कबीर को ज़्यादातर मालवा में ही गाया जाता है। कुमार गंधर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवांचल की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को बंदिशों का स्वरूप दिया. उत्तरप्रदेश की अवधि का असर तो कई उत्तर भारतीय संगीत की बंदिशों में सुनाई दिया है जैसे बाजूबंद खुल खुल जाए,बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए,लागी लगन, बरसन लागी सावन बूंदिया लेकिन मालवी का शुमार कुमार जी ने ही किया. गीत-वर्षा एलबम में कई मालवी लोकगीत बंदिश का आकार लिये हुए हैं।…..

कबीर गायन की विविध शैलियाँ और उसकी संप्रेषणीयता

‘रोना और गाना सबको आता है’, ऐसा हम अक्सर सुनते हैं। मनुष्य के इस स्वाभाविक गुण का विकास ही संगीत है या यूं कह लें कि संगीत मनुष्य के साथ ही उत्पन्न होती है और सभ्यता के विकास के साथ परिपक्व होती जाती है। ‘सामवेद’ को संगीत का आदिम ग्रंथ मान सकते हैं जिसके मंत्रों को गाया जा सकता है। आधुनिक विद्वान् भी इस तथ्य को स्वीकार करने लगे हैं कि समस्त स्वर, ताल, लय, छंद, गति, मन्त्र, स्वर-चिकित्सा, राग, नृत्य, मुद्रा, भाव आदि ‘सामवेद’ से ही निकले हैं। इससे आगे देखें तो 500 ई॰ पू॰ और 100 ई॰ के बीच रचित भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में संगीत के सात स्वरों सा (षडज), रे (ऋषभ), ग (गंधार), म (मध्यम), प (पंचम), ध (धैवत), नि (निषाद) का उल्लेख मिलता है।।

 नाट्यशास्‍त्र एक व्‍यापक रचना या ग्रंथ है जो प्रमुख रूप से नाट्यकला के बारे में है लेकिन इसके कुछ अध्‍याय संगीत के बारे में हैं । इसमें हमें सरगम, रागात्‍मकता, रूपों और वाद्यों के बारे में जानकारी मिलती है । थोड़ा और आगे आएं तो 6 -7वीं सदी में मतंग ने ‘वृहद्देसी’ ग्रंथ की रचना की जिसमें उद्धृत रागों को ‘देसी संगीत’ कहा गया। उस समय तक गायन की शास्त्रीय शैली के लिए लिखित रूप में उपलब्धता नहीं थी। इसके अलावा हरिपाल का संगीत सुधाकर, रम्‍ममत्‍या का स्‍वरमेलकलानिधि आदि से हमें संगीत के विभिन्‍न पहलुओं के बारे में और भिन्‍न-भिन्न कालों के दौरान इसके विकास के बारे में सूचना का एक स्रोत प्राप्‍त होता है ।  देसी संगीत से तात्पर्य लोक संगीत से था। आज का भारतीय संगीत उसी देसी अर्थात लोक संगीत का विकसित रूप है। संगीत की सामाजिक जीवन में उपस्थिति के प्रारम्भिक प्रमाण हमें सिंधु घाटी सभ्यता में मिलते हैं। खुदाई में ऐसी मूर्तियाँ और सीलें मिली हैं जिनमें ढ़ोल बजाते हुए लोग बनाए गए हैं। वैदिक युग के ग्रंथ ऋग्वेद में जिक्र मिलता है कि आर्यों के मनोरंजन का मुख्य साधन संगीत ही था। (सांस्कृतिक स्रोत एवं प्रशिक्षण केंद्र, संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार)

हिन्दी साहित्य के मध्यकाल के प्रामाणिक पाठों पर ध्यान दें तो हमें सूर, मीरा, तुलसीदास, कबीर आदि की रचनाओं में रागों का जिक्र मिलता है। अगर आज भी मध्यकाल की रचनाएँ हमारी जबान पर हैं तो इसके पीछे उन रचनाओं की सांगीतिक संबद्धता ही है। गेय छंदों की रचनाएँ उस युग में खूब हुईं जिनमें कवित्त, सवैया, दोहा, कुंडलियां, चौपाई आदि छंद प्रधान थे। यही कारण है कि गायन के विविध रूपों में आज भी उन रचनाओं को खूब गाया जाता है। इस बात से मुंह नहीं मोड़ा जा सकता है कि उन कवियों की समाज में व्यापक उपस्थिती का कारण उनके रचनाओं की लयात्मकता, छंदबद्धता और संगीतात्मकता ही है।

कबीर के दोहे आज भी गाँवों में गाते-बजाते सुने जा सकते हैं। कबीर वाणी लोगों की जुबान पर रहता है। कहने का तात्पर्य है कि कबीर के काव्य में संगीतात्मकता है। इसके मौजूदा प्रमाणों पर हम ध्यान नहीं भी दें तो कबीर के प्रामाणिक पाठों में विभिन्न रागों का उल्लेख मिलता है। श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘कबीर ग्रंथावली’ में राग गौड़ी, राग रामकली, राग आसावरी, राग सोरठि, राग मारू, राग टोड़ी, राग बिलावल, राग ललित, राग बसंत, राग कल्याण, राग सारंग, राग धनाश्री, राग भैरू जिसे अब राग भैरव के रूप में तथा राग केदारौ जिसे आज राग केदार के  रूप में जाना जाता है आदि रागों का उल्लेख मिलता है। रागों का जिक्र इस बात का प्रमाण है कि कबीर को संगीत की समझ थी।

कबीर की भाषा पर ध्यान दें तो जिस खिचड़ी भाषा, जिसे सधुकड़ी भी कहा गया है में ब्रज, अवधी, राजस्थानी, बिहारी के अलावा अरबी और फारसी के भी शब्द आए हैं यद्यपि कबीर ने स्वयं कहा है मेरी बोली पूरबी । संगीत के मर्मज्ञ विद्वानों का मानना है कि पूर्वी बोलियाँ गायन के लिहाज से सबसे मधुर और ग्राह्य हैं। उनकी भाषा की प्रभावोत्पादकता के बारे में आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी लिखते हैं ‘वे साधारण मनुष्य के लिए दुर्बोध्य नहीं हो जाते और अपने असाधारण भावों को ग्राह्य बनाने मे सदा सफल दिखाई देते हैं। कबीर के इस गुण ने सैकड़ों वर्ष से उन्हें साधारण जनता का नेता और साथी बना दिया है। (कबीर, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 170) कबीर की भाषा सहज और संप्रेषणीय थी।

कबीर के रचना संसार पर नज़र डालें तो सबसे बड़ा हिस्सा भक्ति और योग संबंधी रचनाओं का है। हिन्दी साहित्य आज कबीर के जिस प्रगतिशील और समाज सुधारक रूप को प्रमुखता से जगह देता है वह उनकी रचनाओं में समग्र रूप से व्यक्त नहीं होता है। वे एक धर्मगुरु थे। आचार्य हजारीप्रसाद द्विवेदी कहते हैं ‘कबीर ने ऐसी बहुत सी बातें कही हैं जिनसे (अगर उपयोग किया जाए तो) समाज-सुधार में सहायता मिल सकती है, पर इसलिए उनको समाज सुधारक कहना गलती है। वस्तुतः वे व्यक्तिगत साधना के प्रचारक थे। समष्टि-वृत्ति उनके चित्त का स्वाभाविक धर्म नहीं था। वे व्यष्टिवादी थे। (वही पृष्ठ 171) बाज़ार में लुकाटी लेकर खड़े हुये, ब्राह्मण-मुसलमान के  बीच समन्वय लाने वाले, समाज की रूढ़ियों पर कुठाराघात करने वाले कबीर एक तरफ आधुनिक नज़र आते हैं तो रचना के दूसरे पहलू में जहां ईड़ा-पिंगला, अनहद आदि की अवधारणा है वहाँ कबीर योग और आध्यात्म की ओर मुड़े दिख पड़ते हैं। कबीर का समय ही भक्तिमय था, निर्गुण हो या सगुण रचना का उद्देश्य भक्ति था। कबीर की रचना का बड़ा हिस्सा भक्तिपरक होना युगानुरूप ही था। फिर भी कबीर कहीं कहीं आधुनिक दिख जाते हैं।

संगीत के क्षेत्र में उन्नीसवीं सदी के उत्तरार्ध में विष्णु दिगंबर पलुस्कर का आविर्भाव होता है। उसके पहले साहित्य के रीतिकाल के समानान्तर संगीत की बंदिशों में लौकिक जगत के राग-अनुराग, त्योहारों, मान-मनुहारों वाले शब्द होते थे। साहित्य के रीतिकाल की तरह संगीत के बोल भी भौतिक जगत के थे। पलुस्कर ने रागों की बंदिशों में रीति सुलभ शब्दों को भक्तिपरक शब्दों से बदल दिया और भजनों की परंपरा चल पड़ी। डी बी पलुस्कर के प्रचलित भजन उसी परिवर्तन का परिणाम है। ठुमरी गाने तक की मनाही होने लगी। यह वह दौर था जब हिन्दी साहित्य अपने आधुनिक काल में प्रवेश कर रहा था परंतु हमारा भारतीय संगीत भक्तिकाल की ओर लौटने को पीछे मुड़ चुका था। हम जिस आधुनिकता से मनुष्य को समाज के केंद्र में स्थापित कर रहे थे वही रीतिकालीन रचनाओं में थोड़ी तब्दीली लाकर लौकिक बनाए रखने की बजाए भक्ति की ओर मोड़ देना एक अस्वाभाविक घटना थी। साहित्य आधुनिक हो रहा था वही संगीत पूरातन की ओर जा रहा था। हम जिस कबीर की बात कर रहे हैं उनकी रचनाओं को देखे तो हम पाते हैं कि कबीर द्वारा रचित साखी, सबद, रमैनी, पद, दोहा में से सबसे अधिक पद और साखियों का गायन हुआ है। साहित्य में कबीर का महत्व भौतिक जगत वाले जाति-पाति से है जहां ‘जाति ण पूछो साधू की पूछ लीजिए ज्ञान’ वाली बात है, जहां कबीर ‘साँच बराबर तप नहीं झूठ बराबर पाप’ का उपदेश देते हैं तो ब्राह्मणों को ज्ञान का मार्ग बताते हैं ‘जाति का मोर पूछत हो बाम्हन बूझो मोर गियान।‘ वही दूसरी ओर संगीत जगत की लंबी परंपरा ने कबीर को सामाजिक रूप से नहीं गाया। उनके मूल में भक्ति ही रहा जो हमारे साहित्य की तत्कालीन चिंता से कटे हुए हैं। संगीत की दुनिया ने कबीर को लौकिक से उठाकर अलौकिक में जपना शुरू किया। साहित्य से दूर होकर भक्ति संगीत में बखूबी स्थापित हो गयी। इस तरह कबीर अपने दो अलग रूपों में साहित्य और संगीत में समानान्तर छाए रहे। जिन रचनाओं को गायन में स्थान दिया गया है उनमें कबीर की आध्यात्मिक, योग और ज्ञान संबंधी रचनाएँ ही सर्वाधिक हैं। कबीर के जिस प्राकृतिक चरित्र को हजारीप्रसाद द्विवेदी उजागर करते हैं संगीत ने उसी रूप को कबीर चिंतन के मूल में रखा। साहित्य में जहां कबीर अपना घर जार कर समाज बदलने की बातें करते हैं वहीं संगीत में कबीर अनहद नाद जैसे अलौकिक ज्ञान की बातें करते हैं। साहित्य में जहां कदम-कदम पर कबीर का पूनर्मूल्यांकन आज भी हो रहा है वही संगीत की गोष्ठियों में कबीर भक्त ही बने हुए हैं। हमारा समय अपने हर आयामों में लगभग समान दिशा की ओर परिवर्तन का गवाह बंता है परंतु कबीर के साथ ऐसा नहीं हुआ। एक आयाम में जहां वो प्रगतिशील है वही दूसरे आयाम में पूरातन।

कबीर गायन की विविध शैलियाँ ….

साखियों को सर्वप्रचलित धुन में देबाशीष दास गुप्ता ने गाया है। यह वही धुन है जिसे हम में से सभी ने जरूर सुन रखा होगा। ‘कबीर अमृतवाणी’ नाम से बाज़ार में बिकने वाले इस एल्बम में गुरु की महत्ता और उपदेशात्मक साखियों को गाया गया है। इसका एक नमूना ‘गुरुदेव कौ अंग’ से सुनते हैं…

कबीर की ही तरह शिवपुत्र सिद्धरमैया कोमकली जिसे सब कुमार गंधर्व के नाम से जानते हैं ने स्थापित मानदंडों को उखाड़ फेंका। शास्त्रीयता के पुराने ढर्रे को नकारते हुए लोकप्रिय लोकधुनों को शास्त्रीय गरिमा दी। कुँवर नारायण कहते हैं ‘कुमार गंधर्व के गायन में अगर एक ओर शास्त्रीय गायन की परंपराओं का गहरा संस्कार है तो तो दूसरी ओर लोकगीतों की अनगढ़ समवेत शक्ति और भावनात्मक ऊर्जा । (कुँवर नारायण संसार, संपादक- यतीन्द्र मिश्र, वाणी प्रकाशन, पृष्ठ 421) कुमार जी ने कबीर के  भक्तिपरक और निर्गुण भाव वाले पदों को ही गाया है। नाथ पंथ से आगे वाले कबीर उनकी गायकी में मौजूद हैं। कुँवर जी कहते हैं ‘किसी भी उत्तम कला की तरह कुमार गंधर्व का गायन भी हमें तात्कालिक जिंदगी से कुछ समय के लिए विरक्त या एलिएनेट करता है और हम अपनी भीतरी दुनिया में अपने को सोचते हुए अकेले छूट जाते हैं। (वही पृष्ठ 423) और जब कुमार जी ‘उड़ जाएगा हंस अकेला’ या ‘ राम निरंजन न्यारा रे, अंजन सकल पसारा रे’ गाते हैं तब कुँवर नारायण की अवधारणा पुष्ट होती जान पड़ती है। राग भैरु नाम से श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘ कबीर ग्रंथावली’ के पद संख्या 336 को गंधर्व जी गाते हैं…

 https://www.youtube.com/watch?v=vyMnUiC8cq8

कबीर को ज़्यादातर मालवा में ही गाया जाता है। कुमार गंधर्व एकमात्र ऐसे संगीतज्ञ हुए हैं जिन्होंने मालवांचल की बोली मालवी और उसके लोकगीतों को बंदिशों का स्वरूप दिया. उत्तरप्रदेश की अवधि का असर तो कई उत्तर भारतीय संगीत की बंदिशों में सुनाई दिया है जैसे बाजूबंद खुल खुल जाए,बाबुल मोरा नैहर छूटो ही जाए,लागी लगन, बरसन लागी सावन बूंदिया लेकिन मालवी का शुमार कुमार जी ने ही किया. गीत-वर्षा एलबम में कई मालवी लोकगीत बंदिश का आकार लिये हुए हैं। कुमार जी के नजदीकी विष्णु चिंचालकर कहते हैं ‘कबीर गायन का बहुत बड़ा हिस्सा मालवी में गाया गया है लेकिन कबीर के मालवा जाने का प्रमाण कहीं नहीं है। …. पाण्डुलिपियों की ‘कहत कबीर सुनो भाई साधौ’ – को मालवी लोक गायक ‘सुणो से म्हारा साध भाया’ कर देते हैं। (जीने के बहाने, संपादक – सुरेश शर्मा, राजकमल प्रकाशन, पृष्ठ 374) कबीर की संवेदना को सांगीतिक स्तर पर स्थापित करने वाले कुमार गंधर्व ही हैं। हिंदुस्तानी शास्त्रीय गायकी ने कबीर के आध्यात्मिक गुरु वाले रूप को ही गाया है। कुमार गंधर्व के शिष्य और गंधर्व महाविद्यालय के प्राचार्य मधुप मुद्गल ने अपने गुरु की  गायकी को ही नहीं कबीर को भी नए अंदाज़ में पेश किया। वेलवेडियर प्रेस, इलाहाबाद से निकली ‘शब्दावली – कबीर साहब की’ के पद

‘हमन है इश्क़ मस्ताना, हमन को होशियारी क्या

रहे आज़ाद या जग में, हमन दुनिया से यारी क्या’

को जब मधुप जी गाते हैं तब यह ज़माने के जबान पर चढ़ जाता है।

मधुप जी ने ख़याल गायकी को कबीर गायन के लिए चुना और ‘एक अचंभा देखा रे भाई’, ‘चलि मेरी सखी हो, वो लगन राम राया’ आदि बहुत सारे पदों को गाया है। हिंदुस्तानी संगीत में ख़याल, दादरा गायकी के अलावा पॉप म्यूजिक में भी दखल रखती हैं। कबीर को शुभा जी ने बखूबी निभाया है।

‘दुलहनी गावहु मंगलचार

हम घारे आए हो राजा राम भरतार’ – राग गौड़ी (कबीर ग्रंथावली, पद संख्या 1, पृष्ठ 117)

राग गौड़ी आज राग गौरी के नाम से जाना जात है। दिन के चतुर्थ पहर में गाये जाने वाले इस राग में भक्ति रस और विरह रस की बंदिशें सर्वाधिक गाई जाती हैं। प्रस्तुत है गायकी की एक झलक

हिंदुस्तानी शास्त्रीय संगीत में गायकी की सबसे गंभीर शैली जिसका संबंध तानसेन से है ध्रुपद कहलाता है। वर्तमान समय में डागर घराने के गुंडेचा बंधुओं के आवाज़ में कबीर के सबसे प्रचलित पदों में से एक ‘झीनी झीनी बीनी रे चदरिया’ को सुना जाए।

प्रसिद्ध ग़ज़ल गायक जगजीत सिंह जी ने उप-शास्त्रीय शैली में कबीर को गाया है। ‘Jagjit And Kabir’ नाम के उनके एल्बम से संसार की निस्सारता को बताते पद ‘रहना नहीं देस विराना है’ सुनिए।

कबीर की कविता जिस कंठ से निकली एक अलग प्रभाव और ख्याति को प्राप्त हुई।

                              विशुद्ध शास्त्रीय शैली से अलग कबीर को लोक गायकी की शैली में सर्वाधिक प्रसिद्धि मिली है। मालवा क्षेत्र हो या राजस्थान का इलाका कबीर को क्षेत्रीय बोलियों में ढाल कर खूब गाया गया है। प्रह्लाद सिंह टिपनिया मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र से हैं, कबीर को विदेशों में पहुंचाने का श्रेय इन्हें जाता है। लिंडा हैस, अशोक वाजपाई, विद्या राव, पुरुषोत्तम अग्रवाल, तारा किणी के सहयोग से ‘चलो हमारे देस’ नाम से टिपनिया जी और कबीर गायन को लेकर एक फिल्म का निर्माण भी हुआ है। लोक संगीत की शैली में कबीर को टिपनिया समेत आज छत्तीसगढ़ के भारती बंधु, राजस्थान के कई लोक गायक गा रहे हैं। शास्त्रीय बंधन रहित इस गायकी का नमूना देखिए…

सांसरिक माया-मोह को उजागर करती कबीर की कविता को सामाजिक रूप से भी प्रह्लाद जी ने गाया है। जीवन जगत के सच से सबको अवगत कराना चाहा। योग साधना और व्यष्टिगत साधना ही कबीर के काव्य के मूल में था। ‘झीनी झीनी बीनी चदरिया’ को जब टिपनिया जी गाते हैं तब सम्प्रेषण का माध्यम सशक्त होता दिखता है। शब्द बदल जाते हैं पर भाव वही रहता है।

                        कबीर के पाठों की प्रामाणिकता पर सवाल बने रहे हैं। इन सब के बीच गुरुग्रंथ साहब में संकलित उनके पदों को प्रामाणिक माना गया है। गुरुबानी के रूप में जब कबीर को गाया जाता है तब उनके रहस्यवादी पदों को लिया जाता रहा है। गुरुद्वारों की परंपरा वाले गायन की शैली को ‘गुरमति संगीत’ के नांस ए जानते हैं। यहाँ गुरु महिमा का बखान मिलता है। श्यामसुंदर दास द्वारा संपादित ‘कबीर ग्रंथावली’ के परिशिष्ट के पद संख्या 218 ‘हरि बिन कौन सहाई मन का

माता पिता भाई सुत बनिता हितु लागो सब फन का

को गुरमति संगीत में भाई जोगिंदर सिंह जब गाते हैं तो गुरुबानी गायन की शैली साफ झलकती है।

गुरमति संगीत की एक और झलक भाई हरबंस सिंह जी के गायन में देखिए।

कबीर का रचना संसार ऐसा था कि जिसने भी चाहा सबको अपने मायने का सबकुछ मिला।

                कबीर की कविता में सूफ़ीमत के दर्शन भी होते हैं। रामकुमार वर्मा कहते हैं ‘कबीर का रहस्यवाद हिंदुओं के अद्वैतवाद और मुसलमानों के सूफ़ीमत पर आश्रित है।‘ (कबीर, संपादक – विजयेन्द्र स्नातक,,कबीर का रहस्यवाद-रामकुमार वर्मा, राधाकृष्ण प्रकाशन, पृष्ठ 85) सूफ़ीमत में बंदे और खुदा का एकीकरण हो सकता है पर उसमें माया का विशेष स्थान नहीं है। कबीर भी माया को महठगिनी बताते हैं। रूहानी आवाज़ की आबिदा प्रवीण से जब गुलज़ार ने कबीर को गवाया तो मानो कबीर का पूनर्जन्म होता है। इस जगत के अस्तित्व को भूल पिया में रम जाने की बात उनकी गायकी का सर्वस्व है। गुलज़ार कहते हैं कि ‘आबिदा जब गाती हैं तो खुद सूफी हो जाती हैं’। आबिदा कबीर को पुकार रही हैं…

https://www.youtube.com/watch?v=qwcnqqdXt7c                 पाकिस्तान मूल के ही एक क़व्वाल फरीद अयाज़ जब कबीर के ज्ञान प्रधान सखियों को क़व्वाली के रूप में गाते हैं तब कबीर का अन्यतम रूप सामने आता है।

गायन की हर शैली में कबीर फीट बैठ जाते हैं। फिल्मी गाने हो या पॉप हो, रॉक हो कबीर सर्वत्र हैं।

                   कबीर गायन की जिन शैलियों से मैंने आपको अवगत कराया है वह प्रचलित में से बहुत थोड़ा है। हमारा साहित्य कबीर के समाज सुधारक रूप को सशक्त मानता  है जबकि संगीत जगत उनके आध्यात्मिक रूप को आज तक गायन में जिंदा रखे हुआ है। कबीर की व्यापक पहुँच समाज में जिस लोग गायकी या संगीत से है उसमें भौतिक समाज की चिंता बहुत कम दिखाई देती है। वहाँ रहस्यवादी, आध्यात्मिक, ज्ञानपरक पदों की भरमार है। एक सिलसिलेवार ज्ञान का परिचय उनके द्वारा रचित काव्य देता है जहां संगीत का ज्ञान, तत्व-ज्ञान, साधना का ज्ञान आदि विधिवत रूप में मिलता है।  ‘मसि कागद छुयो नहीं’ वाली बात झूठी होती दिखाई देती है जब कबीर का शास्त्राज्ञान सामने आता है। कबीर की आकादमिक प्रसिद्धि से परे लोक में उनकी उपस्थिति का एक बाद कारण उनके काव्य की गेयता भी है। हमारी अकादमिक बहस जिस कबीर से आज आधुनिकता और प्रगतिशीलता को संबल देता हैं उन्हें लोक में व्याप्त गायकी ने भक्त और आध्यात्मिक गुरु बनाकर छोड़ दिया है। बात बस इतनी सी है कि गायन की शैलियाँ लगातार बदली लेकिन कबीर का रूप लोक में नहीं बदला|  क्या कबीर गायन में उनके आध्यात्मिक रूप का उंनके समाज सुधारक रूप पर हावी होना ही बीतें सालों में सामाजिक मूल्यों की जमीन नहीं तैयार कर पाया? कबीर जिस रूप में साहित्य की आकादमिक दुनिया में हैं अगर वही रूप लेकर संगीत साधक लोक में गए होते तो आज समाज की स्थिति कुछ और होती. अंत में कबीर के मार्फत बस इतना ही कहूँगा –

साधो देखो जग बौराना, साँच कहु तो मारन धावे झूठे जग पतियाना’।

 

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    By: रोहित कुमार

    एम. फिल, हिंदी
    हिंदी विभाग
    दिल्ली विश्वविद्यालय
    फोन- 9540331898

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