मज़्कूर आलम की कहानी ‘और फिर परिवार’ एक बेहद मजबूर, बेबस और लाचार लड़की की त्रासदी लगी, जो खुद को विकल्पहीन महसूस कर आत्महत्या कर लेती है, लेकिन पुनर्पाठ में लगा कि कई बार स्थितियां आपसे बलिदान मांगती हैं। रतिका मजबूर, बेबस और लाचार कैसे हो सकती है, उसने तो वह रास्ता अख्तियार किया, जो भगत सिंह ने किया था। भगत सिंह ने भी तो समाज में जागृति लाने के लिए स्वेच्छा से मौत का विकल्प चुना था। रतिका भी वही करती है। जहां भगत सिंह अदालती बहसों का इस्तेमाल भारत की जनता को यह समझाने के लिए कर रहे थे कि गुलामी की बेड़ियां तोड़कर फेंक दो और इधर रतिका आत्महत्या नोट्स के बहाने अपनी ‘बहनों’ को जागरूक कर रही थी कि गुलामी की बेड़ियां तुम्हारी सोच में है। अकेले-अकेले अपनी लड़ाई लड़ने में है। इसे तोड़ने के लिए सोच और संघर्ष के स्तर पर तुम्हें एक होना ही होगा। यहां आकर इस कहानी की नायिका का चरित्र बहुत कुछ भगत सिंह की तरह हो जाता है- एक इंकलाबी बलिदानी युवा लड़की का, जो अपनी तरह अभिषप्त जीवन जीने वाले-वालियों के साथ आगे बढ़ना चाहती है, अकेले नहीं। इन पंक्तियों को देखिए, “कतरे-कतरे जिंदगी जीने वालों की पीठ पर चढ़कर मैं बनाती अपनी दुनिया और उन्हें छोड़ देती अपने जैसी अभिषप्त जिंदगी जीने को ?” यद्यपि मौत का वरण जिंदगी से पलायन करने जैसा है लेकिन जहां भगत सिंह को राजनैतिक व्यवस्था ने अपने मंसूबों के लिए फांसी पर चढ़ाया वहीँ नायिका को सामाजिक व् न्यायिक व्यवस्था ने विवश किया आत्म हत्या जैसे कदम के लिए तब निश्चित ही कहानी सामाजिक और राजनैतिक रूप से भगत सिंह के विचारों के स्मरण की अपील करती है | – संपादक

मजकूर आलम

मजकूर आलम

…और फिर परिवार

वह पंखे से झूल रही थी। उसकी दोनों आंखें कोटरों से बाहर निकल कर दुनिया को घूर रही थीं और अपनी बिंदास जिंदगी की तरह जुबान बाहर निकाल वह लोगों को चिढ़ा रही थी। यह उसका चिर-परिचित अंदाज था… वह जब तक जी जमाने को ठोकरों पर रखा और दुनिया को अलविदा भी अपने उसी पसंदीदा अंदाज में किया…
आज बस एक ही कमी थी… सुपरिचित अंदाज में उसके हाथ ठेंगा दिखाते हुए दुनिया की ऐसी की तैसी नहीं कर रहे थे। बेजान लटके नीले पड़े हाथों की नीली अंगुलियों में भी जिंदगी से मिली कड़वाहट साफ झलक रही थी। सख्त अंगुलियों ने कोढि़यों सी अजीब षक्ल अख्तियार कर ली थी। मुड़कर अकड़ी अंगुलियां न जाने क्या इशारे कर रही थी। संकेतों की इसी अबूझ गुत्थी को सुलझाने में पुलिस सुबह से ही माथा फोड़ रही थी। मगजमारी तेजी से छापेमारी में तब्दील होती जा रही थी। पुलिस उसके कमरे की एक-एक चीज पर ऐसी गिद्धदृश्टि गड़ा रही थी, मानों सारे राज… अब यह कोना, यह कपड़ा, यह अलमीरा…
या फिर यह चिट्ठी… हां, यह चिट्ठी… बिस्तर को कितनी बार उलट-पुलट चुकी पुलिस को मुंह बिचकाती न जाने कैसे उनकी निगाहों से बच निकली थी। दरअसल यह तकिये के कवर में घुसकर सिकुड़ी-सिमटी अपनी लाज बचा रही थी। वही लाज, जो उसके मुंह से निकले जुबान की तरह संसद से सड़क तक आ गई थी… जिसका अंतिम संस्कार चाय की दुकानों से लेकर ठंड के मौसम में डाइनिंग रूम तक को गर्म करने के लिये बौद्धिक जुगाली में किया जा रहा था…
इज्जत की तरह बची न रह सकी वह चिट्ठी भी… गिद्धदृश्टि वाली पुलिस के हाथों से तो बच गई, लेकिन नीतिका की निगाह से बची न रह सकी… उसने सबसे नजर बचाकर चिट्ठी उठा ली… निकलते ही चिट्ठी ने चीत्कार शुरू कर दी… घिघियाई भी… आंखें भी दिखाई और हमदर्दी नहीं, सच्चे प्यार की तलाश में दीदी की गोद में छिपने की कोशिश भी की…
तुम सही थी नीतिका… तुम सही थी… हां, नीतिका तुम ही सही थी… लेकिन पूरी तरह नहीं… क्योंकि गलत तो मैं भी नहीं थी… गलत थे हमारे हालात… नहीं हालात नहीं… समाज… यह कह-कहकर मैंने खुद को दिलासा देने की बहुत कोशिश की, मगर हर बार आ खड़ा हुआ यह दैत्याकार प्रश्न कि हालात और समाज तो हम दोनों के लिये एक ही थे… एक ही घर, एक ही मां-बाप, एक ही परिस्थितियां… एक ही जैसा पालन-पोशण, एक ही स्कूल… एक जैसी शिक्षा-दीक्षा… शक्ल-सूरत भी लगभग एक सी… इस कदर एक कि लोग अक्सर हमें देख हमारे जुड़वां होने का भ्रम पाल लेते थे… उन्हें कभी लगता ही नहीं था कि तुम मुझसे पूरे चार साल बड़ी हो…
तुम बड़ी थी उम्र में, मगर तुम्हारे सपने बहुत छोटे-छोटे थे… मुझे चिढ़ थी इस बात से। चिट्ठी ने मुंह बिचकाया और जीभ निकाल कर मुंह चिढ़ाने लगी- दो कपड़ों में गुजारा… सर्दी पड़े तो परेशान कि गर्मी कहां से लायें और गर्मी में हलकान कि थोड़ी ठंडक कहां से मिले… बिजली का बिल बहुत ज्यादा आ रहा है पंखा-बत्ती का संभलकर इस्तेमाल करो। हीटर पर खाना मत बनाओ… कूलर बंद करो, लगातार रात भर चला है, थोड़ा आराम दो, कहीं खराब न हो जाए… हरी सब्जी की कीमत आसमान छू रही है… जब तक दाम कंट्रोल में न आ जाएं, राजमा, चना या दाल ही बना लिया करो… इनके भी दाम में तो आग लगी हुई है… नमकीन पराठा ही बना ले, चाय में बोरकर खा लेंगे… यह भी कोई जीवन है…
तुम कहती थी न नीतिका, ऐसे नहीं ऊबते… कभी घना-घना, कभी मुट्ठी चना, कभी वो भी मना… लेकिन हर हाल में इज्जत ढकना सीखो, खुश रहना सीखो… बुरे दिन हमेशा नहीं रहेंगे… अच्छे दिन आयेंगे…
इज्जत कौन-सी इज्जत… क्या भूखे रहना इज्जत है… या दूसरों को चिकनी-चुपड़ी खाते देखना… बता मेरी बहना… या इस टूटे घर में रहना इज्जत है… या टूटे जंगले और दरार पड़ी किवाड़ों से झांकती दुनिया की लोलुप निगाहों का शिकार होना इज्जत है… या घर के अंदर टपकती बारिश के कतरों के बीच कतरे-कतरे जिंदगी को तरसना इज्जत है… बता, बता मेरी बहना… बता ना…
धीरज रख… सब्र का फल मीठा होता है… ईश्वर पर भरोसा कर… इंतजार कर… सब ठीक हो जाएगा… ये इंतजार का वक्त है…
इंतजार… इंतजार… इंतजार… और कितनी प्रतीक्षा करती मैं… हां नीतिका, ये इंतजार की काली रातें तो कभी खत्म होने का नाम ही नहीं ले रही थीं…. प्रतीक्षा में पहले लड़कपन, फिर मेरे किशोरावस्था खो गए… खो क्या गए, मर गए… और तिल-तिलकर मरती रही मैं… हर पल… हर जरूरत के लिए… अब मैं जवान हो गई थी… मेरे सपने मेरी इच्छाएं सब जवान हो रही थीं… मगर घर के हालात वहीं के वहीं…. सच कहूं तो उससे भी बदतर… क्योंकि बड़े होने के साथ-साथ हमारी जरूरतें भी बढ़ी थीं… महंगाई भी बढ़ी थी… और आमदनी वही… अब वही एक-एक निवाले के लिए हिसाब-किताब वाला मामला भी नहीं था… जहां पेट भर खाना तक मुहैया न हो, वहां जवान होती इच्छाओं का क्या मतलब? उन्हें तो मुकम्मल नहीं ही होना था… उस पर से हर वक्त की तुम्हारी कचर-कचर… कभी किसी को मुकम्मल जहां नहीं मिलता, कहीं जमीं, तो कहीं आसमां नहीं मिलता… लेकिन तुम्हें या हमें क्या मिला था?
जमीं?
नहीं!
आसमां?
नहीं!
फिर मुकम्मल की बात ही क्या करना? यहां तो एक टुकड़ा भी नसीब नहीं… लेकिन किस्मत के भरोसे जीने वालों में से तुम थी नीतिका… मैं नहीं… तुम्हारी इन्हीं बातों ने मेरे अंदर विद्रोह के शरारे भर दिये थे… दुनिया से… इस मुफलिस जिंदगी से… और इतनी विवशता भरी जिंदगी देने वाले ईश्वर से…
चिट्ठी तनी… तनकर खड़ी हो गई… हमारे पास भाग्य नहीं, न सही… मजबूत आर्थिक-सामाजिक बैकग्राउंड नहीं, न सही… सुंदरता है… सुडौल देह है… अंग्रेजी मीडियम की आधुनिक शिक्षा है… कॉन्वेंट की पुअर स्टूडेंट फंड की कृपा से ही सही मगर है तो…
तो? नीतिका का सवाल…
चिट्ठी मुस्कुराई… एक रहस्यमयी मुस्कान… मैं तेरी तरह कुएं की मेढ़क नहीं… मैंने इस शतरंजी दुनिया में अपनी गोटी ढूंढ़ निकाली है… और सचमुच गोटी फिट तो कर ही ली थी मैंने नीतिका…
फिर! फिर क्यों हुआ यह सब? क्यों? चिट्ठी दहाड़ी… राक्षसी दहाड़… दिक्-दिगान्तर थर्राये…
थर्राती क्यूं है तू नीतिका! मैं कोई चोरी बेईमानी करने तो जा नहीं रही… इंटरव्यू देने जा रही हूं… एक नये एयरलाइंस की शुरुआत होने जा रही है… उन्होंने एयरहोस्टेस के लिए वैकेंसी निकाली है… मैंने अप्लाई कर दिया है… इंटरव्यू कॉल भी आ गया है… मैं इंटरव्यू देने जा रही हूं…
मैं इंटरव्यू से थर्रा नहीं रही, मगर ठीक से देख लेना कैसा आर्गनाइजेशन है… क्या फ्यूचर है उसका… वहां तेरा फ्यूचर कितना सेफ है… क्योंकि सिर्फ 10+2 के बाद जा रही है तू नौकरी खोजने… पढ़ाई बीच में छोड़कर… एयरहोस्टेस की नौकरी बिना विषेशज्ञता के नहीं मिलती… उसका भी कोर्स होता है… वह भी नहीं किया है तूने… अगर कुछ गड़बड़ हुआ तो…
…तो मेरी नौकरी पक्की है… मैं जानती हूं जुगाड़… प्राइवेट कंपनियों में कैसे नौकरी पाई जाती है… सब जानती हूं… कच्ची गोटियां नहीं खेली मैंने… मेरी छोड़ तू अपनी बता… तूने कौन-सा तीर मार लिया है… तूने तो एमए कर रखा है न… हायर एजुकेशन… क्या मिला तुझे… क्या कमाल कर गई तू… एक प्राइवेट स्कूल टीचर… पांच हजार की तनख्वाह… अब बीएड के लिए मगजमारी… बीएड करके भी कौन सा कारून का खजाना हाथ लग जाएगा… पंद्रह या बीस हजार… मेरी तो सैलरी ही शुरू होगी पंद्रह हजार से…
ऐसा न हो कि…
ओफ्…ओ… तू चुपकर…
चिट्ठी खिलखिलाई… तू हमेशा रोंदू की रोंदू ही बनी रहेगी… डरती ही रहेगी… तो डरती रह… जो रिस्क लेते हैं, वही तरक्की करते हैं, ठाठ की जिंदगी जीते हैं… वैसे भी डर के आगे ही जीत है…
देख जीत गई मैं… चिट्ठी किलकी, चहकी और नीतिका के गले में बांहें डाल झूल गई… नीतिका भी चहक उठी… उस दिन घर में मटन-पुलाव पका… सब ने छक कर खाया…. चिट्ठी ने चटखारे लिए…
देखा नीतिका, हिम्मते मरदां, मददे खुदा… मैंने हिम्मत की तो आज हम खा रहे हैं पुलाव-मटन… वरना महीने भर एडि़यां रगड़ने के बाद मिलते वही पांच हजार और खाते वही नमक-रोटी…
हाय, यह क्या मेरी रोंदू… आज तो तू भी मुस्कुरा रही है… कैसे हुआ यह चमत्कार… जरा ठहर, मैं देख के आती हूं, जरूर आज तेरे सूरज देवता पच्छिम से निकले होंगे… और तू हंसी थी ठहाके लगाकर… मैं भी हंसी थी… उस दिन पहली बार हंसा था हमारे घर का कोना-कोना… मम्मा-पापा के चेहरे, हाथ, कान उनका रोम-रोम आशीष बरसा रहा था…
चिट्ठी फिर चीखी… अजीब घर्र-घर्र-सी अनसमझी चीख… वह आवाज उसकी तो न थी… यह तो किसी डरावने जानवर की आवाज थी जो अब बेबसी में गुर्रा रहा था… बोल नीतिका बोल… अब तू चुप क्यों है… तू ही तो कहती थी हरदम कि मां-बाप के आशीष में बड़ी ताकत होती है… मां बाप को खुश करने वालों को ईश्वर खुश करता है… कहां गया तेरा वह हमदर्द ईश्वर… पूछ अपने उस मददगार से कि मैंने तो हरदम मां-बाप को खुशी दी… उनकी हर चिंता हर ली… उनकी हर जरूरत पूरी की… फिर मुझे खुश क्यों नहीं देख सका वह… क्या वह डर गया था मुझसे…
चिट्ठी हंसी… बेरहम जालिम क्रूर हंसी या विस्फोटक आत्महन्ता हंसी, यह वह खुद भी न समझ सकी… बस हंसती रही… हंसती रही, मानो हंसने से जरूरी अभी और कोई काम नहीं है… जैसे हंसने का दौरा पड़ा हो… हंसने के सिवाय और कोई उपाय नहीं है… अगर उसकी हंसी रुकी तो रुक जाएगी पूरी सृश्टि… आ जाएगा प्रलय… और गूंज उठा उसका यह प्रलयंकारी उद्घोश… हां, डर गया था तेरा ईश्वर मुझसे… क्योंकि बदल दी थी मैंने उसके लिखे की रेखा… उसने तो लिखा था कि हमें जीवन भर तरसना है एक-एक दाने को… अपनी हर जरूरत के लिए हमें उसका मोहताज बने रहना है, उसके सामने हमेशा फैलाये रहना है हाथ, ताकि वह जब चाहे जैसे चाहे हमें नचाये… नचाये कि अभी तुझे मेरी आरती उतारनी है… अभी तुझे मेरे सामने शीश नवाना है… अभी तुझे बकरी की तरह मिमियाना है… वह तो विस्मित था… कि हाय यह इस लड़की ने क्या कर डाला… छह महीने में परमानेंट हो गई इसकी नौकरी… सैलरी हो गई दोगुनी… अब तो इसके घर आ गया फ्रीज, ओवेन, भाई के लिए बाइक, पिता के लिए स्कूटर… कि अब उसकी बहन पांच हजार के लिए एडि़यां नहीं रगड़ती… वह तो अब नोट गिनती है नीतिका कोचिंग क्लासेज में… कि अब इसके घर के प्लास्टर-छप्पर पर झंखर नहीं चढ़ गया है… उन पर नया रंग-रोगन… कि अब पित्जा देख इनके मुंह में पानी आने से पहले डेलिवरी दे जाता है पित्जा ब्वॉय…
याद है नीतिका, जब मैं कमाने लगी थी तो मैंने कहा था तुझसे, अब तू अपनी क्लॉस शुरू कर… तू हमेशा से यही तो चाहती थी न नीतिका… लेकिन डरती थी कि कोचिंग के जमने में वक्त लगेगा… अभी कम से कम बंधा-बंधाया ही सही, पांच हजार रुपये तो आते हैं… लेकिन अपने कोचिंग में तो हो सकता है कि हजारों आ जाएं या महीने-छह महीने एक पैसा भी न आए… उस पर से किरायेदार को खाली कराकर कोचिंग शुरू करना है तो वह आमदनी भी बंद… फिर तब तक घर कैसे चलेगा… पापा के छह हजार रुपयों से? भाई राजवीर का स्कूल फीस कैसे जाएगा… मां के डायबीटिज की दवा कहां से आएगी… इसलिए दबा रखी थी न तूने अपनी चाहत… अब इसकी जरूरत नहीं… मैं और पापा घर चलाएंगे… तू अब इतना वक्त ले सकती है… वक्त इजाजत दे न दे मेरी इजाजत है तुझे… और बस हो गया तेरा खुदा बेचैन… उड़ गई उसकी रातों की नींद… अरे यह गरीब लड़की… इसकी इतनी मजाल…
क्या अनाप-शनाप बोलती रहती है… ईश्वर क्या गरीब-अमीर मानते हैं…
मानते हैं… बिल्कुल मानते हैं… गरीब-अमीर ही नहीं मानता वह, शक्ति प्रदर्शन भी करता है… अगर ऐसा नहीं होता तो पूरी दुनिया बिना जुर्म के क्यों उसके सामने सिर झुकाती… बता… बता मुझे… क्यों उसे सिर्फ अपनी प्रशंसा पसंद होती… कोई उसकी निंदा कर देता है, तो क्यों प्रलय आ जाती है… हाहाकार मच जाता है… ईश्वर की सूनामी लहरों पर सवार होकर शहर के शहर… देश के देश… अरे पूरी सभ्यता तबाह हो जाती है नीतिका… तू तो इतिहास की शोधार्थी है… क्या इतना नहीं जानती… जितना नुकसान तेरे इस खुदा ने किया है, उतना किसी तानाशाह ने नहीं… उसी की आड़ लेकर सब करते हैं सारा कुछ… इतना ही नहीं वह तो वहीं वास करता है, जहां धन है… देखा नहीं… ईश्वर जहां निवास करते हैं उसके नीचे सोने-चांदी का बिस्तर लगा होता है… इतना… इतना कि आदमी क्या सरकारें गिनते-गिनते थक जाती हैं… और ईश्वर को अपने से बड़ा पूंजीपति मानकर छोड़ देती हैं… कोई धारा नहीं लगातीं… कोई टैक्स नहीं लगातीं… और इस कृत्य को ईश्वरीय रहस्य… नहींइइइ… चमत्कार, हां चमत्कार मान लेती हैं… अवैध जमीन पर बनीं मजारें और मंदिरें पूंजीपतियों और शक्तिमानों का प्रश्रयगाह होती हैं, यह भी क्या तुझसे छिपा है नीतिका… यही वजह है कि ईश्वर के घरों में भी लक्ष्मीपतियों का ही राज होता है… कोई भी प्रभावशाली आदमी बिना पंक्ति के भगवान के दर्शन कर सकता है… और गरीब पंक्तिबद्ध निर्धन के हिस्से आती है भगवान की बेआवाज और पुलिस की तड़ातड़ बरसती लाठियां… ईश्वर के उपासक बाबाओं से किस तरह लक्ष्मीजी जा चिपकती हैं, यह भी क्या तुझसे छिपा है नीतिका… लेकिन मैं जानती हूं तू अब भी यही कहेगी… ईश्वर भेदभाव नहीं करता… वह तो हम करते हैं… सब भाग्य का खेल है… लेकिन तेरे ईश्वर का लिखा भाग्य मुझे मंजूर न था… और मैंने अपना भाग्य खुद गढ़ा… और यही वह पल था जब घबरा गया तेरा ईश्वर…
तू बुरा कर ही रही थी रतिका…
चिट्ठी नीतिका पर झपटी… मैं बुरा कर रही थी… क्या बुरा कर रही थी मैं… क्या यह मेरी क्वालिटी नहीं… अगर नहीं तो हर बॉस को क्यों चाहिए होती है एक खूबसूरत सेक्रेटरी… स्वर्ग में अप्सराएं क्या कर रही हैं… धरती पर संकट आता है या स्वर्ग का आसन डोलता है तो यही अप्सराएं होती हैं, जो अपनी लुभावनी मुद्राओं से धरती का संकट हरती हैं और इंद्र का राज बचाती हैं… और इंद्र एक बार फिर रासरंग में मस्त हो जाते हैं… बोल सच है कि नहीं… मुझे तो सिर्फ पैसा कमाना था… सिर्फ पैसा… किसी भी शर्त पर… क्योंकि मैं जान गई हूं कि आर्थिक आजादी ही किसी लड़की को इन मर्दों की गुलामी से निकाल सकती है… और अगर हमारे पास इतना खूबसूरत हथियार है तो क्यों नहीं मैं करूं उसका इस्तेमाल… बता… बोल मेरी बहना… मुझे भी हक है अपनी एक दुनिया बनाने की… तेरे ईश्वर की दुनिया के समानांतर… उतनी ही शक्तिशाली… ऐश्वर्यशाली समानांतर!… ईश्वर ने तुम्हें जितना दिया है… वही मेहरबानी समझो… ज्यादा लालच न करो… उससे न टकराओ… नहीं तो उसकी बेआवाज लाठी ऐसी पड़ेगी की पता भी नहीं चलेगा बहना…
लालच? लालच नहीं हक है यह मेरा… हां, आगे बढ़ना हक है मेरा… इसे कोई छीन नहीं सकता मुझसे…
ऐसे रिश्तों में हक की बात करना ही बेमानी है…
आगे बढ़ने की बात में रिश्ता कहां से आ गया… मैंने कब कहा कि मैं किसी रिश्ते में हूं… और जिसे तू रिश्ता कहती है उसे काम का हिस्सा मानती हूं मैं… अप्वाइंटमेंट के वक्त वही मेरी क्वालिटी बनी थी और प्रमोशन में भी वही काम आया… सर्टिफिकेट की इन फाइलों से मैं नौकरी नहीं पा जाती… तू बता तुझे ही मिली नौकरी… सर्टिफिकेट की इन मोटी-मोटी पोथियों ने कुछ भला किया तेरा… और सिर्फ हवाई जहाज पर टिक-टिक उड़ने भर से मैं कंपनी की डायरेक्टर नहीं हो जाती… एक्स्ट्रा क्वालिटी की जरूरत तो हर जगह होती है… वह थी मेरे पास… मुझे आउट आॅफ टर्न प्रमोशन मिला… जबकि कई कंपनियों का अनुभव लेकर आई लड़कियां अब तक घिस रही हैं वहीं के वहीं… अगर उनके पास भी होती कोई अतिरिक्त योग्यता तो हर वक्त नहीं उड़ रही होती उनके चेहरे पर हवाइयां…
याद है… हां, याद है मुझे…. छह महीने के अंदर मैं परमानेंट हो चुकी थी, जबकि वहीं छह-सात साल का अनुभव लेकर कंपनी में आई एयरहोस्टेस अभी तक टेम्पेरेरी थीं… मैं खुद को लेकर थोड़ी निश्चिंत थी… लेकिन एक दिन आॅफिस में अचानक सबके चेहरे पर हवाइयां उड़ती देखी, तो मुझे भी शंका हुई कि आखिर मामला क्या है… पूछने पर पता चला कि बिगबॉस यानी कंपनी के मालिक आ रहे हैं विजिट के लिए… आज वे सारे नये परमानेंट हुए स्टॉफ से मिलेंगे… खुद जज करेंगे सबको…
छह महीने की नौकरी में पहली बार डिगा था मेरा विश्वास… हिम्मत कर बोली, अब क्या जज करना, अब तो हम परमानेंट हो चुके हैं… परमानेंट?
हां, हो तो चुके हैं मगर इससे एस्योरिटी थोड़े ही मिल जाती है… परमानेंट और टेम्पेरेरी में सिर्फ इतना फर्क होता है कि उन्हें कभी भी निकाला जा सकता है और परमानेंट को तीन महीने की नोटिस या पेमेंट देकर। वह भी सिर्फ बेसिक पेमेंट… हां, परमानेंट होने पर सीएल, पीएल बढ़ जाते हैं… मेडिकल लीव और टूर पैकेज मिलने लगते हैं… सैलरी लगभग दोगुनी हो जाती है… ये सब फायदे हैं मगर एस्योरिटी जैसा कुछ नहीं है… मुझे काटो तो खून नहीं… तेरी नौकरी छुड़वा दी थी… कोचिंग अभी नुकसान में चल रहा था… किरायेदार को हटा चुकी थी… अगर मेरी नौकरी चली गई तो हम तो रोड पर आ जाएंगे… भूखे मरना पड़ेगा… पापा के छह हजार से क्या होगा… पता नहीं बॉस कैसा है… उसे क्या क्वालिफिकेशन चाहिए… हे भगवान, मैंने कॉन्ट्रैक्ट ठीक से पढ़ा क्यों नहीं… अक्षरशः! पढ़ा तो था, फिर कैसे हो गया मिस… तो पता चला कि ये टर्म एंड कंडिशन कुछ ऐसी भाषा में लिखी जाती हैं कि एक्सपर्ट ही समझ पाते हैं… लेकिन कंपनी कानूनी रूप से मजबूत स्थिति में आ जाती है मनमर्जी के लिए… तो उस दिन की मेरी मानसिक स्थिति… उफ्फ… चिट्ठी कराही…
पहले, लगभग दो घंटे तक उन्होंने हम लोगों को ग्रुप में बुलाकर कई तरह के सवाल पूछे… फिर एक-एक कर सबको अपने केबिन में बुलाकर पूछताछ की… मेरा चेहरा फक्क पड़ता जा रहा था… मैं बहुत नर्वस थी… बार-बार पानी पी रही थी… तभी मेरे बगल में बैठी लड़की जो पिछले कुछ दिनों में मेरी अच्छी दोस्त भी बन गई थी ने कहा, तू क्यों मरी जा रही है… तेरा अप्वाइंटमेंट तो हरीश सर ने किया है। बॉस के बाद दूसरे नंबर पर हैं वह। उस पर से तू सिद्धि मैडम की चहेती है…
हां, तो…
तो फिर डरने की कोई बात नहीं… क्योंकि हरीश सर की कोई बात अमूमन सर काटते नहीं… उस पर से सिद्धि मैडम की कृपादृश्टि? उसने इस बात को प्रश्न वाचक की तरह वापस मेरी तरफ उछाल दिया…
मेरी समझ में कुछ नहीं आया… मैंने अहमकों की तरह उसके सामने पलकें झपका दी…
बड़े अर्थपूर्ण ढंग से वह बोली थी- उनके किये की काट तो बिगबॉस के पास भी नहीं है… देखती नहीं जब मन हो आती है, मन न हो तो नहीं आती, जब मर्जी चली जाती है। कोई कुछ नहीं कह सकता उनको… यहां तो नाम का काम करती है वह… पेमेंट उठाने के लिए… सच में तो वह अपना पूरा वक्त मॉडलिंग में लगाती है…
तो कोई कुछ कहता क्यों नहीं उन्हें… इतनी लिबर्टी क्यों… मालिक की रिश्तेदार हैं क्या…
सबसे प्यारी रिश्तेदार… जैसे तू हरीष सर की… बोलते-बोलते उसने दांत काटी।
मैंने आंखें तरेरी- क्या मतलब!
कुछ नहीं… ऐसे ही मजे ले रही थी… क्या तुझसे मजाक भी नहीं कर सकती?
लेकिन उसके इस मजाक से मुझे रास्ता मिल गया था और अपने मजबूत पहलू का एहसास भी हो गया था। देखा नहीं मेरे इस क्वालिफिकेशन से कैसे मिर्ची लगी थी उस लड़की को…
हां नीतिका, जानती हूं यह पढ़ते वक्त तुम क्या कहोगी… मिर्ची नहीं… खैर जाने दो, तभी मेरा कॉल आ गया था… दरवाजा खोलते ही हाई हील के सैंडल तले मेरी साड़ी फंस गई थी… फंस क्या गई थी… सच तो यह है कि मैं अपने मजबूत पक्ष को उजागर करने का मौका तलाश रही थी… हड़बड़ाहट में साड़ी संभालने के नाम पर मैंने अपने पल्लू को पूरी तरह से नीचे सरक जाने दिया था… फिर आहिस्ता-आहिस्ता कर पल्लू को यथास्थिति पहुंचाने के लिए इस तरह नीचे झुकी कि तेजी से झुकी तो गिरने का खतरा है… चुस्त फिटिंग के कपड़े की वजह से मेरे अंग उबले दूध की तरह फफक कर बाहर आने को आतुर हो गये… मुझे लगा मेरा जादू चल गया… बॉस की नजरें मेरी गरदन के नीचे एकटक जमी थी… मैं तेजी से पल्लू संभालती हुई नजरें नीची किये बॉस के सामने इस तरह खड़ी हो गई कि उन्हें लगे कि अचानक घटित हुई इस घटना से मैं बेहद शर्मिंदा हूं… और उनसे नजरें नहीं मिला पा रही हूं… धीमी आवाज में सॉरी बोलते हुए उनके सामने टेबल के पास आकर खड़ी हो गई थी…
उनकी घूरती बिल्लौरी आंखें… अब भी वहीं कहीं अटकी थी… शायद उससे भी नीचे… टेबल की ऊपरी सतह के समानांतर… एकबारगी मुझे लगा मेरी इस हरकत पर वह नाराज हो गए हैं मुझसे… लेकिन अगले ही पल वे एकदम सहज हो गये…
मुझे नर्वस देख बोले, अरे मैं कोई शेर नहीं, जो तुझे कच्चा चबा जाऊंगा… देख मेरे भी दो ही हाथ हैं… नाखून भी नहीं हैं… मेरे दांत भी देख ले… फिर अर्थपूर्ण अंदाज में बोले, इसमें खून नहीं लगा है, जो तू घबरा रही है…
मैं बड़ी अदा से मुस्कुराई… फिर वे मुझसे लगभग दस मिनट तक बातें करते रहे थे… घर-परिवार, पसंद-नापसंद… और फिर बोले- कल से ड्यूटी ओवर होने के बाद तू मुझे रिपोर्ट करेगी… सिर्फ मुझे, समझी… और डर मत… तेरी नौकरी सरकारी टाइप परमानेंट हो गई… समझी या समझाऊं…
मैं जानती थी… मेरी यह क्वालिफिकेशन यहां भी काम कर गई थी… और मुझे बिन मांगे मोती मिल गया था… खुश इतनी थी कि पैर जमीन पर ही न पड़ते थे… मैं मन ही मन गुनगुना रही थी- आज मैं ऊपर, आसमां नीचे… रिपोर्ट करने जाती तो वे ऐसे प्यार जताते मानो मेरे आने के इंतजार के सिवाय उनके पास कोई काम ही न हो… खूब लाड़ दिखाते थे मुझसे…
मैं भी कोई कम तो थी नहीं… मैं जान गई थी कि हरीश सर मेरी महत्वाकांक्षा के बीच आने वाले कड़ी भर थे और अब उनसे पीछा छुड़ाने का वक्त आ गया है… बस, धीरे-धीरे उन्हें इग्नोर करने लगी उन्हें, साथ ही इस कोशिश में भी रहती कि अपना ज्यादा से ज्यादा वक्त बॉस के साथ बिताऊं… बॉस का हाथ मेरे सिर पर देख हरीश सर भी अब मुझे कुछ बोलते नहीं थे…
और एक दिन मेरे प्रभाव में आकर बॉस ने कह ही दिया था- रतिका, ऐसा नहीं है कि तुम मेरे जीवन में आने वाली पहली लड़की हो… कई लड़कियां आई हैं… लेकिन तुम में जो बात है वह किसी में नहीं… आई लव यू… क्या तुम इस नाचीज को अपने दिल में थोड़ी-सी जगह दोगी…
बस यही तो चाहती थी मैं… लेकिन इतनी जल्दी उनके हाथ भी नहीं आना चाहती थी… इसलिए नखरे दिखाने लगी… सर, जैसा आप समझ रहे हैं, मैं वैसी लड़की नहीं हूं… इसके बाद धीरे-धीरे कई दिनों तक वह मेरी मनुहार करते रहे… यह समझाने की कोशिश करते रहे कि सच में उन्हें मुझसे प्यार हो गया है… उन्हें मेरी देह, मेरी सुंदरता ने नहीं, बल्कि मेरी देह से निकलने वाली खुशबू ने बेकरार कर दिया है… और ऐसा तभी होता है, जब कोई सच्चे प्यार में पड़ता है… उसके बाद चूहे-चूहिये के बीच के रतिक्रिया के बारे में बताया… उसमें चूहिये के देह से निकलने वाले फेरोमोनल गंध के बारे में बताया… यह भी बताया कि जिस चूहे को किसी चूहिये के शरीर की गंध पसंद नहीं आती तो वह उसे छूता भी नहीं है… मैं समझ गई थी कि वह अब पूरी तरह से मेरे फेंके प्यार के पाश में बंध चुके हैं… बस अब शकुनी की तरह मुझे अपने पांसे सही फेंकने होंगे और गोटियां हमेशा सुरक्षित घर में रखनी होगी… तुम नहीं समझ सकती नीतिका यह एहसास कितना सुखद होता है… क्योंकि तब लगता है कि मर्दों द्वारा सदियों से सताई स्त्रियों का मैं बदला ले रही हूं… जब-जब मैं उनके मजबूत बाहों की गिरफ्त में होती और वे तरह-तरह से मेरी तारीफ और खुशामद में लगे होते, तो मुझे बेहद खुशी होती, क्योंकि तब-तब मुझे लगता कि मैं वह सशक्त नारी हूं, जो अनादिकाल से औरतों पर होते आए अत्याचार का बदला ले रही है… और जब बेबस निढाल होकर मेरी बांहों में पड़े होते, तो मुझे लगता कि मेरे दो दांत बाहर निकल आए हैं, जो उनके गरदन पर पड़े हैं और मैं उनका रक्तपान कर रही हूं… मैं खुद को वह सशक्त स्त्री समझती, जो औरत जाति की प्रतिनिधि बनकर उनके सारे अपमानों का बदला चुका रही होती है… जब चरम पर पहुंचती तो मुझे लगता कि अब स्त्रियों को इस्तेमाल करने वाला मर्द मेरी ताकत के घेरे के अंदर बंद होकर तड़फड़ा रहा है… सच पहले-पहल तो मुझे यही लगा कि मैं दुनिया की वह शक्तिशाली स्त्री हूं, जो मर्दों को उन्हीं के हथियार से उनको नचा रही है… उनका इस्तेमाल कर रही है…
इस तरह से मैं उस पर राज करने लगी थी और वह वही करता था, जो मैं चाहती थी… एक दिन उसने कहा, तू अब ये सब ड्यूटी-फ्यूटी छोड़… तू तो मेरी मालकिन है… जब मेरी मालकिन है तो इस कंपनी की भी मालकिन हुई न… अब तू रानी बनकर राज कर… समझी या समझाऊं… और मुझे कंपनी का डायरेक्टर बना दिया… मैं भौंचक्क… इतना तो मैं भी नहीं सोच पाई थी… तभी उसने मुझे बांहों मेें भरते हुए कहा था कि मेरी रानी इसमें भी मेरा ही स्वार्थ है… तू वहां जहाज में उड़ती रहती है और यहां तेरा आशिक तड़पता रहता है… अब जब तू बगल के केबिन में रहेगी तो जब जी चाहेगा हम दो जिस्म एक जान हो जाया करेंगे… समझी या समझाऊं…
चिट्ठी के चेहरे पर एक अनबुझ भाव तैरा… पता नहीं यह खुशी का भाव था या दुख का… नीतिका, तू समझ नहीं सकती उसके इस एक फैसले ने मुझे असमंजस में डाल दिया था… अचानक से उसके डायरेक्टर बनाने से मैं सशंकित हो उठी थी… फिर धीरे-धीरे मेरे दिमाग से यह आशंका भी जाती रही… इस डर को भविष्य भरोसे छोड़ दिया… हां तो मैं बता रही थी कि वह था बहुत रसिक और प्यासा… रोज कुआं खोदता था… एक-दो बार नहीं… कम से कम तीन-चार बार… कहता, रतिका तेरी ये जो दो हिमालय की चोटियां हैं न… एक एवरेस्ट हैं, दूसरी कंचनजंघा… ऐसी तो पूरे जहान में किसी के पास नहीं हैं… इन चोटियों के बीच मेरा तो नियाग्रा जल प्रपात भी डूब जाता है… मेरे जल प्रपात के सारे पानी तू सोख जाती है तू… और मैं फिर प्यासा रह जाता हूं… गजब है तू रतिका… तेरे साथ मुझे दुनिया की सबसे तंग और गहरी काली गंडकी घाटी में घूम आने जैसे रोमांच का एहसास होता है… तू जो संतुष्टि देती है न, वह मुझे आज तक कभी किसी से नहीं मिली… मुझे छोड़ना मत कभी… हां, इसके बदले वह मुझे वो सब देता था, जो मुझे चाहिए था… जितना मांगती थी उतना पैसा… सुख सुविधाएं… गिफ्ट्स… मगर…
मगर क्या? तेरे हिसाब से तो सबकुछ अच्छा-अच्छा था… तू तेजी से आगे बढ़ रही थी… घर की आर्थिक स्थिति बेहतर… बेहतर और बेहतर होती जा रही थी…
हां, लेकिन मेरे सुख के बीच तेरा ईश्वर चला आया… जैसे तुझे अपने खुदा से मांगना पड़ता है सबकुछ… उसकी पूजा करनी पड़ती है… फिर उसकी मर्जी, दे, चाहे न दे… या नखरे दिखाये… वैसे ही इससे भी मुझे सबकुछ मांगना पड़ता था… बन बैठा था वह मेरा खुदा… अपने मन से कुछ भी नहीं देता था… मांगती तो एहसान जताना कभी नहीं भूलता था… तरसा-तरसा कर देता था… रोज उसे उसके बड़े होने का एहसास कराना पड़ता है… उसके सामने शीश नवानी पड़ती थी, तारीफ करनी पड़ती थी… फिर भी इतराता, कौन करेगा इतना… बोलो, मेरे जितना कोई और करेगा… तब मुझे एहसास हुआ था कि ठगी गई थी मैं… मैं उसे नहीं नचा रही थी, बल्कि वह मुझे नचा रहा था… वह इस्तेमाल कर रहा था मेरा… आज से नहीं, पहले दिन से… मैं ठगी गई हूं… बस खून खौल उठा मेरा…
जब तू अपनी समझ से उसे नचा रही थी तब…
चिट्ठी से आंखे नचाती रतिका बोली, तब क्या… किसी का इस्तेमाल करने और इस्तेमाल होने में बहुत का फर्क होता है… इस्तेमाल करते वक्त तो बहुत मजा आता है, लेकिन होते वक्त बहुत दर्द होता है… टीस होती है… पोर-पोर इस जलन के एहसास से घाव की तरह टभकता है… तब मुझे यह एहसास हुआ था कि कुछ नहीं बदला… बस बदलते जमाने में इस्तेमाल करने की तकनीक बदली है… सबकुछ वैसा ही है… आदिम… नंगा… बदबूदार… जो सड़कर अब और सड़ांध मार रही है… मर्दों ने औरतों को जूती बनाये रखने के इस मुलम्मे को देह मुक्ति का बस एक वैचारिक जामा पहनाकर उसे मजबूत नाड़े से बांध दिया है, जिसके नीचे वही जलती अंगार है… ठीक वैसे ही जैसे पहले के बंधुआ मजदूर आज के कामगार में बदल गये हैं… पहले उनसे मार-पीट कर काम लिया जाता था और अब कांट्रैक्ट में बांधकर कभी भी नौकरी ले लिये जाने और उसके बदले मजदूरों से ही जुर्माना लिये जाने का भय दिखाकर काम लिया जाता है… मुझे बुरी लगने लगी थी यह बात… इसी बांदी समझने के रवैये से तेरे ईश्वर को नकारा था… अब दूसरा मेरा ईश्वर बना बैठा था… वह भी तो बांदी ही समझता था… जरखरीद गुलाम, जबकि मैं तो बराबरी का मामला चाहती थी… उसका पैसा और मेरा… लेकिन वह जो पैसे देता था वह सोना… और बदले में मैं जो देती थी वह मिट्टी, उसका मानो कोई मोल नहीं… ऐसा ही दिखाता था वह… अकसर कहता, यह मत सोचना कि मैं कीमत दे रहा हूं… अरे लड़की तो अच्छी से अच्छी दस-बीस हजार में मिल जाती हैं… लेकिन तू… तू तो मेरे लिये… उसका यह एहसान दिखाना अखरने लगा था मुझे… बार-बार हाथ क्यों फैलाऊं मैं… मैं भिखारी नहीं थी… मैं उसके पैसे के बदले में उससे ज्यादा कीमत चुकाती थी… इसलिए बुरा लगने लगा था… या तेरे मध्यवर्गीय संस्कार मेरे अंदर भी जोर मारने लगे थे… पता नहीं, बस इतना पता है कि अब उसे बरदाष्त करना मेरे लिये मुश्किल हो गया था…
बुरा लगने की यह प्रक्रिया कोई एक दिन में नहीं शुरू हुई, लेकिन घी में आग का काम किया उस एक क्षण ने, जब एक बार मेरा मूड बहुत खराब था और मैंने उसे मना कर दिया… बस उसने मुंह फुला लिया… जब-जब उसके सामने गई, कोई न कोई बहाना लेकर भन्नाता रहा… मेरा फोन पिक नहीं किया… उस दिन वह मुझे पैसे देने वाला था, वह भी नहीं दिये… ऐसे ही एक बार और हुआ तो उसने मेरी सैलरी चेक पर साइन ही नहीं की… सबकी सैलरी आ गई… मुझसे कहा गया कि सर कुछ बिजी चल रहे हैं… फ्री होते ही साइन करेंगे तब सैलरी मिलेगी… अब मैं जान-बूझ कर भी मना करने लगी, उसकी नीचता की हद जानना चाहती थी… और तब मुझे एहसास हुआ, वह मुझे सिलिकॉन की बनी सेक्स डॉल की तरह का कोई खिलौना समझता हैं… या ऐसा सेक्स रोबोट कि जब उसका मन करे, उसके अंगनुमा एक-एक यंत्र को जोड़ कर अपनी ख्वाहिशें पूरी कर ले, फिर उसे अलग-अलग कर अपने शयनकक्ष में इस तरह सजा दे, जैसे कोई गुडि़या… मैं उसके इस व्यवहार से पूरी तरह खौल गई थी… यह स्थिति मंजूर नहीं थी मुझे… क्योंकि इतना तो तब तक मैं जान ही चुकी थी कि वह जब जिस पर मेहरबान होता है, उसे निहाल कर देता है और जैसे ही मन भरा या दूसरी मिली तो तू कौन और कौन मैं… मेरे आने के बाद सिद्धि का हाल ऐसा ही हुआ था… किसी और के आने के बाद मेरा भी यही हाल नहीं होगा, इसकी क्या गारंटी थी… वह खुद बता चुका था कि पहले भी कइयों की ऐसी-तैसी वह कर चुका है… सबसे बड़ा झटका तो मुझे तब लगा, जब उसने अपने एक डील के लिए मुझे अपने क्लायंट को खुश करने को कहा… जब मैंने मना किया तो एकदम से भड़क उठा- तेरे लिए इतना कुछ करता हूं, तेरी कोई भी इच्छा मैं जमीन-आसमान एक कर पूरा करता हूं… तू मेरे लिए इतना भी नहीं कर सकती…
इतना सा?
और नहीं तो क्या… क्या रखा है इसमें ऐसा, जो खत्म हो जायेगा एक बार से… आजकल तो ऐसी बातें मायने ही नहीं रखतीं… चल मैं तेरा आपरेशन करवा दूंगा… तेरे पति को कुछ पता भी नहीं चलेगा… फिर से मिडिल क्लॉस सेंटिमेंटल फूल की तरह बातें न कर, वरना वापस उसी गटर में चली जाएगी, जहां से निकली थी तू… फिर स्वर हल्का कर बोला था- कम आॅन यार… ये सब तो मामूली बातें है… समझी या समझाऊं…
मैंने कहा था सर यह मामूली बात नहीं… अभी तक जो भी मैंने किया है, वह अपनी इच्छा से किया है… अपनी मर्जी से किया है… आगे भी जो करूंगी, उसमें मेरी मर्जी जरूर शामिल होगी… ऐसे ही बिना मर्जी के किसी के सामने बिछ जाने वालियों में से मैं नहीं हूं… और रही मामूली-सी बात की, तो क्यों नहीं अपनी बीवी को भेज देते हैं… बहुत दिनों का जमा कोई ज्वालामुखी फूट पड़ा था मेरे भीतर… चिट्ठी से गरम-गरम लावा निकलने लगा…
चटाक! दो टके की लौंडिया मेरी बीवी से अपनी तुलना करती है… रंडी कहीं की… लड़की सिर्फ पहली बार अपनी मर्जी से किसी मर्द का बिस्तर गर्म करती है, उसके बाद यह उसकी नियति हो जाती है… उसके पास लौटने का कोई रास्ता नहीं बचता… मर्जी से नहीं आएगी, तो ब्लैकमेल होगी… पैसों के लालच में आएगी… प्यार से आएगी… जोर जबरदस्ती से आएगी… धमका कर आएगी… जाएगी कहां… क्योंकि अपने सारे रास्ते तो वह मर्द के बिस्तर पर ही छोड़ आई होती है… अपनी मर्जी हूंह… माई फुट… जड़ दिया था उसने एक जोरदार थप्पड़… गाल से ज्यादा दिल पर लगी थी यह चोट…
चिट्ठी बिसूरी… मैं समझ गई थी एक बार कदम डगमगाने के बाद सधे कदमों से चलना इतना आसान नहीं होता… उसके बाद सबकुछ एम्प्लॉयर की मर्जी पर मुनहसर होता है… लेकिन मैंने भी इस दलदल से बाहर निकलने की जिद ठान ली थी बहना… इसलिए अपने व्यवहार के लिए बाद में उसके माफी मांगने का कोई असर नहीं हुआ था मुझ पर… मनाने का भी नहीं… फॉरेन टूर पर भी ले गया… लेकिन मैं बस एक मौके के इंतजार में थी, इसलिए चुप थी… अब जब वह मेरी तारीफ करता तो मेरा दिल कहता था, देख साला, हरामी कैसे चटखारे ले रहा है… दिल करता आंखें फोड़ दूं कम्बख्त की… मन में आता, मुझ पर नजर पड़ते ही लार टपकने लगती है इस कम्बख्ती के मारे की, जब इतनी ही अतुलनीय अच्छी बीवी है तो, क्यों मुंह मारता फिरता है इधर-उधर… फिर खुद ही जवाब देती, कुत्ते की जात है न साला… मुंह नहीं मारेगा तो और क्या करेगा…
क्या बके जा रही है… नीतिका चीखी…
मैं बक रही हूं… अबे घोंचू तेरा इतिहास बक रहा है… इतिहास उठाकर देख ले मेरी पढ़ाकू इतिहास टीचर… घर में बीवी और साहब कोठे पर… क्यों? मजे के लिए ही न… कोठा छोड़, तू यही बता कि किस राजा ने हरम नहीं बनवा रखी थी… किस खेतिहर किसान की बहू-बेटी को नहीं सोना पड़ा जमींदार के साथ…
बकवास में तुझसे कोई जीत सकता है भला?
नहीं जीत सका कोई भी मुझसे… चिट्ठी गर्व से इतराई… दो साल… सिर्फ दो साल… और देख तू कि मैं कहां हूं… आज मैं एयरहोस्टेस नहीं, डायरेक्टर हूं कंपनी की… और तू? वहीं की वहीं… दस हजार रुपल्ली पाने वाली स्कूल टीचर… बड़े गर्व से कहा था न तूने कि मैं कभी कोचिंग खोलती ही नहीं रतिका अगर जान जाती यह सच… मुझे तो लगा तू नौकरी कर रही है… तू तो उसकी रखैल बनी फिर रही है… नहीं चलानी मुझे ऐसे कुकर्म के पैसे से शुरू की हुई कोचिंग… और बंद कर दी थी तूने कोचिंग… लेकिन… चिट्ठी फट पड़ी… तो और क्या करती भूखे मरती… फिर तुरत रो पड़ी थी चिट्ठी, तू सही थी नीतिका… मैं तो देह की आजादी, आर्थिक आजादी के सपने के साथ आई थी, मुझे क्या पता था, जो समतल सरपट भागती सड़क दिख रही है, वह सुराब है… मरीचिका है… दलदल है… भट्ठी है… आजादी नहीं, आजादी का आभास मात्र! यह तो वह रास्ता है, जो सिर्फ आजादी, उन्मुक्तता, मजे का एहसास देता है, मगर स्त्री रहती है गुलाम की गुलाम ही… बस गुलामी का चोला बदल जाता है… वह अपनी देह का इस्तेमाल अब भी अपनी मर्जी से नहीं, मजबूरी और असुरक्षा की वजह से कर रही होती है… या थोड़े से लालच के लिए… जो भी है इस राह पर चलने की आखिरी नियति मरना ही है… लेकिन मैं मरना नहीं चाहती थी नीतिका, आगे बढ़ना चाहती थी… मैं चाहती थी कि हथउठाई या मुंहतक्कन के जीवन से छुटकारा मिले… मगर यह भी मंजूर न था उसे… वह हमेशा मुझे अपना मोहताज बनाकर रखना चाहता था… लेकिन मैं रतिका थी… नीतिका नहीं… एक महत्वाकांक्षी लड़की जिसने अपनी लड़ाई खुद लड़ी है हमेशा… और पाया है वह सबकुछ जो चाहा है… अब मैं इन परिस्थितियों से आगे निकलना चाहती थी… इसलिए अब मैं इस बीच की गई कॉरस्पांडेस कोर्स की रौ में आगे की राह देख रही थी… बस एक मौके की तलाश में थी… चिट्ठी दहाड़ी… अब तो मेरे पास अनुभव भी था… कंपनी चलाने तक का अनुभव… तो यह नहीं देगा तो दूसरी जगह ट्राई करूंगी… अच्छे मौके खुद चल कर आएंगे मेरे पास… फिर क्यों जिऊं मैं इस दोगले के भरोसे दोयम दर्जे की जिंदगी… मेरे सपने भी अब खिलने लगे थे… सोच रही थी कि कुछ दिन और कहीं अच्छे फर्म में अच्छी-सी नौकरी कर लूं, फिर खोलूंगी अपनी कंपनी… साले समझते क्या हैं मुझे… इनसे कम हूं क्या… थोड़ी बीस ही हूं योग्यता में उन्नीस तो हरगिज नहीं…
लेकिन तुम सही थी नीतिका… कहा तो था तुमने मुझे कि रतिका, ईश्वर को दूर से देखा जाता है… चाहा जाता है… स्वर्ग की कामना की जाती है…. और इसी कामना में अपनी जिंदगी होम कर दी जाती है, ठीक वैसे जैसे चंदा को तकते हुए चकोर कर देती है… लेकिन ईश्वर की दुनिया में घुसपैठ नहीं किया जाता… ईश्वर की दुनिया में रहने का ख्वाब देखना तो ठीक है, मगर उसकी दुनिया में हकीकत में नहीं रहा जाता, क्योंकि यह ईश्वर को बरदाश्त नहीं… वह तुझे दूध से मक्खी की तरह निकाल फेंकेगा…
ऐसे कैसे निकाल फेंकेगा… मैं कोई मक्खी नहीं… चिट्ठी दहाड़ी…
तो वह तेरा जीना हराम कर देगा…
हां, नीतिका… बिल्कुल सही कहा था तुमने… उसने मेरा जीना हराम कर दिया… मैंने मौके तो ढूंढ़ भी लिए अपने लिए… लाखों की सैलरी सारी सुविधाएं इज्जत सबकुछ मनमाफिक… यहां भी डायरेक्टर का पोस्ट, लेकिन इस बार यह हथउठाई में नहीं मिला था मुझे… यह अर्जित किया था मैंने… अपने काबिलियत के बूते… एवरेस्ट और कंचनजंघा जैसी चोटियों के बल पर नहीं… अब ऐसा सोचना भी गाली-सा लगने लगा था मुझे… लेकिन कांटे बिछा दिये उसने मेरी राह में… चिट्ठी बिलख पड़ी… इस बार मेरी राह में आया उसका वजीफा पाने वाला थानेदार… झूठी एफआईआर कर मेरे लिये कहीं और नौकरी करना नामुमकिन कर दिया… दूसरी तरफ बिगबॉस मुझे धमकियां और प्रलोभन देता रहा… मुझे बरबाद कर देने की धमकियां… मुझे पता ही नहीं चला था कि उसने धोखे से कंपनी के पेपर के नाम पर कई अन्य ऐसे दस्तावेजों पर भी मेरे हस्ताक्षर ले लिए थे, जिसके अनुसार मैं उसकी कंपनी की कर्जदार हो गई थी… इतनी बड़ी रकम की कर्जदार कि सब कुछ बेचकर भी चुका न पाती… पता नहीं कब उसने हमारे मस्ती के क्षणों को भी भयावह बना दिया था… एमएमएस बनाकर… वह बार-बार कहता फिर से कंपनी में आ जाओ… मेरी बन जाओ… यह सब फाड़कर फेंक दूंगा… एमएमएस डिलीट कर दूंगा… क्या करूं मेरी जान तूने ऐसा चस्का लगा दिया है कि किसी और से दिल ही नहीं भरता… लेकिन मैं जानती थी, सच यह नहीं था… सच तो यह था कि ये भगवान तो भक्तों को दुत्कार सकते हैं, छोड़ सकते हैं, मगर कोई इन्हें कैसे छोड़ सकता है? आहत था वह इस एहसास से कि उसे छोड़ा गया है, इसलिए मजा चखाना चाहता था वह मुझे… और मुझे उस कंपनी में वापस जाना और जीवन भर रखैल बन कर जीना मंजूर नहीं था… ऐसी हालत में दूसरी कंपनी में काम करना भी नहीं संभव था… अपनी कंपनी खोलना… पहले तो इतना साधन नहीं था, दूसरे उसके कथित कर्जे जो मैंने कंपनी से लिये थे, चुकाये बिना कोई दूसरा काम कर भी नहीं पाती… कई तरह की कानूनी अड़चने सामने आ जाती… और इस एमएमएस ने तो मेरी नींद ही उड़ा कर रख दी थी… फिर क्या करती मैं, तू ही बता… कोई रास्ता ही नहीं बचा था मेरे पास… बोल न नीतिका क्या करती मैं… अपने परिवार वालों को फिर से रोड पर आने देती… नहीं कर सकती थी ऐसा… वह धमकी देता था कि तुम्हें और तुम्हारे परिवार को जेल भिजवा दूंगा, अलग-अलग शहरों में अलग-अलग एफआईआर कर दौड़ाता रहूंगा… तेरा एमएमएस क्लिप इंटरनेट पर डाल दूंगा… ब्लूटूथ के जरिये पूरे शहर में बंटवा दूंगा… उसके पास पावर था… पैसा था… अच्छी तरह पता था मुझे कि वह जब चाहे इस करप्ट सिस्टम में ऐसा कर सकता था… बल्कि इससे भी ज्यादा… इसलिए कोई रास्ता बचा ही नहीं था मेरे लिए नीतिका…
एक बात नीतिका, जो मैं सिर्फ तेरे से शेयर करना चाहती हूं… वह यह कि मैं मरना नहीं चाहती थी… कभी नहीं… अगर सिर्फ अपनी बात होती तो इस जिल्लत के बाद भी जीती… लेकिन अगर मैं जी तो वह मेरे परिवार को भी बरबाद कर देगा… इसलिए जा रही हूं…
जानती है नीतिका जब मैंने मरने का फैसला लिया तो कैसे किलस कर रह गई… कलेजा कांप उठा… लगा मरने से पहले ही रूह फना हो गई… कई-कई बार फंदे को गले में डाला और निकाला… फंदे के नीचे कांपते हाथों से कुर्सी लगाने से पहले कई बार मेरी हाथों से वह छूटी और गिरी… बार-बार मन बदला… गौतम बुद्ध याद आए… उनकी यह बात, दुख है… दुख का कारण है… कारण है तो निवारण है… नेपथ्य से मेरे कानों में गूंजती रही… हिम्मत देती रही, मत मरो… लड़ो… हर समस्या का हल इसी जिंदगी में है… मरने के बाद कुछ भी नहीं… चार्वाक सामने खड़े हो गए… जिंदगी ही सबकुछ है… कोई आत्मा नहीं… मरने के बाद कुछ भी नहीं…
यावज्जीवेत सुखं जीवेद ऋणं कृत्वा घृतं पिवेत, भस्मीभूतस्य देहस्य पुनरागमनं कुतः
जब तक जीवन है सुख से जियो… खुद के पास साधन नही है, तो उधार लेकर जिओ मरने के बाद शरीर को किसने वापस आते देखा है? यानी मौत का मजाक बनाकर जियो…
लेकिन शायद तब वे यह नहीं समझ पाए थे कि आदमी की जिंदगी इतने डोरों से बंधी होती है कि अगर एक डोर न काटी जाए तो सारे डोर उलझ कर रह जाती हैं… मैं सच कहती हूं नीतिका मैं जीना चाहती थी… लेकिन परिवार की कीमत पर नहीं…
हां नीतिका, सचमुच जीना हराम कर दिया था उसने मेरा… और अभी और जीती तो पूरे परिवार का हराम कर देता… इसलिए जा रही हूं मैं… अलविदा… चिट्ठी ने हाथ हिलाया… और चिट्ठी उड़ने लगी… नीतिका दौड़ी… उसे पकड़ने की कोशिश की… भरपूर कोशिश… चिल्लाती रही… तू क्या समझती है कि तेरे मरने के बाद वह परिवार को छोड़ देगा… वह अब भी वही करेगा, जो तेरे जिंदा रहने पर वह करता… चिट्ठी के पीछे भागती रही नीतिका… चिट्ठी आसमान में… नीतिका नीचे… तभी आकाषवाणी हुई, याद है नीतिका तू रामायण पढ़ती थी- जन्मत मरत दुसह दुख होई… यह तो ईश्वरों के लिए सत्य है… जन्म लेते समय का तो पता नहीं मगर मरते समय उन्हें दुसह दुख इसलिए होता होगा कि हाय यह ऐश्वर्य छोड़कर कैसे जाऊं…. यह सत्य हम जैसों के लिए नहीं है… हमारे लिए तो बस एक ही सत्य है… जीवन माने नरक… मौत माने मुक्ति… और इस मुक्ति को अंगीकार करने से हमें भला कौन-सा ईश्वर रोक सकता है… इतनी किसकी हैसियत है… ठीक है कि मैं जैसी जिंदगी चाहती थी, मैं वैसी जिंदगी अपनी इच्छा से जी नहीं सकी। जीना चाहा तो पता चला इस दुनिया में बहुत सारे खुदा हैं, जो मुझे जीने नहीं देंगे। लेकिन जितने दिन जी… अपनी मर्जी से जी… और जब लगा यह मुमकिन नहीं तो मौत… हां, मौत भी अपनी मर्जी से अंगीकार कर रही हूं… इसमें भी तुम्हारे भगवान का कोई दखल नहीं होगा… लो मैं भी चली… उड़न छू… अलविदा नीतिका… और चिट्ठी हवा के बवंडर में घुसकर ऊपर… बहुत ऊपर… और फिर नीतिका की नजरों से ओझल हो गई…
फिर जैसे दिक्-दिगान्तर गूंज उठे- तुम सही थी नीतिका… हां… लेकिन पूरी तरह नहीं… मैं अब जानती हूं नीतिका क्या गलती की मैंने… सचमुच मैं जान गई हूं… मुक्ति के नाम पर मैं इधर से उधर छलांगे लगा रही थी… अपनी सुविधानुसार कभी इस तरफ, कभी उस तरफ… शेर के खतरे से अनजान जंगल-जंगल हिरनी की तरह कुलांचे मार रही थी… ऐसे में यह तो होना ही था… एक तरफ तो मैं देह से मुक्ति की बात कर रही थी, दूसरी तरफ उसी देह को टूल की तरह इस्तेमाल कर रही थी… उसकी कीमत वसूल रही थी… जबकि इस मुक्ति के साथ तो एक जिम्मेदारी भी आती है… मैं उसी से भाग रही थी… इस आजादी का मतलब तो मात्र इतना भर होता है कि देह से इज्जत नहीं जुड़ी है… इज्जत अपने कर्मों से जुड़ी है… जिम्मेदारी से जुड़ी है… मैंने उसे ही शर्मसार किया… इस स्वतंत्रता का मतलब तो यह था कि अगर कुछ ऐसा-वैसा हो तो खुद को दोशी मत मानो… और बढ़ चलो अपने काम पर… पर मैंने स्वतंत्रता को स्वछंदता समझ लिया… देह को औजार समझ लिया… तो फिर कैसी मुक्ति… कहां की मुक्ति… जैसे ही शरीर को औजार बनाया, वैसे ही जुड़ गई अपनी देह से, बल्कि और कसकर पकड़ लिया अपने देह को… एक और बात मेरी बहना… दूसरी गलती मुझसे यह हुई कि आर्थिक आजादी के नाम पर एक तरफ तो मैंने तेरे ईश्वर की सत्ता को चुनौती दी, दूसरी तरफ उसी की तरह शक्तिशाली और ऐश्वर्यशाली दुनिया के निर्माण के मंसूबे भी बांध रही थी, विश्वामित्र की तरह… इसका मतलब तो यही था न कि मैं भी खुदा बनने की राह पर चल रही थी, यानी फिर कई कतरे-कतरे जिंदगी जीने वालों की पीठ पर चढ़कर मैं बनाती अपनी दुनिया और उन्हें छोड़ देती अपने जैसी अभिषप्त जिंदगी जीने को… हां, बहना, सच यही है कि विद्रोह की मेरी ज्वाला इतनी बड़ी हो गई थी कि मैं उसी की लपटों में झुलस रही थी… इसकी आंच से बचने का मुझे बस एक ही रास्ता दिखाई दे रहा था कि मैं तेरे विश्वास को तोड़कर अपनी एक अलग दुनिया बनाऊंगी… तेरे खुदा के समानांतर… उतनी ही शक्तिशाली और उतनी ही ऐश्वर्यशाली… काश मेरी बहना… जिंदगी भी रिवाइंड हो पाती, तो इस बार अपनी गलतियों को सुधार कर फूलप्रूफ प्लान के साथ देती चुनौती तेरे खुदा को… देखती तब कैसे सामना करता वह मेरा… तब अपने जैसे अभिषप्त साथियों का साथ लेकर खड़ी होती उसके खिलाफ… हां, नीतिका मैं जान गई हूं वह बीजमंत्र… सच बहना, तेरे भगवान की तो नहीं, पर तेरी कसम खाकर कहती हूं कि मैं जीना चाहती थी… लेकिन परिवार…।?

Leave a Reply

Your email address will not be published.