कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग lokrag

-: श्रीराम तिवारी :-

जीवन के अंत में ही मुक्तिबोध का एक ढ़ीला-ढ़ाला कविता-संग्रह आया। उनकी एक कविता को पाठ्यक्रम से हटाया गया। मेरे खुद का एकांकी एकत्र संग्रह 78वें वर्ष में आया-रीढ़। प्रभात सरसिज 66वें वर्ष में अपना पहला संग्रह दे सके। ऐसे उदाहरण कम हैं जिससे शब्दों से प्रशिक्षण देने का पता चले। कविता की नाभि पकड़ने वाला ऐसा ही प्रभात सरसिज का संग्रह है ‘लोकराग’।
कविता आत्म निर्वासन नहीं है। यह आभासी दुनिया की चकाचैंध से मनुष्य यानी पाठक को अलग ले जाने, दिखलाने की विद्या है। आज के समय में लोग समाज से, अपनों से, यहाँ तक की खुद से अलग किए जा रहे हैं और वे अलग हो रहे हैं। यही मनुष्य विरोधी हरकत है। इसी हरकत के प्रतिरोध में ‘लोकराग’ कविता के एजेंडों को पहाड़ों, पेड़ों, चिड़ियों, अपने प्रेम, अपने लोगों के पास पहुँचाने का एक सही समय पर सार्थक उपक्रम है। कविता लिखते की भेज से उठकर इस संग्रह की कविताएँ वस्तुसत्ता में लोकराग को उसके भीतर जाकर पकड़ती हैं। यह साधारण बात नहीं है कि एक कवि संवादहीनता और संवेदनहीनता के विकराल समय में खुद को, कविता को परिवार और समाज का, वस्तुसत्ता का पात्र बना दे। ऐसा करते हुये कुछ कविताओं में वैश्विक, पूरा मानवता के छोरों तक को प्रभात सरसिज छूते हैं। ऐसी ही इनके भीतर की सजावट है। इस सजावट को ये बार-बार बाहर लाते हैं। ऐसा ये रूपकों, शब्दों की गुंफन भाषा के अपने अन्वेषण से करते हैं। मुक्तिबोध की तरह ही इनकी आवाज ही भीतर-बाहर चलती रहती है। यहीं पर अगर हृदय का तर्क किसी के पास हो तो इस तथ्य-कथन को काटे कि प्रभात सरसिज हमारे बीच दूसरे मनबोध की भूमिका में आए हैं। संग्रह से पता चलता है कि गिद्धौर से शांतिनिकेतन के सोनाझुरीपल्ली तक गए हैं। पर यह किराया नहीं चुका पाने की स्थिति में घर का पूरा सामान छोड़कर दूसरे शहर में चले जाने का विवश कौतूहल शायद नहीं हो। पता चलता है कि दो ऊपरी पहाड़ी स्थलों से इनकी कविताएँ वायरल होता हैं जहाँ ये अपनी कविताओं को अपने परिवेश में छूते हैं। देखिए यह कठिन सौन्दर्य-

उफ्! कविताओं को छूते हुए गुजरता
हृत्पाश्र्व को छूते हुए तश्तर सा गुजरना है!
पत्थरों के मध्य से
उध्र्वगमन करती कविता
दीनात्मजनों के विपुल अनुभवों को छूना चाहती है
इन घुन लगे वैश्विक काल में
शब्दों की लाठी
जर्जर होकर भी
तटस्थ नहीं है!

पुस्तकः लोकराग कविः प्रभात सरसिज प्रकाशकः प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, चेशायर होम रोड, बरियातु रांची-2201261 कीमतः 150/रुपया

पुस्तकः लोकराग
कविः प्रभात सरसिज
प्रकाशकः प्यारा केरकेट्टा फाउंडेशन, चेशायर होम रोड, बरियातु रांची-2201261
कीमतः 150/रुपया

यही लोकराग है। हालत यही है कि धन के पीछे आज जब हम सामाजिक तो दूर पारिवारिक भी नहीं रहे तो यहीं पर प्रभात सरसिज का लोकराग हमें बचाने की कोशिश है। यह मामूली बात नहीं है।
मेरे इस बीज वक्तव्य का शीर्षक है-कविता में मानसिक अपंगता का अंत है-लोकराग। आज तक का ब्योरा है कि हम वास्तविक जीवन नहीं जी रहे हैं जहाँ साझा और सरोकार हो। शुरू से हमारी दुनिया मानसिक अपंगता की आत्मकेन्द्रित दुनिया रही है। निहित स्वार्थों की ताकत के आगे हम बुद्धिहीन जीते रहे हैं। ताकतवाले नहीं चाहते कि सामान्य लोग बुद्धिमत्ता के पास फटकें। उनका विकास होगा तो उनका विरोध होगा। ताकत के लिए आप की बुद्धिमत्ता खतरा होती है। इसलिए आज तक यही कोशिश जारी है की कोई शिक्षाधारी नहीं हो। गरीबी, बीमारी, बेकारी, युद्धमारी चलती रहे। इसी में ताकत को, मूल्यहीन लोगों को फायदा है। यही आज तक की साजिश है। आज की स्थिति यह है इसके खिलाफ सोच वाली चेतना भी खारिज और अप्रासंगिक होती जा रही है। इसके कारणों पर, समाधान पर बौद्धिकों की, तथाकथित सक्रिय यथास्थितिवादियों की कोई नजर नहीं है न उनकी यह जरूरत है। सब इत्मिनान में है। जिनके पास नजर है वे खुद अपने को ‘ब्रांडेड’ समझने लगे हैं। इसका एक ही उत्तर है-अस्मिता का लोकराग जहाँ बहुत ही कम लोग पहुँच पा रहे हैं। मैं जोर देकर कहता हूँ कि प्रभात सरसिज इनमें अगली पांत में हैं। इनके आंतरिक सौन्दर्य के शास्त्रीय, सामाजिक, लोकरंगी रूपात्मक शब्द गुंफन के बीच भी सामाजिक सरोकार को व्यापक करने का स्वर है। यही इनका मुक्तिबोध होना है। शब्दों के चयन के साथ उसकी वजह और समाधान का कविता-संकेत। नेरूदा, नजरूल, निराला, फैज की तरह का।

आज की समकालीन कविता में उक्ति-चमत्कार का बाजारवाद घुसता जा रहा है जो यथार्थ की फोटोग्राफी से भी भिन्न एक तरह का फिजूल अतियथार्थवाद है जिससे शब्द ग्रसित होता जा रहा है। प्रभात सरसिज ने यहीं अपने को बचाया है तो कविता की संवेदनधर्मिता की रक्षा की है। संग्रह की शुरू की आधे तक की कविताओं में नदी के फूटने की त्वरा और चंचलता है जो आगे चलकर पहाड़ सीरीज की छः कविताओं के बाद तरंगमुक्त थिर गद्य होकर समाज के बीच बहती है। यही लोक तक पहुँचने, उसमें पर्यवसित होने का राग और रंग है जिसका माध्यम हैं स्मृतियाँ-पत्थरों के बीच गुजरने के धार की स्मृतियाँ। पर ये स्मृतियों तक ही नहीं रूकते। परिवेश के स्थिर पेड़ों पर अपने ही नुचे हुए पंखों से मन के पाखी का घोसला बनाते हैं। इसी की चहचहाहट है इनकी कविताएँ। इसी से शमशेर की तरह भाग रहे दृश्यों को पीछे छोड़कर अपनी बात को आगे ले जाते हैं। पहाड़ के बीच से दशरथ मांझी की तरह लोक का रास्ता बनाते हैं। शमशेर का बिम्ब है-‘‘दो पहाड़ों को कहुनियों से ठेलता आदमी।’’ इनकी पूरी कविता इसी की उपमा-उपमेय है। रूपक की भाषा में। इसी को ये अपना समृद्ध गद्य कहते हैं जो मुहावरा नहीं बनता-संवेदनशून्यता को भरता है। यही है कविता में प्रतिरोध नहीं करने की मानसिक अपंगता का अंत। आज लोग, युवा-युवतियाँ अपने स्मार्ट फोन से चिपकते जा रहे हैं। इस तरह साजिश के शिकार हैं। इसे ही सोशल मीडिया कहा जा रहा है। इसी का इस्तेमाल कर हिंसक, उपभोक्ता आतंकवाद का घोड़ा दौड़ाया जा रहा है-विश्वविजयी घोड़ा। ऐसे ही रूपक हैं प्रभात सरसिज के पास। यहीं पर एक सतकर्ता है इनका ‘लोकराग’। ये साफ कहते हैं-

कवि बावर्ची बने हैं
प्रतिरोध की अंगीठी पर चढ़ने के लिए
तत्पर हैं कविता के कठोर सींक
पहले इसी बावर्ची खाने में तैयार होंगे
छल के व्रतियों के मांस के कवाब।

यही साफ-साफ है कविता का प्रतिरोध। गरीबी, बीमारी, बेकारी, युद्धमारी से लड़ने की छायी मानसिक आज तक की लोक अपंगता के अंत का नया हौसला-ताकि प्रेम, प्रकृति, सरोकार जैसे मूल्य किताबों से निकलकर चेतना के वृत्त में आवें। यही समकालीन कविता का मर्म है कि निःशब्द अकेलेपन में वहीं बजे आबादी का राग। यही प्रभात जी के अनुसार अघोषित युद्ध से सन्नद्ध समकालीनता है।

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