ऐसा क्यों है ?: ग़ज़ल (अश्विनी आश्विन)

अश्विनी आश्विन

1- ऐसा क्यों है ?

इस दुनिया में ऐसा क्यों है ?
जीवन इतना सस्ता क्यों है??
सब अपनी दुनिया में ग़ुम हैं,
सब की हसरत, पैसा क्यों है??
बेशक, भीड़ भरी है दुनिया,
इन्सां मगर अकेला क्यों है??
माना ! तन उस का गोरा है,
पर वो मन का काला क्यों है ??
गुलशन में माली है, फिर भी,
कलियों का मुंह उतरा क्यों है?
मैं अपने घर मैं हूँ ! लेकिन,
मन सहमा-सहमा सा क्यों है ?
मंदिर मेरा, मस्ज़िद तेरी
सदियों से ये झगड़ा क्यों है ??
इन अंधों-बहरों के युग में,
गूंगी मेरी कविता क्यों है ??

 

2-

मुफलिसी, मुंह का निवाला छीन लेती है।
ज़िन्दगी का हर उजाला, छीन लेती है।।

आशियाने तो मयस्सर ही नहीं होते,
बालकों से पाठ-शाला छीन लेती है।।

गर्मियों में सोख लेती है लहू अपना,
ठण्ड में, कम्बल, दुशाला छीन लेती है।।

आज, मंहगाई निगोड़ी ! बेरहम ! हम से
चाय का लब से पियाला, छीन लेती है।।

सल्तनत भी अब रहम हम पर नहीं खाती
वोट लेती है, हवाला छीन लेती है।।

Leave a Reply

Your email address will not be published.