मानवीय रिश्तों की गर्माहट को भेदती छद्म आज़ादी से होकर किसी बारीक रेशे की तरह गुजरती जिंदगी के बेहद सूक्ष्म कणों को पकड़ने, जोड़ने का प्रयास करती कवि कुमार अम्बुजकी यह कहानी …..| संपादक 

कहना सुनना 

कुमार अम्बुज

कुमार अम्बुज

|| एक ||
जब पिता इक्यावन के हुये, उन्होंने मुझसे बात करना कम कर दिया था। इसका अहसास मुझे कई सालों बाद हुआ। तब इस देरी के लिए, इस अंतराल के लिए मुझे कुछ दिनों तक बड़ी शर्मिन्दगी रही।
दरअसल, उन्होंने ही एक दिन, जैसे याद दिलाया- ‘तुम तो जानते ही हो कि पिछले कुछ समय से, ठीक से कहूँ तो सात सालों से मैंने तुमसे ज्यादा कहना-सुनना बंद कर दिया है। जब तुमने एक बार मुझे पलटकर जवाब दिया था कि अब मैं छब्बीस का हो गया हूँ और आप मेरे मामलों में ज्यादा टोका-टाकी न किया करें, मैं पहले ही परेशान हूँ। तबसे देखा ही होगा कि मैं तुमसे कुछ नहीं कहता। तुम सुनना भी नहीं चाहते इसलिए मैं चुपचाप अपना काम करता हूँ और तुम्हें पूरी आजादी है। मैं आज यह जानना चाहता हूँ कि पिछले इतने सालों से भी तुम परेशान क्यों हो?’
मेरी चुप्पी को पार करते हुये उन्होंने जोड़ा- ‘संसार का हरेक पिता अपने बच्चों को प्रसन्न देखना चाहता है।’
उस दिन से मैंने खुश होने के बारे में गंभीरता से सोचना शुरू किया। लेकिन पिता ने बाद में भी मुझसे बहुत कम बातचीत करना जारी रखा।

(दो)
माँ ने बताया कि पिता कुछ कम सुनने लगे हैं। कई बार तो उनसे चीखकर, चिल्लाकर कहना पड़ता है। जैसे मैं उन्हें डाँट रही हूँ। जोर से बोलने पर मुझे रोना आ जाता है। मैंने उनसे कभी ऊँची आवाज में बात नहीं की। मुझे लगता है कि मैं रोज दिन में कम से कम पंद्रह-बीस बार उनका अपमान करती हूँ।
पिता तिरेसठ के हो गये थे। मैं उन्हें डाॅक्टर के पास ले गया। डाॅक्टर ने जाँच करने के बाद कहा कि इन्हें पुराना जुकाम है। और अब ‘हियरिंग एड’ लगेगी। पिताजी ने मशीन कुल दो दिन लगायी और अपनी छोटी-सी संदूक में बंद कर दी। कि इससे इतनी तरह की आवाजें आती हैं जितनी वे सुनना नहीं चाहते। और हर एक आवाज बहुत तेज आती है। डाॅक्टर ने और फिर मैंने समझाया कि धीरे-धीरे आदत बन जायेगी। उन्होंने कहा कि वे इतनी आवाजें नहीं सुन सकते। कि वे चिडि़यों की आवाजें और पंखे की घर्र-घर्र की कर्कशता एक साथ, एक जैसी तेज आवाज में नहीं सुन सकते। कि उन्हें चक्कर आने लगते हैं। फिर कुछ रुककर बोले- ‘यों भी केवल तुम्हारी माँ ही मुझसे बात करती है। बेहतर है उसे एक भोंपू दिला दो।’
उस दिन मैंने हिसाब लगाया कि हाँ, बारह साल हो गये हैं।

|| तीन ||
आखिर माँ पिता से चीखकर बातें करते हुये मर गई। वह कहना चाहती थी कि मुझे अस्पताल मत ले जाओ। लेकिन पिता बच्चों के आगे असहाय थे। वह आखिरी बार इतना जोर से चिल्लाई थी कि उसे हृदयाघात हो गया। शायद यह सोचकर भी उसे धक्का पहुँचा हो कि उसने पिता का कुछ ज्यादा ही अपमान कर दिया।
करीब तीन महीने बाद पिता ने संदूक में से ‘हियरिंग एड मशीन’ निकालकर मुझे दी- ‘इसे किसी को दे देना, मुझे इसकी जरूरत नहीं है।’
उसके दो महीने बाद पिता ने पाँच हजार रुपये दिये और कहा कि एक हजार हर महीने के हिसाब से दूँगा। तुम्हारे साथ रहने-खाने के लिये। तुम्हारी माँ थी तो वह घर के काम कर देती थी। मैं घर के काम कुछ कर नहीं सकता।
मैंने कहा- ‘नहीं। यह नहीं होगा। मैं यह पैसे नहीं ले सकता। आप मेरे पिता हैं।’ उन्होंने कान पर हथेली की ओट बनाकर कहा- ‘मुझे साफ सुनाई नहीं दे रहा है लेकिन मैं समझ रहा हूँ कि तुम पैसे लेने के लिये मना कर रहे हो। मगर तुम ये पैसे नहीं लोगे तो मैं यहाँ नहीं रहूँगा।’
पिता इस तरह सत्तर साल के हो गये।

|| चार ||
उनके पास एक पुरानी सायकिल है। उसकी मरम्मत वगैरह वे नियमित रूप से कराते रहे हैं। आज भी वह काफी अच्छी हालत में है। पच्चीस साल पुरानी सायकिल केवल आठ-दस साल पुरानी लगती है। उसमें से घंटी निकलवा दी है। कहते हैं कि खराब हो गई थी। यों भी, कितनी घंटी बजाओ, रास्ते से कोई नहीं हटता। किसी को कुछ सुनाई नहीं देता। इतनी आवाजें सडक पर, बाजार में होती हैं कि उसमें भला सायकिल की घंटी किसे सुनाई देगी? सायकिल तो आजकल किसी को दिखाई भी नहीं देती। उसे कोई वाहन भी नहीं मानता।
और जब घर में ही किसी को कुछ दिखाई-सुनाई नहीं देता, बाहर का आदमी क्यों कुछ सुनेगा? और वह भी सायकिल की घंटी। आखिर तूती भी कब तक बजाई जा सकती है, जब कोई कुछ सुनना ही नहीं चाहता।

|| पाँच ||
अब वे सायकिल का हेण्डिल थामकर पैदल चलते हैं। जैसे सायकिल को घुमाने ले जा रहे हों। या सायकिल उनकी चलित-छड़ी हो। वे सड़क पर एक किनारे चलते हैं। पूरा कस्बा उन्हें पहचानता है। खासतौर पर आॅटोवाले और सड़कों पर रोज जीप-मेटाडोर, मोटरसायकिल चलानेवाले लोग। दूधवाले भी। उन्हें देखकर कोई हाॅर्न नहीं बजाता। वे अपनी एक पटरी बनाकर चलते हैं। उन्हें देखकर जो हाॅर्न बजाये, वह बेवकूफ ही कहलाएगा। या फिर वह अजनबी होगा या उसे रतौंधी होगी।
सब्जी लाना उनकी दिनचर्या में शामिल है। चाहे फिर वे एक पाव पालक या सिर्फ पुदीना ही लाएँ। वे सब्जीमंडी में सर्वाधिक परिचित ग्राहक हैं। फुटपाथ पर बैठे किसी भी सब्जीवाले के पास जाते हैं, और उससे कुछ नहीं कहते। वह जान लेता है कि उन्हें क्या चाहिए और कितना। जितने पैसे वे देते हैं, वह रख लेता है। कभी कुछ वापस भी कर देता है। कभी-कभी पिता उनके हाल पूछते हैं- ‘अच्छे हो!’ यह उनका पसंदीदा सवाल या वाक्य है। उम्मीद है। कामना है। हर बार राजकपूर की तरह हथेली दिखाकर उन्हें आश्वस्त कर दिया जाता है।
लौटते हुए अक्सर वे मंदिर जाते हैं और बाहर के बरगद के पेड़ के चारों ओर बने चबूतरे पर बैठ जाते हैं। सायकिल को विश्राम मिलता है तो वे भी तरोताजा हो जाते हैं। मंदिर के भीतर जाकर, मूर्ति से कुछ कहते या माँगते हुए उन्हें किसी ने नहीं सुना। घर में भी उन्हें किसी ने चाय या रोटी कहते नहीं सुना।
उन्होंने अब प्रतिमाह डेढ़ हजार रुपये देना शुरू कर दिए हैं।

|| छह ||
इधर कुछ अरसे से वे रोज लायब्रेरी जाते हैं। शाम पाँच से सात। सिंधिया के जमाने की लायब्रेरी घर के एकदम पास है। पुरानी बड़ी-बड़ी, हिलती-डुलती मेजें। वैसी ही बेंचें। भारी पंखे। दीवारों से प्लास्टर से पहले वह कलई की पपड़ी गिरती है जो अनेक बार की पुताई से बन जाती है। जिसके गिरने से कोई आवाज नहीं होती।
लायब्रेरी बंद क्यों नहीं हो रही है, यह अचरज और कोफ्त का विषय हो सकता है। लायब्रेरी में अब पहले से भी अधिक, अपूर्व शांति छाई रहती है। बोलना मना है, इसलिए सुनना भी मना हो जाता है। दस-बारह अधेड़ या बुजुर्ग लोगों द्वारा अखबारों को उलटने-पलटने की आवाजें भी वाचनालयीन शांति का हिस्सा लगती हैं। युवक यहाँ नहीं आते। उधर कोने में वह पट्टी है, जो गलत वर्तनी के कारण भी अपना ध्यान खींचती है- ‘कृप्या, शांति बनाए रखें।’ कभी सफेद रहे इसके अक्षर धूल और नमी से धुँधले हो चले हैं।
बहुत कम बातचीत का क्रम जारी रखे हुए पिता को अब पच्चीस बरस से ऊपर हो गए हैं।

(‘दस्तक’ से साभार)

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    By: कुमार अम्बुज

    जन्म:- 13 अप्रैल 1957, गुना (मध्य प्रदेश)
    भाषा:- हिंदी
    विधाएँ:- कविता, आलोचना, वैचारिक लेख
    प्रमुख कृतियाँ:- कविता संग्रह : किवाड़, क्रूरता, अनंतिम, अतिक्रमण, अमीरी रेखा
    कहानी संग्रह: इच्छाएँ,
    पुरस्कार/सम्मान:- भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, केदार सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार, गिरजाकुमार माथुर सम्मान
    संपर्क:- एचआईजी सी 10, तृतीय तल, गुलमोहर ब्‍लॉक, ग्रीन मीडोज, अरेरा हिल्‍स, पुरानी जेल रोड, भोपाल – 462011
    मोबाइल:- 09424474678
    ई-मेल- [email protected]
    वेबसाइट- kumarambuj.blogspot.com

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One Response

  1. shahnaz

    बहुत बढ़िया। ..पिता का संस्मरण।

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