद्यालय के माहौल में ढलने लगा था। बाजार की एक पुरानी पुस्तकों की दुकान पर रद्दी में इन्द्रजाल चित्रकथा के अंग्रेजी संस्करण के सैकड़ों पुराने अंक मिल गए थे। अपने प्रिय पात्र फैण्टम, मैंण्ड्रेक, रिप किर्बी, लोथार व गार्थ जिन्हें मैं हिन्दुस्तान-टाईम्स के हिन्दी संस्करण के रविवारीय परिशष्ट में प्रकाशित रंगीन पट्टियों में पढ़ा करता था, उनकी चित्रकथाओं के यह अंक किसी खजाने से कम नहीं थे। चित्रकथाएँ पढ़ना तो अब भी मेरा शौक ही था, किंतु अब उनके माध्यम से मैं अंग्रेजी पर भी अधिकार बना रहा था।
सागर में तीन वर्षों तक पढ़ाई कर तथा अंग्रेजी में आने वाली कठिनाइयों पर विजय प्राप्त कर के मैंने निरंतर तीन वर्षों तक प्रथम श्रेणी में कक्षाएँ उत्तीर्ण कीं। स्नातक उपाधि में मैंने जो ’दशमलव दो पांँच’ अंकों का धोखा खाया था, वह कटु अनुभव बहुत उपयोगी रहा। विश्वविद्यालय के अपने साथियों से मुझे सीखने को मिला कि परीक्षाओं में अच्छे अंक लाने के लिए छात्र किस प्रकार से पढ़ाई करते हैं। हम परीक्षा के पहले की रात को ’कत्ल की रात’ कहते, जिसमें हम सारी रात सोते ही नहीं थे, इस डर से कि महत्वपूर्ण बिंदु भूल न जाएँ। सुबह छः बजे तक पढ़ाई करके नहा-धो कर छात्रावास से उतरते व चाय पीकर सीधे परीक्षा-भवन पहुँचते। जब उत्तर पुस्तिका लिख रहे होते तो लगता जैसे पलकों पर मनों बोझ रखा हो। फिर बारह बजे छात्रावास पहुँच कर भोजन कर के सोते तो सीधे दूसरे दिन सुबह जाकर ही उठते। अगला पूरा दिन सिविल लाइंस तथा कटरा घूमते, फिल्म देखते व रात से अगले प्रश्न पत्र की तैयारी में जुट जाते। इस प्रकार एक दिन मैं अपने शैक्षणिक जीवन की अंतिम परीक्षा दे आया, एम.टेक. तृतीय वर्ष का अंतिम प्रश्न-पत्र।
जब ग्रीष्मावकाश के पश्चात् विश्वविद्यालय दोबारा खुला तो मैं अपने जीवन की अंतिम अंक-सूची लेने विभाग पहँुचा। प्रोफेसरों के कक्ष के बाहर पहुँचा था कि उनकी आपसी बातचीत सुनाई दी – ’ही हैज़ गाॅट सेम माक्र्स इन आल द सब्जेक्ट्स आॅनली एक्स्सेप्ट माइनिंग’। यह विभाग के रीडर डा. त्रिवेदी की आवाज़ थी जो हम हिन्दी-पट्टी के लड़कों के सबसे बड़े प्रेरणा स्रोत थे। प्रतीत हुआ कि वह जाॅय जोसेफ, लीना पांडेय या मुत्तुरघु तिरुनावुक्कारसु में से किसी एक के बारे में चर्चा कर रहे होंगे। तीनों ही मेरी कक्षा के अग्रणी विद्यार्थी थे। अंक-सूची ली तो देखा कि तीन विषयों में विशेष योग्यता है, एक में सत्तर प्रतिशत से अधिक अंक तथा एक विषय माइनिंग जियोलाॅजी में साठ प्रतिशत अंक हैं। इसका मतलब ……! हाँ, डाॅ. त्रिवेदी उन में से किसी एक नहीं, अपितु मेरे बारे में बात कर रहे थे। अब मैं गुड-सेकेण्ड नहीं था। अपने शैक्षणिक-जीवन के अंतिम इम्तिहान में सैद्धांतिक विषयों में मुझे अपनी कक्षा में शीर्ष स्थान मिला था तथा तीन वर्षों के अंक मिला कर एम.टेक. उपाधि की मेरिट में मेरा स्थान चैथा था। मेरिट में मुझसे आगे जाॅय, लीना व रासू ही थे। विभागाध्यक्ष तथा ’रिमोट सेंसिंग’ विषय के प्रतिष्ठत विद्वान डाॅ.एस.एन.पाण्डेय (अब स्वर्गवासी) न जाने क्यों दुखी थे; उन्होंने मुझसे कहा- ’बधाई हो, आपको आपकी आशा से अधिक अंक मिले हैं’। वास्तव में मुझे आशा से अधिक अंक ही मिले थे, फिर भी मैंने ढिठाई के साथ कहा कि यदि आपने प्रायोगिक परीक्षा में मुझे अच्छे अंक दिये होते तो संभवतः मैं यह मान भी लेता।
बाहर आकर मैं बहुत देर तक बोधि-वृक्ष के नीचे बैठा रहा। मेरे हाथों में अंक-सूची थी, पर मैं खुश होने से अधिक अवाक् था। हतप्रभ रह जाने के साथ-साथ कुछ ऐसा लग रहा था, जैसे मुझसे बहुत कुछ छिन गया हो। मुझे लग रहा था कि काश, पीछे जाकर स्नातक का गुड-सेकेण्ड सुधार लेता। फिर उसके पीछे जाकर इण्टर का गुड-सेकेण्ड भी। अब मुझे पता था कि गुड-सेकेण्ड को कैसे अधिकतम अंकों में परिवर्तित किया जाता है। परंतु समय तो हाथ से निकल ही चुका था। बीच में कई बार मन हुआ कि स्नातक का श्रेणी सुधार दे लूँ, पर वह टलता ही गया। और फिर एक दिन यह विचार ही मन से निकल गया। अब सामने केवल भविष्य का संघर्ष था, क्यों कि वह समय भूगर्भ-शास्त्र में पेशेवर नौकरियों का समय नहीं था तथा व्याख्याता बनने का तो मैं पात्र ही नहीं था।
कुछ समय तक व्यापार में हाथ-पैर मारने, केन्द्रीय विद्यालय में ग्रेजुएट शिक्षक के रूप में गणित का तदर्थ शिक्षण करने, छात्रों को अंग्रेजी व गणित की ट्यूशन पढ़ाने के पश्चात् एक दिन इच्छानुकूल काम मिला। प्रतीक्षा सूची का वह लड़का जिसने विभाग में प्रवेश के समय मुझे अगवा करवाया था, वह मुझसे पहले नौकरी में आ गया था। उसी की अनुशंसा पर मुझे पहली नौकरी मिली। पहले-पहल तो वहाँ भी संघर्ष ही रहा व दिन कठिनाई भरे ही बीतेे, किंतु समय के साथ स्थिरता आती गई। कुछ वर्षों तक भारत की अग्रणी कम्पनियों में जल-विद्युत परियोजनाओं की योजना व निर्माण के भू-तकनीकी पक्ष का कार्य सीखने के पश्चात् आज मुझे प्रतीत होता है कि निजी क्षेत्र में नौकरी करने के लिए अंक-सूची का अब जैसे कोई महत्व ही नहीं रह गया हो। साक्षात्कार देने व चयन होने के पश्चात् सेवाभार ग्रहण करते समय पहली बार औपचारिकता पूर्ण करने के लिए अंकसूची की माँग होती है। हालाँकि इधर ’डीम्ड विश्वविद्यालयों’ की आई बाढ़ व कुछ फर्जी डिग्रीधारकों के कारण अब कुछ निजी क्षेत्र की कम्पनियों में अंकसूचियों का सत्यापन किसी तृतीय पक्ष के माध्यम से करवाया जा रहा है, किंतु वह सत्यापन उपाधि के असली होने का ही होता है। आज मैं एक पेशेवर भूविज्ञानी हूँ, जिसके काम की कीमत उसकी कार्यक्षमता व अनुभव के आधार पर तय की जाती है। काम होने पर जहाँ उसे मुँह-माँगी कीमत मिलती है, वहीं काम नहीं होने पर उसे बेकार भी बैठना पड़ता है। निजी क्षेत्र की नौकरियों के इस दौर में डिग्री का महत्व केवल वैधानिक नियमों को निबाहने में ही होता है। यदि अभ्यर्थी तृतीय श्रेणी से भी उत्तीर्ण हो, तब भी कोई फर्क नहीं पड़ता। हाँ, यहाँ आपको प्रतिदिन प्रथम आना होता है, अन्यथा कोई दूसरा आपका स्थान लेने को सदैव तैयार रहता है।
फिर इस अंतराल में मैंने यह भी अनुभव किया कि व्यावसायिक जीवन में अग्रणी रहने हेतु अध्ययन का क्रम निरंतर जारी रखना पड़ता है। आधारभूत संरचना निर्माण के जिस क्षेत्र में मैं सेवारत हूँ, उसमें अपने-आपको अद्यतन रखने हेतु नवीन खोजों तथा सिद्धांतों को अनवरत सीखना व आत्मसात करना पड़ता है। तथापि, अब मुझे पूरा आत्मविश्वास है कि अब मैं एक ’गुड-सेकेण्ड लड़का’ नहीं रहा। मुझे अपने संपूर्ण सेवाकाल में परिवीक्षा से लेकर वार्षिक गोपनीय प्रतिवेदन तक कभी भी पाँच के मापदण्ड पर चार से कम अंक नहीं मिले। हाँ, किंतु यदि मैं गणित का प्रवक्ता बनता तो संभवतः एक गुड-सेकेण्ड प्रवक्ता ही बनता। परंतु मैंने यह भी सीखा कि टेलर, गाॅस व मैक्लाॅरिन महोदय के जिन प्रमेयों का पढ़ाया जाना मुझे तब के समय में सर्वथा निरर्थक लगता था व जिनका व्यावहारिक जीवन में कोई उपयोग समझ में नहीं आता था, तकनीकी क्षेत्र में उनकी महती उपयोगिता है। अंतरिक्ष-विज्ञान की सूक्ष्म गणनाओं से लेकर भू-तकनीकी के उन साॅफ्टवेयरों तक के निर्माण में जिनका मैं नित्य-प्रति उपयोग करता हूँ, इन गणितीय सिद्धांतों का महत्वपूर्ण योगदान है। वह अकार्बनिक रसायन जो चक्रव्यूह प्रतीत होता था, उसे भेद कर ही कैंसर व अन्य प्राण-घातक बीमारियों के उपचार संभव हो पाते हैं। त्रिकोणमिति, लाॅगेरिथ्म और रामायण-महाभारत के राक्षसों के से नामों वाले समद्विबाहु व समत्रिबाहु त्रिभुजों का ज्ञान तकनीकी जीवन में अत्यंत आवश्यक है। आधारभूत जानकारियों के अभाव में तकनीकी कार्यों में यदा-कदा शर्मिन्दा भी होेना पड़ता है, परंतु जब उन कक्षाओं से गायब होकर खेले गए आम-डगाली तथा खरपाट की याद आती है, तब मुस्कुराहट वापस लौट आती है।
इन सबके मध्य हिन्दी आज भी मेरा प्रिय विषय है, उसके साथ ही अंग्रेजी भी तथा जब कभी थोड़ा सा समय मिलता है या व्यस्तता में से कुछ समय चुरा पाता हँू, तब थोड़ा-बहुत लिख-पढ़़ भी लेता हूँ। हाँ, दुरूह कलावादी अज्ञेय कविताएँ आज भी न तो मैं समझ ही पाता हूँ, न उन्हें किसी कुन्जी के सहारे ’डी-कोड’ कर सीखने का शौक ही है। वह तो मेरे लिए गणित के अबूझ प्रमेयों के समान ही हैं। आप मुस्कुराकर कह लीजिए-’नाच न जाने आँगन टेढ़ा’! बचपन में चित्र-कथाएँ पढ़ने का जो शौक अधूरा रह गया था, व्यावसायिक जीवन में स्थिर होने पर मैंने अपना वह शौक सबसे पहले पूरा किया। इन्टरनेट से भी बहुत सी चित्र-कथाएँ एकत्र कर पढ़ी हैं। बाजार से खरीद कर अब भी चित्र-कथाएँ पढ़ता हूँ। फैंटम, मैंण्ड्रेक, बज सायर, लोथार व रिप किर्बी आज भी मेरे सर्वाधिक प्रिय पात्र हैं, परंतु चाचा चैधरी, रमन, बिल्लू और पिंकी भी मुझे उतना ही आनंद देते हैं।
मेरा मानना है कि हमारी शिक्षा-व्यवस्था में बच्चों को रूचि के अनुसार विषय पढ़ने की व्यवस्था की जानी चाहिए। सभी बच्चों को गणित या विज्ञान प्रिय नहीं हो सकते। कुछ को हिन्दी व अंग्रेजी से प्रेम होता है, तो कुछ बच्चों को सामाजिक विज्ञान व संस्कृत पसंद होते हैं। हमारे समय में गणित व विज्ञान के अतिरिक्त अन्य विषयों की पढ़ाई करने पर भविष्य की अनिश्चितता बढ़ जाती थी, क्योंकि तब अन्य संकायों के विद्यार्थियों के लिए नौकरियों के अवसर सीमित ही होते थे। इस कारण, यद्यपि मुझे गणित व विज्ञान पढ़ना कभी रुचिकर नहीं लगा, फिर भी मैं सदा ही अम्मा कोे हृदय से धन्यवाद देता हूँ कि यदि उन्होंने उस समय मेरी बात मान कर वाणिज्य पढ़ने दिया होता, तब संभवतः मुझे भी संघर्ष के पश्चात् कोई सामान्य सरकारी नौकरी मिल पाती या व्यापार में ही अपना जीवन खपा देना पड़ता। इसके उलट, आज के समय में कला या वाणिज्य विषयों की पढ़ाई करने से कोई अन्तर नहीं आता व छात्र इण्टर अथवा स्नातक के पश्चात् इच्छानुकूल व्यवसाय प्रबंधन, कम्पनी-सचिव, चार्टर्ड-अकाउँटेंट, यात्रा-प्रबंधन जैसे व्यावसायिक पाठ्यक्रमों की पढ़ाई कर सफलतापूर्वक जीवन-यापन कर सकते हैं। इसके साथ ही खेल, कला व संगीत के क्षेत्र में भी उज्जवल भविष्य के मार्ग प्रशस्त हो रहे हैं। अतः मेरे विचार में, यदि बचपन में ही बच्चों की मूल रुचि का समुचित वर्गीकरण हो व उसे उस क्षेत्र में पर्याप्त सुविधाएँ दी जाएँ, तो वह गणित व विज्ञान के अतिरिक्त अन्य क्षेत्रों में भी आगे जा सकता है।
पीछे मुड़कर देखूँ तो एक अन्य बात जो सबसे महत्वपूर्ण लगती है, वह है बाल-मनोविज्ञान। बच्चा जो कुछ भी पढ़े, जैसा भी पढ़े पर इस सबके समानांतर उसके भीतर की सकारात्मक उर्जा को निरंतर बचाकर रखा जाना चाहिए, उसे बढ़ाया जाना चाहिए। पारिवारिक व विद्यालयीन वातावरण इतना धनात्मक व उत्साहपूर्ण हो कि बच्चे की कुछ करने की दबी-छिपी इच्छा अदम्य आकांक्षा में बदल जाए। परिस्थितियाँ ऐसी बनाई जाएँ कि ऊँचा उठने की वह आकंाक्षा बच्चे के अंतर से मौलिक विचार के रूप में प्रस्फुटित हो, न कि बाहर से थोपी गई महत्वाकाँक्षा के रूप में। मुझे स्वयं के बारे में प्रतीत होता है कि मेरे अंदर एक किंचित अपरिभाषित सी ऊर्जा थी, जिसने मुझे जीवन में कभी थकने नहीं दिया। वह ऊर्जा सफलता अथवा असफलता हेतु नहीं थी। भावना यह नहीं थी कि कुछ विशेष करना है, परंतु एक निरंतर गतिमान रखने को प्रेरित करने वाला संवेग था; जो कुछ भी सामने आया उसे करता गया, जय-पराजय के प्रश्नों से कोसों दूर। एक उत्साह था, जिसकी दिशा अविचल रूप से उत्तरादिश-अभिमुख थी। यदि वह उत्साह न होता, तो जिस स्तर का मैं विद्यार्थी था, जीवन में कुछ भी कर पाना कठिन था। आज मैं जो कुछ भी हूँ, उसी उत्साह व उमंग के कारण हूँ, जिस ने मुझे कठिनतम परिस्थितियों का सामना करनेे की क्षमता दी, अक्षम से सक्षम बनाया। वही उर्जा आज भी मुझे गतिमान रखती है।

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