आज की बाजारवादी सामाजिक व्यवस्था के कारण कवितातों में से सिमटते ग्रामीण परिवेश को शिद्दत से महसूसती प्रशांत विप्लवी की यह कविता – अनीता चौधरी

कवि की मौत 

प्रशांत विप्लवी

प्रशांत विप्लवी

अंतिम कविता में
पानी माँगा
गाँव माँगा
छाँव मांगी
और अलसाई-सी ठांव मांगी
कविता के उर्ध्व पंक्तियों में दर्ज की
अपनी अकुलाहट
अंतिम पंक्ति के नीचे
रुग्ण हस्ताक्षर किये
और आँखें गोल कर पढता रहा कई बार
पानी..
गाँव ..
छाँव…
ठांव ..
विछोह में मरते हुए कवि के शब्द पंक्तिबद्ध रहे
पानी के तल-अतल तक
गाँव के सीमाने पर नीम के नीचे
छंद को टिकाये रहा देर तक
भाव पड़े रहे शिथिल-निष्प्राण
पन्नों के ठांव में ..
एक अदद बाजार में ढूंढती रही कविता
अपने लिए एक छाँव
कवि, झूठे शब्दों के तिलिस्म में फंसा रहा जीवन-भर
पानी सूखते रहे
गाँव उजड़ते रहे
छाँव कौए की पीठ ही रही
हर अलसाई दोपहर में
एक कवि की मौत होती है

Leave a Reply

Your email address will not be published.