स्त्री-विमर्श और कविता में नये मुहावरों से लैस भाषा-शिल्प…रूचि भल्ला बड़ी ज़िम्मेदारी से अपने समय और समाज का सच बयान करती हैं…संपादक

औरतें नहीं देखती आईना  

रूचि भल्ला

औरतें नहीं देखती हैं आईना
वो तो शीशे में छुपाती हैं अपना चेहरा
चाहे चीनी हों या जापानी
अफ़गानी या हिंदुस्तानी
उनकी आँखें नहीं मिला पाती हैं
आईने से अपनी नज़रें

वो सजती हैं सँवरती हैं
मेकअप की कई परतों में
खुद को छिपाती जाती हैं
यूँ आईने में अपनी पहचान
खो देना चाहती हैं औरतें

दुनिया भर की औरतों को
आईने से शिकायत है
कि जितना भी सँवर लें
एक ही चेहरा दिखता है वहाँ
उसी अहिल्या का

सदियों से औरतें आईना नहीं देख रही हैं
आईने से अपना चेहरा छुपा रही हैं
आँचल के छोर से
आईने का तरबतर गीला चेहरा
पोंछती जाती हैं
और चमका कर
कमरे में कहीं ऊँचे टाँग देती हैं
अपनी असली पहचान…

 

कुछ खत इलाहाबाद के नाम 

साभार google से

1)
ये सारी दुनिया बहुत सुंदर है
पर सबसे सुंदर मेरा शहर इलाहाबाद है
हालांकि मैं 95 में निकल आयी थी
शहर की गलियों से अपने आलता लिए पाँव
पर इक्खठ-दुक्खठ मैं अब भी वहीं खेल रही हूँ
नन्हें पाँवों से …….

2)
मेरे आलता लगे पाँव की छाप पर
इलाहाबाद जब अपने पाँव धरता है
मुझे याद करके
मेरे नाम की आवाज़
इस शहर के सूरज को चीरते हुई चली आती है
मेरे पास ….
मेरी खैरियत लेने

जानती हूँ ….
मेरा शहर मुझे रोज़ याद करता है …
रोज़ खेलना चाहता है इक्खठ -दुक्खठ
मेरी यादों के संग
और गोटी मेरे नाम की उछाल देता है
सूरज की तरफ………..

3)
जब तक जीती हूँ इलाहाबाद हुई जाती हूँ
जब नहीं रहूँगी इलाहाबाद हो जाऊँगी मैं ……..

4)

वैसे एक बात कहूँ
लद्दाख की छत पर भी खड़े होकर
देखी है मैंने दुनिया

पर इलाहाबाद की खिड़की से
दुनिया बड़ी दूर तलक
दिखाई देती थी मुझे ……….

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