जैसे बीज को तोड़कर निकलता हो कोई अंकुर | ‘अर्चना कुमारीकी कविताओं से गुज़रना भी कुछ ऐसी ही अनुभूति से रूबरू होना है, जब, कविता की साहित्य दृष्टि सामाजिक, आर्थिक और मानवीय रिश्तों के बीज की मज़बूत परत तोड़कर आंतरिक उद्वेलन के साथ अंकुरित होती हैं | संपादक

ओस की बूँदें 

अर्चना कुमारी

अर्चना कुमारी

परछाईयों पर पैर रखना
अतीत दोहराने जैसा
प्रतिध्विनियाँ खो देती हैं
संवेग अनुगूंज का
आईने की एक चिलक
प्रश्नचिह्न सा चिपक जाती हैं वजूद से
प्रतिबिम्ब के दरकने का भय
आँखों की पुतलियाँ सिकोड़ता है
साथ-साथ के रास्ते पर
एक-दूसरे से उल्टा चलना
पुरानी गाँठों की मजबूती है
जिनके दाग और जगह होते हैं
और घाव को छूती ऊँगलियाँ
नमक में घुल जाती हैं
ओस की बूँदों में भीगीं फाहों जैसी
काश! मैं होती
कि जलन कि हर दाह में
उसके सीने से लगकर
थाह पाती……!!!

  1. घर के किस्से

google से साभार

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दर खटखटाया
सन्नाटों का आदी घर चौंका
अकबकाया……
आहटों के पैर देखे
मुस्कुराया……
कोई आया
रौशनी वाले कमरे में
अँधेरों की चमक ढूँढने
हाथ बढाकर हौले से छूना दीवारें
और चूम लेना सीलन
जख्मों के नाम एक साजिश थी
मोहब्बत की…..
कहाँ रुकते पैर
और कहाँ टिकती आहटें
घर ढोता है कितनी ही लाशें
देहरी गवाह है
उन रक्तिम चिह्नों के
जिन्हें हल्दी वाले हाथों से लिपटना था
रास्ते बरसते हैं
आँखें पत्थर…………!!!
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टूटे छप्परों से रिसते हैं
घरों के किस्से
एक खासियत है यही
कि लाशों से कोई भभका नहीं उठता ॥

  1. परिन्दे

आवाजों के परिन्दे

उड़ते भी तो कहाँ जाते
किसी मुंडेर पर रखे
अल्फाज़ के दाने चुगते
और पीते अहसास का पानी

छोटे से दिल में
पिंजरे का डर लेकर
ठहरने से पहले चल देते
कोई मासूम बच्चा
हाथ बढाता
रुक जाता…….

परिन्दों की उड़ानों से ज्यादा
फड़फड़ाहट से ईश्क करने वाली लड़की
जख्मों को धूप में सुखाती
पुराने घावों का हरा करती
लाल होना किसी ख्वाब का
परिन्दों की मौत होती है

पाजेब की छनछन मधुर
और घूँघरुओं का टूट जाना
कि जैसे दिल धड़कना
और दिल का टूट जाना

सदियों से शिकायतें नाम रहीं
उल्फत के
झुकी पलकें गुनाहगार रहीं
किसी मौसम का
पतझड़ों में बरसकर
टहनियाँ हरा करती
कि आकर ठहर जाएँ
मुंडेरों के उदास पंछी

बिखरे परों का ढेर लेकर
मुस्कुराना
कोई इल्जाम दे जाए
फिर गुनगुनाना
दुआ के दरों से
खाली लौट आना

चुप हैं परिन्दें
और आसमाँ तक कोई इल्जाम है ॥

  1. नायिका

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विप्रलब्ध नायक
साँसों को हुक्म मानकर
पदचापों की आहटों के आरोह अवरोह में
जीता है…..

जा चुकी नायिका का
उसमें बने रहना ही
प्रेम होता है शायद

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