युवा कवि पुलकित फिलिपकी कविताओं के रचना संसार का ज्यादा भाग आक्रोश से भरा है | यह रचनाएं गवाह हैं इस बात की कि वर्तमान युवा केवल निराशा से ही नहीं बल्कि आक्रोश से भी भर रहा है | बतौर बानगी पूँजी और पूँजीवाद से रचनात्मक साक्षात्कार करती एक कविता ….संपादक 

कलबुर्गी तुम्हारे लिए

पुलकित फिलिप

ओ !
सुन री बड़ी पूँजी
पृथ्वी की धरा-महासागरों से
दुर्गन्ध आने लगी है धीरे-धीरे
इतना चिपचिपा गया है सब
की उबकाई आती है
की तेरी विशाल जीभ सब समेटे जाती है
बदबूदार लार टपकाते हुए (खून मिली)

सुन!
हिटलर-मुसोलिनी की जननी सुन
तू जब लील चुके सारे कलबुर्गी-पानसरे-दाभोलकरों को
जब कुचल चुके हर आदिम सवाल को
अपने मज़बूत ‘लोकतान्त्रिक’ जूते से
(सवाल भी मुंह से गाढ़ा खून उगलने लगेगा)
जब ठूंस ले
अपने कभी ना भरने वाले उदर में
सारी प्रकृति
नदियाँ
पहाड़
जंगल
खान-खदान
फूल
ओस
हरापन
रिश्ते
मनुष्यता
जब हर कांगो बच्चा
हड्डी पे चिपकी खाल बन जाए
जब हर आदिवासी
सूखकर पेड़ की छाल बन जाए
जब हर हथौड़े और दरांती से टपकता पसीना
तेरे आई एम एफ को भर दे
जब तस्लीमा-हुसैन सब
मार गिरा दिए जाएँ
सारी किताबें-पुस्तकालय जला दिए जाएँ
इतिहास के पन्नों में कहीं खो जाए
हर मार्क्स-लेनिन और भगत सिंह
हर कला तेरे बूटों की पॉलिश बन जाए
हर आरामपरस्त प्रगतिशील
तेरी महफ़िल की महंगी शराब पे ललचाने लगे
इंसानियत पे दमघोंटू धुंध का साया छाने लगे
बच्चा पैदा होते ही
“येस वी कैन”
चिल्लाने लगे (कमाने लगे- तेरे लिए)
हर ओर कुछ बन रहा हो
‘विकास’ का तम्बू तन रहा हो
तब मेरी सलाह मान
ऐसे मौके पे
एक पार्टी तो बनती है बॉस!

मगर सुन!
उस पार्टी के बूढ़े खानसामे का छोटा बेटा (१० साल वाला)
माँ की सूखी छातियों से हट
जब
बाप की गड्ढे में घुसी आँखें देखेगा
और तू
किसी लजीज मुर्गे की टांग खींच रही होगी
तो सोचेगा ज़रूर उसका मानव मन —
“ये काश मुझे भी मिल जाए
ये मुझे क्यूँ नहीं मिलता?
ये मुझे क्यूँ नहीं मिलता?”

सुन!
सवालों की घास
हर बंजर में उग आती है
हर बंजर में
(समझी!)

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