कश्मीर के ऐतिहासिक दस्तावेजों और संदर्भों से शोध-दृष्टि के साथ गुज़रते हुए “अशोक कुमार पाण्डेय”  द्वारा लिखा गया ‘कश्मीर : एक संक्षिप्त इतिहास’ आलेख की दूसरी क़िस्त आज पढ़ते हैं | – संपादक 

“1128 ईसवी में गद्दीनशीन हुए जयसिम्हा का लगभग 28 वर्षों का राज्य ललितादित्य और अवन्तिवर्मन की कड़ी में कश्मीर के बेहतर वक्तों की तरह याद किया जाता है. कल्हण इन्हीं के दरबार में थे. लेकिन इस छोटे से अंतराल के बावजूद कश्मीर में जो पतन जारी था वह बदस्तूर चलता रहा. 1171-1286  तक चले बोपादेव वंश के राज्य में या फिर उसके बाद स्थापित हुए डामर वंश में कुछ भी ऐसा नहीं बदला जो सड़ चुकी राज व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन लाता. नैतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पतन कश्मीर के इतिहास का हिस्सा बन चुके थे.”

हिन्दू राजाओं का पतन काल

अशोक कुमार पांडेय

अवन्तिवर्मन कश्मीर का एक और योग्य शासक था जिसने चौपट हो चुकी राज्यव्यवस्था तथा अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने के लिए अथक प्रयास  किये. उसने बलिप्रथा तथा जीव हत्या पर रोक लगा दी. इस  समय  कश्मीर में हिन्दू धर्म पूरी तरह से प्रभावी हो चुका था और बौद्ध धर्म की चमक खो गई थी. 883 ईसवी में उसकी मृत्यु के बाद ही का समय हिन्दू राजाओं के चारित्रिक पतन का  है. सुरा-सुंदरी के प्रभाव में ऐसे ऐसे राजा हुए जिन्होंने अपने सगे बेटों के साथ सत्ता संघर्ष किये. अर्थव्यवस्था चौपट हो गई तथा जनता त्राहि माम करने लगी. ऐसे ही एक राजा क्षेमेन्द्र गुप्त का राज्यकाल पतन की पराकाष्ठा का काल था. क्षेमेन्द्र शराब और कामक्रीड़ा से जब मुक्त होता था तो विद्वानों के अपमान और किसानों के उत्पीडन के नए नए तरीके ढूंढता था. हालत यह कि उसके मंत्री उसे अपने घर पर आमंत्रित कर अपनी पत्नियाँ प्रस्तुत करते थे और वह इसके बदले उन्हें ईनाम-इक़राम दिया करता था. वह अपनी रानी दिद्दा पर इस कदर निर्भर था कि उसे दिद्दाक्षेम कहा जाने लगा था. राजा की मृत्यु के बाद उसने 958 ईसवी में रानी ने अपने अल्पवयस्क पुत्र अभिमन्यु को गद्दी पर बिठाया और ख़ुद शासन सम्भाला. वह अपने समय के किसी भी अन्य राजा की तरह ही चालाक और क्रूर थी. उसने अनेकों प्रेम सम्बन्ध बनाए और उसका उपयोग अपने शासन को सुरक्षित रखने में किया. जब वे उसके लिए ख़तरा बने या अनुपयोगी हुए तो दिद्दा ने उन्हें रास्ते से हटा दिया. उसकी सबसे क्रूर कार्यवाही अभिमन्यु की मृत्यु के बाद एक के बाद एक अभिमन्यु के तीन पुत्रों की हत्या करवाना थी. जहाँ पहले दो, नंदिगुप्ता और त्रिभुवन को उनके शासन के पहले और दूसरे साल में ही जादू टोने से मार दिया गया वहीँ भीमगुप्त ने पांच साल शासन किया और जब उसने अपनी दादी और उसके नए प्रेमी तुंग के अनाचारों के ख़िलाफ़ क़दम उठाये तो उसे पहले गिरफ़्तार किया गया और फिर खुलेआम हत्या कर 981 ईस्वी में दिद्दा ख़ुद गद्दीनशीन  हुई. तुंग खस कबीले का था और अपने भाइयों के साथ बैल चराने आया था. उसने दरबार में चिट्ठियां पहुंचाने का काम हासिल कर लिया था. दिद्दा की उस पर नज़र पड़ी और जल्द  ही वह उसका प्रिय बन गया. दिद्दा के तत्कालीन प्रेमी भूय्या की हत्या कर तुंग सबसे शक्तिशाली मंत्री बन गया. अपने सभी उत्तराधिकारियों की हत्या कर चुकी दिद्दा ने अपने भाई उदयराज के पुत्र संग्रामराजा  को अपना उत्तराधिकारी घोषित किया और 1003  ईस्वी  में  दिद्दा की मृत्यु के साथ  लोहार वंश का शासन आरम्भ हुआ.

google से साभार

.उसके बाद के राजाओं में प्रमुख नाम हर्ष का है जिसे मंदिरों को तोड़ने और लूटने के संदर्भ में विशेष रूप से याद किया जाता है. कल्हण ने उसका वर्णन करते हुए भयानक घृणा का प्रदर्शन किया है. हर्ष का व्यक्तित्व विद्वत्ता और दुराचार जैसे विरुद्धों का अजीब समन्वय था. एक तरफ वह सुन्दर गीतों का रचनाकार था, संगीत और कला का ज्ञाता था, न्यायप्रिय था, समन्वयवादी था तो दूसरी तरफ स्वेच्छाचारी, क्रूर और चरित्रहीन था. आरंभ में उसका शासन बहुत लोकप्रिय हुआ लेकिन बाद में वह लगातार पतन के गर्त में जाता गया. वह खुले दिमाग का था. तुर्क तब तक कश्मीर में आ चुके थे और उसने न केवल उनकी संस्कृति से बहुत कुछ अपनाया बल्कि उनकी सैन्य रणनीतियों को भी अपने दरबार में शामिल किया और गुलाम तुर्की स्त्रियों को अपने हरम में. हर्ष ने तमाम युद्ध किये और इनमें से अधिकतर में हार का सामना किया. इन  सबके साथ अय्याशी  उसे परम्परा में मिली थी. कामपिपासा में उसने अपने परिवार की स्त्रियों तक को नहीं बख्शा और वेश्याएं तो खैर थी हीं. ज़ाहिर है इन बढ़ते ख़र्चों को पूरा करने के लिए अकूत धन की ज़रुरत पड़ती. यह  धन अन्धान्धुध करारोपण से हासिल किया गया. यहाँ तक कि मल त्याग पर भी कर लगा दिया गया था![i] जनता में त्राहि त्राहि मच गई. उसने मंदिरों और देवालयों को भी लूटा. बहुत संभव है ऐसा धन के लिए ही किया गया हो[ii]. मंदिर उस  समय धन  सम्पत्ति का केंद्र थे और राजाओं की गरिमा तथा शक्ति के प्रतीक. उन्होंने कभी  खुद को अमर करने के लिए तो कभी अपनी हिंसा और अनाचार को छिपाने के लिए एक तरफ पंडितों को दान दिए थे तो दूसरी तरफ मंदिर बनवाये थे जिनमें सोना-चांदी और दूसरी कीमती धातुएं लगीं थीं. मंदिरों की उसकी लूट को कुछ लोगों ने तुर्कों के प्रभाव से जोड़ा है, लेकिन न केवल कश्मीर बल्कि देश के अन्य कई भागों में मंदिरों के लूट के कारण केवल साम्प्रदायिक नहीं थे.[iii]

1128 ईसवी में गद्दीनशीन हुए जयसिम्हा का लगभग 28 वर्षों का राज्य ललितादित्य और अवन्तिवर्मन की कड़ी में कश्मीर के बेहतर वक्तों की तरह याद किया जाता है. कल्हण इन्हीं के दरबार में थे. लेकिन इस छोटे से अंतराल के बावजूद कश्मीर में जो पतन जारी था वह बदस्तूर चलता रहा. 1171-1286  तक चले बोपादेव वंश के राज्य में या फिर उसके बाद स्थापित हुए डामर वंश में कुछ भी ऐसा नहीं बदला जो सड़ चुकी राज व्यवस्था में कोई बड़ा परिवर्तन लाता. नैतिक, आर्थिक, सामाजिक और राजनैतिक पतन कश्मीर के इतिहास का हिस्सा बन चुके थे.

जर्जर हो चुके कश्मीरी राज्य पर जब मंगोल आक्रान्ता दुलचा (ज़ुल्जू)  ने बारामूला दर्रे की ओर से आक्रमण किया तो डामर वंश के राजा सहदेव ने उसका सामना करने की जगह उसे रिश्वत देने की कोशिश की. नाक़ामयाब होने पर सहदेव किश्तवार भाग गया. मंगोल सैनिकों ने आठ महीनों तक सोना-चाँदी, अनाज लूटने के बाद कश्मीर की अरक्षित महिलाओं को अपना शिकार बनाया. खेत जला दिए गए, घर लूट लिए गए, जवान पुरुष और बच्चे या तो मार दिए गए या ग़ुलाम बना लिए गए. कश्मीर घाटी पूरी तरह से तहस नहस हो गई. सेनापति रामचंद्र ने ख़ुद और अपने परिवार सहित विश्वस्त सैनिकों तथा अनुचरों को किले के भीतर क़ैद कर लिया था. आठ महीने बाद जब वहाँ सब नष्ट हो चुका था और लूटने के लिए कुछ नहीं बचा तो दुल्चा वापस जाने का निर्णय लिया. उसके सहयोगियों ने बारामूला और पाखली के उसी रास्ते से लौटने की सलाह दी जिससे वे आये थे, पर दुलचा ने स्थानीय क़ैदियों से सबसे छोटे रास्ते के बारे में पूछा. कहते हैं कि दुलचा से उसकी ज़्यादतियों का बदला लेने के लिए उन्होंने जान बूझकर सबसे ख़तरनाक रास्ते, बनिहाल दर्रे से जाने का सुझाव दिया और लौटते हुए दुलचा दिवासर परगना की चोटी के पास अपने सैनिकों, क़ैदियों और लूट के सामान के साथ बर्फ में दफ़न हो गया.[iv]

google से साभार

इस पूरी विपत्ति में घाटी के निवासियों के मददगार बनकर आये शाह मीर और रिंचन. रामदेव की पुत्री कोटा के साथ मिलकर उन्होंने जितना थोड़ा बहुत संभव हो सका प्रतिरोध भी किया और सहायता भी. रिंचन कोटा से प्रेम में पड़ गया और कोटा ने भी उसे स्वीकृति दी. रिंचन (ला चेन रिग्याल बू रिन चेन) बौद्ध था जो कुबलाई खान की मौत के बाद लद्दाख में मची अफरातफरी में अपने पिता और वहां कुबलाई खान के प्रतिनिधि लाचेन की हत्या के बाद अपनी छोटी सी सेना के साथ जो-ज़िला दर्रे से सोनमर्ग घाटी पार कर गंगागीर में सेनापति रामचंद्र के महल में शरणागत हुआ था. शाह मीर स्वात घाटी का निवासी था और कहा जाता है कि एक रात उसे ख़्वाब आया कि वह कश्मीर का राजा बनेगा तो इस बिना पर वह सपरिवार श्रीनगर पहुँच गया  और राजा के दरबार में उसने रामचंद्र से निकटता बनाई. राजा  सहदेव ने उसे बारामूला के पास एक गाँव दावर कुनैल की जागीर दे दी थी.[v] कालान्तर में रिंचन और शाह मीर अच्छे मित्र बन गए.[vi]

दुलचा के जाने के बाद सहदेव लौटा तो उसने किश्तवार के गद्दी क़बीले के साथ श्रीनगर पर कब्ज़े की कोशिश की लेकिन रामचन्द्र ने खुद को राजा घोषित कर दिया. उसने लार के अपने किले से उतर अंदरकोट पर कब्ज़ा कर लिया और सहदेव की सेना को हरा कर सत्ता पर कब्ज़ा कर लिया. भय से पहाड़ों में जा छिपी जनता जब वापस लौटी तो राजा के लिए उसके मन में कोई सम्मान शेष न था. चारों ओर त्राहि-त्राहि सी मची थी. हालत यह कि पहाड़ी क़बीलों ने इसी बीच हमला कर दिया और बचा-खुचा लूटने के साथ कई लोगों को दास बनाकर ले गए और इन सबके परिणामस्वरूप अकाल की स्थिति पैदा हो गई. जनता की रक्षा के लिए वहां कोई नहीं था. उन्होंने खुद अपनी सेनायें बनाकर इन क़बीलों का सामना किया. रिंचन ने इसका पूरा फ़ायदा उठाया. पहले तो उसने जनता का साथ दिया और फिर शाह मीर तथा अपनी लद्दाखी सेना की सहायता से सैनिकों को वस्त्र व्यापारी के रूप में धीरे धीरे महल के अन्दर भेज कर उचित समय पर महल पर हमला कर रामचंद्र की हत्या कर दी. मौक़े की नज़ाकत को देखते हुए कोटा ने पिता की हत्या को महत्त्व देने की जगह कश्मीर की महारानी के पद को महत्त्व दिया और 6 अक्टूबर 1320  को रिंचन जब कश्मीर की गद्दी पर बैठा तो कोटा उसकी महारानी के रूप में उसके बगल में बैठी. रिंचन ने अपने रामचंद्र के पुत्र रावणचन्द्र को रैना की उपाधि देकर लार परगना और लद्दाख की जागीर दे दी और इस तरह उसे अपना मित्र बना लिया.

क्रमशः ………

संदर्भ सूची –

[i] देखें,  पेज़ 33, हिस्ट्री ऑफ़ सिविलाइज़ेशन ऑफ़ सेन्ट्रल एशिया, सम्पादक : एम एस आसिमोव तथा सी ई बोज्वर्थ,  खंड 4, भाग 1, मोतीलाल बनारसीदास पब्लिशर्स प्राइवेट लिमिटेड, दिल्ली, 1997

[ii] देखें, पेज़ 5, कश्मीर इन क्रूसिबल, प्रेमनाथ बज़ाज़, पाम्पोश पब्लिकेशंस, नई दिल्ली, दूसरा संस्करण, 1967

[iii] देखें, Temple desecration in pre-modern India – Richard M Eaton, फ्रंटलाइन, 9-22 दिसंबर, वर्ष-2000

[iv] देखें, पेज़ 36, कश्मीर अंडर सुल्तान्स, मोहिबुल हसन, प्रकाशक : ईरान सोसायटी,159-बी, धर्मतल्ला स्ट्रीट, कलकत्ता, 1959

[v] देखें, इकॉनमी ऑफ़ कश्मीर अंडर सुल्तान्स,डा मंज़ूर अहमद, इंटरनेशल जर्नल ऑफ़ हिस्ट्री एंड कल्चरल स्टडीज़, वाल्यूम 1, अंक 1, अक्टूबर-दिसम्बर, 2015, पेज़ 39

[vi] देखें, किंग्स ऑफ़ कश्मीर (अनुवाद : जोगेश चन्द्र  दत्त), पेज़ 15, पुस्तक 1, खंड 3, जोनाराजा, ई एल एम प्रेस, कलकत्ता, 1898

Leave a Reply

Your email address will not be published.