कम शब्दों में बड़ी बात कहने का सामर्थ्य रखती है कविता | जैसे मिर्ची का एक बीज जो झनझना सकता है दिमाग तक | शब्दों की घनी बुनावट के बिना भी जिंदगी के गहरे रंगों कुछ इसी अंदाज़ के साथ उकेरतीं अशोक कुमारकी कवितायें……..  

ओह दाना मांझी तुम भी न 

अशोक कुमार

अशोक कुमार

ओह दाना मांझी
तुम भी न
दशरथ मांझी ही थे

दशरथ मांझी
पहाड़ तोड़ता रहा
पत्नी की मौत पर
अस्पताल का रास्ता बनाता रहा

दाना मांझी
तुम भी तो
कंधों पर ढो रहे थे
निष्प्राण हुई पत्नी
और पैरों से काट रहे थे
जिंदगी के पहाड़ से रास्ते.

कविता की गुंजाइश कहाँ रही

नंगी धड़ंग मुनि घुस गये सदन में
और दहाड़े
पति धर्म है
पत्नी राजनीति

शनि सिंगनापुर के बाद अब
हाजी अली दरगाह में घुस सकती थीं औरतें

पहली बार डेनमार्क की मस्जिद में
महिला इमाम ने दी अजान
पहुँची साठ औरतें

ये बस ख़बरें हैं
कविता नहीं

बस खबरें इकट्ठा हो कर कविता हो जाती हैं
पर तशरीह आपकी

जहाँ स्त्रियाँ अपनी जीत का जश्न मना रही थीं
वहाँ भी कोई पति ही प्रमुख था

कविता की सचाई तो ख़बरों में ही है
अलग से कविता की गुंजाइश कहाँ रही.

व्यक्ति  

साभार google से

साभार google से

मंगल से मुझे चाँद अच्छा लगा
चाँद से अपनी पृथ्वी

विदेश से मुझे अपना देश पसंद आया
देश में अपना राज्य

अपने राज्य में अपना जिला
फिर अपना गाँव अपना शहर
लगे मुझे प्यारे

अपने घर से लगाव था मुझे
और अपने परिवार में
सबसे बढ़िया मैं था.

शब्द कम

मेरे पास शब्द कम हैं
उसके पास भी शब्द कम हैं

थोड़ा दुरुस्त करता हूँ
जरा फिर से कहता हूँ

मेरे पास शब्द उससे थोड़े ही ज्यादा हैं
फिर भी हम वही प्यादा हैं.

जाओ कोई  काम कर लो

जाओ कोई काम कर लो
अगर यह तय नहीं कि कौन सा काम
तो पूछ लो उन मशीनों से फिर तो
क्या बचा है उनसे

क्या कोई सड़क पर कहीं छूटा हुआ रोड़ा बिछाना है
कहीं शेष रह गया है कोलतार चुपड़ने से कोई पैच

या फिर गहरी घुप्प अँधेरी खानों में
कोई बच गया है कोयले का जिद्दी टुकड़ा
जो मेरी तुम्हारी तरह नहीं बदलना चाहता
अपनी प्रस्थिति

देख लो कहीं खेतों में बचा हो कोई काम तुम्हारे लिये
जो दँवनी की मशीनों से छूट गया हो
किसी खर पतवार की तरह

या फिर खोजो कोई काम जो दफ्तर दे दे
और फिर कोई लैपटॉप ले कर
बैठ सको तुम
वातानुकूलित कमरे में

देखो ढूँढ सको तो ढूँढ लो
कोई काम तुम अपने लिये
जल्द से जल्द

या फिर देखना कहीं
तुम्हारा देश स्विट्जरलैंड तो नहीं हो रहा
जो काम के बदले दरमाहे की
कोई समझी बूझी पेशकश तो नहीं कर रहा.

आत्मकथ्य

जुबान मेरी ही थी
मगर जुबान थी

हाँ तो सुनो
मेरी जुबान मुझसे ही कुछ कह रही थी !

आउट डेटेड

मैंने महसूस किया
मैं आउटडेटेड हो गया था
मैंने महसूस किया
यह मान लेने में भी हर्ज़ नहीं है

कोई आसक्ति तो थी नहीं
कि फ़ैशन में ढली हों पतलून की मोहरी
और वैन ह्यूसेन मेरे लिये पहला और आखिरी ब्रैंड नेम था
कि वह मुझे कोई ह्यूएन सांग का छोटा भाई लगता था
जब मैंने पहली बार किसी पुतले को फिरायालाल एंड संस की दुकान में
उस ब्रैंड के शर्ट पैंट पहने देखा था
मुझे उस गोरे नारे पुतले को देख रश्क़ हुआ था

वैन ह्यूसेन मेरी नौकरी का एक बहुत बड़ा लक्ष्य था
जो अक्सर मेरी बढ़ी हुई तनख्वाह से और बड़ा हो जाता था

मैंने कई बार यह भी सोचा
कि काश ह्यूएन सांग आज के भारत में आता
तो भले ही मैं न पहनता वैन ह्यूसेन
उसे भेंट दे विदा करता

मैंने महसूस किया कि
सचमुच वैन ह्यूसेन क्या गंजे हुए सिर पर फबेगा
या फिर वह मुझे अपनी औकात बता देगा

हालाँकि ह्यूएन सांग तो एक आया था
पर वैन ह्यूसेन मेरी जिंदगी में कई आये
जो देह पर चढ़े और चले गये
और जब मेरी दिलचस्पी जब उनमें नहीं रही
मुझे लगा तभी कि मैं आउटडेटेड हो गया हूँ
ह्यूसेन सांग की तरह
जिसका आना और जाना अब मायने नहीं रखता

मैंने महसूस किया कि सचमुच
मैं आउट डेटेड हो चला हूँ
कि अब मैं किसी सिनेप्लेक्स में तीन घंटे नहीं बैठ सकता
और मुझे यह भी नहीं पता
कि आज मोहनजोदडो कोई विलुप्त हुई सभ्यता नहीं
उस पर बनी किसी फिल्म का नाम है.

व्यामोह

नया कुरता किस तरह का हो
यह सोच हमेशा उस तरह तारी होता था
जैसे खुदरा पैसा जेब पर भारी होता था

उन खुदरे पैसों में वह खनखनाहट कहाँ थी
और वे सिर्फ जेब में एक छेद भर कर सकते थे

कालर के पीछे घिसे कुरते खुद के बदलने की ताकीद कर जाते
धीरे से कानों में
और यह भी कि छोड़ दो भैया जान मेरी
कि ऊब गया हूँ तुमसे

तुम तो अब रूटीन हो चले हो मेरे साथ
कि सोमवार मंगलवार तुम मुझे घसीटोगे
अपने कंधों पर
उस काली पैंट के साथ
जिस पर कहीं एक रफ्फू भी है
जिसे तुम बड़ी चालाकी से छुपा जाते हो

और फिर जब किसी पार्टी की घोषणा होगी
तुम वार्डरोब से निकालोगे कोई चमकौआ कमीज़

कुरते की बात पर मुस्कुराता हूँ
और सोच में पड़ जाता हूँ
कि कैसे चेहरे की धीमी पड़ती चमक को
नये कुरते से छुपाता हूँ
और कितने शातिर तरीके से
उतरी कमीज़ वहाँ दे आता हूँ
जहाँ चेहरे की चमक को तौलने के लिये कोई कुरते नहीं होते

सोचता हूँ
कुरते कितने फायदेमंद हैं
और हुनरमंद
कि कितनी सफाई से
मांसपेशियों के ढीलापन छुपा जाते हैं
और देह की बदबू की शिकायत भी नहीं करते

मैं नये कुरते की सोचता हूँ
देह बदलने के पहले
कि कुरते पूरी देह की यात्रा तक कभी साथ नहीं देंगे
कि कोई याद करे मेरा चेहरा
तो वे पुराने कपड़े ही उसे याद न आयें
मेरे चेहरे के साथ
जैसे कई के सफेद कपड़े
उनके चेहरों के साथ मुझे आतंकित करते हैं

सच
अब नया कुरता खरीदना चाहता हूँ
सच
अब मैं पुराने कुरतों से कोई मोह नहीं रखना चाहता.

उन्मुक्तता

पेड़ भी पत्ते त्याग देना चाहते थे
और भार मुक्त होना चाहते थे
एक दिन

पहाड़ भी पत्थरों के वज़न त्यागना चाहते थे
और हल्का होना चाहते थे
एक दिन

एक दिन
नदियाँ अतिरेक जल छोड़ देना चाहती थीं

एक दिन आकाश
और विरल होना चाहते थे

एक दिन
समुद हहराना कम करना चाहते थे

एक दिन हम भी उन्मुक्त होना चाहते थे
हमेशा के लिये.

स्वयंसिद्ध

स्वयंसिद्ध मान लेते हैं
कि कहीं कोई ज़बान नहीं है
कहीं कोई शब्द नहीं हैं
और कहीं कोई मुहावरा नहीं

सिद्ध होता है
ज़बान पर कोई मिर्ची रखा जाना
कितना अक्षम होता है
एक जली हुई जिह्वा को
मचलने से रोक पाने में.

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