साहित्यिक संग्रह से ‘गाब्रिएल गार्सिया मार्केज’ की कहानी ……..  का अनुवाद – ‘मनोज पटेल’ की कलम से …

ऐसे ही किसी दिन 

अनुवाद – ‘मनोज पटेल’

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज

गाब्रिएल गार्सिया मार्केज
जन्म : 6 मार्च 1927, कोलंबिया
भाषा : स्पेनिश
विधाएँ : उपन्यास, कहानी, संस्मरण, पटकथा लेखन
सम्मान
नोबेल पुरस्कार (1982)
निधन
17 अप्रैल 2014, मेक्सिको

उस सोमवार की सुबह, गर्म और बिना बारिश वाली हुई। तड़के जागने वाले औरेलियो एस्कोवार ने, जो दाँतों का बिना डिग्री वाला डाक्टर था, अपना क्लीनिक छह बजे ही खोल दिया। उसने शीशे की आलमारी से नकली दाँत निकाले, जो अब भी खड़िया-मिट्टी के साँचे में जड़े हुए थे, और मुट्ठी भर औजारों को उनके आकार के क्रम में मेज पर यूँ सजा के रखा जैसे उनकी नुमाइश की जा रही हो। उसने बिना कालर वाली एक धारीदार कमीज पहन रखी थी जिसके बंद गले पर सुनहरा बटन था, और उसकी पैंट गेलिस से बँधी हुई थी। वह दुबला-पतला सींकिया इनसान था जिसकी निगाह कभी-कभार ही हालात के अनुरूप हो पाती थी, जैसा कि बहरे लोगों की निगाहों के मामले में होता है।
औजारों को मेज पर व्यवस्थित करने के बाद वह ड्रिल को कुर्सी के पास खींच लाया और नकली दाँतों को चमकाने बैठ गया। वह अपने काम के बारे में सोचता नहीं दिख रहा था, बल्कि, ड्रिल को अपने पैरों से चलाते हुए, तब भी जबकि उसकी जरूरत नहीं होती थी, वह निरंतर काम किए जा रहा था।

आठ बजे के बाद खिड़की से आसमान को देखने के इरादे से, वह थोड़ी देर के लिए रुका और उसने देखा कि दो विचारमग्न बाज बगल के मकान की शहतीर पर धूप ले रहे थे। वह इस खयाल के साथ फिर काम में जुट गया कि दोपहर के खाने के पहले फिर से बारिश होगी। अपने ग्यारह वर्षीय बेटे की तेज आवाज से उसका ध्यान भंग हुआ।

‘पापा।’

‘क्या है?’

‘मेयर पूछ रहे हैं कि क्या आप उनका दाँत निकाल देंगे।’

‘उससे बता दो कि मैं यहाँ नहीं हूँ।’

वह एक सोने का दाँत चमका रहा था। हाथ भर की दूरी पर ले जाकर उसने आँखें भींचकर दाँत को जाँचा-परखा। छोटे से वेटिंग रूम से फिर उसका बेटा चिल्लाया।

‘वो कह रहे हैं कि आप यहीं हैं, और यह भी कि वह आपकी आवाज सुन सकते हैं।’

दंतचिकित्सक ने दाँतों की जाँच-पड़ताल जारी रखी। उसे मेज पर बाकी चमकाए जा चुके दाँतों के साथ रखने के बाद ही वह बोला : ‘अच्छा है, सुनने दो उसे।’

वह फिर से ड्रिल चलाने लगा। उसने गत्ते के डिब्बे से, जहाँ कि वह ऐसी चीजें रखता था जिनपर काम करना बाकी है, कुछ दाँत निकाले और सोने को चमकाने में जुट गया।

‘पापा।’

‘क्या है ?’

उसने अब भी अपना हाव-भाव नहीं बदला था।

‘वह कह रहे हैं कि अगर आप उनका दाँत नहीं निकालेंगे तो वह आपको गोली मार देंगे।’

बिना हड़बड़ाए, बहुत स्थिर गति से उसने ड्रिल को पैडल मारना बंद किया, उसे कुर्सी से परे धकेला और मेज की निचली दराज को पूरा बाहर खींच लिया। उसमें एक रिवाल्वर पड़ी थी। ‘ठीक है,’ उसने कहा। ‘उससे कहो कि आकर मुझे गोली मार दे।’

उसने कुर्सी को घुमाकर दरवाजे के सामने कर लिया, उसका हाथ दराज के सिरे पर टिका हुआ था। मेयर दरवाजे पर नजर आया। उसने अपने चेहरे के बाईं तरफ तो दाढ़ी बनाई हुई थी, लेकिन दूसरी तरफ, सूजन और दर्द की वजह से पाँच दिन की बढ़ी हुई दाढ़ी मौजूद थी। दंतचिकित्सक ने उसकी नीरस आँखों में कई रातों की नाउम्मीदी देखी। उसने अपने उँगली के पोरों से दराज को बंद कर धीरे से कहा :

‘बैठ जाओ।’

‘गुड मार्निंग,’ मेयर ने कहा।

‘मार्निंग,’ दंतचिकित्सक ने जवाब दिया।

जब औजार उबल रहे थे, मेयर ने अपना सर कुर्सी के सिरहाने पर टिका दिया और कुछ बेहतर महसूस करने लगा। उसकी साँसे सर्द थीं। यह एक घटिया क्लीनिक थी : एक पुरानी लकड़ी की कुर्सी, पैर से चलने वाली एक ड्रिल, मिट्टी की शीशियों से भरी एक शीशे की आलमारी। कुर्सी के सामने एक खिड़की थी जिस पर कंधों की ऊँचाई तक के परदे पड़े हुए थे। जब उसने दंतचिकित्सक को आता हुआ महसूस किया, तो उसने अपनी एड़ी को कड़ा करके मुँह खोल दिया।

औरेलियो एस्कोवार ने अपना सर रोशनी की दिशा में घुमा लिया। संक्रमित दाँत के मुआयने के बाद उसने उँगलियों के सतर्क दबाव से मेयर का जबड़ा बंद कर दिया।

‘यह काम संवेदनशून्य किए बिना ही करना पड़ेगा,’ उसने कहा।

‘क्यों?’

‘क्योंकि अंदर एक घाव है।’

मेयर ने उसकी आँखों में देखा। ‘ठीक है,’ उसने कहा, और मुस्कराने की कोशिश की। दंतचिकित्सक जवाब में नहीं मुस्कराया। अब भी बिना किसी जल्दबाजी के वह, विसंक्रमित औजारों का पात्र, काम करने की मेज तक ले आया और उन्हें एक ठंडी चिमटी की सहायता से पानी से बाहर निकाला। फिर उसने पीकदान को जूते की नोक से धकेला और वाशबेसिन में हाथ धुलने के लिए गया। यह सब उसने मेयर की तरफ देखे बिना ही किया। लेकिन मेयर ने उस पर से अपनी नजरें नहीं हटाईं।

घाव अक्ल दाढ़ के निचले हिस्से में था। दंतचिकित्सक ने अपने पैर फैलाकर गर्म संडासी से दाँत को पकड़ लिया। मेयर ने कुर्सी के हत्थों को मजबूती से थाम लिया, अपनी पूरी ताकत से पैरों को कड़ा कर लिया और अपने गुर्दों में एक बर्फीला खालीपन महसूस किया मगर कोई आवाज नहीं निकाली। दंतचिकित्सक ने महज अपनी कलाई को हरकत दी। बिना किसी विद्वेष के, बल्कि एक कटु कोमलता के साथ, उसने कहा :

‘अब तुम हमारे बीस मारे गए लोगों की कीमत अदा करोगे।’

मेयर ने अपने जबड़े में हड्डियों की चरमराहट महसूस की, और उसकी आँखें आँसुओं से भर आईं। लेकिन उसने तब तक साँस नहीं लिया जब तक कि उसे दाँत निकलने का एहसास न हो गया। फिर उसने अपने आँसुओं के बीच से उसे देखा। उसके दर्द के चलते वह इतना पराया नजर आ रहा था कि वह अपनी पिछली पाँच रातों की यातना समझने में नाकाम रहा।

पीकदान पर झुके, पसीने से तर, हाँफते हुए उसने अपनी जैकेट की बटन खोली और पैंट की जेब से रूमाल निकालने को हुआ। दंतचिकित्सक ने उसे एक साफ़ कपड़ा दिया।

‘अपने आँसू पोंछ लो,’ उसने कहा।

मेयर ने ऐसा ही किया। वह काँप रहा था। जब दंतचिकित्सक अपने हाथ धुल रहा था, उसने जीर्ण-शीर्ण छत और धूल से अटे, मकड़ी के अंडों और मरे हुए कीड़े-मकोड़ों से भरे मकड़ी के जाले की तरफ देखा। अपने हाथ पोंछते हुए दंतचिकित्सक वापस लौटा। ‘जाकर सो जाओ,’ उसने कहा, ‘और नमक-पानी से गरारा कर लेना।’ मेयर उठ खड़ा हुआ और एक अनौपचारिक फौजी सलामी के साथ विदा लेकर, जैकेट की बटन बंद किए बिना ही, अपने पैर फैलाते, दरवाजे की ओर बढ़ चला।

‘बिल भेज देना,’ उसने कहा।

‘तुम्हारे या शहर के नाम?’

मेयर ने उसकी तरफ नहीं देखा। उसने दरवाजा बंद कर दिया और परदे के पीछे से कहा :

‘एक ही बात है।’

(साभार – हिंदी समय डॉट कोम से )

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